अपना ज्ञान बघारते हुए-हिन्दी कहानी


वह ज्ञानी थे और अभी प्रवचन कार्यक्रम कर लौटे थे। मेरे से उनकी मुलाकात उनके यजमान के घर पर जो कि मेरे मित्र थे के घर पर हुई जहां मै किसी काम से गया था।

मित्र ने मुझसे कहा कि ‘‘तुम प्रवचन कार्यक्रम में क्यों नहीं आये? आना चाहिए भई। यह ठीक है कि तुम आजकल योग साधना कर रहे हो पर कभी-कभी सत्संग भी सुना करो।’’

वह प्रवचनकर्ता कोई साधु संत नहीं थे बल्कि गृहस्थ थे पर ऐसे ही उनका नाम हो गया था तो लोग समय पास करने के लिये उनका बुला लेते थे। मैं मित्र की बात सुनकर हंस पड़ा तो वह सज्जन बोले-‘‘हां इस दुनियां में सुबह बहुत तेजी से सांस लेने वाले भी कई योगी न रहे। कबीरदास जी यही कहते हैं इसलिये भगवान भजन में मन लगाना चाहिये। योग साधना से क्या होता है।’’

मैं थोड़ा जोर से हंसा तो वह बोले-‘‘आप इसे मजाक मत समझिये मैं आपको सही ज्ञान की बात बता रहा हूं।’’

इसी बीच मेरे मित्र की पत्नी भी एक थाली में फल और मिठाई रखकर आ गयी तो वह उसे देखते हुए बोले-‘‘मिठाई तो अभी नहीं खाउंगा। एक सेव अभी खा लेता हूं बाकी थैले में रख दो घर ले जाता हूं।

मैं भी मुस्कराते हुए उन्हें देख रहा था। मेरा मित्र होम्योपैथी का डाक्टर था और अधिक प्रसिद्ध न होने के बावजूद उसका काम ठीक चल रहा था और अपने मोहल्ले की तरफ के वह इस कार्यक्रम का मुख्य कर्ताधर्ता था।

वह सेव खाते हुए उससे बोले-‘भाई, हमें कम से कम महीने भर की दवाई दे दो ताकि हमारी और पत्नी की डायबिटीज कंट्रोल में रहे।’’

मेरा मित्र दवाई लेने चला गया तो उसकी पत्नी भी वहं से चली गयी। तब वह मुझसे बोले-योगसाधना से कोई सिद्ध नही होता। यह कहने की बात है। इसलिये आप भगवान में मन लगाया करो। उनकी भक्ति से सब ठीक हो जाता है।’’
मैने उनसे कहा-‘यह मेरा मित्र डाक्टर है और पांच  वर्ष पूर्व उच्च रक्तचाप की शिकायत के कारण इलाज कराने आया था । तब इसने मुझे खूब डांटा था। इसके पास अब कभी मरीज का तरह दवाई नहीं लेने न आना पड़े इसलिये ही योगसाधना करता हूं। यकीन करिये केवल उसके बाद दो वर्ष पहले बुखार की शिकायत लेकर आया था यह अलग बात है कि यह उस दिन घर पर नहीं था तो इसके पोर्च में पलंग पर सो गया और मेरा बुखार चला गया। इससे बचने के लिये ही मैं योगसाधना, ध्यान और मंत्रजाप करता हूं।’’

तब तक मेरा मित्र कमरे के अंदर आ गया था और मैने उसके सामने ही कहा-‘‘एक डाक्टर के रूप में मुझे इसकी शक्ल पसंद नहीं है।’’

उनका मूंह उतरा हूआ था। उन्होंने अपना मिठाई और फल को थैला उठाया और वहां से चले गये। जाते वक्त उन्होंने मेरे मित्र और उसकी पत्नी से बात की पर मेरी तरफ देखा भी नहीं। उनके जाने के बाद मैने अपने मित्र से पूछा-‘‘कौन सज्जन थे ये?’’

वह बोला-‘‘कोई अधिक प्रसिद्ध तो नहीं है मेरे मरीज है और मोहल्ले के लोगों ने कहा कि सत्संग कराना है। सो बुलवा लिया। वैसे बहुत ज्ञानी हैं।तुम्हें कैसे लगे?’
मैंने कहा-^मैं क्या कह सकता हूँ. अगर तुम कहते हो तो ज्ञानी ही होंगें. बाकी मैं ऐसे सामान्य लोगों पर अपनी टिप्पणी नहीं करता.”
मित्र और मेरे बीच अनेक बार अध्यात्म पर जोरदार बहसें सुन चुकी उसकी पत्नी को मेरे से इस उत्तर की आशा नहीं थी। इसलिये उसने हंसते हुए पूछा-‘‘क्या सोच बोल रहे हैं या हमारा मन रख रहे हैं।’’

वह गलत नहीं थी पर मैं मित्र द्वारा दिये गये महत्वपूर्ण कागज के लिफाफे को लेकर वहां से बाहर निकल गया। पीछे से मेरा मित्र मुझसे कह रहा था-सच बोलना। क्या तुंम हमारा दिल रखने के लिये मान रहे हो कि वह वास्तव में ज्ञानी हैं।’’

मैने पलटकर उसे मुस्कराते हुए देखा  और वहां से बिना उत्तर दिये चला आया।

 

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कबीर संदेशःअहंकार होता है पतन का कारण


मैं मेरी तू जनि  करै, मेरी मूल विनासि
मेरी पग का पैखड़ा, मेरी गल की फांसि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि इस संसार में मनुष्य देह पाकर अहंकार के जाल में मत फंसा क्योंकि यह तो पांव की फांस है जो भक्ति मार्ग पर चलने नहीं देती। बाद में यही गले की फांसी भी बन जाती है।
तन सराय मन पाहरु, मनसा उतरी आय
को काहू का है नहीं, देखा ठोंकि बजाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह देह धर्मशाला की तरह है और इसका पहरेदार हमारा मन है। इस देह में इच्छाएं और कामनाएं अतिथि के रूप में आकर ठहर जाती हैं। एक का काम पूरा होता है तो दूसरी वहां रहने चली आती है। यहां कोई किसी का सगा नहीं है यह ठोक बजाकर देख लिया।

इत पर घर उत है घरा बनिजन आये हाट
करम करीना बेचि के, उठि करि चालो बाट

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में देह धारण करने का आशय यह समझना चाहिए कि हम व्यापारी की तरह हाट में आये है। इसलिये हमें सत्कर्मों का व्यापार करना चाहिए। अतः यहां जाने से पहले अपना समय भगवान भक्ति और परमार्थ करते रहना चाहिए। आखिर फिर अपने घर वापस भी तो जाना है।

व्याख्या-हमेशा कहा जाता है कि हमारा आत्मा परमात्मा से बिछड़ कर यहां आया है इसलिये उनका घर ही हमारा घर है। यही कबीरदास जी का आशय है। इसलिये वह यह कहते हैं कि यह देह धारण करना मतलब बाजार में आना है। 

कठपुतली का खेल तो अब भी चल रहा है (हास्य-व्यंग्य)


हम घर से बाहर निकल कर जैसे सायकल से सड़क पर आये तो  एक सज्जन मिल गये और  हमसे बोले-‘कहां जा रहे हो।’

हमने कहा-‘पुतले और पुतली का खेल देखने जा रहे हैं।’
वह बोले-‘‘कहां जा रहे हो? हमें भी बताओ। अरसा हो गया कठपुतली का खेल देखे। हमें भी बताओं तो हम भी अपनी कार से वहां पहुंच रहे हैं।’’
हमने कहा-‘नही, दरअसल हमारे एक मित्र ने हमसे कहा कि आओ पोल खोल देखेंगे। उसी के आग्रह पर उसके घर जा रहे हैं।’

वह बोले-‘‘अरे, वह तो फिल्म का नाम है। उसमें तो मशहूर हीरो  और हीरोइन ने एक्टिंग की है। तुंम उसे पुतले-पुतली का खेल कह रहे हो।’’

हमने कहा-‘मगर फिल्म और कठपुतली के खेल में फर्क क्या हैं?
वह बोला-‘‘कमाल करते हो यार? मैने सुना तुमने पीना छोड़ दी है। लगता है आज सुबह ही पीकर निकले हो। उसमें तो असली हीरो-हीरोइन ने काम किया है।’’

हमने उत्तर दिया कि-‘‘ कब कहा कि नकली ने काम किया है। मगर काम तो वही किया है जो काठ के बने पुतले-पुतली ही करते हैं। उनको जो डायरेक्ट कहता है वैसा ही अभिनय करते हैं। नृत्य निदेशक जैसा कहता है वैसा ही नाचते हैं ओर संवाद लेखक जैसा लिखकर देता है वैसा ही बोलते हैं। बस बोलते खुद है, चलती उनकी टांगे ही है और बोलती उनकी जुबान है। कोई प्रत्यक्ष कोई डोर पकड़े नहीं रहता। अप्रत्यक्ष रूप से तो कोई न कोई पकड़े रहता ही है फिर हुए तो वह भी पुतले-पुतली ही न!’’

वह बातचीत का विषय बदलते हुए बोले-‘छोड़ो यार, कल तुमने क्रिकेट मैच देखा। क्या जोरदार मैच हुआ?’

अमने च ौंककर पूछा-‘‘क्या भारत की टीम का कोई क्रिकेट मैच हो रहा है?’

‘नही यार,‘‘वह बोले-‘वह ट्वंटी-ट्वंटी के मैच हो रहे हैं। क्या जोरदार मैच हो रहे हैं? तुम तो क्रिकेट के शौकीन हो तुम्हें यह मैच देखना चाहिए।

हम बुद्धुओं की तरह खड़े रहे फिर पूछा-‘‘पर मैच किस देश से हो रहा है?
वह झल्लाकर बोले-‘तुमसे बात करना बेकार है। बहस पर बहस करते हो। अरे किसी देश की टीम से नहीं बल्कि ऐसे ही कुछ टीमें हैं उनके मैच हो रहे हैं।’’

हमने बनते हुए कहा-‘‘अच्छा! तुम उन मैचों की बात कर रहे हो। हमने टीवी पर सुना था कि कुछ उस पर बीस हजार करोड़ रुपये का दांव लग रहा है। अब जब दांव लगेगा तो फिर कहीं यह भी कठपुतली के नाच की तरह तो नहीं है।’ जब इतने बड़े मैचों पर जिनमें देश का नाम दांव पर लगा होता है तब ऐसी ही बातें होतीं हैं कि अमुक ने मैचा फिक्स कर लिया  और अमुक ने अपना प्रदर्शन क्षमता से कम किया उसमें सच्चाई न भी होत तो इनमें तो ऐसा हो सकता है क्योंकि इसमें किसी के प्रति जवाबदेही नहीं है।
वह बोले-‘‘अपने का इन चीजों से क्या लेना देना? अपने को तो मैच देखना है।’

हमने शुष्क स्वर में कहा-‘इनसे कोई लेना देना नहीं है इसलिये तो वह मैच नहीं देख रहे। डांस  चाहे इसमे देखें या उसमें है तो डांस ही।  
वह बोले-‘‘तुमसे अब बहस करना बेकार है। मनोरंजन का मतलब ही नहीं समझते।’
हमने कहा-‘‘नहीं समझते तो दोस्त के आमंत्रण पर उसके घर क्यों जा रहे हैं? बस फर्क यह है कि तुम फिल्म कहते हो हम पुतले-पुतली का नाच कहते हैं।

वह सज्जन झल्लाकर चले गये। हमने अपनी राह ली। हम भी सोच रहे थे कि सुबह-सुबह क्योंे पंगा लिया।

दरअसल पहले लोग अपनी शक्ल ही आइने में देख पाते थे और फिर अपने सामने चलते फिरते लोगोंे से मजा किसको आता है। इसलिये कठपुतली के अभिनय को देखकर उनको मजा आता है। अब आ गये हैं कैमरे। उसमें तो हाड़मांस के पुतले काम करते हैं तो हम कह देते है। कि हीरो-हीरोइन हैं। काम तो वह वैसा ही कर रहेे हैं सच तो यह कि हर कोई हीरो-हीरोइन बनने के सपने देखने का आदी है इसलिये कठपुतली कहने से झिझकता है। यह भी हो सकता है कि कठपुतली का खेल कहने से लोगों को अपने गंवार होने का अहसास होता हो क्योंकि आजकल तो हर कोई माडर्न बनकर रहना चाहता है। उन हांड़मांस के पुंतलों में अपने को देखता है इसलिये ही कहता है कि हीरो-हीरोइन है।  हम भी पहले ऐसे ही देखते थे। इधर जब से ज्ञान और ध्यान में घुसे हैं तब से र्थोड़ा देखने का नजरिया बदला है। क्रिकेट खेल देखकर हमने अपना जीवन बरबाद कर लिया और अगर वह वक्त हमने कहीं अगर और लगाया होता तो आज क्या होते? उसक मलाल अब दूर हो गया है जब से इस ब्लाग विधा में घुसे हैं। हम अपने को पुतला नहीं कहते क्योंकि स्वयं ही विचार कर लिखते हैं। हम तो उसे ही मनुष्य की तरह कर्म करने वाला मानते हैं जो अपनी बुद्धि से चलता है न कि दूसरे की बुद्धि से। कहने को खिलाड़ी और अभिनेता भी अपनी बुद्धि से चलते हैं और हम उन्हें अपने जैसा मानते है पर उनकी फिल्म और ऐसे छोटे मैचों में उनकी सक्रियता को ही पुंतलों जैसा मानते हैं। आखिर हमारी इस राय में क्या कमी है?
 

 

Translation, the author of nearly all the languages of tools will


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The point is that the translation is not the result cent of its English-reading assistance, has been found. So it has been used to write for me. When I am on my translation of the text for many words, I brought it back to him does not accept the word alternative keeps me. I created a little English, they may also be understood very well, I will take. It seems that his reaction to the positive. Blog writer also some English writers of Hindi Blog for striving to make contact are showing. Blog writer to remember the mood of Hindi-speaking foreign writers Blog for the remains of his contacts should take place. This Blog is not here and who walks through the translation tool at their other speaking Blog writers come in contact with the full possibility.

Blog of a word in the language translation is not a Blog and writers for the Wall of the language seems to have ended. Yesterday an English writer Blog has posted a response on the matter, in the sense that he has been reading my post as he is writing Jennifer Lancey wrote Hello there. I was sent a link to your blog by a friend a while ago. I have been reading a long for a while now. Just wanted to say HI. Thanks for putting in all the hard work. Now is not surprising that I am writing in Hindi read, is the only people who know only English. I read it and the English translation of his address about his opinions do not run, but we will also go well where such comments are alleging that it is clear that our understanding of that. Yes, I can not wait for this thing to me is that a Hindi translation of the Blog tool to read the translation itself but also keeping am. To correct the translation of impurities so am working hard so that my posts and more clearly readable. Now it’s time to write the attention that I am keeping Blog of the translation of other languages. All the languages of the world’s Blog writer for a day so that they will be close to the longer distances will be named. I want Hindi Blog writer, and they are also the world at his prestigious posts to be on time sometimes on the translation tool that should see the full translation in English that comes from reading. The word translation are not optional for him to choose words as possible. English translation is not necessary that we keep enough of it, that it can be translated in English, the maximum net. There is not any objectionable because we are writing in Hindi and other languages if the author of Blog contact us if they’re willing to keep the facility would be. One thing is the experience that we all their lessons in pure Hindi words maximum use it as pure English translation.

Stories
Google’s translation of the text has been presented here to

Good news was not read – comic satire अच्छा हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य


My wife has asked the night -”What will eat?”
We have said -”Where we eat at night? So you take a cup of milk with him a small toast to be so afraid. Although you asked why?
Ira said – ‘you just write something to eat. I thought that perhaps you saw the hunger will take. When preparing food at night and not on the account, he writes, why?
I said – ‘write for yourself, not what the think. Read the account of the night will not! How serious is the matter of foreign dignitaries that the people of our country, people are accused of taking more food, it is important to understand that it is no worry about that.
my wife -”out-you must have been like a man. And all the people to say that I am an account at the time you eat at night and come home with only two to four tea and biscuits account of the night with a cup of milk toast two accounts. It is not, and what to eat? And people say I am a time account.

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I have said -”I did that I would tell people to account and I am the account. This is the thing that set our house on the night, caused not eat.”

I has been silent wife. One morning, and visited the gentleman replied – yaar”Look, our country, what people are saying out of India’s people eat more food in the world because of the crisis. Tell me now, the people of this country was poor, and the flag poles on the ideologies of this country to do with the attack. End! Privatization liberalization live. Now say that more accounts. Now what not to eat bread filled the stomach?

I has said -”if food is not enough. A need to eat less bread.
He said a gentleman – you yaar”as one that can not be any time to eat eat.
I has said -”Today we are less physical effort of so little account.
Mrs them were familiar with them and we spoke -”Where an account of time? Almost at night with tea and biscuits at night with a cup of milk toast must account. What is eating less?

We has thought of speaking lies did not help and i said – ‘We do not say that low?
He said a gentleman – ‘It is also, we still eat on the account. After eating glass of milk must take. Ha, etc. do not pay with her toast. bhabhiji, Do you understand that the only people you drink the milk. After we eat, sleep sip of milk is not only not come.
We have said – ‘you eat with, why are so upset? Your boy’s wedding will, we must also lashed eat like other people. No such oath not to eat that night and never eat. Yes, yoga meditation since the start of the night, then eat free from worry, you have not ever say that the dinner to take leave. Some also say the man said.

He said – ‘The issue is that really what we eat too?
We have said -”Do not think more? You are already complaining of diabetes and it will only benefit those companies who are out of their pills because of the food is digested you get. Yoga, meditation may be that publicity from now increasing the number of healthy people and those on the ‘more food’ campaign to increase the tension will be the same again made them sick The move may be the same.
He said a gentleman -”it has not yet informed you of what we eat more Indian?
I has said – in this country,”one hundred and five million people live. Far more people eat wheat, rice, said something and. No one has a scale. A house in four age groups of four are members of the amount of food on their own – is different. Now, how the people of this country say that the accounts are more or less.
He said a gentleman – the last ten years, we are seeing that in your home comes as wheat not take more than once. But eating out of its low consumption have been going. Like many small children, etc. ate the chips enter the stomach, pizzs, burger and ate the stomach, then fill in the house where eat?
I has said – ‘eating out of the account appear to other people. On the road to the movement of money out of people to see such things are doing so. Eating places them in the market and a crowd of people watching the money flow seems that the nation is the very account.
The concern of a gentleman, after all, if my wife would have said – ‘brother Sahib, so why would you worry? The people of this country, an account of seized a short account. A field in sight, not kill. Any of the seized is not happy to see him come? Went on a looting the house, do not. This is your home you told we eat at night when to come? If you ever bhabhiji and children to come not just to eat on.

He said a gentleman – ‘You Kamal doing? Such a debate has been on the field and you eat, then sat been talking about. At tea, you will eat, so she does not force us not come to your house, including family. Yes, once you come to eat, think again.
Then we went and he changed the subject of talks were the wife said -”it said that the people of India who are more account?

I has said -”We know you try to learn why their concerns have been raised. More concern to a great loss of body fat. “
As he spoke out – if it is a matter of course. Although such a title today in the newspaper, saw on the news was read out. Was not a good read. Without meaning to read the news of what advantage?हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य

हमने कहा-‘‘हम रात को कहां खाते हैं?तुम दूध का एक कप ले आओ तो उसके साथ एक छोटा टोस्ट खाकर सो जायेंगे। वैसे तुमने यह पूछा क्यों?’
कहने लगीं-‘तुम अभी कुछ खाने पर लिख रहे थे। मैने देखा तो सोचा कि शायद तुम्हें भूख लग जाये। जब रात को खाना नहीं खाते तो उस पर लिखते क्यों हो?’
मैने कहा-‘अपने लिये तो लिखते नहीं है जो यह सोचें। पढ़ने वाले तो रात को खाते होंगे न! फिर कितनी गंभीर बात है कि अपने देश के लोगों पर अधिक खाने का आरोप लग रहा है तो यह समझाना जरूरी है कि ऐसी कोई बात नहीं है।’
हमारी श्रीमती जी बोली-‘‘लगाने वाला भी तुम जैसा कोई आदमी रहा होगा। सारी दुनियां से कहते हो कि एक समय खाना खाता हूं पर तुम रात को घर आते ही चाय के साथ  दो से चार बिस्कुट  खाते हो और रात को दूध के कप के साथ एक दो टोस्ट उदरस्थ कर जाते हो। यह खाना नहीं तो और क्या है? और लोगों से कहते हो कि एक समय खाता हूं।’

हमने कहा-‘‘तो क्या लोगों का बताता फिरूं कि मैं यह खाता हूं और वह खाता हूं। यह तो तय बात है कि रात को हमारे घर पर खाना नहीं बनता।’’

हमारी श्रीमती जी चुप हो गयीं। सुबह ही एक सज्जन आये और बोले-‘‘देखो यार, अपने देश के  बाहर के लोग क्या कह रहे हैं  भारत के लोग अधिक खाते हैं इसलिये दुनियां में खाद्यान्न का संकट है। अब बताओ, इस देश के लोग गरीब थे तो झंडे और डंडे लेकर इस देश पर विचाराधाराओं के साथ हमला करते थे। सरकारीकरण खत्म करो उदारीकरण चलो। अब कह रहे हैं कि अधिक खाते हैं। अब क्या रोटी भी पेट भरकर  नहीं खायें?’

हमने कहा-‘‘भरपेट तो खाना नहीं चाहिए। जरूरत से एक रोटी कम खाना चाहिए।
वह सज्जन बोले-‘‘यार तुम जैसा तो कोई हो नहीं सकता कि एक समय खाना खाये।’
हमने कहा-‘‘हम आजकल शारीरिक मेहनत कम कर रहे हैं इसलिये कम खाते हैं।
हमारी श्रीमती उनसे परिचित थीं और उनसे बोलीं-‘‘कहां एक समय खाते हैं? रात को आते ही चाय के साथ बिस्किट और रात को दूध के कप के साथ टोस्ट जरूर खाते हैं। वह क्या खाने से कम है?’

हमने सोचा झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है और हमने कहा-‘हम कम कहते हैं कि नहीं लेते?’
वह सज्जन बोले-‘यह तो हम भी करते है पर फिर भी खाना खाते हैं। खाने के बाद दूध का ग्लास जरूर लेते हैं। हा,ं उसके साथ टोस्ट वगैरह नहीं लेते। भाभीजी, आप क्या समझ रही हो कि केवल आप लोग ही दूध पीते हैं। खाने के बाद हम दूध न पियें तो नींद ही नहीं आये।’
हमने कहा-‘पर आप खाने को लेकर इतने परेशान क्यों हो रहे हैं? आपके लड़के की शादी में आयेंगे तो जरूर हम भी जमकर खायेंगे जैसे दूसरे। ऐसी कोई कसम नहीं खा रखी कि रात को कभी नहीं खायेंगे। हां, जबसे योग साधना शूरू की है तब से रात को खाने की चिंता से मुक्त हो गये हैं पर आपको कभी यह नहीं कहेंगे कि रात का भोजन लेना छोड़ दें। कहने वाला कुछ भी कहता रहे।’

वह बोले-‘मुद्दे की बात यह है कि क्या वाकई हम बहुत खाते हैं?’
हमने कहा-‘‘अधिक मत सोचो? पहले ही तुम मधुमेह की शिकायत करते हो  और उसमें फायदा उन कंपनियों का ही होगा जो बाहर की हैं क्योंकि उनकी गोलियों से ही तुम खाना पचा पाते हो। हो सकता है कि योग साधना के प्रचार से  अब स्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही हो और उन पर ‘अधिक खाने’ के शगूफे से तनाव बढ़ाकर फिर उनको बीमार बनाया जाये यही इसके पीछे यही चाल हो सकती है।
वह सज्जन बोले-‘‘पर तुमने यह अभी तक नहीं बताया कि क्या हम भारतीय अधिक खाते हैं?’
हमने कहा-‘‘इस देश में एक सौ पांच करोड़ लोग रहते हैं। कहीं लोग गेंहूं अधिक खाते हैं तो कही चावल तो कहीं कुछ और। किसी के पास कोई पैमाना नहीं है। घर में चार एक आयु वर्ग के चार सदस्य होते हैं पर उनके खाने की मात्रा अलग-अलग होती है। अब कैसे कहें कि इस देश के लोग अधिक खाते हैं या कम।’
वह सज्जल बोले-‘हम तो पिछले दस साल से देख रहे हैं कि अपने घर में जितना गेंहूं आता है उससे अधिक कभी लेते नहीं है। बल्कि बाहर के खाने से उसकी खपत कम होती जा रही है। छोटे बच्चे तो तमाम तरह की चिप्स वगैरह खाकर पेट भरते हैं, पीजा, बर्गर और पैट्रीज खाकर पेट भरेंगे तो फिर घर में कहां खायेंगे?’
हमने कहा-‘फिर बाहर खाने से दूसरे लोगों को खाते दिखते हैं। पैसे की आवाजाही सड़क पर होने से बाहर के लोगों को दिख रही हैं इसलिये ऐसी बातें कर रहे हैं। उनको बाजार में खाने के स्थानों पर लोगों की भीड़ और पैसे का बहाव देखकर ऐसा  लगता है कि यह देश बहुत खाता है।’
वह सज्जन चिंता में पड़े रहे तो आखिर हमारी श्रीमती जी ने कहा-‘भाई साहब, इतनी चिंता में आप पड़े क्यों हैं? इस देश के लोग खाते हैं तो किसी से छीनकर थोड़े ही खाते हैं। किसी के खाने में नजर तो नहीं डालते। किसी को सुखी देखकर उससे छीनते तो नहीं हैं? किसी के घर पर जाकर लूटपाट तो नहीं करते। आप यह बताईये हम आपके घर रात के खाने पर कब आयें? आप तो भाभीजी और बच्चों को लेकर कभी खाने पर लेकर  आते ही नहीं।’
 
वह सज्जन बोले-‘आप कमाल कर रही हो? इतनी बहस हो गयी खाने पर और आप फिर खाने की बात  लेकर बैठ गयीं। कभी आयेंगे चाय पीने पर आप खाने के जबरदस्ती करतीं हैं इसीलिये नहीं हम परिवार सहित आपके घर नहीं आते।ं हां, आप एक बार खाने पर आयें तो फिर सोचेंगे।’
फिर हमने बातचीत का विषय बदला और वह चले गये तो श्रीमतीजी ने कहा-‘‘पर यह कहा किसने है कि भारत के लोग खाते अधिक हैं?’

हमने कहा-‘‘हमें पता है पर तुम जानने की कोशिश कर अपनी चिंता क्यों बढ़ा रही हो। अधिक चिंता शरीर को हानि पहुंचाती है।’
वह बाहर जाते हुए बोलीं-हां यह तो बात है। वैसे आज अखबार में ऐसा कोई ऐसा शीर्षक तो देखा था पर खबर पूरी नहीं पढ़ी। अच्छा हुआ नहीं पढ़ी। बिना मतलब की खबर पढ़ने से क्या फायदा?’