कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अपना सम्मान बढ़ाने के लिये पाखंड करना अनुचित
आधुनिक समाज में प्रचार तंत्र का बोलबाला है। फिल्म हो या टीवी इनमें अपना चेहरा देखने और दिखाने के लिये लोगों के मन में भारी इच्छा रहती है। यही कारण है कि लोग अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये तमाम तरह के पाखंड करते हैं। हमारे देश में लोग धर्मभीरु हैं इसलिये अनेक पाखंडी धार्मिक पहचान वाले वस्त्र पहनकर उनके मन पर प्रभाव डालते हैं। अनेक गुरु बन गये हैं तो उनके शिष्य भी यही काम कर रहे हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इसे बिडाल वृत्ति कहा गया है। मूल रूप से धर्म अत्यंत निजी विषय हैं। दूसरी बात यह है कि सांसरिक विषयों में लिप्त लोगों से यह अपेक्षा तो करना ही नहीं चाहिये कि वह धर्माचरण का उदाहरण प्रस्तुत करें। सार्वजनिक स्थानों पर धर्म की चर्चा करना एक तरह से उसका बाजारीकरण करना है। इससे कथित धर्म प्रचारकों को धन तथा प्रतिष्ठा मिलती है। सच्चा धार्मिक आदमी तो त्यागी होता है। उसकी लिप्पता न धन में होती है न प्रतिष्ठा पाने में उसका मोह होता है। उसकी प्रमाणिकता उसके मौन में होती है न कि जगह जगह जाकर यह बताने कि वह धर्म का पालन कर रहा है तो दूसरे भी करें।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है
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अधोदृष्टिनैष्कृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः।
शठो मिथ्याविलीतश्च बक्रवतवरो द्विजः।।
हिन्दी में भावार्थ-उस द्विज को बक वृत्ति का माना गया है जो असत्य भाव तथा अविनीत हो तथा जिसकी नजर हमेशा दूसरों को धन संपत्ति पर लगी रहती हो जो हमेशा बुरे कर्म करता है सदैव अपना ही कल्याण की सोचता हो और हमेशा अपने स्वार्थ के लिये तत्पर रहता है।
धर्मध्वजी सदा लुब्धश्छाद्मिका को लोकदम्भका।
बैडालवृत्तिको ज्ञेयो हिंस्त्र सर्वाभिसन्धकः।।
हिन्दी में भावार्थ-अपनी प्रतिष्ठा के लिये धर्म का पाखंड, दूसरों के धन कर हरण करने की इच्छा हिंसा तथा सदैव दूसरों को भड़काने के काम करने वाला ‘बिडाल वृत्ति’ का कहा जाता है।
जैसे जैसे विश्व में धन का प्रभाव बढ़ रहा है धर्म के ध्वजवाहकों की सेना भी बढ़ती जा रही है। इनमें कितने त्यागी और ज्ञानी हैं इसका आंकलन करना जरूरी है। अध्यात्मिक और धर्म ज्ञानी कभी अपने मुख से ब्रह्म ज्ञान का बखान नहंी करते। उनका आचरण ही ऐसा होता है कि वह समाज के लिये एक उदाहरण बन जाता है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व ही धर्म की पोथी का निर्माण करता है। अगर उनसे आग्रह किया जाये तो वह संक्षिप्त शब्दों में ही अध्यात्मिक ज्ञान बता देते हैं। जबकि आजकल पेशेवर ज्ञान प्रवचक घंटों भाषण करने के बादी श्रोताओं को न तो धर्म का अर्थ समझा पाते हैं न उनके शिष्य कभी उनके मार्ग का अनुसरण करते हैं। यही कारण है कि इतने सारे धर्मोदेशक होते हुए भी हमारा समाज भटकाव की राह पर है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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संत कबीर दर्शन-झुककर ही पानी पीना संभव
हर मनुष्य को स्वाभिमान से जीवन व्यतीत करना चाहिए। इसका अर्थ भी यह कदापि नहीं है कि विनम्रता का त्याग करें। हमेशा इस अकड़ में गरदन ऊपर कर न चलें कि आपको किसी की जरूरत नहीं है। समय के अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन लाते रहना चाहिए। न इतना विनम्र होना चाहिए कि लोग कायर समझने लगें न इतनी उग्रता दिखायें कि लोग अहंकारी समझें। जहां से मदद और कृपा की आशा हो वहां तो विनम्रता दिखाना चाहिए जहां से न हो वहां भी सरल व्यवहार रखकर यह साबित करें कि आप में निरंकार का भाव है।
इस संसार में अपने पद, पैसे और प्रतिष्ठा के मद में रहने वाले लोग बहुत मिल जाते हैं और जब उनका पतन होता है उनकी उसी समाज हंसी भी उड़ती है जिससे वह अपने वैभव से पीड़ित किये रहते हैं। जीवन अनेक रंगों से भरा है। कभी दुःख है तो कभी सुख, कभी हृास है तो कभी परिहास, कभी सौंदर्य का बोध होता है तो कभी वीभत्स रूप सामने आता है। ऐसे में मनुष्य को अपने मन पर नियंत्रण रखना चाहिए। इसके साथ ही वाणी में सदैव मिठास रखते हुए लोगों के साथ प्रेमपूर्वक वार्तालाप करने से अपनी स्वयं की छवि बनती है।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि
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ऊंचा पानी न टिकै, नीचै ही ठहराय।
नीचा होय सा भरि पियै, ऊंच पियासा जाए।
‘‘पानी कभी ऊंचाई पर नहीं टिकता वह नीचे की तरफ बहता है। उसी तरह जिस व्यक्ति को पानी पीना होता है उसे गरदन नीचे करनी पड़ती है। जो अकड़ कर गरदन ऊंची रखता है उसे पानी भी नसीब नहीं होता।’’
हम जब भी पानी पीते हैं तो गरदन झुकाना पड़ती है। चाहे ग्लास में पियें या सीधे नल से मगर अपनी गर्दन झुकानी पड़ती है। हालांकि कुछ लोग कह सकते हैं कि गरदन अकड़ कर बोतल से भी पानी पिया जा सकता है तो उनको यह भी बता दें कि स्वास्थ्य वैज्ञानिक इस तरह सीधे पानी पीने से देह को हानि पहुंचने की आशंकायें अब जताने लगे हैं। उनका कहना है कि सीधे गले में पानी न डालते हुए मुख के माध्यम से अंदर पानी पीना चाहिए। इससे एक बात पता लगती है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन भी विज्ञान से परिपूर्ण है।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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संत कबीर के दोहे-पराई नारी से मजाक न करो
मनुष्य अपने सुख के पल तो एकदम सहजता से गुजार लेता है पर जब दुःख आता है तो भगवान को याद करता है। सच बात तो यह है कि मनुष्य अपने संकटों को स्वयं ही आमंत्रित करता है। कई बार तो ऐसे वाद विवादों को जन्म देता है जिसके मूल में सिवाय अहंकार के कुछ अन्य नहीं होता। हंसी मजाक में झगड़े होते हैं। कुछ पुरुषों की आदत होती है वह अपने साथ वार्तालाप करने वाली स्त्रियों के साथ हंसी मजाक कर अपना दिल बहलाते हैं। वह समझते हैं कि अपने आपको बुद्धिमान साबित कर अपने लिये प्रतिष्ठा अर्जित कर रहे हैं पर होता उसका उल्टा है। उनको लोग हल्का या अगंभीर मानते हैं। कभी कभी इस बात पर झगड़े तक हो जाते हैं।
इस विषय पर संत कबीर कहते हैं कि
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दीपक झोला पवन का, नर का झोला नारि।
साधू झोला शब्द का, बोलै नाहिं बिचारि।।
वायु का झौंका दीपक के लिये भय देने वाला होता है तो नारी का संकट पुरुष के लिये परेशानी का कारण होता है। उसी तरह यदि ठीक से विचार कर शब्द व्यक्त न किया जाये तो वह साधुओं के लिये संकट का कारण बनता है।
पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचै कोय।
कबहूं छेड़ि न देखिये, हंस हंसि खावे रोय।
दूसरे आदमी की नारी से कभी कोई हंसी या मजाक न करो क्योंकि वह उस छुरी के समान है जो आदमी को हंसकर या रोकर अंततः काट देती है।
अनेक पुरुष दूसरे की स्त्रियों से वार्तालाप कर अपने मनोरंजन की प्राप्ति करते हैं। यह मनोरंजन अंततः उनको महंगा पड़ता है। देखा तो यह जा रहा है कि आधुनिक समाज में केवल इसी बात पर अनेक झगड़े हो जाते हैं कि किसी ने परस्त्री के साथ मजाक किया। अनेक लोग इस चक्कर में बदनाम हो जाते हैं कि वह परस्त्रियों से अपने संबंध बनाते हैं। ऐसा नहीं है कि समाज में पहले ऐसा नहीं होता था। अगर यह बात होती तो हमारे संत महापुरुष इस बुराई की तरफ प्राचीनकाल से सचेत नहीं करते पर वर्तमान आधुनिक समय में परस्त्रियों से से अश्लील अथवा द्विअर्थी संवाद के साथ वार्तालाप करना एक फैशन हो गया है जो कि देश की सांस्कृतिक परंपराओं के भी विरुद्ध है।
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चाणक्य नीति-गीदड़ की अपेक्षा सिंह की गुफा में जाना अच्छा
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नीचप्रसंङ्गा कुलहीनसेवा चिह्ननि देहे नरकास्थितानाम्।।
‘‘अत्यंत क्रोध करना अति कटु कठोर तथा कर्कश वाणी होना, निर्धनता, अपने ही बंधु बांधवों से बैर करना, नीचों की संगति तथा कुलहीन की सेवा करना यह सभी स्थितियां प्रथ्वी पर ही नरक भोगने का प्रमाण है।’’ गम्यते यदि मृगेन्द्र-मंदिर लभ्यते करिकपोलमौक्तिम्।
जम्बुकाऽऽलयगते च प्राप्यते वत्स-पुच्छ-चर्म-खुडनम्।।
‘‘कोई मनुष्य यदि सिंह की गुफा में पहुंच जाये तो यह संभव है कि वहां हाथी के मस्तक का मोती मिल जाये पर अगर वह गीदड़ की गुफा में जायेगा तो वहां उसे बछड़े की पूंछ तथा गधे के चमड़ का टुकड़ा ही मिलता है।’’
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सामवेद के आधार पर चिंत्तन-मनुष्य हर दिन युद्ध करता है
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हिदी दिवस पर लेख-हिंदी का महत्व क्या है किसे और कैसे समझाए
हिन्दी दिवस के तत्काल बाद उनका जो हाल होगा वह दर्दनाक दिखेगा। 14 सितंबर के आसपस ऐसा लगेगा कि पूरा देश हिन्दी मय हो रहा है तो तत्काल बाद यह अनुभव होगा कि अंग्रेजी माता ने अपना वर्चस्व प्राप्त कर लिया है। एक तरह से 14 सितंबर का दिन अंग्रेजी के लिये ऐसा ही होता है जैसे कि सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण। उस दौरान अंग्रेजी और भारतीय समाज के बीच हिन्दी नाम का ग्रह ऐसे ही आता है जैसे ग्रहण लग रहा हो। धीरे धीरे जैसे ग्रहण हटता वैसे ही कम होती पाठक संख्या अं्रग्रेजी को अपने पूर्ण रूप में आने की सुविधा प्रदान करती है।
यह ब्लॉग लेखक अंतर्जाल पर छह साल से सक्रिय है। प्रारंभ में हिन्दी दिवस पर अनेक लेख लिखे। यह लेख आजकल अंतर्जाल पर छाये हुए हैं। इसमें एक लेख हिन्दी के महत्व पर लिखा था। उस पर कुछ बुद्धिमान पाठक अक्सर नाराजगी जताते हैं कि उसमे हिन्दी का महत्व नहीं बताया गया। कुछ तो इतनी बदतमीजी से टिप्पणियां इस तरह लिखते हैं जैसे कि लेखक उनके बाप का वेतनभोगी नौकर हो। तब मस्तिष्क के क्रोध की ज्वाला प्रज्जवलित होती है जिसे अपने अध्यातिमक ज्ञान साधना से पैदा जल डालकर शांत करना पड़ता है। अंतर्जाल पर अब हमारा सफर अकेलेपन के साथ है। पहले इस आभासी दुनियां के एक दो मित्र अलग अलग नामों से जुड़े थे पर फेसबुक के प्रचलन में आते ही वह नदारत हो गये। यह मित्र व्यवसायिक लेखक हैं यह अनुमान हमने लगा लिया था इसलिये उनकी आलोचना या प्रशंसा से प्रभावित नहीं हुए। अलबत्ता उनके बारे में हमारी धारणा यह थी कि वह सात्विक प्रवृत्ति के होंगे। इनमें से कुछ मित्र अभी भी ब्लाग वगैरह पर सम्मेलन करते हैं पर हमारी याद उनको याद नहीं आती। इससे यह बात साफ हो जाती है कि अंतर्जाल पर लेखन से किसी प्रकार की आशा रखना व्यर्थ है। सवाल यह पूछा जायेगा कि फिर यह लेख लिखा क्यों जा रहा है?
हिन्दी लेखन केवल स्वांतसुखाय ही हो सकता है और जिन लोगों को यह बुरी आदत बचपन से लग जाती है वह किसी की परवाह भी नहीं करते। लिखना एकांत संाधना है जिसमें सिद्ध लेखन हो सकता है। शोर शराबा कर लिखी गयी रचना कभी सार्थक विंषय को छू नहीं सकती। जिस विषय पर भीड़ में या उसे लक्ष्य कर लिखा जायेगा वह कभी गहराई तक नहीं पहुंच सकता। ऐसे शब्द सतह पर ही अपना प्रभाव खो बैठते हैं। इसलिये भीड़ में जाकर जो अपनी रचनाओं प्रचार करते हैं वह लेखक प्रसिद्ध जरूर हो जाते हैं पर उनका विषय कभी जनमानस का हिस्सा नहंीं बनता। यही कारण है कि हिन्दी में कबीर, तुलसीदास, मीरा, सूरदास, रहीम तथा भक्ति काल के गणमान्य कवियों के बाद उन जैसा कोई नहीं हुआ। प्रसिद्ध बहुत हैं पर उनकी तुलना करने किसी से नहीं की जा सकती। वजह जानना चाहेंगे तो समझ लीजिये संस्कृत के पेट से निकली हिन्दी अध्यात्म की भाषा है। सांसरिक विषयों -शिक्षा, स्वास्थ्य, साहित्य तथा विज्ञान- पर इसमें बहुत सारे अनुवाद हुए पर उनका लक्ष्य व्यवसायिक था। इससे हिन्दी भाषियों को पठन पाठन की सुविधा हुई पर भाषा तो मौलिक लेखन से समृद्ध होती है। जिन लोगों ने मौलिक साहित्य लेखन किया वह सांसरिक विषयों तक ही सीमित रहे इस कारण उनकी रचनायें सर्वकालीन नहीं बन सकीं। भारतीय जनमानस का यह मूल भाव है कि वह अध्यात्म ज्ञान से परे भले ही हो पर जब तक किसी रचना में वह तत्व नहीं उसे स्वीकार नहीं करेगा। यही कारण है कि जिन लेखकों या कवियों से अध्यात्म का तत्व मिला वह भारतीय जनमानस में पूज्यनीय हो गया।
हिन्दी भाषा को रोटी की भाषा बनाने के प्रयास भी हुए। उसमें भी सफलता नहीं मिली। कुछ लोगों ने तो यह तक माना कि हिन्दी अनुवाद की भाषा है। यह सच भी है। भारत विश्व में जिस प्राचीनकालीन अध्यात्मिक ज्ञान के कारण गुरु माना जाता है वह संस्कृत में है। यह तो भारत के कुछ धाार्मिक प्रकाशन संगठनो की मेहरबानी है कि वह ज्ञान हिन्दी में उपलब्ध है । इतना ही नहीं हिन्दी के जिस भक्तिकाल को स्वर्णकाल भी कहा जाता है वह भी कवियों की स्थानीय भाषा में है जिसे हिन्दी में जोड़ा गया। सीधी बात है कि हिन्दी भाषा संस्कृत और भारतीय भाषाओं की नयी पीढ़ी है। व्यापक होने के कारण इसने राष्ट्रभाषा का दर्जा पा लिया है। अब यही भाषा आगे बढ़ रही है। यह अलग बात है कि हिन्दी भाषा की चिंता करने वाले कुछ बुद्धिजीवी अफलातूनी निर्णयों और प्रयासों से हिन्दी भाषियों को भटकाव के रास्ते पर ले चल पड़े हैं। उनके निर्णय और प्रयास हिन्दी भाषा के विकास से अधिक हिन्दी भाषियों को गुलाम बनाये रखने के लिये अधिक हैं। पहला निर्णय तो हिन्दी में अंग्र्रेजी भाषा के शब्द जबरन शामिल करने वाला है। अगर यह निर्णय सर्वमान्य हो जाये तो हिन्दी में केवल हो गया, आ गया, आ रहा है, है, हो रहा है और था यानि केवल क्रियात्मक शब्द ही रह जायेंगे। आखिर वह ऐसा क्यों कर रहे हैं? अक्सर हम लोग सुनते हैं कि मानव तस्करी होती है। इसे तस्करी इसलिये कहा जाता है क्योंकि वह गैर कानूनी है मगर कागजों पर कानूनी रूप से मनुष्य की कबूतरबाजी भी होती है जिसे हम मानव निर्यात कह सकते हैं। यहां का आदमी विकसित देशों में जाकर नौकरी करे इसी कारण उसे हिन्दी भाषा के सहारे अंग्रेजी का ज्ञान कराया जा रहा है। इसका प्रमाण यह है कि अमेरिका में किसी उच्च पद पर पहुंचने वाले आदमी का यहां गुणगान किया जाता है। इस तरह यह संदेश यहां नयी पीढ़ी को दिया जाता है कि अगर तुम्हारे अंदर प्रतिभा है तो बाहर जाओ यहां तुम्हारे लिये कुछ भी नहीं। अमेरिका में सफल होकर ही तुम हमारा नाम रौशन कर सकते हैं। यह गुलाम संस्कृति का साम्राज्यवादी स्वरूप है। विकसित देश अपना राज्य कायम करने के लिये लड़ते हैं तो यहां के बुद्धिमान गुलामी पाने के लिये वैसा ही संघर्ष करते दिखते है।
एक दूसरा प्रयास भी हो रहा है। हिन्दी को रोमन लिपि में लिखने का। इतना घटिया प्रयास देखकर यह लगता है कि जैसे देश से गुलाम बाहर भेजने की कुछ लोगों को बहुत जल्दी है। अध्यात्म ज्ञान से पैदल लोगों को श्रीमद्भागवत गीता का कोई सिद्धांत समझाना कठिन है। ऐसे में उनको सांसरिक विषय का यह सिद्धांत बताना भी मूर्खता है कि भाषा और भाव का संबंध भूमि से होता है। भारत भूमि के लिये न तो अंग्रेजी की गुंजायश है न अरबी की। यहां से वहां लोग जा सकते है पर भाषा भाव और भूमि तो यहीं रहनी है। हिन्दी दिवस के मौके पर नयी पीढ़ी के लोगों को सलाह है कि वह खूब अंग्रेजी पढ़ें। खूब लिखें पर वह शुद्ध हो। उसी तरह हिन्दी में पढ़ें और लिखें पर उसका मौलिक स्वरूप भूलें नही। उनको हिन्दी कभी कमाकर नहीं देगी पर अंग्रेजी कभी उनको शांति नहीं देगी। अगर वह दोनों का मिश्रण करेंगे तो रोटी और शांति दोनों से जायेंगे। भारत में गरीब और निम्म मध्यम वर्ग के लोगों के बीच हिन्दी हमेशा रहेगी और उनको उनको सम्मान नहीं मिलेगा तो अंग्रेजी में हिन्दी मिक्चर से उनको विदेश में भी नौकरी नहीं मिलेगी।
आखिर में एक मजेदार बात। कहा जाता है कि संस्कृत में बाहरी भाषाओं के शब्द शामिल करने की गुंजायश न होने के कारण लुप्त हो गयी। इसके बावजूद यह सच्चाई है कि संस्कृत को जानने वाले विद्वानों को आज भी अत्यंत सात्विक माना जाता है। जिनको संस्कृत का ज्ञान है उनको लो सम्मानीय मानते हैं। जिस तरह हिन्दी के कर्णधार हिन्दी को हिंग्लिश बना रहे हैं उससे हिन्दी जानने वालों को भी आगे चलकर ऐसे ही अध्यात्मिक पुरुष माना जायेगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि कमाने के लिये भाषा महत्वपूर्ण नहीं है। विभाजन पूर्व भारत से बाहर गये भारतीयों ने बिना अंग्रेजी के वहां अपने धंधे कायम किये। उसी तरह विभाजन बाद वर्तमान भारत में आये लोगों को हिन्दी नहीं आती पर वह यहां जम गये। मूल बात है अपना व्यवहार और योग्यता। इन दोनों के लिये अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली होना आवश्यक है। हिन्दी भाषा के ज्ञान से ऐसी शक्ति आती है। यह बात हमने इसलिये लिखी क्योंकि अब हमने हिन्दी भाषा से अलग होती एक हिंग्लिश भाषा का अभ्युदय भी देख लिया है जिसे बोलने वाले रोजी रोटी पाने के लिये जुगाड़ कर रहे हैं। ऐसे में अध्यात्मिक रूप से बलशाली बने रहने के लिये हमारी वाणी, विचार तथा व्यवहार में शुद्ध हिन्दी का होना अनिवार्य है।
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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विदुरनीति-अपनी शक्ति से अधिक वस्तु की कामना करना तकलीफदेह
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द्वाविमौ कपटकी तीक्ष्णौ शरीरपरिशोधिणौ।
यश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यस्यनीश्वरः।।
‘‘गरीब मनुष्य जब अपने पास उपलब्ध धन से अधिक मूल्यवान वस्तु की कामना करता है और अस्वस्थ या कमजोर होने पर क्रोध की शरण लेता है तब वह अपने ही शरीर को सुखाने का काम करता है।’’
द्वावम्भसि निचेष्टच्यौ गलै बध्वा दृढां शिलाम्।
धनवन्तमदातारं दरिद्र चापस्विनम्।।
‘‘मनुष्य धन होने पर दान न करे और गरीब होने पर कष्ट सहन न कर सके उसे गले में पत्थर मजबूत पत्थर बांधकर पानी में डुबा देना चाहिए।’’
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चाणक्य नीति दर्शन-खामोशी में बहुत बड़ी ताकत है
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ये तु संवत्सरं पूर्ण नित्यं मौनेन भुंजते।
युगकोटिसहस्त्रं तु स्वर्गलोके महीयते।।
‘‘जो मनुष्य एक वर्ष तक मौन रहकर बिना बोले भोजन करता है, वह अवश्य ही जीवन में मान सम्मान प्राप्त करने के अलावा बाद में भी स्वर्ग भोगता है।’’
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मनु स्मृति-जिस खेल में पैसा दाव पर लगे जुआ कहलाता है
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अप्राणिभिर्यत्क्रियते तल्लोके द्यूतमच्यते।
प्राणिभिः क्रियतेयस्तु सः विज्ञेयः समाह्वयः।।
विकर्म क्रियर्यानित्य बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः।।
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भर्तृहरि नीति शतक-नालायक लोग गुणवानों में भी कमी निकलते हैं
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जाङ्यं ह्नीमति गणयते व्रतरुचौ दम्भः शुचौ कैतवं शूरे निर्घृणता मुनौ विमतिता दैन्यं प्रियालापिनि।
तेजस्विन्यवलिप्तता मुखरता वक्तर्यशक्तिः स्थिरे तत्को नाम गुणो भवेत् गुणिनां यो दुर्जनैनाकितः।।
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पतंजलि योग विज्ञान-ध्यान करने से तनाव मुक्त रहना संभव
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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सुखानुशयी रागः।
‘‘सुख के अनुभव के पीछे रहने वाला क्लेश राग है।’’
‘‘दुःखानुशयी द्वेषः।
‘‘दुःख के अनुभव पीछे रहने वाला क्लेश द्वेष है।’’
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूडोऽभिनिवेशः।।
‘‘मनुष्य जाति में परंपरागत रूप से स्वाभाविक रूप से जो चला आ रहा है वह मृत्यु का क्लेश ज्ञानियों में भी देखा जाता है। उसे अभिनिवेश कहा जाता है।’’
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।
‘‘ये सभी सूक्ष्मावस्था से प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करने योग्य हैं।’’
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।
‘‘उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नष्ट करने योग्य हैं।’’
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नीचप्रसंङ्गा कुलहीनसेवा चिह्ननि देहे नरकास्थितानाम्।।
‘‘अत्यंत क्रोध करना अति कटु कठोर तथा कर्कश वाणीक होना, निर्धनता, अपने ही बंधु बांधवों से बैर करना, नीचों की संगति तथा कुलहीन की सेवा करना यह सभी स्थितियां प्रथ्वी पर ही नरक भोगने का प्रमाण है।’’ गम्यते यदि मृगेन्द्र-मंदिर लभ्यते करिकपोलमौक्तिम्।
जम्बुकाऽऽलयगते च प्राप्यते वत्स-पुच्छ-चर्म-खुडनम्।।
‘‘कोई मनुष्य यदि सिंह की गुफा में पहुंच जाये तो यह संभव है कि वहां हाथी के मस्तक का मोती मिल जाये पर अगर वह गीदड़ की गुफा में जायेगा तो वहां उसे बछड़े की पूंछ तथा गधे के चमड़ का टुकड़ा ही मिलता है।’’
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राज्ञः कोषोपहर्तृश्च प्रतिकूलेष च स्थितान्।
घातयेद्विविधैर्दण्डैररीणां चोयजापकान्।।
सन्निधातृंश्चैव मोषस्य हन्याच्यौरमिवेश्वरः।।
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भारतीय वेद शस्त्रों के आधार पर संदेश-वायु भी औषधि का काम करती है
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वात ते गृहेऽमृतस्य निधिर्हितः।
ततो नो देहि जीवसे।।
प्र ण आयूँरिर तारिषत्।।
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भर्तृहरि नीति शतक-वाणी पर काबू रखकर ही प्रभाव जमाया जा सकता है
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दह्यमानाः सुतीत्रेण नीचा पर-यशोऽगिना।
अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकृर्वते।।
‘‘दुर्जन आदमी दूसरों की कीर्ति देखकर उससे ईर्ष्या करता है और जक स्वयं उन्नति नहीं कर पाता तो प्रगतिशील आदमी की निंदा करने लगता है।’’
यदीच्छसि वशीकर्तु जगदकेन कर्मणा।
परापवादस्सयेभ्यो गां चरंतीं निवारथ।।
‘‘यदि कोई व्यक्ति चाहता है कि वह समस्त संसार को अपने वश में करे तो उसे दूसरों की निंदा करना बंद कर देना चाहिए। अपनी जीभ को वश में करने वाला ही अपना प्रभाव समाज पर रखता है।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शक्तिशाली और कुलीन लोग किसी को बेवजह परेशान नहीं करते
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नहि स्वसुखमन्विच्छन् पीडयेत् कृपणं नृपः।
कृषणः पीडयमानोहि मन्युना हन्ति पार्थिवम्।।
अल्पसाराणि भूतानि पीडयेदिविचारम्।।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-प्रकृति के प्रकोप पर ध्यान रखना चाहिए (kautilya ka arthashastra-prikrati ka prakop pa dhyan dena chahiye)
प्रकृतिव्यसनानि भूतिकामः समुपेक्षेत नहि प्रमाददर्पात।
प्रकृतिव्यसनान्युपेक्षते यो न चिरातं रिपवःपराभतवन्ति।।
न राज्यव्यसनापोहसमर्थ राज्यपूर्जितम्।।
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आस्था और विश्वास-हिन्दी शायरी
कभी बाहर दिखाया नहीं जाता,
विश्वास का दावा
कभी कागज पर लिखाया नहीं जाता।
कहें दीपक बापू
नीयत से हैं जो फरिश्ते
वह कभी
अपने काम का ढिंढोरा नहीं पीटते,
बदनीयत करते इंसान होने का दावा
मगर जज़्बातों को मतलब के लिये पीसते,
जहान को बर्बाद कर
अपने लिये एय्याशी खरीदने वालों को
जिंदगी का कायदा कभी सिखाया नहीं जाता।
चाणक्य नीति-छात्र छात्राएँ मनोरंजन से दूर रहें (chankya niti-chhatra chhatraen aur manoranjan)
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कामं क्रोधं तथा लोभं स्वादं श्रृंगारकौतुके।
अतिनिद्राऽतिसेवे च विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत्।।
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हिन्दू धर्म संदेश-कुशल लोग ही कर सकते हैं राष्ट्र की रक्षा (kushl log kar sakte hain rashtra ki raksha-hindu dharma sandesh)
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सत्यं बृहदृत्तामृग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्पुरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु्।।
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श्रीगुरु नानक देव जयंती/प्रकाश पर्व पर विशेष हिन्दी लेख (special hind artilce on birth day of shri guru nanakdev jayanti or prakasha parva))
writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior
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भारतीय वेद शास्त्र-वायु भी बीमारी के इलाज के लिये दवा बन सकती है (bhartiya ved shastra-air is a medicin)
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वात ते गृहेऽमृतस्य निधिर्हितः।
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चाणक्स नीति शास्त्र-जिसके पास अपनी बुद्धि न हो उसका वेद भी भला नहीं कर सकते (chankya neeti shastra-jiske paas buddhi n ho bed shastra bhee usk bhala nahin kar sakte)
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अन्तःसारविहीनानामुपदेशो न जायते।
‘‘जिसके अंदर योग्यता का अभाव है और जिसका हृदय अत्यंत मैला है उस पर किसी के उपदेश वैसे ही कोई प्रभाव नहीं होता जैसे मलयागिरी से आने वाली वायु के स्पर्श से भी बांस चंदन नहीं बनता।
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करीति किम्।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति।।
‘‘जिसके पास स्वयं ही बुद्धि नहीं है वेद शास्त्र उसे कोई लाभ नहीं कर सकते। वैसे ही जैसे जन्मांध व्यक्ति के दर्पण कोई कार्य नहीं कर सकता।
दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो न हि भूतले।
अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत्।।
‘‘दुष्ट व्यक्ति को सज्जन बनाने के लिये भूमि पर कोई भी उपाय नहीं है जैसे मलत्याग करने वाली इंद्रिय को सौ प्रकार से धोने पर भी वह श्रेष्ठ नहीं हो पाती।
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भारतीय धर्म ग्रंथों से संदेश-अपने प्राण लेने वाला व्यक्ति शोक करने योग्य नहीं
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आत्मत्यागनि पतिताश्च नाशौचोदकभाजः।
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अथर्ववेद से संदेश-जो अहंकारी को परास्त करे वही इन्द्र समान राजा
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यः शर्धते नानुददाति शुध्यां दस्योर्हन्ता स जनास इन्द्रः।
‘‘जो मनुष्य अहंकारी के अहंकार को दमन करता है और जो दस्युओं को मारता है वही इन्द्र है।’’
यो जाभ्या अमेथ्यस्तधत्सखायं दुधूर्षति।
ज्योष्ठो पदप्रचेतास्तदाहु रद्यतिगति।
‘‘जो मनुष्य दूसरी स्त्री को गिराता है, जो मित्र की हानि पहुंचाता है जो वरिष्ठ होकर भी अज्ञानी है उसको पतित कहते हैं।’’
एक बात निश्चित है कि जैसा आदमी अपना संकल्प धारण करता है उतनी ही उसकी देह और और मन में शक्ति का निर्माण होता है। जब कोई आदमी केवल अपने परिवार तथा स्वयं के पालन पोषण तक ही अपने जीवन का ध्येय रखता है तब उसकी क्षमता सीमित रह जाती है पर जब आदमी सामूहिक हित में चिंत्तन करता है तब उसकी शक्ति का विस्तार भी होता है। शक्तिशाली व्यक्ति वह है जो दूसरे के अहंकार को सहन न कर उसकी उपेक्षा करने के साथ दमन भी करता है। समाज को कष्ट देने वालों का दंडित कर व्यवस्था कायम करता है। ऐसी मनुष्य स्वयं ही देवराज इंद्र की तरह है जो समाज के लिये काम करता है। शक्तिशाली मनुष्य होने का प्रमाण यही है कि आप दूसरे की रक्षा किस हद तक कर सकते हैं।
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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भारतीय धर्म ग्रंथों से संदेश-भगवान विष्णुनारायण से कर्म की प्रेरणा लेना चाहिए (bhagwan vishnu narayan se karma ki prernaa lekh-bhartiya dharma granthon se)
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विष्णोः कर्माणि पश्चत यतो व्रतानि पस्पशे।
‘‘भगवान विष्णु के पुरुषार्थों को देखो और उनका स्मरण करते हुए अनुसरण करो।’
ऋतस्य पथ्या अनु।
‘‘ज्ञानी सत्य मार्ग का अनुसरण करते हैं।’’
‘प्रेता जयता नर।’
आगे बढ़ो और विजय प्राप्त करो।’’
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