जिम्मेदारी में कमीशन-हिन्दी कविता (jimmedar aur commision-hindi kavita)


जिम्मेदारी वह सारे समाज की यू ही नहीं उठाते,
मिलता कमीशन, खरीदकर घर का सामान जुटाते।
बह रही  दौलत की नदियां, उनके घर की ओर,
दरियादिल दिखने के लिये, वह कुछ बूंदें भी लुटाते।
न कहीं शिकायत होती, न करता कोई फरियाद
भाग्य का तोहफा समझ सभी अपने हिस्से उठाते।
लग चुकी है ज़ंग लोगों के सोचने के औजारों में
तयशुदा लड़ाई है, खड़े यूं ही हाथ में तलवार घुमाते।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका

Advertisements

गृहलक्ष्मी से बड़ा सामान-हिन्दी हास्य कविता (grihalakshmi ka bada saman-hindi hasya kavita


रिश्ते की बात करते हुए
वर पक्ष ने जमकर डींग मारीं
‘हमारे पास अपना आलीशान मकान है,
अपनी बहुत बड़ी दुकान है,
घर में रंगीन टीवी, फ्रिज,ऎसी और
कपडे धोने की मशीन है
रसोई में बनते तमाम पकवान हैं’.
फिर रिश्ता तय होते ही अपनी
मांगों की सूची कन्या पक्ष को थमा दीं
जिसमें तमाम तरह का मांगा था सामान
जैसे उनका बेटा बिकाऊ इन्सान है

कन्या के पिता ने रिश्ते से
इंकार  करते हुए कहा
‘आपके घर में बहु की कमी थी
वही पूरी करने के लिए मैं अपनी
बेटी का हाथ देने को तैयार था
पर मुझे लगता है कि
उसकी आपको कोई जरूरत नहीं
क्योंकि आपकी प्राथमिकता
गृह लक्ष्मी को घर में जगह देने की बजाय
उसके साथ आने वाला सामान है’,
सामानों के होने की ख़ुशी आपको बहुत है
पर किसी की बेटी का आपका घर रोशन हो
ऐसा लगता नहीं आपके दिल को कोई अरमान है.  
————————

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

मोम की आस्था-हिन्दी कविता (mom kee astha-hindi poem)


आस्था को कौन गिरा सकता है
विश्वास को कौन तोड़ सकता है,
हृदय में उपस्थित देवताओं को
कौन अपमानित कर सकता है,
जिन इंसानों ने तय कर लिया  है कि
किसी भी तरह ज़माने की हवा बिगाड़ेंगे
आसमान के ख्वाबी फरिश्तों को
ज़मीन पर लाकर रंग निखारेंगे
अपने मतलब के लिये जज़्बातों को
जलता दिखाकर
झौंक देंगे पूरे शहर को  आग में
रहबरों का ही आसरा है उनको
इसलिये बड़ा हुआ है हौंसला
कोई उनका क्या बिगाड़ सकता है।

उनकी आस्थाएँ मोम की  बनी हैं
जिनके पिघलने पर इसलिए ही 
तूफ़ान मचता है
———
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

हिन्दी साहित्य,समाज,संदेश,मनोरंजन,मस्ती,मस्त राम,hindi literture,hindi sahitya,hindi poem,hindi kavita,raharon ka aasra,astha,vishvas,dil ke devata

ज़रूरत -हिन्दी कविता (zaroorat-hindi poem)


किसी की पीड़ा को देखकर कब तक
दिखावटी आंसु बहाओगे,
उसे जरूरत इलाज की है,

किसी की बेबसी पर कब तक
अपनी हमदर्दी दिखाओगे
उसे ज़रूरत  सहारे की है,

कब तक तकलीफों से बचने के लिये
किसी को हंसाओगे
उसे जरूरत दिल से मुस्कराने की है,

खाली लफ्जों से इंसान का पेट नहीं भरता
मगर जिन का भरा है
वह भी बैचेनी में जीते हैं
जरूरत तसल्ली की रोटी
और रोटी से तसल्ली की है।
————

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

ज़माने में जंग की आग लगाकर-हिन्दी शायरी


बंदूक के सहारे ज़माने में बदलाव
लाने की कोशिश हथियारों के
सौदागरों के दलाल की
चाल लगती है,
खून बहाकर तरक्की के रास्ते
चलने का ख्याल डाकुओं जैसा लगता है,
दुनियां के जिंदा रहने के लिये
कुछ मूर्तियों का टूटना जरूरी है
शैतानों का ख्याल लगता है
दरअसल जिनकी रूह लापता है
अपने ही आपसे
ज़माने में जंग की आग लगाकर
दिल बहलाने में उनका मन लगता है।
—————

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

खामोश तूफान-हिन्दी शायरी (khamosh toofan-hindi shayari)


दीवार के उस तरफ
वह आग की तरह उफन रहे हैं
यह सोचकर कि इस पार
पहुंचते ही तिनके को जला डालेंगे।
अंदाज नहीं उनको इस बात का कि
यहां भी कोई खामोश तूफान सांस ले रहा है
यह ख्याल करते हुए कि
हवाओं का रुख पलटा है कई बार
इस बार आग को भी भस्म कर डालेंगे।
———-
थोड़े प्यार की उम्मीद थी
उसे भी न दे सके
लगाई ऊंची कीमत उन्होंने अपनी दोस्ती की
यह सोचकर कि
लाचार को बिचारा बना देंगे।
टूट गया है तिलिस्म उनके विश्वास का
भले ही अपने घमंड का आसरा है उनको
पर जब आकर देखेंगे टूटा दिल
तब अपने ख्याल ही उनको हरा देंगे।
—————

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

कवि ने वरदान माँगा -हास्य कविता


कवि की हाजिरी पर प्रसन्न होकर
अपने दरबार में प्रकट हुए सर्वशक्तिमान
और बोले
‘दो में से एक वर मांग ले
पहला इस जन्म में अपनी
कविताओं के हिट होने का वरदान
पर इससे नहीं पैसे के लिहाज से तुम धनवान
या अगले जन्म में किसी प्रकाशक का
चमचा बनकर दौलत कमायेगा
और पायेगा दुनियां भर का सम्मान
पर कविता की नहीं होगी लोगों में शान’
कवि तुरंत बोला-
‘अगर इस जन्म में नहीं अपने नसीब है
कविताऐं तो फ्लाप हम भी गरीब हैं
जितने हिट हैं उतने ही ठीक हैं
अब तो निकल गयी उमर
इसलिये सुरक्षित रख लो
अगले जन्म के लिये अपना वरदान
तब युवावस्था में ही सारी
कामयाबी दिलाना
चमचे बनने की पूरी शक्ति देना
भले ही कविता लिखने की कम कर लेना
साहित्यकारों में करना शुमार
भले ही किसी प्रकाशक का चमचा बना देना
लिखें चाहें जैसा भी पर बढ़ाना सम्मान
किसी हालत में न हो इस जन्म जैसा भान

……………………………………..

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप