क्रिकेट मैच विद ब्लाग गासिप-हास्य व्यंग्य


वह ब्लाग क्रिकेट की वजह से ही लोकप्रिय हो रहा है। हुआ यह कि एक अभिनेता की की कोई एक क्रिकेट टीम है। इसी अभिनेता ने अपना एक ब्लाग भी खोल रखा है। यानि क्रिकेट और ब्लाग में उसका बराबर का दखल है। ब्लाग और क्रिकेट दोनेां ही प्रचार के वजह से ही लोकप्रिय होते हैं। अगर कोई क्रिकेट न ख्ेाले और ब्लाग न लिखे-पढ़े तो दोनों ही पटियों पर आ जायेंगे। इसलिये कभी कभी तो यह लगता है कि ब्लाग और क्रिकेट दोनों की प्रचार दिलाने के लिये अभिनेताओं का उपयोग हो रहा है।
अब इसी ब्लाग और क्रिकेट के बीच संघर्ष हो रहा है या कराया जा रहा है जो भी समझ लें। वैसे देखा जाये तो वह ब्लाग जो कि अभिनेता की टीम की आलोचना करते हुए अंदरूनी खबरें दे रहा है उसे देखते हुए तो ऐसा लगता है कि जैसे फिल्मों की गासिप आती है वैसे ही वह भी कर रहा है। तय बात है कि अभिनेताओं को गासिपों की जरूरत होती है-प्रत्यक्ष रूप से वह उन गासिपेां की विरोध करते हुए बयान देते हैं यानि अगर वह गासिप नहीं छपे तो उनको बयान देने का अवसर भी न मिले। प्रत्यक्ष रूप से वह अभिनेता उस ब्लाग लेखक को तलाश करता हुआ दिख रहा है और इधर लोग हैं कि उसे भी शक की नजर से देख रहे हैं। दरअसल यही क्रिकेट के साथ हुआ यही है कि कुछ पुराने क्रिकेट प्रेमी जो अब ब्लागर बन गये हैं उसे शक की नजर से देखते हैं। शक यूं भी होता है कि वह ब्लाग क्रिकेट की वजह से ही मशहूर हो रहा है। वैसे वह ब्लाग अंग्रेजी में हैं-टीवी में इस लेखक ने यही देखा था-पर यह महत्वपूर्ण नहीं है। ब्लाग लिखवाने के लिये कोई हिंदी का टाईपिस्ट नहीं मिला होगा या फिर यूनिकोड का उनको पता नहीं होगा। इस लेखक ने कई बार जिम्मेदार हिंदी ब्लाग लेखकों से कहा है कि इस टूल का प्रचार करो। कभी कभी तो लगता है कि कुछ ब्लाग लेखक बड़े लोगों से मिलते हैं पर उनके यूनिकोड टूल का पता नहीं बताते।
यकीनन अगर वह ब्लाग लिखवाने वालों को हिंदी टूल का पता होता तो वह ऐसा ही करते। एक तीर से दो शिकार! दोनों ही भाषाओं में प्रचार! भले ही अभिनेता और अभिनेत्रियों को हिंदी नहीं आती-उनके टीवी पर साक्षात्कार देखकर ऐसा ही लगता है जिसमें वह हिंदी के प्रश्न का जवाब भी अंग्रेजी में देते हैं-पर वह हिंदी में प्रचार की भूख उनको बहुत है।
आजकल इस लेखक के अनेक ब्लाग अंग्रेजी कर पढ़े जाते हैं जब उनको खोलकर देखते हैं तो अपना लिखा ही समझ में नहीं आता । अगर ब्लाग लेखक वह हिंदी में ब्लाग लिखता तो उसे ढेर सारे पाठक मिल जाते-अंग्रेजी में भी हिंदी वाले पढ़ते हैं पर उनको समझ में कम आता है। फिर टूल से अनुवाद कर उसे अंग्रेजी में प्रस्तुत किया जा सकता था। इधर हिंदी के ब्लाग लेखक भी उस टिप्पणियां लिखने से बाज नहीं आते-तब उनको यह विचार नहीं आता कि ब्लाग लिखवाने वाला उनके ब्लाग नहीं पढ़ता या टिप्पणी नहीं देता। इतने बड़े आदमी से भला मासूम हिंदी ब्लाग लेखक ऐसी आशा करते भी कैसै?

बड्ा आदमी! हां, ब्लाग लेखक के दावे के अनुसार वह उस अभिनेता की टीम में अंदर तक पहुंच रखता है और यकीनन कोई यह काम छोटा आदमी नहीं कर सकता। अनेक लोग अनेक तरह के शक कर रहे हैं पर एक बात तय है कि ब्लाग को प्रचार खूब मिल रहा है। अब इसमें एक पैंच है कि क्रिकेट की लोकप्रियता को ब्लाग के जरिये बनाये रखने का प्रयास हो रहा है या इससे ब्लाग को प्रचार दिलवाया जा रहा है। उसके समाचार ऐसे ही हैं जैसे फिल्मी अभिनेता और अभिनेत्रियों के इश्क के किस्सै! मुश्किल यह है कि क्रिकेट के ग्यारह खिलाड़ियों में सभी पुरुष हैंे और उनमें किसी तरह की महिला की चर्चा करना खेल से अलग चर्चा हो जायेगी इसलिये शायद उससे बचा जा रहा है। इसलिये अभिनेता ओर अभिनेत्रियेां के प्रसंग की बजाय खिलाड़ियों के आपसी विवादों को लिखा जा रहा है।
वैसे इस लेखक ने इस क्रिकेट और ब्लाग की जंग पहले एक ब्लाग लेखक के कंप्यूटर पर आंखों से देखी थी। वह ब्लाग लेखक अपना ब्लाग बना रहा था। लफड़ा यह था कि वह हिंदी टाईप जानता था और उसे यूनिकोड टूल का पता नहीं था। होता तो भी क्या करता? ब्लाग बनाना भी तो उसे नहीं आता था। बार हिंदी में टाईप करके रखता तो वहां सब अंग्रेजी में हो जाता और वह ऐसा कि किसी के समझ में नहीं आता। इधर विश्व क्रिकेट कप प्रतियोगिता प्रारंभ हो चुकी थी। लीग मैच हो रहे थे और वह परेशान था। इधर मन में यह बात थी कि ब्लाग बन जाये तो अपना लिखना शुरू किया जा सके तो उधर क्रिकेट मैच देखने की इच्छा भी थी कि शायद भारत इस बार जीत जाये। उसने ब्लाग की वजह से हल्के मैच देखेन की कुरबानी करने का फैसला किया। मगर यह क्या? इधर पहली छोटी कविता यूनिकोड में लिखकर डालकर उसने ताली बजायी और सोचा कि चलो पता करें मैच का क्या हुआ? पता लगा कि भारत बंग्लादेश से हार गया।

इधर वह ब्लागर हिंदी के हिंदी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरम नारद पर ही अपनी क्रिकेट के वह पाठ भी देख रहा था जो किसी के पढ़ने में नहीं आ रहे थे और वहां से शिकायते आ रही थी। बहरहाल हिंदी ब्लाग ने उसके क्रिकेट प्रेम की कुर्बानी ले ही ली। उसके बाद तो उसने क्रिकेट पर केवल एक ही बार अच्छी बात लिखी वह थी जब भारत ने बीस ओवरीय विश्व प्रतियोगिता जीती और उसमें भी जोड़ दिया कि भारत में लोग क्रिकेट से ऊब रहे थे पर बाजार अब इसे लाइफलाईन की तरह उपयोग करेगा। उस ब्लाग को क्रिकेट का विषय हमेशा व्यंग्य लिखने के लिये ही अच्छा लगता है। बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा शीर्षक की कविता जबरदस्त हिट है जबकि वह उसी के समझ में नहीं आती।

एक बात लगती है कि क्रिकेट खेल ब्लाग के जरिये लोकप्रियता बनाये रखने के इस तरह प्रयास आगे भी होंगे। यह क्लबी टाईप क्रिकेट है और इसमें लोगों की रुचि अब फिल्मों की तरह बनाये रखने का प्रयास होगा क्योंकि देशप्रेम को भुनाना अब कठिन होता जा रहा है। अनेक बुद्धिमान लोग यह मानने लगे है कि क्रिकेट से देशप्रेम जोड़ना एक भ्रम था भले ही उसके साथ देश का नाम जुड़ा था। अंतर्जाल का प्रयोग बढ़ रहा है और फिल्मी हस्तियों को तो यहां वैसे भी लोकप्रियता प्राप्त है पर क्रिकेट खिलाड़ियों की लोकप्रियता बरकरार रखने के लिये चटपटे ब्लाग आगे भी बनेंगे। गनीमत अंग्रेजी में है और हिंदी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरम उसे अपने यहां नहीं दिखा रहे वरना तो किसी भले आदमी का वहां पढ़ना भी भी मुश्किल हो जाये। वहां पाठक चटपटा मसाला पढ़ेगा कि…………….कवितायें या व्यंग्य। अलबत्ता चटपटे होने के कारण हिंदी के ब्लाग लेखक उनके पते यहां छापते रहेंगे।
आखिर बात यह है कि इस लेखक को क्रिकेट और ब्लाग में बैर लगता है क्योंकि जिस दिन मैच होता है उस दिन ब्लाग पर पाठकों की संख्या कम हो जाती है। दिन भर हिट ले रहे ब्लाग स्टेटकांउटर पर अपनी ताकत दिखाते हैं पर रात को क्रिकेट मैच के समय सो जाते हैं। भारतीय समय के अनुसार मैच अगर दिन में हुआ तो फिर रात को ही ब्लाग पर पाठक आते हैं। इसलिये ब्लाग और क्रिकेट की यह जंग भी दिलचस्प है भले ही लोगों को वह प्रयोजित लगती हो।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

अंतर्जाल पर अंग्रेजी से नहीं बल्कि हिन्दी से ही बदलाव हो सकता है=आलेख


अंतर्जाल के ब्लाग पर सामाजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये प्रयास कोई अब नयी बात नहीं है। कुछ लोगों ने अभी हाल ही में वेलंटाईन डे के पहले तक इंटरनेट पर चले विवाद पर लिखे गये पाठों को देखकर यही निष्कर्ष निकाला है कि आने वाले समय में भारत के 4.2 करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ता सड़क पर जाकर नारेबाजी करते हुए लाठी झेलने की बजाय अपने घरों पर कंप्यूटर और लैपटाप पर आंदोलन करना ठीक समझ रहे हैं। यह दिलचस्प है। ऐसे में एक प्रश्न जरूर उठता है कि आखिर इस देश में कौनसी भाषा के ब्लाग पर हम ऐसी आशा कर रहे हैं? यकीनन वह हिंदी नहीं है बल्कि अंग्रेजी है और जब देश में सामाजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये प्रयासों की आवश्यकता है तो उसके लिये सबसे महत्वपूर्ण भूमिका हिंदी के ब्लाग की होना चाहिये-बिना उनके यह कल्पना करना कठिन है।
अभी समाचार पत्र पत्रिकायें जिन ब्लाग का नाम अखबारों के दे रहे हैं वह अंग्रेजी के हैं। विवादास्पद विषय पर अखबार में नाम आने से उनको खोलकर पढ़ने वाले बहुत आते हैं-सामान्य रूप से आने पर ब्लाग में कोई दिलचस्पी नहीं लेता। समाचार पत्र पत्रिकाओं में नाम आने से वैलंटाईन डे से पूर्व तक चले विवाद पर जो पाठ अंग्रेजी ब्लाग पर लिखे गये उनको पाठक मिलना स्वाभाविक था पर हिंदी के ब्लाग के बिना किसी भी आंदोलन या जागरुकता के प्रयास में सफलता नहीं मिल सकती।

इस विवाद पर हिंदी के ब्लाग पर भी जमकर लिखा गया। हिंदी ब्लाग लेखकों ने उन अंग्रंेजी ब्लाग के लिंक दिये और इसमें संदेह नहीं कि उनको पाठक दिलवाने में योगदान दिया। नारी स्वातंत्र्य पर एक फोरम अंतर्जाल पर बनाया जिस पर 14 फरवरी वैलंटाईन डे पर दस हजार से अधिक सदस्य शामिल हुए। कुछ वेबसाईट भी जबरदस्त हिट ले रहीं थी पर यह सभी अंग्रेजी भाषा से सुसज्जित समाज का ही हिस्सा था। आम भारतीय जिसकी भाषा हिंदी है उसका न तो वैंलंटाईन डे से लेना देना था न नारी स्वातंत्र्य पर चल रही सतही बहस से। फिर भी समाचार पत्र पत्रिकाओं ने उस विवाद को महत्वपूर्ण स्थान दिया। ऐसे में हिंदी ब्लाग पर चल रही बहस का कहीं जिक्र नहीं आया जो कि इस बात का प्रमाण है प्रचार माध्यम उसकी अनदेखी कर रहे हैं। हालांकि हिंदी ब्लाग लेखकों के दोनों पक्षों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा पर कुछ ब्लाग लेखकों के निजी आक्षेपों ने उनके पाठ को कमजोर बना दिया।
हमारा यहां उद्देश्य वैलंटाईन डे पर हुई बहस के निष्कर्षों पर विचार करना नहीं है बल्कि सामाजिक आंदोलन और जागरुकता में हिंदी ब्लाग के संभावित योगदान का आंकलन करना है। यह बात इस लेखक द्वारा हिंदी क्षेत्र के होने के कारण नहीं लिखी जा रही कि भारत में हिंदी ब्लाग की ही किसी सामाजिक परिवर्तन में भूमिका हो सकती है। अगर अंग्रेजी ब्लाग की भूमिका हुई तो वह हिंदी समाचार पत्र पत्रिकाओं में उनके पाठों के स्थान मिलने का कारण होगी न कि अपने कारण। यह हैरानी की बात है कि ब्लाग का प्रचार तो सभी कर रहे हैं पर इस सत्य से मूंह छिपा रहे हैं कि वह अंग्रेजी भाषा के ब्लाग के बारे में लिख रहे हैं न कि हिंदी के बारे में। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अंग्रेजी के मोह के कारण प्रचार चाहने वाले प्रतिष्ठित लोग अंग्रेजी के ब्लाग पर ही अपना नाम देखना चाहते हैं जैसे कि बी.बी.सी. लंंदन के समाचारों में देखते हैं। जहां तक हिट का प्रश्न है तो अभी अंतर्जाल पर कई तरह के भ्रम हैं कि क्या वाकई अंग्रंजी ब्लाग लेखकों के उतने पाठक हैं जितने कि वह दावा करते हैं। अंग्रेजी के एक ब्लाग लेखक ने अपनी एक टिप्पणी में लिखा था कि अंग्रेजी में वही ब्लाग हिट ले रहे हैं जो प्रायोजित हैं पर जो सामान्य लोगों के ब्लाग हैं उनकी कमोबेश स्थिति हिंदी जैसी है। सच क्या है कोई नहीं जानता। वैसे भी किसी एक के दावे पर यकीन करना ठीक नहीं है।

फिर यह ंअंतर्जाल है। अंग्रेजी का परचम फहरा रहा है यह सही है पर भारतीय विषयों पर हिंदी में लिखा गया है तो उसे पाठक नहीं मिलेंगे यह भी भ्रम है। हां, इतना अवश्य है कि उच्च स्तर पर अंग्रेजी भाषा के लोगों का वर्चस्व है और वह अपने ब्लाग हिट बना लेते हैं पर इसके लिये उनकी तकनीकी कौशल या चतुर प्रबंधन को ही श्रेय दिया जा सकता है न कि पाठों को। यह हैरान करने वाली बात है कि अगर अंग्रेजी ब्लाग के मुकाबले हिंदी ब्लाग के लेखक अधिक भावनात्मक ढंग से अपनी बात रखते हैं और उनके पाठक भी उनको ऐसे ही पढ़ते हैं।

एक बात तय रही कि अंग्रेजी के ब्लाग पढ़ने वाले बहुत मिल जायेंगे क्योंकि उनको हिंदी ब्लाग के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। दूसरा कारण यह है कि हिंदी के प्रचार माध्यम केवल चुनींदा हिंदी ब्लाग लेखकोें पर ही प्रकाश डालते हैं क्योंकि सभी की पहुंच उनके कार्यालयों तक नहीं है। जब किसी विषय के साथ ब्लाग का नाम देना होता है तो अंग्रेजी के ब्लाग का नाम तो दिया जाता है पर हिंदी के ब्लाग को एक समूह के नाम से संबोधित कर निपटा दिया जाता है। कभी कभी झल्लाहट आती है पर फिर सोचते हैं कि अगर कहीं इन्होंने हिंदी के ब्लाग के नाम अपने प्रचार में दिये तो फिर उनको ही तो चुनौती मिलेगी-भला कौन व्यवसायी अपने सामने प्रतिस्पर्धी खड़ा करना चाहेगा। हिंदी के ब्लाग लेखकों के पास साधन सीमित है। मध्यवर्गीय परिवारों के लोग किस तरह अपने ब्लाग चला रहे हैं यह तो वही जानते हैं। फिर जो ब्लाग लेखक हैं उनमें से अधिकतर शांति से रहकर काम करने वाले हैं। किसी प्रकार का दूराव छिपाव नहीं करते इसलिये ही तो अंग्रजी ब्लाग का भी लिंक देते हैं पर अंग्रेजी के ब्लाग ऐसा कहां करने वाले हैं?

लब्बोलुवाब यह है कि बातेंे बड़ी करने से काम नहीं चलेगा। तमाम लोग जो सामजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये ब्लाग की भूमिका चाहते हैं उनको यह समझना चाहिये कि यह केवल हिंदी में ही संभव है। ऐसे में वह इसी बात का प्रयास करें कि हिंदी ब्लाग जगत का ही प्रचार करें। हालांकि इसके आसार कम ही हैं क्योंकि वैलंटाईन डे पर नारी स्वातंत्र्य की समर्थक जिन वेबसाईटों का प्रचार हो रहा है उनके सामने प्रतिवाद प्रस्तुत करने वाला कौन था? यकीनन कोई नहीं। हां, हिंदी ब्लाग जगत में बहुत सारे पाठ थे जो नारी स्वातंत्र्य के रूप में पब के प्रचार के विरुद्ध जोरदार ढंग से लिखे गये तो परंपरा के नाम पर स्त्रियों पर अनाचार के विरुद्ध भी बहुत कुछ प्रभावी ढंग से कहा गया। तीसरे पक्ष भी था जिसमें ब्लाग पर ऐसे भी पाठ लिखे गये जो इस मुद्दे को ही प्रायोजित मानते हुए समर्थन या विरोध करने की बजाय उसका मजाक उड़ा रहे थे। देश का बहुत बड़ा पाठक वर्ग उससे पढ़ने से वंचित रह गया जो शायद अंग्रेजी में लिखे गये पाठों से बहुत अच्छा था। वैसे एक बात भी लगती है कि वैलंटाईन पर एकतरफा बहस शायद अंग्रेजी में ही संभव थी क्योंकि उनके पाठ एकदम सतही थे। हिंदी वाले तो बहुत गहराई में उतरकर लिखते हैं और एक बार कोई अच्छा ब्लाग पढ़ ले तो पाठक् उनको पढ़ने पर ही आमादा हो जाते हैं। अंग्रेजी में जो ब्लाग इस दौरान हिट हुए वह भला अब रोज थोड़े ही हिट रहने वाले हैं। अगर इस बात से सीखा जाये तो भी यही निष्कर्ष निकलता है कि समाज में स्थाई परिवर्तन केवल हिंदी भाषा के ब्लाग से ही संभव है। अंग्रेजी में क्षणिक प्रचार ही संभव है स्थाई परिवर्तन नहीं।
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मंदी का दौर:नया उपभोक्ता वर्ग कहां से आयेगा-आलेख


अमेरिका के उद्योगपति बिल गेट्स ने कहा है कि वर्तमान मंदी अगले चार साल तक चल सकती है। बिल गेट्स विश्व में प्रसिद्ध उद्योगपति हैं और नये लोगों को उनसे प्रेरणा लेने को कहा जाता है। वैसे उन्होंने जो अनुमान लगाया है उसके जो आधार होंगे वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के बाजार को दृष्टिगत बनाये गये होंगे। वैसे तो भारत में भी मंदी का दौर चल रहा है पर आज तक यह कोई नहंी बता पा रहा है कि आखिर यह मंदी आई कैसे?

जिन लोगों ने दृष्टा की तरह इस बाजार को देखा होगा वह कभी न कभी इस आशंकित मंदी पर विचार अवश्य करते रहे होंगे। नित प्रतिदिन नवीन उत्पादों की चर्चा आये दिन प्रचार माध्यमों में आती है पर यह बात याद रखने लायक है कि वह पुराने प्रचलित उत्पादों को बाहर अधिक करते हैं बनिस्बत नये ग्राहक बनाने के। अभी में भारत में एक सस्ती कार के निर्माण और बाजार में और की चर्चा है इस कार को देखने के बाद-एक टीवी में एक मेले में इसका माडल दिखाया गया था-कोई भी कह सकता है कि वह लोगों में कम दाम से अधिक अपनी डिजाइन के कारण लोकप्रिय होगी। जिन लोगों के पास महंगी और आकर्षक कारें हैं वह भी इसका उपयोग स्थानापन्न रूप से कर सकते हैं या पुरानी बेचकर वही लेना चाहेंगे। इस कार को नये उपभोक्ता खरीदेंगे पर उनकी संख्या कम होगी। अब यह संभव है कि अनेक महंगी और बड़ी गाडि़यों की बिक्री में कमी उसकी वजह से हो सकती है। कहने का तात्पर्य है कि जो तेजी बाजार में चल रही थी-कम से कम भारत में-वह सीमित वर्ग के धन के व्यय पर चल रही थी। यही वर्ग बदल बदल कर आ रहे उत्पादों को खरीद रहा था। हां शुरुआताी दौर में फ्रिज,टीवी,कूलर,कार,मोटर साइकिल तथा अन्य औद्योगिक उत्पादों को नये होने के कारण भारत में बहुत बड़ा बाजार मिला पर जैसे ही मध्यम वर्ग के सभी लोगों से इसे प्राप्त कर लिया तो उसके बाद फिर वही वर्ग नये उत्पादों को खरीद रहा जिसके पास अपने मूल स्त्रोत से अलग भी आय है-या फिर कहा जाये कि उनके पास एक से अधिक आय के स्त्रोत हैं। इसके अलावा निजी क्षेत्र में ं नयी और आकर्षक नौकरी के कारण भी एक वर्ग नये उत्पादों को खरीदता रहा। देश में उदारीकरण के प्रारंम्भिक दौर में उस समय अनेक उद्योगों और व्यवसायों को अपना मूल ढांचा खड़ा करने के लिये लोग चाहिये थे और उन्होंने इसलिये अपने यहां बड़े पैमाने पर नौकरियां दीं। इनमे आप टेलिफोन कंपनियों का नाम ले सकते हैं। उनकेा नये कनेक्शन और ग्राहक जुटाने थे इसलिये उन्होंने अपना संगठन बढ़ाया। अब वह स्थापित हो गये हैं। शहरों में उन्होंने अपना नेटवर्क स्थापित कर लिया है और नई लाईनें डालने और ग्राहक बनाने का उनका दायरा अब उतना नहीं है जितना दो या तीन वर्ष पूर्व था। तय बात है कि उनको अपने यहां नौकरियां ओर कर्मचारी कम करना पड़ सकते हैं। इसका असर उन लोगों की क्रय क्षमता पर पड़ना है जो वहां से हटाये जायें या कहीं ऐसी जगह रखें जायें जहां उनका स्वयं का व्यय ही अधिक हो जाये। फिर मंदी के दौर के चलते जहां अनेक लोग नौकरियां गंवा रहे हैं या उनके वेतन में कमी हो रही है इससे भी एक उपभोक्ता के रूप में उनकी क्रय क्षमता का हृास हो रहा है।

दरअसल इस मंदी का मुख्य कारण यह है कि कंपनियों ने अपने विनिवेशकों को खुश करने के लिये अधिक लाभांश या ब्याज दिया। यह अलग बात है कि कंपनी के उच्चाधिकारियों के पास भी अधिक मात्रा में शेयर होते हैं और उनको स्वयं भी लाभ मिलता है। इतना ही नहीं कितनी भी मंदी हो कंपनियों के उच्चाधिकारियों के लाभों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह अपना उच्च स्तर बनाये रखते हैं-कई जगह वेतन के साथ वह कमीशन भी प्राप्त करते हैं-उनके व्यय में कमी नहीं आती। अभी हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ने अपने देश की कंपनियों को इस बात के लिये लताड़ा भी था कि उनके उच्चाधिकारी न केवल ठाठ से रह रहे हैं बल्कि बोनस भी ले रहे हैं जबकि उनकी कंपनियां मंदी का संकट झेलते हुए सरकार से मदद की गुहार लगा रही हैं।

भारत में तो वैसे भी कर्मचारियों और मजदूरों का शोषण होता रहा है और कंपनियां भी इससे पीछे नहीं हैं। मुख्य बात यह है कि उन छोटे कर्मचारियों का सभी जगह शोषण होता है जो मजदूरी या लिपिकीय कार्य करते हैं। इनके वेतन बहुत कम रखे जाते हैं यह सोचकर कि उनका कोई महत्वपूर्ण नहीं है या उन जैसे बहुत मिल जायेंगे। कंपनियां यह भूल जाती हैं कि उनके कर्मचारी किसी के उपभोक्ता होते हैं जैसे कि अन्य जगह कार्यरत कर्मचारी उनके भी उपभोक्ता होते है। एक टेलीफोन कंपनी मेंं कार्यरत टीवी और फ्रिज भी खरीदता है तो टीवी कंपनी के लिये कार्य करने वाला अपने यहां टेलीफोन भी लगवाता है। अगर हम इस चक्र को देखें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अधिकतर कंपनियां या उद्योगपति समाज के दोहन में लगे रहते हैं और उपभोक्ता के रूप मेंं दूसरे की जेब से पैसा निकालने के लिये तत्पर होते हैं पर जब उसे भरने की बात आती है तो उनको अपने लाभ की चिंता सताती है। इन उद्योगतियों और कंपनियों के उच्चाधिकारियों का बहुत सारा यकीनन बैंकों में सड़ता होगा और वह बैठकर इस मंदी का लुत्फ उठाते हैं और प्रचार माध्यमों में मंदी का रोना रोते हैं।

भारत में जो नवीन उपभोक्ता वर्ग गुणात्मक रूप से बढ़ रहा था उसमें अब घनात्मक वृद्धि ही संभव है इसलिये नवीन उत्पाद किसी पुराने उत्पाद को या तो रीसेल के लिये भेजेंगे या कबाड़ में डाल देंगे। इससे बाजार उठने वाला नहीं है। वैसे भी आदमी कितना कबाड़ घर में रखेगा? घर भी आखिर भरने लगता है। यह मंदी का दौर कब तक चलेगा कोई नहीं जानता क्योंकि सभी जगह समस्या यही रहने वाली है कि नया उपभोक्ता वर्ग कहां से आयेगा या उसकी जेब कैसे भरेगी। आखिर आदमी भी कब तक कबाड़ में चीजें रखेगा।
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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सुविधाओं के गुलाम-व्यंग्य


15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था या एक राष्ट्र के रूप में स्थापना हुई थी। परंतत्र देश स्वतंत्र हुआ पर क्या परतंत्र का मतलब गुलामी होता है। कुछ प्रश्न है जिन पर विचार किया जाना चाहिये। विचार होगा इसकी संभावना बहुत कम लगती है क्योंकि वाद ओर नारों पर चलने वाले भारतीय बुद्धिजीवी समाज की चिंतन करने की अपनी सीमायें हैं और अधिकतर इतिहास में लिखे गये तथ्यों-जिनकी विश्वसनीयता वैसे ही संदिग्ध हेाती है- के आधार पर भविष्य की योजनायें बनाते है।

कई ऐसे नारे गढ़े गये हैं जिनको भुलाना आसान नहीं लगता। कोई कहता है कि चार हजार वर्ष तक भारत गुलाम रहा तो कोई दो हजार वर्ष बताकर मन का बोझ हल्का करता है। अगर मन लें वह गुलामी थी तो फिर क्या आज आजादी हैं? अगर यह आजादी है तो यह पहले भी थी। परंतत्रता और गुलामी में अंतर हैं। तंत्र से आशय कि आपके कार्य करने के साधनों से हैं। शासन, परिवार और संस्थाओं का आधार उनके कार्य करने का तंत्र होता है जिसमें मनुष्य और साधन संलिप्त रहकर काम करते हैं। परतंत्रता से आशय यह है कि इन कार्य करने वालों साधनों और लोगों का दूसरे के आदेश पर काम करना। सीधी बात करें तो देश का शासन करने का तंत्र ही आजाद हुआ था पर लोग अपनी मानसिकता को अभी भी गुलामी में रखे हुए हैे। अधिकतर लोगों का मौलिक चिंतन नहीं है और वह इतिहास की बातें कर बताते हैं कि वह ऐसा था और वहां यह था पर भविष्य की कोई योजना किसी के पास नहीं है।
जैसे जैसे प्रचार माध्यमों की शक्ति बढ़ रही है लोग सच से रू-ब-रू हो रहे हैं और वह इस आजादी को ही भ्रम बता रहे हैं। वह अपने विचार आक्रामक ढंग से व्यक्त करते हैं पर फिर गुलामों जैसे ही निष्कर्ष निकालते हैं। बहुत विचार करना और उससे आक्रामक ढंग से व्यक्त करने के बाद अंत में ‘हम क्या कर सकते हैं’ पर उनकी बात समाप्त हो जाती है।
शायद कुछ लोगों को यह लगे कि यह तो विषय से भटकाव है पर अपने समाज के बारे में विचार किये बिना किसी भी प्रकार की आजादी को मतलब समझना कठिन है। आज भी विश्व के पिछड़े समाजों में हमारा समाज माना जाता है। बीजिंग में चल रहे ओलंपिक में एक ही स्वर्ण पदक पर पूरा देश नाच उठा पर 110 करोड़ के इस देश में कम से कम 25 स्वर्ण पदक होता तो मानते कि हमारा तंत्र मजबूत है। जब भी इन खेलों में भारतीय दलों की नाकाम की बात होती है तो तंत्र को ही कोसा जाता है। यानि हमारा तंत्र कहीं से भी इतना प्रभावशाली नहीं है कि वह 25 स्वर्ण पदक जुटा सके। इक्का-दुक्का स्वर्ण पदक आने पर नाचना भी हैरानी की बात है। भारत ने व्यक्तिगत स्पर्धा में पहली बार अब यह स्वर्ण पदक जीता जबकि पाकिस्तान का एक मुक्केबाज इस कारनामे को पहले ही अंजाम दे चुका है पर वहां भी एसी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी। हमारे देश एक स्वर्ण पदक पर इतना उछलना ही इस बात का प्रमाण है कि लोगों के दिल को यह तसल्ली हो गयी कि ‘चलो एक तो स्वर्ण पदक आ गया वरना तो बुरे हाल होते’।

तंत्र की नाकामी को सभी जानते हैं। इस पर बहसें भी होती हैं पर निष्कर्ष के रूप में कदम कोई नहीं उठाता। वर्तमान हालतों से सब अंसतुष्ट हैं पर बदलाव की बात कोई सोचता नहीं है। अग्रेज अपनी ऐसाी शैक्षणिक प्रणाली यहां छोड़ गये जिसमें गुलाम पैदा होते हैंं। यह अलग बात है कि बड़ा गुलाम छोटे गुलाम का साहब होता है।

समाज और लोगों की आदतों को ही देख लें वह किस कदर सुविधाओं के गुलाम हो गये है। देश में आयात अधिक है और निर्यात कम। विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता क्या गुलामी नहीं है। जिसे पैट्रोल पर पूरा देश दौड़ रहा है उसका अधिकांश भाग विदेश से आता है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने का प्रयास उसका अंग था पर क्या वह आज कोई कर रहा है। पूरा देश गैस, पैट्रोल का गुलाम हो गया है। अगर इनका उत्पादन पूरी तरह देश में होता तो कोई बात नहीं पर अगर किसी कारण वश कोई देश भारत को तेल का निर्यात बंद कर दे या िकसी अन्य कारण से बाधित हो जाये तो फिर इस देश का क्या होगा? पूरा का पूरा समाज अपंग हो जायेगा। अपने शारीरिक तंत्र से लाचार होकर सब देखता रहेगा।

फिर जिन अंग्रेजों को खलनायक मानते थे आज उसकी प्रशंसा करते हैं। उसकी हर बात को बिना किसी प्रतिवाद के मान लेते हैं। हमारे देश के अनेक लोग वहां अपने लिये रोजगार पाने का सपना देखते हैं। वैसी भी अंग्रेजों का रवैया अभी साहबों से कम नहीं है। वैसे पहले तो अपने भाषणों में सभी वक्ता अंग्रेजों को कोसते थे पर अब यह काम किसी के बूते का नहीं है। अमेरिका के मातहत अंग्रेजों से कोई टकरा पाये इसका साहस किसी में नहीं है। फिर उनके द्वारा छोड़ी गयी साहब और गुलाम की व्यवस्था में हम कौनसा बदलाव ला पाये।

फिर अंग्रेजों ने कोई भारत को गुलाम नहीं बनाया था। उन्होंने यहां रियासतों के राजा और महाराजाओं को हटाकर अपना शासन कायम किया था। यही कारण है कि आज भी कई लोग उनको वर्तमान भारत के स्वरूप का निर्माता मानते हैं। अगर देखा जाये तो जिस आम आदमी के आजादी से सांस लेकर जीने का सपना देखा गया वह कभी पूरा नहीं हो सका क्योंकि तंत्र के संचालक बदले पर तंत्र नहीं। जब हम स्वतंत्रता की बात करते हैं तो अंग्रेजों की बात करनी पड़ती है पर अगर स्थापना दिवस की बात की जाये तो इस बात को भुलाया जा सकता है कि उनके राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था। पिछले दिनों अखबारों में छपा था कि ब्रिटेन में भी सरकारी दफ्तर लालफीताशाही और कागजबाजी के शिकार हैं। वहां भी काम कम होता है। यानि हमारे यहां उनके द्वारा यहां स्थापित तंत्र ही काम रहा है जिसमें कागजों में लिखा पढ़कर फैसला किया जाता है या छोटे से छोटे काम पर चार लोग बैठकार लंबे समय तक विचार कर उसे करने का निर्णय करते हैं। वैसे तो लगता था कि अंग्रेजों ने केवल यहां ही साहब और गुलाम की व्यवस्था रखी पर दरअसल यह तो उनके यहां भी यही तंत्र काम कर रहा है। वहां भी कोई सभी साहब थोड़े ही हैं। वहां भी आम आदमी है और सभी लार्ड नहीं है। भारत से गये कुछ लोग भी वहां लार्ड की उपाधि से नवाजे गये हैं। मतलब यह कि भारतीय भी लार्ड हो सकते हैं यह अब पता चला है। ऐसे में ख्वामख्वाह में अंग्रेजों को महत्व देना। इससे तो अच्छा है कि इसे स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता तो अच्छा था।
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