आम ब्लाग लेखक के लिये कमाई अभी दूर की कौड़ी-आलेख


उस दिन चिट्ठकार चर्चा का नियमित ईमेल पढ़ा-यह ईमेल इसके सदस्यों को नियमित भेजा जाता है-जिसमें तमिल बच्चों द्वारा हिंदी सीखने की बात कही गयी थी। यह कोई नई खबर नहीं है क्योंकि अब कई ऐसे तमिल भाषी है जो हिंदी में लिखते और पढ़ते हैं-शायद इस ईमेल का आशय यह हो सकता है कि अब अधिक दिलचस्पी से तमिल भाषी बच्चे इसे पढ़ने लगें हों। इस प्रसंग का उल्लेख इसलिये करना ठीक लगा क्योंकि ईमेल पढ़ते हुए ही एक घटना इस लेखक के जेहन में आयी थी और वह कोई अधिक पुरानी नहीं थी। उस पर लिखने का दिल था पर इस ईमेल को देखकर यह प्रबल विचार उठा कि उस पर लिखा जाये।

एक मित्र सज्जन ने कुछ इस तरह एक घटना सुनाई। एक महिला के दो लड़के हैं एक अमेरिका में दूसरा मध्यप्रदेश में रहता है। मध्यप्रदेश में रहने वाला लड़का अपनी मां को अमेरिका में छोटे बेटे की तरफ रवाना करने के लिये चेन्नई गया। उसने विमानतल से अपनी मां को वायुयान में बिठाकर रवाना किया पर उसे अपनी मां को लेकर एक चिंता थी जो शायद नई थी। इससे पहले भी वह कई बार अमेरिका अकेले जा चुकी है पर इस बार कोई अन्य साथ जाने वाला यात्री नहीं था दूसरा उस महिला को हीथ्रो हवाई अड्डे पर टर्मिनल बदलना था जिसमें भाषा आड़े आने वाली थी। तमिल भाषी महिला को अंग्रेजी कम ही आती है पर हिंदी का ठीकठाक ज्ञान है।
उस महिला के बड़े पुत्र को इस टर्मिनल बदलने के दौरान ही मां के लिये चिंतायें थीं। इन टर्मिनलों पर यात्रियों की सहायता के लिये बहुभाषी होते हैं पर समस्या उनसे संपर्क की थी।

बहरहाल वह भद्र महिला हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरी कोई दुभाषिया ढूंढने लगी क्योंकि उसको दूसरे टर्मिलन पर जाने के लिये बस का पता पूछना था। एक दुभाषिया उससे मिला तो उसने उससे कहा कि‘आधे घंटे में आता हूंं।’
महिला बेबस खड़ी रह गयी। फिर उसने वहां खड़ी एक कर्मचारी से टूटी फूटी अंग्रेजी में उस बस का पता पूछा तो उस लड़की ने बता दिया। वह उस बस में चढ़कर दूसरे टर्मिनल पर पहुंची। वहां फिर वह कोई दुभाषिया ढूंढने लगी। वहां तमाम कर्मचारी थे जो चेहरे से ही विभिन्न देशों के लग रहे थे। वहां एक दुभाषिया उस महिला के पास आया और अंग्रेजी में पूछा कि ‘क्या आप भारत से आईं हैं।’
महिला ने कहा-‘हां!’
वह दुभाषिया उस समय औपचारिक रूप से पेश आ रहा था। फिर उसने महिला से हिंदी में पूछा-क्या आपको हिंदी आती है।’
उस भद्र की महिला की बाछें खिल उठीं और बोली-हां, आती है।’
वह दुभाषिया औपचारिकता की बजाय आत्मीयता से बोला-आपने अपने कागजों में व्हील चेयर की मांग की है। मैं अभी मंगवाता हूं। अच्छा आपने शाकाहारी भोजन की मांग की है यह बात मैं वायुयान के कर्मचारियों को बता दूंगा। अभी आप आराम से उधर बैठ जाईये। आप बेफिक्र होकर अपनी यात्रा जारी रखिये।’
महिला जब तक वहां से रवाना नहीं हुई तब तक उसकी वहां अनेक कर्मचारियों से हिंदी में बातचीत हुई। वह बहुत खुश थी। निर्धारित समय पर वायुयान से वह अमेरिका से रवाना हो गयी। वहां पहुंचकर उसने अपने बड़े बेटे को अपनी पूरी यात्रा का वृतांत फोन पर सुनाया और कहा-‘जब उस लड़के ने हिंदी मेेंं बात की तो मुझे बहुत अच्छा लगा। उससे पहले तो बहुत अकेलापन लग रहा था। उसके मूंह से निकल हिंदी शब्द अमृत की तरह लगे थे।’
हिंदी के विकास को लेकर निराशाजनक बातें करने वालों का निहितार्थ क्या होता है यह समझ में नहीं आता। जहां तक हिंदी के संपर्क भाषा का प्रश्न है तो वह निरंतर बढ़ रही है-यहां अपवादों की चर्चा करना व्यर्थ होगा। सच बात तो यह है कि हिंदी अब भारत में उन क्षेत्रों में पहुंच रही है जहां उसे पहले जाना तक नहीं जाता था। हम जब हिंदी के सम्मान की बात करते हैं तो सवाल यह उठता है कि हम उसे किस रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं? क्या यह चाहते हैं कि सारा विश्व ही हिंदी बोलने लगे। यह अतिश्योक्ति होगी। फिर हिंदी का आधुनिक स्वरूप बरकरार रहना चाहिये, अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग इसमें नियमित रूप से नहीं होना चाहिये, और अंग्रेजी की क्रियायें स्वीकार्य नहीं है जैसी बातों पर सहमति होने के बावजूद रूढि़वादिता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
आजकल अंतर्जाल की हिंदी के वेबसाईटों और ब्लाग को भविष्य में एक समानांतर प्रचार माध्यम के रूप में स्थापित होने की बात कहीं जा रही है पर इधर यह भी दिखाई दे रहा है कि हमारे कुछ ब्लाग लेखक मित्र-जिनका चिंतन और हिंदी ज्ञान वाकई गजब का है-ऐसी रूढि़वादी बातें करते हैं कि लगता है कि उनको समझाना कठिन है। पिछले दो वर्षों से मेरे संपर्क में रहे कुछ मित्र हिंदी लिखने वाले टूलों से जुड़े हैं और सच बात तो यह है कि इस लेखक को आत्मविश्वास से हिंदी में लिखने का आत्मविश्वास भी उन्हीं से मिला है पर उनकी कुछ बातें हैरान कर देती हैं।

यहां विकिपीडिया के हिंदी टूल की बात करना जरूरी रहेगा जो मेरे डेस्कटाप पर है पर उसका उपयोग करने मेंे मुझे असहजता लगती है। यह तो गनीमत है कि गूगल का इंडिक टूल और फिर बाद में कृतिदेव का यूनिकोड टूल मिल गया जो अंतर्जाल पर नियमित लिखना संभव हो पाया। हिंदी के विकिपीडिया का करीब पंद्रह दिन तक उपयोग किया पर बाद में जब उसका संशोधित टूल उपयोग किया तो उससे असहजता लगने लगी। एक मित्र ने कुछ गजब की बातें लिखीं जो हिंदी टाईप राइटर को लेकर थीं
उनकार कहना था कि पता नहीं किसने यह टाईपराईटर बनाया जिसमे ‘ ि’ की मात्र पहले लगती है जबकि इसे बाद में टाईप करना चाहिये क्योंकि इसे पढ़ा भी बाद में जाता है। तक यह था कि हिंदी जैसी बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है तो वैसी टाईप भी हो।
इसके बाद विकिपीडिया में यह परिवर्तन दिखाई दिया। इससे हुआ यह कि उस टूल पर टाईप करते हुए अपना लिखा ही पढ़ने मेें नहीं आता। इंडिक टूल से किसी शब्द के साथ आई लगाने से भी दी पी ही हो जाता है पर अगर इस विचार से विकिपीडिया पर टाईप किया जाये तो दि पि हि नि रहेगा। चलिये यह भी मान लें पर जब ‘’ि’ की मात्रा जब ल ि प ि जैसी दिखती हैं तो समझ में नहीं आता। पहले विकिपीडिया के आफलाईन टूल में हिंदी में ज्ञ शब्द आसानी से बन जाता था पर बाद में वह भी संभव नहीं रहा। हालत यह है कि कभी जल्दी में टिप्पणी लिखने लायक भी यह टूल नहीं रहा। यह कोई शिकायत नहीं है बल्कि कहना यही है कि अधिक रूढ़ता से आगे बढ़ेंगे तो शायद हम हिंदी के साथ न्याय नहीं कर पायेंगे।

अंतर्जाल पर दिखता सब कुछ है पर वैसा ही है जैसा दिख रहा है कहना कठिन है। गूगल के अनुवाद टूल से हिंदी के पाठ अन्य भाषाओं में पढ़े जा रहे हैं यह तो दिख रहा है पर वह वाकई उसी भाषा के लोग पढ़ रहे हैं जिसमें पढ़ा गया यह कहना कठिन है।
आखिर हिंदी को लेकर आशावादी क्यों होना चाहिये? दरअसल हिंदी को लेकर जब हम बात करते हैं तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि हमारे देश की पहचान जिन रचनाओं से है वह मूल रूप से आधुनिक हिंदी में नहीं हैंं। अन्य की बात तो छोडि़ये हिंदी भाषी लोग जो अपनी पहचान वाली रचनायें पढ़ते हैं वह मूल रूप से संस्कृत या क्षेत्रीय भाषाओं में है। आधुनिक हिंदी के शुरुआती दौर में मौलिक रूप से अच्छा लिखा गया पर बाद में तात्कालिक रूप से सम्मान और धन पाने के लिये अनेक समसामयिक विषयों पर लिखकर वाहवाही बटोरने में लग गये। इसलिये हमेशा ही प्रासंगिक रहने वाले विषयों पर बहुत कम ही मौलिक रूप से लिखा गया। यही कारण है कि हिंदी भाषा साहित्य समृद्ध होते हुए भी अप्रासंगिक होता चला जाता है। हास्य कवितायें और व्यंग्य लिखने वाले बहुत मिल जायेंगे पर उनका व्यंग्य सन् 2040 में पढ़ कर समझा जाये यह जरूरी नहीं है-यह इसलिये लिखा गया है क्योंकि इस लेखक के एक मित्र ब्लाग ने उसी सन् में जीवन पर्यंत हिंदी सम्मान देने की बात लिखी है। बहरहाल यह हालत हम आज के संदर्भ में लिख रहे हैं और वह भी अंतर्जाल से पूर्व के हिंदी साहित्य की-जो कि आर्थिक, सामाजिक और वैचारिक दबावों से कभी उबर ही नहीं पाया।

मध्य में एक सूक्ष्म पाठ
————————-
हालांकि यह एक सच्चाई है कि किसी भी अभियान को बिना धन के मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता यही स्थिति हिंदी ब्लाग जगत की है। यहां केवल अपने लिखने के दम पर कमाना संभव नहीं है। हालंाकि कुछ ब्लाग लेखक कमा रहे हैं पर उनकी कमाई का आधार केवल उनका लिखा हुआ नहीं है। हां, यह संभव है कि जो ब्लाग लेखक बेहतर प्रबंधन और संबंध बनाने की क्षमता रखते हैं उनको अतिशीघ्र यहां आय अर्जित हो सकती है। अनेक प्रचार माध्यमों में यह प्रचार जरूर किया जा रहा है कि हिंदी ब्लाग से लोग कमा रहे हैं पर दो वर्षों में इस लेखक को एक पैसा भी इससे नहीं मिला है। इसके बावजूद यह एक सच है कि भविष्य में बेहतर लिखने वालों के लिये यह धन कमाने का एक जरिया बन सकता है।

अंतर्जाल पर भी इसे दबाव में रखने के प्रयास तो होंगे पर जिन लोगों को उस दबाव से लड़ने की ताकत है और जो मौलिक और स्वतंत्र रूप से लिखने के अभ्यस्त होंगे वह अपना अस्तित्व स्वयं ही बनायेंगे। जब वेबसाइटों या ब्लाग की बात करते हैं तो वह केवल हिंदी में लिखने तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि रिपोर्ताज, समाचारों और घटनाओं के सीधे प्रसारण की संभावना भी वेबसाईटों पर हो सकती है। जैसे हम आजकल समाचार या साहित्यक पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों का स्वरूप देखते हैं ऐसा यहां होने की संभावना नहीं है। एक अखबार अनेक समाचारों और आलेखों के साथ पाठक के पास पहुंचता है पर ब्लाग या वेबसाईटें अगर लोकप्रिय हुई तो उन्हें जरूरी नहीं है कि वह सभी एकदम प्रस्तुत करें। दिन में पचास से पांच सों तक वह अपने पाठ जारी कर सकती हैं। कई ब्लाग बनाकर वह उसे चलायमान रख सकती हैं। ऐसे ही साहित्यक पत्रिकाओं के साथ भी है। यह जरूरी नहीं कि सप्ताह या दिन में एक ही बार सब प्रस्तुत किया जाये। प्रतिदिन अनेक रचनायें एक एक कर प्रस्तुत की जा सकती हैं। यही वीडियो और आडियो प्रसारणों के साथ भी हो सकता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि अंतर्जाल पर हिंदी एक नये स्वरूप के साथ सामने आयेगी। हिंदी का बाजार बहुत बड़ा है तो दूसरा सच यह भी है कि हिंदी के अब सार्थक लेखन की अपेक्षायें बढ़ रही है पर हिंदी को दोहन करने वाला बाजार नये और मौलिक लेखकों को संरक्षण देने के लिये उत्सुक नहीं है। वह चाहता है कि उसे लिखने वाले गुलाम मिलें पर हिंदी को अंतर्जाल पर ले जाने का एक ही उपाय है कि मौलिक और स्वतंत्र रूप से लिखा जाये तभी नवीनता आयेगी। अभी अंतर्जाल पर हिंदी में लिखने की विधा शैशवकाल में हैं पर जैसे जैसे विस्तार रूप लेगी नये परिवर्तन आयेंगे। अभी तो यह भी एक ही समस्या है कि गूगल के इंडिक और कृतिदेव यूनिकोड टूल के अलावा कोई अन्य प्रमाणिक और सरल टूल ही लिखने के लिये उपलब्ध नहीं है। गूगल के इंडिक टूल और कृतिदेव यूनिकोड टूल का भी इतना प्रचार अभी लोगों में नहीं है। जब इस बारे में पांच छह वर्ष पहले से इंटरनेट पर काम करने वाले लोगों को बताया जाता है तो हैरान रह जाते हैं-उनको यह जानकारी नवीनतम लगती है। एक ब्लाग लेखक ने लिखा था कि हिंदी नयी भाषा है इसलिये उसका विस्तार प्राकृतिक कारणों से तय है। यह सच भी लगता है अगर इस बात को मान लिया जाये कि हिंदी में सार्थक और दीर्घाकलीन तक प्रभावी लेखन
भविष्य में अंतर्जाल पर होगा।
…………………..

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की सिंधु केसरी-पत्रिका ’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

अंतर्जाल पर अंग्रेजी से नहीं बल्कि हिन्दी से ही बदलाव हो सकता है=आलेख


अंतर्जाल के ब्लाग पर सामाजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये प्रयास कोई अब नयी बात नहीं है। कुछ लोगों ने अभी हाल ही में वेलंटाईन डे के पहले तक इंटरनेट पर चले विवाद पर लिखे गये पाठों को देखकर यही निष्कर्ष निकाला है कि आने वाले समय में भारत के 4.2 करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ता सड़क पर जाकर नारेबाजी करते हुए लाठी झेलने की बजाय अपने घरों पर कंप्यूटर और लैपटाप पर आंदोलन करना ठीक समझ रहे हैं। यह दिलचस्प है। ऐसे में एक प्रश्न जरूर उठता है कि आखिर इस देश में कौनसी भाषा के ब्लाग पर हम ऐसी आशा कर रहे हैं? यकीनन वह हिंदी नहीं है बल्कि अंग्रेजी है और जब देश में सामाजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये प्रयासों की आवश्यकता है तो उसके लिये सबसे महत्वपूर्ण भूमिका हिंदी के ब्लाग की होना चाहिये-बिना उनके यह कल्पना करना कठिन है।
अभी समाचार पत्र पत्रिकायें जिन ब्लाग का नाम अखबारों के दे रहे हैं वह अंग्रेजी के हैं। विवादास्पद विषय पर अखबार में नाम आने से उनको खोलकर पढ़ने वाले बहुत आते हैं-सामान्य रूप से आने पर ब्लाग में कोई दिलचस्पी नहीं लेता। समाचार पत्र पत्रिकाओं में नाम आने से वैलंटाईन डे से पूर्व तक चले विवाद पर जो पाठ अंग्रेजी ब्लाग पर लिखे गये उनको पाठक मिलना स्वाभाविक था पर हिंदी के ब्लाग के बिना किसी भी आंदोलन या जागरुकता के प्रयास में सफलता नहीं मिल सकती।

इस विवाद पर हिंदी के ब्लाग पर भी जमकर लिखा गया। हिंदी ब्लाग लेखकों ने उन अंग्रंेजी ब्लाग के लिंक दिये और इसमें संदेह नहीं कि उनको पाठक दिलवाने में योगदान दिया। नारी स्वातंत्र्य पर एक फोरम अंतर्जाल पर बनाया जिस पर 14 फरवरी वैलंटाईन डे पर दस हजार से अधिक सदस्य शामिल हुए। कुछ वेबसाईट भी जबरदस्त हिट ले रहीं थी पर यह सभी अंग्रेजी भाषा से सुसज्जित समाज का ही हिस्सा था। आम भारतीय जिसकी भाषा हिंदी है उसका न तो वैंलंटाईन डे से लेना देना था न नारी स्वातंत्र्य पर चल रही सतही बहस से। फिर भी समाचार पत्र पत्रिकाओं ने उस विवाद को महत्वपूर्ण स्थान दिया। ऐसे में हिंदी ब्लाग पर चल रही बहस का कहीं जिक्र नहीं आया जो कि इस बात का प्रमाण है प्रचार माध्यम उसकी अनदेखी कर रहे हैं। हालांकि हिंदी ब्लाग लेखकों के दोनों पक्षों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा पर कुछ ब्लाग लेखकों के निजी आक्षेपों ने उनके पाठ को कमजोर बना दिया।
हमारा यहां उद्देश्य वैलंटाईन डे पर हुई बहस के निष्कर्षों पर विचार करना नहीं है बल्कि सामाजिक आंदोलन और जागरुकता में हिंदी ब्लाग के संभावित योगदान का आंकलन करना है। यह बात इस लेखक द्वारा हिंदी क्षेत्र के होने के कारण नहीं लिखी जा रही कि भारत में हिंदी ब्लाग की ही किसी सामाजिक परिवर्तन में भूमिका हो सकती है। अगर अंग्रेजी ब्लाग की भूमिका हुई तो वह हिंदी समाचार पत्र पत्रिकाओं में उनके पाठों के स्थान मिलने का कारण होगी न कि अपने कारण। यह हैरानी की बात है कि ब्लाग का प्रचार तो सभी कर रहे हैं पर इस सत्य से मूंह छिपा रहे हैं कि वह अंग्रेजी भाषा के ब्लाग के बारे में लिख रहे हैं न कि हिंदी के बारे में। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अंग्रेजी के मोह के कारण प्रचार चाहने वाले प्रतिष्ठित लोग अंग्रेजी के ब्लाग पर ही अपना नाम देखना चाहते हैं जैसे कि बी.बी.सी. लंंदन के समाचारों में देखते हैं। जहां तक हिट का प्रश्न है तो अभी अंतर्जाल पर कई तरह के भ्रम हैं कि क्या वाकई अंग्रंजी ब्लाग लेखकों के उतने पाठक हैं जितने कि वह दावा करते हैं। अंग्रेजी के एक ब्लाग लेखक ने अपनी एक टिप्पणी में लिखा था कि अंग्रेजी में वही ब्लाग हिट ले रहे हैं जो प्रायोजित हैं पर जो सामान्य लोगों के ब्लाग हैं उनकी कमोबेश स्थिति हिंदी जैसी है। सच क्या है कोई नहीं जानता। वैसे भी किसी एक के दावे पर यकीन करना ठीक नहीं है।

फिर यह ंअंतर्जाल है। अंग्रेजी का परचम फहरा रहा है यह सही है पर भारतीय विषयों पर हिंदी में लिखा गया है तो उसे पाठक नहीं मिलेंगे यह भी भ्रम है। हां, इतना अवश्य है कि उच्च स्तर पर अंग्रेजी भाषा के लोगों का वर्चस्व है और वह अपने ब्लाग हिट बना लेते हैं पर इसके लिये उनकी तकनीकी कौशल या चतुर प्रबंधन को ही श्रेय दिया जा सकता है न कि पाठों को। यह हैरान करने वाली बात है कि अगर अंग्रेजी ब्लाग के मुकाबले हिंदी ब्लाग के लेखक अधिक भावनात्मक ढंग से अपनी बात रखते हैं और उनके पाठक भी उनको ऐसे ही पढ़ते हैं।

एक बात तय रही कि अंग्रेजी के ब्लाग पढ़ने वाले बहुत मिल जायेंगे क्योंकि उनको हिंदी ब्लाग के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। दूसरा कारण यह है कि हिंदी के प्रचार माध्यम केवल चुनींदा हिंदी ब्लाग लेखकोें पर ही प्रकाश डालते हैं क्योंकि सभी की पहुंच उनके कार्यालयों तक नहीं है। जब किसी विषय के साथ ब्लाग का नाम देना होता है तो अंग्रेजी के ब्लाग का नाम तो दिया जाता है पर हिंदी के ब्लाग को एक समूह के नाम से संबोधित कर निपटा दिया जाता है। कभी कभी झल्लाहट आती है पर फिर सोचते हैं कि अगर कहीं इन्होंने हिंदी के ब्लाग के नाम अपने प्रचार में दिये तो फिर उनको ही तो चुनौती मिलेगी-भला कौन व्यवसायी अपने सामने प्रतिस्पर्धी खड़ा करना चाहेगा। हिंदी के ब्लाग लेखकों के पास साधन सीमित है। मध्यवर्गीय परिवारों के लोग किस तरह अपने ब्लाग चला रहे हैं यह तो वही जानते हैं। फिर जो ब्लाग लेखक हैं उनमें से अधिकतर शांति से रहकर काम करने वाले हैं। किसी प्रकार का दूराव छिपाव नहीं करते इसलिये ही तो अंग्रजी ब्लाग का भी लिंक देते हैं पर अंग्रेजी के ब्लाग ऐसा कहां करने वाले हैं?

लब्बोलुवाब यह है कि बातेंे बड़ी करने से काम नहीं चलेगा। तमाम लोग जो सामजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये ब्लाग की भूमिका चाहते हैं उनको यह समझना चाहिये कि यह केवल हिंदी में ही संभव है। ऐसे में वह इसी बात का प्रयास करें कि हिंदी ब्लाग जगत का ही प्रचार करें। हालांकि इसके आसार कम ही हैं क्योंकि वैलंटाईन डे पर नारी स्वातंत्र्य की समर्थक जिन वेबसाईटों का प्रचार हो रहा है उनके सामने प्रतिवाद प्रस्तुत करने वाला कौन था? यकीनन कोई नहीं। हां, हिंदी ब्लाग जगत में बहुत सारे पाठ थे जो नारी स्वातंत्र्य के रूप में पब के प्रचार के विरुद्ध जोरदार ढंग से लिखे गये तो परंपरा के नाम पर स्त्रियों पर अनाचार के विरुद्ध भी बहुत कुछ प्रभावी ढंग से कहा गया। तीसरे पक्ष भी था जिसमें ब्लाग पर ऐसे भी पाठ लिखे गये जो इस मुद्दे को ही प्रायोजित मानते हुए समर्थन या विरोध करने की बजाय उसका मजाक उड़ा रहे थे। देश का बहुत बड़ा पाठक वर्ग उससे पढ़ने से वंचित रह गया जो शायद अंग्रेजी में लिखे गये पाठों से बहुत अच्छा था। वैसे एक बात भी लगती है कि वैलंटाईन पर एकतरफा बहस शायद अंग्रेजी में ही संभव थी क्योंकि उनके पाठ एकदम सतही थे। हिंदी वाले तो बहुत गहराई में उतरकर लिखते हैं और एक बार कोई अच्छा ब्लाग पढ़ ले तो पाठक् उनको पढ़ने पर ही आमादा हो जाते हैं। अंग्रेजी में जो ब्लाग इस दौरान हिट हुए वह भला अब रोज थोड़े ही हिट रहने वाले हैं। अगर इस बात से सीखा जाये तो भी यही निष्कर्ष निकलता है कि समाज में स्थाई परिवर्तन केवल हिंदी भाषा के ब्लाग से ही संभव है। अंग्रेजी में क्षणिक प्रचार ही संभव है स्थाई परिवर्तन नहीं।
…………………………………………………..

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

वेलेंटाइन डे का एक दिन में शोर थमा-हास्य-व्यंग्य (velantine day ka shor-hasya vyangya)


कल वैलंटाईन डे बीत गया। पिछले प्रदंह दिन से उसका प्रचार जोरदार ढंग से हुआ। आज अनेक खबरें इस बारे में समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में छायी हुईं हैं। अधिकतर लोगोंं का ध्यान सड़कों, पार्कों, होटलों तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर हुए अच्छे बुरे दृश्यों के विश्लेषण पर केंद्रित हैं पर कुछ लोग हैं जिनका ध्यान बाजार समाचार पर है। टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं की इस बात के लिये भी प्रशंसा करनी चाहिये कि उन्होंने इस बात को छिपाया नही कि मंदी से जूझ रहे बाजार को कल एक दिन के लिये संजीवनी मिल गयी-यह कितने दिन काम करेगी यह तो बाद में ही पता चलेगा।
इन्हीं समाचारों से पता चला कि इस बार कथित प्रेमियों ने सोने या उससे संबंद्ध उपहार अपने प्रेमियों को दिये-यह भी बताया है कि ऐसी सलाह प्रेमियों को बाजार विशेषज्ञों ने ही दी थी। इस बार मंदी के कारण विदेशी गुलाब फूलों की बिक्री के कारण कम बिकने की आशंका थी पर वह गलत निकली। उपहारों के सामान और ग्रीटिंग कार्ड खूब बिके। निष्कर्ष यह है कि मंदी का वैलंटाईन डे पर बुरा प्रभाव नहीं हुआ पर भविष्य में ऐसी आशंका से इंकार भी नहीं किया जा सकता।

प्रचार और विज्ञापन से पहले आदमी का असहज किया जाता है ताकि वह बाजार के लिये एक ग्राहक के रूप में तैयार हो सके। विदेशी या पाश्चात्य सभ्यता पर आधारित हो कथित दिवस यहां प्रचलन में आये हैं वह एक दिन में नहीं आये बल्कि उसके लिये बकायदा योजना बनायी गयी। यह योजना भले ही संगठित रूप से न बनी हो पर धीरे धीरे वह बृहद रूप लेती गयी।
हमारे देश में किसी भी फैशन की शुरुआत फिल्मों से ही होती थी। अब टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाओं ने भी इसमें योगदान देना प्रारंभ कर दिया है। भले ही उनको प्रत्यक्ष रूप से लाभ नहीं होता पर उनके प्रायोजक और विज्ञापनदाता उनसे ऐसी आशा करते हैंे कि वह अपने पाठकों और दर्शकों उनके उत्पादों और वस्तुओं की तरफ आकर्षित कर सकें।
हर बार की तरह एक बहुत बड़ा वर्ग इससे दूर ही रहा। यह अलग बात है कि वैलंटाईन डे पर बाजार को संजीवनी देने के लिये पूरे विश्व में प्रयास हुए और भारत में तो ऐसा लगता है कि इसकी भूमिका एक माह पहले ही तैयार की गयी। एक बड़े शहर में पब पर हुए आक्रमण में विरोध स्वरूप कुछ लोगों ने उसे वैलंटाईन डे से जोड़ दिया। देखा जाये तो दो ऐसे प्रसंग हुए जिनको बाजार के लिये प्रचार प्रबंधकों ने खूब पकाया।
अगर आप लेखक या पत्रकार हैं तो यह जरूरी नहीं है कि हर घटना पर अपनी सहमति या असहमति जतायें। अगर आप परंपरावादी होने का दावा करते हुए पाश्चात्य सभ्यता का विरोध करते हैं तो यह याद रखना चाहिये कि अपने धर्मग्रंथों में उपेक्षासन भी एक विधि जिससे प्रतिद्वंद्वी को परास्त किया जा सकता है। यह अलग बात है कि इस आसन के लिये आपको सहज होना पड़ता है, मगर जब आप विरोध करने के लिये तत्पर होते हैं तब अपने अंदर उस असहज भाव को प्रवेश होने देतें हैं तो इसका मतलब यह है कि आज बाजार की सहायता कर रहे हैं जिसकी कीमत प्रचार प्रबंधक वसूल कर ही लेते हैं।
एक दृष्टा की तरह अनेक लोग बाजार के इस खेल को देख रहे थे। टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओंं से इसका पता नहीं चलता पर अंतर्जाल पर हिंदी ब्लाग पढ़ने से पता लगता है कि अधिकतर लोग विवाद बढ़ाने वाली घटनाओं में बाजार की योजना और हाथ होने का अनुभव कर रहे थे। भले ही विवाद करने वालों का आशय पैसा कमाने से अधिक प्रचार पाना हो पर अनजाने में वह व्यवसायिक प्रचारकों की सहायता कर रहे थे।
मामूली घटनाओं में नारी स्वातंत्र्य और सांस्कृतिक मूल्यों की तलाश करने वाले आपस में बहस कर रहे थे जबकि बाजार का मतलब केवल अपने लिये पैसा कमाने का था। शराब महिला पिये या पुरुष यह उसका निजी मामला है पर अगर कोई उन पर आक्रमण करता है तो उससे निपटने की जिम्मेदारी कानून की है और वह उसे भी निभा रहा है पर बहस करने वालों को विषय चाहिये था। नारी स्वातंत्र्य के समर्थक इसमें सदियों पुरानी परंपराओं के विरुद्ध आव्हान करते हैंं तो परंपरावादी लोग अपने सांस्कृतिक मूल्यों के लिये फिक्रमंद दिखते हैं। अगर आप उनके लिखे हुए पाठ या दिखाये जा रहे दृश्य देखें तो आपको लगेगा कि यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है पर अगर आप सड़क पर निकल जाईये तो इस बहस से अनजान लाखों लोगों को अपने लक्ष्य की ओर आते जाते देखा जा सकता है। बाजार को उनकी उपेक्षा बुरी लगती है इसलिये वह हर जगह अपने उत्पाद और वस्तुओं का प्रचार देखना चाहता है। ऐसे में जहां प्रचार की संभावना है वहां बाजार अपना दांव खेलता है और प्रचार प्रबंधक भी यह सोचकर उसमें जुट जाते हैं कि उससे उनके प्रयोजकों और विज्ञापनदाताओं को लाभ हो।
इधर अंतर्जाल पर अनेक पाठ देखकर अच्छा लगा। सच बात तो यह है कि समाचार पत्र पत्रिकाओें और टीवी चैनलों की सीमायें हैं। वह अपनी तरफ से कोई बात नहीं कह पाते बल्कि उनको आवश्यकता होती है उसके लिये किसी मुख की जिसके नाम से वह कुछ लिख सकें। अगर विवाद हो तो उसे दो मुखों की आवश्यकता होती है-एक समर्थन के लिये दूसरा विरोध के लिये। तय बात है कि जिन्हें प्रचार चाहिये वह इधर या उधर से होकर बोलते हैं ताकि उनके मुख चमक सकें। अंतर्जाल पर हिंदी ब्लाग में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। पाठ लिखने वाले ने लिखा तो असहमत होने वालों ने उस पर समर्थन या विरोध में टिप्पणी की वह भी कम पढ़ने लायक नहीं होती। प्रतिवाद में पाठ तक लिख जाते हैं और फिर अधिक गुस्सा हो तो सामने वाले ब्लाग लेखक का नाम ही शीर्षक मेंे दिया जाता है।
यहां भी दोनों पक्षंों के ब्लाग लेखक हैं। पिछले दो वर्षों में यह पहला ऐसा अवसर था जब वैलंटाईन डे पर ऐसे पाठ ब्लागों पर पढ़ने को मिले जो बहुत दिलचस्प लगे। आम जीवन की तरह इस विषय पर उपेक्षासन कर रहे ब्लाग लेखक ही अधिक थे पर वैलंटाईन डे के पक्ष और विपक्ष ब्लाग पर लिखे गये पाठ पढ़ने से भला कौन चूक सकता था? उनको हिट मिलना स्वाभाविक था क्योंकि द्वंद्व हर इंसान को देखने में मजा आता है-अगर वह खुद उसके पात्र न हों। जो स्वयं बहस में लिप्त नहीं होते वही उन बहसों का निष्कर्ष निकाल सकते हैं पर अगर पूरी तरह उपेक्षासन करने वाले हों तो फिर हंस तो सकते ही हैं। सच बात तो यह है कि अगली बार वैलंटाईन डे पर जिन आम लोगोंे को समय हो तो वह बजाय कहीं अन्यत्र जाने के हिंदी ब्लाग जगत पर अधिक सक्रिय रहें इसके लिये जरूरी है कि वह अभी से ही सक्रिय हो जायें क्योंकि उनको जो संतोष यहां मिल सकता है वह किसी अन्य प्रचार माध्यम पर नहीं मिल सकता।
प्रसंगवश हमारे मित्र ब्लाग लेखकों की इसमें जोरदार भूमिका थी और उनका सामना भी ऐसी महिला ब्लाग लेखिकाओं से हुआ जिनके प्रति हमारे मन में आत्मीय भाव है। अब यह छिपाना बेकार है कि ब्लाग के पाठों पर चले रहे इन द्वंद्वों के प्रति हमने उपेक्षासन किया होगा। चूंकि इस विषय पर हमने केवल बाजार की दृष्टि से ही विचार किया इसलिये किसी सिद्धंात या आदर्श की बात करना हमें स्वयं स्वीकार नहीं था।
एक बात तय कि अपनी बात किसी से जबरन मनवाने की बजाय उसे अपने विचार या व्यवहार से प्रभावति करना चाहिये और यही सभ्य समाज का तकादा है। बहसें होना चाहिये पर मर्यादा के पार नहीं जाना चाहिये। मतभेद हों पर मनभेद नहीं होना चाहिये। बजार और प्रचार का यह खेल कभी थमने वाला नहीं है। अभी तो उनके पास 365 दिनों में केवल 20 से 25 दिन प्रचार के लिये हैं। हो सकता है कल वह पूर्व और उत्तर से कोई दिन निकालें और उसका यहां प्रचार करने लगें। उनको तो 365 दिन ही बाजार में ग्राहक चाहिये।
आदमी जो कपड़े पहनने या सोने के लिये उपयोग करता है उसके पूरी तरह गल जाने पर ही दूसरा खरीदता है-बहुत कम लोग हैं जो नये वस्त्र खरीद सकते हैं। फिर खुद खरीदने से कहां खुशी होती है जितना दूसरे को उपहार देने से। शायद इसलिये प्रचार माध्यम उपहार की बात अधिक करते हैं। आदमी अपने चीज पुरानी या नष्ट होने पर आये, बाजार इतनी देर प्रतीक्षा नहीं कर सकता। इसलिये ग्रीटिंग कार्ड और अन्य उपहार जो उपयोग में अधिक नहीं होते पर बाजार को पैसा देते हैं उनको बेचने का मार्ग यही एक मार्ग है। बहरहाल शोर थम गया है और ऐसा शांति लग रही है जैसे धुलेड़ी में दो बजे के बाद बाजार में लगती है। जिस तरह के दृश्य सामने आये उससे तो लगता है जैसे कि यह होली का पर्व हो। अंतर बस इतना ही है कि उस समय गंदगी और रंगों के विषैले होने के भय से लोग बाहर नहीं निकलते पर वैलंटाईन डे के दिन यह खतरा उन युवाओं के लिये ही है जो जोड़े बनाकर घूमते हैं।
………………………….

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.राजलेख हिन्दी पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप