हिन्दी शायरी-ताज और दौलत (hindi shayari-taj aur daulat)


जिनको पहनाया ताज़
वही दौलत के गुलाम हो गये,
जिन ठिकानों पर यकीन रखा
वही बेवफाई की दुकान हो गये।
किसे ठहरायें अपनी बेहाली का जिम्मेदार
दूसरों की कारिस्तानियों से मिली जिंदगी में ऐसी हार
कि अपनी ही सोच पर
ढेर सारे शक और
मुंह से निकलते नहीं लफ्ज़
जैसे कि हम बेजुबान हो गये।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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क्रोध को सामदंड से शांत करें-मनु स्मृति


अपमानातु सम्भूतं मानेन प्रशमं नयेत्।
सामपूर्व उपायो वा प्रणामो वाभिमानजे।।

          हिन्दी में भावार्थ-जब अपने अपमान से विग्रह यानि तनाव सामने आये तब सम्मान देकर उसे शांत करें और जब अभिमान से उत्पन्न हो तब सामपूर्वक उसका उपाय कर शांत करें।

कुर्यायर्थदपरित्यागमेकार्थाभिनिवेशजे।
धनापचारजाते तन्निरोधं न समाचरेत्।।

          हिन्दी में भावार्थ-जब एक ही प्रयोजन के कारण विग्रह या तनाव उत्तपन्न हो तब दोनों में से एक उसका त्याग करे। जब धन के कारण तनाव हो तब उसकी उपेक्षा करें तो शांति हो जाती है।

भूतनुग्रहविच्छेदजाते तत्र वदेत्प्रियम्।
दवमेव तु देवोत्थे  शमनं साधुसम्मतम्।।

          हिन्दी में भावार्थ-जब अन्य प्राणियों से वाणी के द्वारा तनाव या विग्रह उत्पन्न तो उसे प्रियवचन बोलकर शांत करें।

          वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में अनेक प्रकार के तनाव या विग्रह के क्षण आते हैं। उस समय ज्ञानी लोग उसके उत्पन्न होने का कारण जानकर उसका निग्रह करते हैं। जिन लोगों को ज्ञान नहीं है वह अभिमान वश उसी कारण को अधिक बढ़ाते हैं जिसके कारण तनाव या विग्रह उत्पन्न हुआ है। अगर कोई व्यक्ति हमारे बोलने से नाराज हुआ है तो उसकी उपेक्षा कर हम उसे अधिक बढ़ाते हैं। उस समय ऐसा लगता है कि हमसे अपमानित व्यक्ति हमारा क्या कर लेगा मगर इस बात को भूल जाते हैं कि अहंकार हर मनुष्य में है और समय आने पर हर कोई अपने अपमान का बदला लेने को तत्पर होता है। एक बात दूसरी भी है कि हम अपने व्यवहार से अपने शत्रु बनाते हैं तो स्वयं भी आराम से नहीं बैठ पाते।
        अतः जहां तक हो सके अन्य लोगों से वैमनस्य या तनाव का भाव समाप्त कर देना चाहिये। ऐसा भी होता है कि एक ही समय में दो लोग किसी लक्ष्य या व्यक्ति के लिये प्रयत्नशील हो जाते हैं इससे दोनों में वाद विवाद होता है। ज्ञानी मनुष्य अपना लक्ष्य छोड़कर दूसरा तय कर लेते हैं। बजाय किसी से विवाद के अच्छा है कि अपना ही मार्ग बदल लें। मन शांत करने के लिये ऐसे आवश्यक उपाय करते रहना चाहिये ताकि समय समय पर आने वाले तनाव क्षणिक साबित हों।

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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प्रथ्वी पर विचरते हैं तीन हीरे-हिन्दी धार्मिक चित्तन (prathvi ke teen heere-hindi dharmik chittan)


           आधुनिक प्रचार माध्यमों के विज्ञापनों से पूरा भारतीय समाज दिग्भ्रमित हो रहा है। क्रिकेट खिलाड़ियों, फिल्म अभिनेता तथा अभिनेत्रियों के अभिनीत विज्ञापन उपभोग की ऐसी खतरनाक प्रवृत्ति को जाग्रत करते हैं कि लोगों की अध्यात्मिक चेतना लुप्त हो गयी है। फिर हमारी शिक्षा व्यवस्था में ऐसी प्रणाली अपनाई गयी है जो केवल गुलाम बनाती है। ऐसे में अगर किसी में रचनात्मक प्रवृत्ति जाग्रत हो जाये तो वह पूर्व जन्म का ही प्रभाव समझे तो अच्छा है वरना तो अब व्यक्ति में चरित्र निर्माण की बजाय उसे प्रयोक्ता और सेवक बनने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।

          वैसे समाज की हालत तो कोई पहले भी अच्छी नहीं थी। सोना, चांदी, हीरा और रत्नों की चाहत हमारे समाज में हमेशा रही है। शायद यही कारण है कि हमारे मनीषी मनुष्य के अंदर मौजूद उस रत्न का परिचय कराते रहे हैं जिसे आत्मा कहा जाता है। इसके बावजूद लोग भौतिक संसार की चकाचौंध में खो जाते हैं और सोना, चांदी और हीरे की चाहत में ऐसे दौड़ते हैं कि पूरा जीवन ही अध्यात्मिक ज्ञान के बिना गुजार देते हैं। जिस अन्न और जल से जीवन मिलता है उसे तुच्छ समझते हैं एक पल का चैन न दे वही सोना गले लगा देते हैं। उसी तरह देहाभिमान से युक्त होने के कारण अधिक वाचाल होकर क्रूरतम शब्दों का प्रयोग करते हैं। जिससे समाज में वैमनस्य बढ़ता है।
         महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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         पृथिव्यां त्रीणी रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
मूर्खे पाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।
        ‘‘इस प्रथ्वी पर तीन ही रत्न हैं-अन्न, जल और मधुर वाणी, किन्तु मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न कहते हैं।’’

                  अक्सर लोग कहते हैं कि भारतीय लोगों के पास दुनियां के अन्य देशों के मुकाबले बहुत अधिक सोना है, मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि उससे अधिक तो हम पर परमात्मा की यह कृपा है कि दुनियां के अन्य देशों से अधिक हमारे यहां भूगर्भ जलस्तर है। वैसे आजकल बाज़ार के सौदागर यह प्रयास भी कर रहे हैं कि यहां जल सूख जाये और उसे बेचकर अपने बैंक खाते बढ़ायें। अनेक तरह के ठंडे पेयों के कारखाने यहां स्थापित हो गये हैं जो अपने इलाके का पूरा जल पी जाते हैं। वहां का जलस्तर कम हो गया है पर भारतीय जनमानस ऐसी चकाचौंध में खो गया है कि उसे इसका आभास ही नहीं होता। जल जैसा रत्न हम खोते जा रहे हैं पर आर्थिक विकास का मोह ऐसा अंधा किये जा रहा है कि उसकी परवाह नहीं है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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