स्त्रियों की कम संख्या उनके प्रति बढ़ते अपराधों के लिये जिम्मेदार-आलेख


देश में प्रतिदिन ही महिलाओं के प्रति किये गये अपराध समाचारों की सुर्खियां बन रहे हैं। हालत यह हो गयी है कि एक दिन में पांच पांच समाचार आते हैं और जब अपराधी पकड़े जाते हैं तो यह याद रखना कठिन हो जाता है कि आखिर वह किस घटना के लिये पकड़े गये हैं। इस पर तमाम तरह के आलेख और रिपोर्ताज पढ़ने और सुनने के बाद यह नहीं लगता कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग इसे कन्या भ्रुण हत्याओं से जोड़कर देख पा रहा हो।
जो नियमित रूप से समाचार पत्र पत्रिकायें पढ़ते हैं उनको अच्छी तरह याद होगा जब आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व कन्याओं की भ्रुण हत्या का दौर शुरु हुआ था तब सामाजिक विशेषज्ञों ने स्पष्टतः आज के दृश्य की कल्पना कर बता दी थी। एक लंबे समय तक यह दौर चला फिर इसके लिये कानून भी बना पर सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि कन्याओं की भ्रुण हत्याओं का दौर बंद हुआ। हालत यह है कि एक समय तक पहली संतान के रूप में कन्या होना भी ठीक मानने वाले इस समाज में अब ऐसे भी लोग हैं जो पहली संतान के रूप में भी बेटा चाहते हैं और जरूरत पड़े तो कन्या भ्रुण हत्या करा देते हैं। ऐसी जानकारियां समाचार पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर आती रहती हैं।

महिलाओं पर तेजाब फैंकने या उनके साथ जोर जबरदस्ती की घटनाओं पर विश्लेषण करने वाले अल्पज्ञानी बुद्धिजीवी हर घटना में अपराधी और पीड़िता की स्थितियों के आंकलन में लग जाते हैं। कुछ इसे गिरती कानूनी व्यवस्था ं तो कुछ इसे पहनावे और लड़कियों की आजादी को मानते हैं। इधर इंटरनेट पर ऐसी बहसें देखने को मिलती हैं जिससे लगता है कि वाद और नारों की राह पर चले लेखक और बुद्धिजीवी अपने चिंतन से कम अपने गुरुओं की सोच पर अधिक चलते हैं।
एक कहता है कि
1.लड़कियां उकसावे वाले कपड़े पहनती हैं।
2.वह एक नहीं अनेक लड़के मित्र बनाती हैं जिससे आपस में कभी न कभी तनाव बनता है।
3.माता पिता अपनी व्यस्तताओं के चलते लड़कियों की निगाहबानी नहीं कर पाते जिससे वह अपने युवावस्था के कारण ऐसी गलतियां कर बैठती हैं जो अततः उनके लिये घातक होती है।

दूसरा कहता है कि
1.समाज अभी भी असभ्य है उसका लड़की के प्रति नजरिया नहीं बदला।
2.जैसे जैसे धन की प्रचुरता बढ़ रही है लड़कियों के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं।
3. कानून व्यवस्था की स्थिति खराब है और अपराधियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही नहीं हो रही। पुरुष समुदाय इसके लिये पूरी तरह से जिम्मेदार है।

हो सकता है कि ये सभी लेखक और बुद्धिजीवी सही हों पर वह इन घटनाओं के दृश्यव्य रूप पर ही अपना ध्यान केंद्रित करने से समस्या का हल नहीं हो सकता।
25 वर्ष पूर्व ही सामाजिक विशेषज्ञों ने कहा था कि जिस दहेज समस्या से पीड़ित होकर समाज कन्या भ्रुण हत्याओं के दौर को स्वीकार कर रहा है वह तो हल नहीं होगी बल्कि इससे उनके प्रति जो अपराध होंगे वह अधिक भयानक होंगे।
उनका कहना था कि
1.अभी लड़कियां पर्याप्त मात्रा में हैं इसलिये लड़के इधर उधर नजरें मारकर काम चलाते हैं। एक नहीं तो दूसरी नहंीं तो तीसरी। कहने का तात्पर्य यह है कि उनके संपर्क में अधिक लड़कियां आती हैं और वह उनको देखते हैं इसलिये उनमें आक्रामकता नहीं आती। जब यह संख्या कम हो जायेगी तक एक लड़की पर अनेक लड़कों की नजर होगी। इससे आकर्षण में तीव्रता आयेगी और ऐसे में अगर लड़की की तरफ से उनको निराशा हाथ लगती है तो वह उस पर आक्रमण करेंगे।
2.रास्ते पर अनेक लड़कियों को होने से भी लड़के व्यस्त रहते हैं पर जब उनकी संख्या सीमित होगी तो वह चलते फिरते आक्रमण करेंगे।
3.दहेज प्रथा बिल्कुल हल नहीं होगी। उल्टे लड़कियां कम होने से उनके माता पिता अधिक अच्छा वर चाहेंगे। भारत में धन के असमान वितरण से वैसे ही समस्यायें बढ़ रही है। इधर जो अच्छे वर और घर होंगे वह अधिक दहेज की मांग करेंगे। इससे उल्टे इससे बेमेल विवाहों को प्रोत्साहन मिलेगा क्योंकि जिसके पास अधिक धन होगा वह अधिक धन और सुंदर लड़की की मांग करेगा इससे लड़कों की आयु बढ़ेगी और ऐसे में उनको छोटी आयु की लड़कियां भी ब्याह करने को मिल जायेंगी।

सामाजिक विशेषज्ञों की चेतावनी के लिये शब्द कुछ भी रहे हों पर उनका आशय यही था कि कम लड़कियां होने से एक ऐसा संकट आयेगा जिससे बचना कोई आसान काम नहीं होगा। हम यहां भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को ध्यान में रखते हुए एक बार अपने को दृष्टा और अपनी देह को पंच तत्वों से बनी एक वस्तु मान लें। अर्थात हम मान लें कि स्त्री पुरुष देह भी एक वस्तु हैं-नारीवादी लेखक इस बात तो ध्यान दें यहां यह बात आत्मा को दृष्टा मानकर कही जा रही है-तो भी मांग पूर्ति का नियम लागू होता है। पुरुष अधिक होंगे तो उनकी कम और स्त्री संख्या में कम है तो उसकी मांग अधिक होगी। आप अपने देश में जलस्त्रोतों पर पानी के लिये और सड़कों पर वाहन टकराने पर होने वाले हिंसक संघषों पर ध्यान दें तो पानी कम नहीं है बल्कि मांग बढ़ गयी है पर आपूर्ति उस ढंग से नहीं हो पाती। उसी तरह सड़कों पर वाहन अधिक हो गये हैं पर वह चौडी नहीं हुई उसी तरह आपको लगेगा कि स्त्री पुरुषों की संख्या में अनुपातिक अंतर ही इस संकट के लिये जिम्मेदार हैं। परिवार नियोजन रखना अच्छी बात है पर बच्चे की भ्रुण हत्या एक ऐसा अपराध है जिसका परिणाम तत्काल नहीं पता लगता पर आज समाज जिन हालतों में गुजर रहा है उससे हम समझ सकते हैं कि आखिर वह इस हालत में क्यों आया?
जब हर मनुष्य के दृष्टा होने की बात की है तो एक घटना याद आ रही है-नारीवादियों को शायद यह बुरी लगे पर वह इस लेखक के साथ वैचारिक धरातल पर खड़े हों तो सहमत होंगे। खासतौर से नारीवादी लेखिकाओं से अपेक्षा तो है कि वह इस घटना में आयु और उसकी प्रासंगिकता पर विचार करेंगी।
उस दिन एक सड़क पर यह लेखक अपने रात को नौ बजे स्कूटर पर आ रहा था कि एक जगह गड्ढा आ गया। वह बड़ा था और उससे दूर हटकर निकलने के लिये लेखक को रुकना पड़ा। सड़क पर कोई खास भीड़ नहीं थी। एक आदमी उसी गडढे के पास से गुजर रहा था। उसने इस लेखक से कहा-‘अच्छा हुआ यह गडढ़ा आपको दिख गया वरना इसमें कई गिर चुके हैं।’
यह लेखक जवाब में केवल हंस पड़ा। उसी समय दो लड़कियां वहां से गाड़ी पर निकली। तब वह सज्जन फिर बोले-‘पता नहीं आजकल माता पिता कैसे हैं। आप बताईये क्या इस तरह रात को लड़कियों को बाहर जाने की इजाजत दी जानी चाहिये? अरे, करोड़ो रुपये आदमी संभाल कर रखता है पर देखिये उससे कही अधिक कीमती इस तरह बिटियायें बाहर घूमने के लिये छोड़ देता है।’
लेखक ने पूछा-‘आप उनको जानते हैं?’
उन सज्जन ने कहा-‘नहीं! जिस तरह आजकल की घटनायें हो रही हैं उनको देखते हुए यह बात कह रहा हूं। अरे भई, आप ही बताईये जवान लड़कियों की रक्षा का उपाय उनके घरवालों को नहीं करना चाहिये?’
यह सही है कि युवा विवाहिताओं के प्रति भी अपराध होते हैं पर अविवाहित युवतियों के प्रति अपराध हमेशा ही भारी संकट का कारण बनता है।
आप अगर लेखक हैं तो सड़क पर खड़े होकर बहस नहीं कर सकते। कन्या भ्रुण हत्याओं के बारे में विशेषज्ञों की चेतावनी को अनदेखा करते हुए यह समाज जिस तरह आगे बढ़ता गया यह घटनायें उनका परिणाम है। इन घटनाओं की कोई भी वजह हो सकती है पर यह उसका नहीं बल्कि बरसों पहले चले इस रिवाज-हां, समाज में एक तरह से कन्या भ्रुण हत्या रिवाज ही बन गया है-का ही परिणाम है।
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भर्तृहरि नीति शतक: भक्ति को धंधा न समझें


भर्तृहरि कहते हैं कि
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कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।

हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के लये कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता है उसका स्मरण और भजन करना ही एकमात्र उपाय है शेष तो मनुष्य की व्यापारी बुद्धि का परिचायक है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने जीवन यापन के लिये व्यापार करते हुए इतना व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाता है कि वह भक्ति और भजन में भी सौदेबाजी करने लगता है और इसी कारण ही कर्मकांडों के मायाजाल में फंसता जाता है। कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार संग्रह है और उसमें स्वर्ग में प्रीति उत्पन्न करने वाले वेद वाक्यों से दूर रहने का संदेश इसलिये ही दिया गया है कि लोग कर्मकांडों से लौकिक और परलौकिक सुख पाने के मोह में निष्काम भक्ति न भूल जायें।

वेद, पुराण और उपनिषद में विशाल ज्ञान संग्रह है और उनके अध्ययन करने से मतिभ्रम हो जाता है। यही कारण है कि सामान्य लोग अपने सांसरिक और परलौकिक हित के लिये एक नहीं अनेक उपाय करने लगते हंै। कथित ज्ञानी लोग उसकी कमजोर मानसिकता का लाभ उठाते हुए उससे अनेक प्रकार के यज्ञ और हवन कराने के साथ ही अपने लिये दान दक्षिणा वसूल करते हैं। दान के नाम किसी अन्य सुपात्र को देने की बजाय अपन ही हाथ उनके आगे बढ़ाते हैं। भक्त भी बौद्धिक भंवरजाल में फंसकर उनकी बात मानता चला जाता है। ऐसे कर्मकांडों का निर्वाह कर भक्त यह भ्रम पाल लेता है कि उसने अपना स्वर्ग के लिये टिकट आरक्षित करवा लिया।

यही कारण है कि कि सच्चे संत मनुष्य को निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करने के लिये प्रेरित करते हैं। भ्रमजाल में फंसकर की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत तनाव बढ़ता है। जब किसी यज्ञ या हवन से सांसरिक काम नहीं बनता तो मन में निराशा और क्रोध का भाव पैदा होता है जो कि शरीर के लिये हानिकारक होता है। जिस तरह किसी व्यापारी को हानि होने पर गुस्सा आता है वैसे ही भक्त को कर्मकांडों से लाभ नहीं होता तो उसका मन भक्ति और भजन से विरक्त हो जाता है। इसलिये भक्ति, भजन और साधना में वणिक बुद्धि का त्याग कर देना चाहिये।
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मनुस्मृति-भावावेश में गधे जैसे शब्द नहीं बोलें


न नृत्येन्नैव गायेन वादित्राणि वादयेत्।
नास्फीट च क्ष्वेडेन्न च रक्तो विरोधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि नाचना गाना, वाद्य यंत्र बजाना ताल ठोंकना, दांत पीसकर बोलना ठीक नहीं और भावावेश में आकर गधे जैसा शब्द नहीं बोलना चाहिये।

न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्य´्जलिना पिबेत्।
नौत्संगे भक्षयेद् भक्ष्यानां जातु स्यात्कुतूहली।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि जिस कार्य को करने से अच्छा फल नहीं मिलता हो उसे करने का प्रयास व्यर्थ है। अंजली में भरकर पानी और गोद में रखकर भोजन करना ठीक नहीं नहीं है। बिना प्रयोजन का कौतूहल नहीं करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब आदमी तनाव रहित होता है तब वह कई ऐसे काम करता है जो उसकी देह और मन के लिये हितकर नहीं होते। लोग अपने उठने-बैठने, खाने-पीने, सोने-चलने और बोलने-हंसने पर ध्यान नहीं देते जबकि मनुमहाराज हमेशा सतर्क रहने का संदेश देते हैं। अक्सर लोग अपनी अंजली से पानी पीते हैं और बातचीत करते हुए खाना गोद में रख लेते हैं-यह गलत है।
जब से फिल्मों का अविष्कार हुआ है लोगों का न केवल काल्पनिक कुतूहल की तरफ रुझान बढ़ा है बल्कि वह उन पर चर्चा ऐसे करते हैं जैसे कि कोई सत्य घटना हो। फिल्मों की वजह से संगीत के नाम पर शोर के प्रति लोग आकर्षित होते हैं।
मनुमहाराज इनसे बचने का जो संदेश देते है उनके अनुसार नाचना, गाना, वाद्य यंत्र बजाना तथा गधे की आवाज जैसे शब्द बोलना अच्छा नहीं है। फिल्में देखना बुरा नहीं है पर उनकी कहानियों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों को देखकर कौतूहल का भाव पालन व्यर्थ है इससे आदमी का दिमाग जीवन की सच्चाईयों को सहने योग्य नहीं रह जाता।

नाचने गाने और वाद्य यंत्र बजाना या बजाते हुए सुनना अच्छा लगता है पर जब उनसे पृथक होते हैं तो उनका अभाव तनाव पैदा करता है। इसके अलावा अगर इस तरह का मनोरंजन जब व्यसन बन जाता है तब जीवन में अन्य आवश्यक कार्यों की तरफ आदमी का ध्यान नहीं जाता। लोग बातचीत में अक्सर अपना प्रभाव जमाने के लिये किसी अन्य का मजाक उड़ाते हुए बुरे स्वर में उसकी नकल करते हैं जो कि स्वयं उनकी छबि के लिये ठीक नहीं होता। कहने का तात्पर्य यह है कि उठने-बैठने और चलने फिरने के मामले में हमेशा स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिए।
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चाणक्य नीति-निंदा का दुर्गुण हो तो अन्य पाप की क्या जरूरत


नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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लोभश्चेदगुणेन किं पिंशुनता यद्यस्ति किं पासकैः सत्यं चेतपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम्।
सौजन्यं यदि किं गुणैः सुमहिमा यस्ति किं मण्डनैः सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यस्ति किं मृत्युना।।

हिंदी में भावार्थ-मनुष्य में यदि लोभ का भाव है तो फिर किसी दूसरे दोष की उसे आवश्यकता नहीं है। यदि उसके स्वभाव ही निंदा और चुगली करने का है तो उसे कोई अन्य पाप कर्म करने की आवश्यकता नहीं है। अगर व्यक्ति सत्य के पथ पर है तो उसे किसी तप की आवश्यकता नहीं है। इसी तरह यदि मन ही पवित्र है तो उसे किसी पवित्र स्थान पर जाकर स्नान करने की आवश्यकता नहीं है। हृदय में सद्भावना है तो फिर कोई दूसरा गुण क्या कर लेगा? संसार में अपने कर्मो से यश फैल रहा है तो फिर आभूषणों या सुंदर वस्त्रों को धारण करने से क्या लाभ? विद्या है तो धनहीन होना महत्वपूर्ण नहीं है। अगर अपयश फैल गया है तो फिर मृत्यु से भी मुक्ति नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में आकर अपने दैहिक निर्वहन के लिये भौतिक पदार्थों की आवश्यकता होती है पर उसके लिये अपनी आत्मा को भुलाकर उनमें लिप्त होने से कोई लाभ नहीं है। इस संसार के सभी भौतिक पदार्थ नष्ट प्रायः है पर मनुष्य द्वारा अपने सतकर्मों से अर्जित यश ही उसके बाद चलता रहता है। दुर्गुण तो स्वाभाविक रूप से आते हैं पर गुणों को बनाये रखने के लिये प्रयास करना पड़ता है। उसी तरह अपकीर्ति तो स्वतः ही फैलती है पर कीर्ति फैलाने के लिये प्रयास करना पड़ता है। आशय यह है कि अगर हम अपने ऊपर मानसिक रूप से नियंत्रण नहीं करेंगे तो हमारे कदम स्वतः ही भटकाव की राह पर चल पड़ेंगे।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शत्रु पर सिंह की तरह प्रहार करें


कौमे संकोचभास्य प्रहारमपि मर्धयेत्।
काले प्रापते तु मतिमानुत्तिश्ठेत्क्रूरसर्पवत्।।
हिंदी में भावार्थ-
अपने समय के अनुसार जीवन में रणनीति बनाते हुए कछुए के समान अंग समेटकर शत्रु का प्रहार भी सहन करें तो और उचित अवसर देखकर सांप के समान प्रहार भी करें।
मतप्रमतवत् स्थित्वा ग्रसदुत्पलुत्य पण्डितः।
अपरिभश्यमानं हि क्रमप्राप्ते मृगेन्द्रवत्।।
हिंदी में भावार्थ-
बुद्धिमान व्यक्ति को मत्त और प्रमत्त के समान दिखावे में स्थित होकर शत्रु पर ऐसे ही प्रहार करते हैं जैसे सिंह करता है। उसका वार कभी खाली नहीं जाता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में कई बार ऐसा अवसर आता है जब हमें दूसरे के शब्दिक और शारीरिक आक्रमण को झेलना पड़ता है। उस समय हमें अपनी स्थितियों और शक्ति का अवलोकन करते हुए इस बात को भी देखना चाहिये कि हमारे सहयोगी कौन है? अगर समय हमारे अनुकूल न हो तो अपनी सहनशक्ति को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि उस समय क्रोध या निराशा में उठाया गया कदम आत्मघाती होता है।
इसके विपरीत जब हमारा समय अनुकूल हो और लगता हो कि हमारे मित्र और सहयोगी साथ देने के लिये तैयार हैं और शत्रु या विरोधी को दबाया जा सकता है तब उस पर शाब्दिक या शारीरिक आक्रमण किया जा सकता है। वैसे आजकल के सभ्य युग में शारीरिक कम शाब्दिक संघर्ष अधिक होते हैं। चाहे किस प्रकार का भी आक्रमण हो उसकी तैयारी विवेक से करना चाहिये। कहीं कहीं हम पर शाब्दिक आक्रमण भी होता है और अगर लगता है कि वहां प्रत्युत्तर देने का उचित समय नहीं है तो मौन रहना ही बेहतर है परंतु यदि लगता है कि उससे सामने वाले को अनावश्यक लाभ मिल रहा है तो स्थिति देखकर उस पर पलटवार करना बुरा नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है जीवन में अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये रणनीति से काम करना चाहिए। कहा भी जाता है कि यह जिंदगी को युद्ध या जंग से कम नहीं होती।
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चाणक्य नीति- निरंतर अभ्यास से ही कामयाबी संभव


जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्वते घटः।
स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य चः।।
हिंदी में भावार्थ-
पानी की एक एक बूंद से जिस तरह घड़ा भर जाता है उसी प्रकार थोड़े से अभ्यास से सभी प्रकार विद्यायें, धार्मिक ज्ञान तथा धन प्राप्त किया जा सकता है।
नाहारं विच्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्।
आहारा हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्वान को भोजन तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की चिंता छोड़कर केवल धर्म संग्रह की चिंता करना चाहिए क्योंकि परमात्मा ने दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति की व्यवस्था पहले ही कर दी है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में सफलता प्राप्त करने का कोई संक्षिप्त मार्ग नहीं है। जीवन में धीरज के साथ अपने कर्म करने के साथ ही ज्ञानार्जन का अभ्यास सतत करना ही सफलता का मंत्र है। संक्षिप्त मार्ग ढूंढने का आशय है अप्राकृतिक साधनों की तरफ आकर्षित होकर अपने लिये विपत्तियों का बुलाना। लोग एक दिन में ही लखपति और फिर करोड़पति बनना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि अवैध या अपराधिक कार्यों में ही यह संभव है पर स्वच्छ और पवित्र व्यवसायों में तो धीरज के साथ ही उन्नति की तरफ बढ़ा जाता है। इस बात पर विचार कर सुख के साथ शांति पूर्वक जीवन की इच्छा करने वालों को अपने व्यवसाय और नौकरी के साथ ही अध्यात्मिक विषयों में भी रुचि लेना चाहिए।
इतना ही नहीं जीवन में परिश्रम से बचने का कोई प्रयास नहीं करना चाहिए। काम करने से ही आत्मविश्वास बढ़ता है और इसके लिये जरूरी है कि अपने प्रयास में नैतिकता और ईमानदारी बरतें। अपने व्यवसाय और अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के कार्य के निरंतर अभ्यासरत रहने से उपलब्धियों प्राप्त होती हैं और इस पर विश्वास करना चाहिए।
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चाणक्य नीति-जो विद्या काम की न आये उसे पाना व्यर्थ


नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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हर्त ज्ञार्न क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नर।
हर्त निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष ह्यभर्तृकाः ।।

हिंदी में भावार्थ- जिस ज्ञान को आचरण में प्रयोग न किया जाये वह व्यर्थ है। अज्ञानी पुरुष हमेशा ही संकट में रहता हुआ ऐसे ही शीघ्र नष्ट हो जाता है जैसे सेनापति से रहित सेना युद्ध में स्वामीविहीन स्त्री जीवन में परास्त हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- मनुष्य का सेनापित उसका ज्ञान होता है। उसके बिना वह किसी का गुलाम बन जाता है या फिर पशुओं की तरह जीवन जीता है। ज्ञान वह होता है जो जीवन के आचरण में लाया जाये। खालीपीली ज्ञान होने का भी कोई लाभ नहीं है जब तक उसको प्रयोग में न लाया जाये। हमारे देश में ज्ञानोपदेश करने वाले ढेर सारे लोग है जो ‘दान, तत्वज्ञान, तपस्या, धर्म, अहिंसा, प्रेम, और भक्ति की महिमा’ का बखान करते हैं पर उनका जीवन उसके विपरीत विलासिता, धन संग्रह, और अपने बड़े होने के अभिमान में व्यतीत होता है। देखा जाये तो उनके लिये ज्ञान विक्रय और उनके अनुयायियों के लिये क्रय की वस्तु होती है। उसके आचरण से न तो गुरु का और न ही शिष्य का लेना देना होता है।

यही कारण है कि हमारा समाज जितना धार्मिक माना जाता है उतना ही व्यवसायिक भी। भारतीय प्राचीन ग्रथों का तत्वज्ञान का मूल सभी जानते हैं पर उसके भाव को कोई नहंीं जानता। अनेक गुरु ज्ञानोपदेश करते हुए बीच में ही यह बताने लगते हैं कि ‘धर्म के प्रचार के लिये धन की आवश्यकता है’। वह अपने भक्तों में दान और त्याग का भाव पैदा कर अपने लिये धन जुटाते है। भक्त भी अपने मन में स्थित दान भाव की शांति के लिये उनकी बातों में आकर अपनी जेब ढीली कर देते हैं। कथित गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान के पथ पर लाकर उनका भौतिक दोहन कर फिर उनको अज्ञान के पथ पर ढकेल देते हैं। यही कारण है कि अध्यात्मिक गुरु कहलाने वाला अपना देश भौतिकता के ऐसे जंजाल में फंस कर रह गया है जहां विकास केवला एक नारा है जिसकी अंतिम मंजिल विनाश है।
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