क्रोध को सामदंड से शांत करें-मनु स्मृति


अपमानातु सम्भूतं मानेन प्रशमं नयेत्।
सामपूर्व उपायो वा प्रणामो वाभिमानजे।।

          हिन्दी में भावार्थ-जब अपने अपमान से विग्रह यानि तनाव सामने आये तब सम्मान देकर उसे शांत करें और जब अभिमान से उत्पन्न हो तब सामपूर्वक उसका उपाय कर शांत करें।

कुर्यायर्थदपरित्यागमेकार्थाभिनिवेशजे।
धनापचारजाते तन्निरोधं न समाचरेत्।।

          हिन्दी में भावार्थ-जब एक ही प्रयोजन के कारण विग्रह या तनाव उत्तपन्न हो तब दोनों में से एक उसका त्याग करे। जब धन के कारण तनाव हो तब उसकी उपेक्षा करें तो शांति हो जाती है।

भूतनुग्रहविच्छेदजाते तत्र वदेत्प्रियम्।
दवमेव तु देवोत्थे  शमनं साधुसम्मतम्।।

          हिन्दी में भावार्थ-जब अन्य प्राणियों से वाणी के द्वारा तनाव या विग्रह उत्पन्न तो उसे प्रियवचन बोलकर शांत करें।

          वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में अनेक प्रकार के तनाव या विग्रह के क्षण आते हैं। उस समय ज्ञानी लोग उसके उत्पन्न होने का कारण जानकर उसका निग्रह करते हैं। जिन लोगों को ज्ञान नहीं है वह अभिमान वश उसी कारण को अधिक बढ़ाते हैं जिसके कारण तनाव या विग्रह उत्पन्न हुआ है। अगर कोई व्यक्ति हमारे बोलने से नाराज हुआ है तो उसकी उपेक्षा कर हम उसे अधिक बढ़ाते हैं। उस समय ऐसा लगता है कि हमसे अपमानित व्यक्ति हमारा क्या कर लेगा मगर इस बात को भूल जाते हैं कि अहंकार हर मनुष्य में है और समय आने पर हर कोई अपने अपमान का बदला लेने को तत्पर होता है। एक बात दूसरी भी है कि हम अपने व्यवहार से अपने शत्रु बनाते हैं तो स्वयं भी आराम से नहीं बैठ पाते।
        अतः जहां तक हो सके अन्य लोगों से वैमनस्य या तनाव का भाव समाप्त कर देना चाहिये। ऐसा भी होता है कि एक ही समय में दो लोग किसी लक्ष्य या व्यक्ति के लिये प्रयत्नशील हो जाते हैं इससे दोनों में वाद विवाद होता है। ज्ञानी मनुष्य अपना लक्ष्य छोड़कर दूसरा तय कर लेते हैं। बजाय किसी से विवाद के अच्छा है कि अपना ही मार्ग बदल लें। मन शांत करने के लिये ऐसे आवश्यक उपाय करते रहना चाहिये ताकि समय समय पर आने वाले तनाव क्षणिक साबित हों।

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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3.दीपक भारतदीप का चिंतन

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मनु स्मृति-अध्ययन में सुस्ती नहीं करें (manu smriti-shiksha aur susti)


अध्येयष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः।
‘अधीष्व भो! इति ब्रुयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
शिष्य को पढ़ाने के विषय में गुरु को कभी भी आलस नहीं बरतना चाहिये। इसके अलावा बेमन से भी अध्यापन का कार्य करना उचित नहीं है। अध्यापन प्रारंभ करने से पहले छात्र से कहना चाहिये कि ‘पढ़ो’ और समाप्ति पर कहना चाहिये कि विश्राम करो।
ब्रह्यणः प्रणवः कुर्यादादावन्ते च सर्वदा।
स्त्रवत्यनोंकृतं पूर्व परस्ताच्च विशीर्यति।।
हिंदी में भावार्थ-
गुरु का यह कर्तव्य है कि वह अध्यापन प्रारंभ करने से पहले ॐ शब्द का आप छात्र से करावे। ऐसा न करने से पढ़ा हुआ स्मरण में नहीं रहता। इस कारण दोनों का परिश्रम व्यर्थ हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वर्तमान शिक्षा पद्धति में अनेक दोष हैं और इसी कारण हमारे यहां समाज में विकृत्तियां बढ़ती जा रही है। हम समाज के आचरण को लेकर तमाम तरह की निराशाजनक प्रतिक्रियायें तो व्यक्त करते हैं पर उसमें सुधार की कोई योजना हमारे पास नहीं है। किसी भी मनुष्य में संस्कार और बौद्धिक निर्माण का समय उसका छात्र जीवन ही रहता है। उस समय संयम और नियम से जीवन व्यतीत करने पर ही शिक्षा प्राप्त हो सकती है। समाज चल रहा है इसकी विपरीत दिशा में। आजकल तो छात्र जीवन ही मौज मस्ती का माना जाता है और कहा जाता है कि आजकल बच्चे अपने माता पिता से अधिक कुशाग्र बुद्धि हैं क्योंकि वह मोबाइल और टीवी का रिमोट चलाना जानते हैं। मगर हम संस्कारों की बात नहीं करते जिनके बारे में सभी मानते हैं कि उनका क्षरण हो गया है। छात्र जीवन में ज्ञान प्राप्त करने के साथ ही इस बात की भी होड़ लगी है कि उसका अधिक से अधिक प्रदर्शन किया जाये।
कहते हैं कि भजन और भक्ति तो बुढ़ापे में किया जाना चाहिये जबकि सच यह है कि जो संस्कार बचपन में नहीं पड़े फिर उनकी स्थापना एकदम कठिन है। ऐसे में बचपन से बच्चों को अपनी नियमित शिक्षा के साथ ही आध्यात्म का ज्ञान भी दिया जाना चाहिये। विद्यालयों में तो यह शिक्षा मिलती नहीं है इसलिये माता पिता या दादा दादी को ही यह दायित्व उठाना चाहिये।
ॐ शब्द का हमारे अध्यात्म में बहुत महत्व है और इसलिये अध्ययन से पूर्व उसका जाप मन ही मन में अवश्य करना चाहिये। शब्दों में ओम को सर्वोत्तम माना गया है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में तो इसका जाप अध्यापक कराते नहीं है इसलिये माता पिता को चाहिये कि वह अपने बच्चों को इसका जाप करने का संदेश दें। इसके जाप से पढ़ा हुआ याद रहता है और इससे मन भी स्वच्छ रहता है।
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