मोम की आस्था-हिन्दी कविता (mom kee astha-hindi poem)


आस्था को कौन गिरा सकता है
विश्वास को कौन तोड़ सकता है,
हृदय में उपस्थित देवताओं को
कौन अपमानित कर सकता है,
जिन इंसानों ने तय कर लिया  है कि
किसी भी तरह ज़माने की हवा बिगाड़ेंगे
आसमान के ख्वाबी फरिश्तों को
ज़मीन पर लाकर रंग निखारेंगे
अपने मतलब के लिये जज़्बातों को
जलता दिखाकर
झौंक देंगे पूरे शहर को  आग में
रहबरों का ही आसरा है उनको
इसलिये बड़ा हुआ है हौंसला
कोई उनका क्या बिगाड़ सकता है।

उनकी आस्थाएँ मोम की  बनी हैं
जिनके पिघलने पर इसलिए ही 
तूफ़ान मचता है
———
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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विकासवादी और पुरातनवादी-हिन्दी कविता


स्त्री का भला करेंगे,
बच्चों को खुश करने के दावें भरेंगे,
वृद्धों का उद्धार करेंगे,
मजदूरों को न्याय देंगे,
गरीब को करेंगे अमीर,
और लाचार का सहारा बनेंगे,
ऐसे दावे धोखा है,
बेईमानी का खोखा है।
समाज को एक जैसा बनाने की कोशिश
करने वाले विकासवादी अक्लमंद
सभी को बना रहे मूर्ख
इसलिये समाज को
जांत पांत और धर्म के टुकड़ों में बांटकर
अपनी बादशाहत को ज़माने पर ठोका है।
करे जो समदर्शिता की बात
उसे पुरातनवादी बताकर रोका है।
————

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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