इंटरनेट पर हिन्दी लिखने वालों को साहित्यकार ही माने-हिन्दी लेख


                 प्रतिदिन कोई न कोई सम्मानीय अपना सम्मान पुराने सामान की तरह बाहर फैंक रहा है। इससे तो यही लगता है जितने साहित्यक सम्मान देश में बांटे गये हैं उससे तो अगले दस वर्ष तक टीवी चैनलों पर रोज सम्मान वापसी की प्रमुख खबर रहने वाली है।  खासतौर से विशिष्ट रविवार की सामग्री केवल सम्मान वापसी रहने वाली है।  हमारी सलाह है कि अब ज्ञानपीठ तथा अन्य सम्मान सभी भाषाओं के ब्लॉग लेखकों को ही दिया जाना चाहिये जो कभी भी यह वापस नहीं करेंगे और करेंगे तो खबर भी नहीं बनेगी।  अंतर्जाल पर भारत की क्षेत्रीय भाषाओं के ब्लॉग लेखक सक्रिय है।  वह कैसा लिखते हैं यह तो पता नहीं पर यही स्थिति पुराने सम्मानीय लेखकों की भी है। इनमें से अनेक तो ऐसे हैं जिन्हें अपनी भाषा के लोग भी तब जान पाये जब उन्हें सम्मानित किया गया।

                                   हमारी यह सलाह है कि जिस तरह यह लोग अब फनी-इसका मतलब न पूछिये हमें पता नहीं-हो रहे हैं तो उसका मुकाबला भी उनके फन से होना चाहिये।  ब्लॉग भी अब एक किताब की तरह हैं। एक बार सम्मान प्रदान करने वाली संस्था के प्रबंधक भी फनी होकर ब्लॉग लेखकों को ज्ञानीपीठ से सम्मानित कर दें। यही प्रतिक्रियात्मक प्रयास इन पुराने सम्माानीयों के जख्म पर नमक छिड़कने की तरह होगा। एक अध्यात्मिक ज्ञान साधक की दृष्टि से हमारा मानना है कि राजसी कर्म में जस से तस जैसा व्यवहार करना ही चाहिये।  कम से कम हिन्दी में अनेक ऐसे ब्लॉग लेखक हैं जिन्हें हम बहुत काबिल मानते हैं। उन्हें ज्ञानपीठ सम्मान इसलिये भी मिलना चाहिये क्योंकि अंतर्जाल पर हिन्दी उन्हीं की वजह से जमी है। सबसे बड़ी बात यह पुराने सम्मानीय उन्हें दोयम दर्जे का मानते हैं और जब उन्हें ज्ञानपीठ तथा अन्य सम्मान मिलने लगे तो सारी हेकड़ी निकल जायेगी।

                                   हमारा ज्ञानपीठ के लिये कोई दावा नहीं है, यह बात साफ कर देते हैं क्योंकि हमें नहीं लगता कि फन इतना भी स्तरहीन नहीं होना चाहिये कि भन-इसका मतलब भी नहीं पूछिये- लगने लगे। अगर बात जमे तो  गहन चिंत्तन करें नहीं तो व्यंग्य समझकर आगे बढ़ जायें।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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उच्च राजसी पुरुषों से दया की अपेक्षा करना व्यर्थ-21 जून विश्व योग दिवस पर विशेष लेख


     अध्यात्मिक दर्शन का संबंध आंतरिक मनस्थिति से है। उसके ज्ञान से  व्यक्ति सात्विक भाव धारण करता है या फिर इस संसार में विषयों से सीमित संबंध रखते हुए योग भाव को प्राप्त होता है।  एक बात तय रही कि दैहिक विषयों से राजसी भाव से ही  राजसी कर्म के साथ संपर्क रखा जा सकता है। ज्ञान होने पर व्यक्ति अधिक सावधानी से राजसी कर्म करता है और न होने पर वह उसके लिये परेशानी का कारण भी बन जाता हैं।  हम देख यह रहे है कि लोग अपने साथ उपाधि तो सात्विक की लगाते हैं पर मूलतः राजसी प्रवृत्ति के होते हैं। ज्ञान की बातें आक्रामक ढंग से इस तरह करेंगे कि वह उन्हीं के पास है पर उनमें धारणा शक्ति नाममात्र की भी नहीं होती और राजसी सुख में लिप्त रहते हैं। राजसी कर्म और उसमें लिप्त लोगों में लोभ, क्रोध, मोह, अहंकार की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है अतः उनसे सात्विक व्यवहार करने और विचार रखने की आशा करना ही अज्ञान का प्रमाण है। सात्विकता के साथ राजसी कर्म करने वालों की संख्या नगण्य ही रहती है।

            धर्म, अर्थ, समाज सेवा, पत्रकारिता और कला क्षेत्र में धवल वस्त्र पहनकर अनेक लोग सेवा का दावा करते हैं। उनके हृदय में शासक की तरह का भाव रहता है। स्वयंभू सेवकों की भाषा में अहंकार प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। प्रचार में विज्ञापन देकर वह नायकत्व की छवि बना लेते हैं।  शुल्क लेकर प्रचार प्रबंधक जनमानस में उन्हें पूज्यनीय बना देते हैं। कुछ चेतनावान लोग इससे आश्चर्यचकित रहते हैं पर ज्ञान के अभ्यासियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता। राजसी कर्म में लोग फल की आशा से ही लिप्त होते हैं-उनमें पद, प्रतिष्ठा पैसा और प्रणाम पाने का मोह रहता ही है। हमारे तत्वज्ञान के अनुसार यही सत्य है।

             सामान्य जन उच्च राजसी कर्म और पद पर स्थित शिखर पुरुषों से सदैव परोपकार की आशा करते हैं पर उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि इस संसार में सभी मनुष्य अपने और परिवार के हित के बाद ही अन्य बात सोचते हैं। परोपकार की प्रवृत्ति सात्विक तत्व से उत्पन्न होती है और वह केवल अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली मनुष्यों में संभव है। सात्विक लोगों में बहुत कम लोग ही राजसी कर्म में अपनी दैहिक आवश्यकता से अधिक संपर्क रखने का प्रयास करते हें। उन्हें पता है कि व्यापक सक्रियता काम, क्रोध, मोह लोभ तथा अहंकार के पंचगुण वाले  मार्ग पर ले जाती है। ऐसे ज्ञान के अभ्यासी कभी भी राजसी पुरुषों की क्रियाओं पर प्रतिकूल टिप्पणियां भी नहीं करते क्योंकि उनको इसका पता है कि अंततः सभी की देह त्रिगुणमयी माया के अनुसार ही संचालित होती है। उनके लिये अच्छा या बुरा कुछ नहीं होता इसलिये काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार को वह राजसी कर्म से उत्पन्न गुण ही मानते हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अपना सम्मान बढ़ाने के लिये पाखंड करना अनुचित


         आधुनिक समाज में प्रचार तंत्र का बोलबाला है। फिल्म हो या टीवी इनमें अपना चेहरा देखने और दिखाने के लिये लोगों के मन में भारी इच्छा रहती है।  यही कारण है कि लोग अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये तमाम तरह के पाखंड करते हैं।  हमारे देश में लोग धर्मभीरु हैं इसलिये अनेक पाखंडी धार्मिक पहचान वाले वस्त्र पहनकर उनके मन पर प्रभाव डालते हैं। अनेक गुरु बन गये हैं तो उनके शिष्य भी यही काम कर रहे हैं।  कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इसे बिडाल वृत्ति कहा गया है। मूल रूप से धर्म अत्यंत निजी विषय हैं।  दूसरी बात यह है कि सांसरिक विषयों में लिप्त लोगों से यह अपेक्षा तो करना ही नहीं चाहिये कि वह धर्माचरण का उदाहरण प्रस्तुत करें।  सार्वजनिक स्थानों पर धर्म की चर्चा करना एक तरह से उसका बाजारीकरण करना है।  इससे कथित धर्म प्रचारकों को धन तथा प्रतिष्ठा मिलती है।  सच्चा धार्मिक आदमी तो त्यागी होता है। उसकी लिप्पता न धन में होती है न प्रतिष्ठा पाने में उसका मोह होता है।  उसकी प्रमाणिकता उसके मौन में होती है न कि जगह जगह जाकर यह बताने कि वह धर्म का पालन कर रहा है तो दूसरे भी करें।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है
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अधोदृष्टिनैष्कृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः।
शठो मिथ्याविलीतश्च बक्रवतवरो द्विजः।।

         हिन्दी में भावार्थ-उस द्विज को बक वृत्ति का माना गया है जो असत्य भाव तथा अविनीत हो तथा जिसकी नजर हमेशा दूसरों को धन संपत्ति पर लगी रहती हो जो हमेशा बुरे कर्म करता है सदैव अपना ही कल्याण की  सोचता हो और हमेशा अपने स्वार्थ के लिये तत्पर रहता है।

धर्मध्वजी सदा लुब्धश्छाद्मिका  को लोकदम्भका।
बैडालवृत्तिको ज्ञेयो हिंस्त्र सर्वाभिसन्धकः।।

      हिन्दी में भावार्थ-अपनी प्रतिष्ठा के लिये धर्म का पाखंड, दूसरों के धन कर हरण करने की इच्छा हिंसा तथा सदैव दूसरों को भड़काने के काम करने वाला ‘बिडाल वृत्ति’ का कहा जाता है।

 

         जैसे जैसे विश्व में धन का प्रभाव बढ़ रहा है धर्म के ध्वजवाहकों की सेना भी बढ़ती जा रही है।  इनमें कितने त्यागी और ज्ञानी हैं इसका आंकलन करना जरूरी है।  अध्यात्मिक और धर्म ज्ञानी कभी अपने मुख से ब्रह्म ज्ञान का बखान नहंी करते। उनका आचरण ही ऐसा होता है कि वह समाज के लिये एक उदाहरण बन जाता है।  उनका व्यक्तित्व और कृतित्व ही धर्म की पोथी का निर्माण करता है।  अगर उनसे आग्रह किया जाये तो वह संक्षिप्त शब्दों में ही अध्यात्मिक ज्ञान बता देते हैं।  जबकि आजकल पेशेवर ज्ञान  प्रवचक घंटों भाषण करने के बादी श्रोताओं को न तो धर्म का अर्थ समझा पाते हैं न उनके शिष्य कभी उनके मार्ग का अनुसरण करते हैं। यही कारण है कि इतने सारे धर्मोदेशक होते हुए भी हमारा समाज भटकाव की राह पर है।

 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

 

 

संत कबीर के दोहे-पराई नारी से मजाक न करो


                                 मनुष्य अपने सुख के पल तो एकदम सहजता से गुजार लेता है पर जब दुःख आता है तो भगवान को याद करता है।  सच बात तो यह है कि मनुष्य अपने संकटों को स्वयं ही आमंत्रित करता है।  कई बार तो ऐसे वाद विवादों को जन्म देता है जिसके मूल में सिवाय अहंकार के कुछ अन्य नहीं होता।  हंसी मजाक में झगड़े होते हैं।  कुछ पुरुषों की आदत होती है वह अपने साथ वार्तालाप करने वाली स्त्रियों के साथ हंसी मजाक कर अपना दिल बहलाते हैं।  वह समझते हैं कि अपने आपको बुद्धिमान साबित कर अपने लिये प्रतिष्ठा अर्जित कर रहे हैं पर होता उसका उल्टा है।  उनको लोग हल्का या अगंभीर मानते हैं। कभी कभी इस बात पर झगड़े तक हो जाते हैं।

इस विषय पर संत कबीर कहते हैं कि
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दीपक झोला पवन का, नर का झोला नारि।
साधू झोला शब्द का, बोलै नाहिं बिचारि।।

                   वायु का झौंका दीपक के लिये भय देने वाला होता है तो नारी का संकट पुरुष के लिये परेशानी का कारण होता है।  उसी तरह यदि ठीक से विचार कर शब्द व्यक्त न किया जाये तो वह साधुओं के लिये संकट का कारण बनता है।

पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचै कोय।
कबहूं छेड़ि न देखिये, हंस हंसि खावे रोय।

                     दूसरे आदमी की नारी से कभी कोई हंसी या मजाक न करो क्योंकि वह उस छुरी के समान है जो आदमी को हंसकर या रोकर अंततः काट देती है।

                    अनेक पुरुष दूसरे की स्त्रियों से वार्तालाप कर अपने मनोरंजन की प्राप्ति करते हैं। यह मनोरंजन अंततः उनको महंगा पड़ता है।  देखा तो यह जा रहा है कि आधुनिक समाज में केवल इसी बात पर अनेक झगड़े हो जाते हैं कि किसी ने परस्त्री के साथ मजाक किया। अनेक लोग इस चक्कर में बदनाम हो जाते हैं कि वह परस्त्रियों से अपने संबंध बनाते हैं। ऐसा नहीं है कि समाज में पहले ऐसा नहीं होता था।  अगर यह बात होती तो हमारे संत महापुरुष इस बुराई की तरफ प्राचीनकाल से सचेत नहीं करते पर वर्तमान आधुनिक समय में परस्त्रियों से से अश्लील अथवा द्विअर्थी संवाद के साथ वार्तालाप करना एक फैशन हो गया है जो कि देश की सांस्कृतिक परंपराओं के भी विरुद्ध है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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विदुरनीति-अपनी शक्ति से अधिक वस्तु की कामना करना तकलीफदेह


                  फिल्म और टीवी धारावाहिकों पर अनेक तरह के ऐसे कार्यक्रम प्रसारित होते हैं जिनकी कहानियों का कोई सिर पैर नहीं होता। स्थिति यह है कि टीवी में धनाढ्य वर्ग की पृष्ठभूमि पर आधारित कार्यक्रमों में उनके सानिध्य में पल रहे नौकर पात्रों की वेशभूषा भी अत्यंत महंगी होती है। कई बार तो ऐसा होता है कि किसी पात्र को अपनी जिंदगी से परेशान हाल दिखाया जाता है पर उसके हर पल बदलते कपड़े इस बात को प्रमाणित नहीं करते कि वह वाकई परेशान हाल समाज का प्रतिबिंब है। यह अलग बात है कि यह सब दिखाने वाले साहित्य को समाज का दर्पण बताते हुए अपनी कहानियों के प्रमाणिक होने का दावा करते हैं। हमारे देश के अनेक अभिनेता गरीब से उठकर अमीर बनने की कहानियों को अपने नायकत्व से सुसज्जित कर महानायक बन गये हैं। अनेक तो शताब्दी के नायक और महानायक की छवि बना चुके हैं। मगर यह सब कल्पित कहानियों के पात्र हैं। उनमें समाज की सत्यता देखना स्वयं को तकलीफ देना है।
          समाज का सच यह है कि हमारे यहां जड़तावाद फैला है। वंशवाद इस तरह बढ़ा है कि कोई विरला ही होता है जो अपने बल, पराक्रम तथा कौशल से शून्य से शिखर पर पहुंचता है। चाटुकारिता की वजह से बस इतनी सफलता मिलती है कि शिखर पुरुष की चरणवंदना करते हुए समाज देख सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि हम प्रचार माध्यमों में जिस तरह का वातावरण देखते हैं वह प्रायोजित है और आम इंसान का ध्यान बंटाने के लिये है जिससे वह विद्रोह की प्रवृत्तियों से दूर रहे और समाज यथारूप से स्थित रहे। भौतिक परिवर्तन आयें पर उससे शिखर पुरुषों के परिवार की रक्षा होती रहे।
               विदुर नीति में कहा गया है कि

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              द्वाविमौ कपटकी तीक्ष्णौ शरीरपरिशोधिणौ।

                 यश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यस्यनीश्वरः।।

              ‘‘गरीब मनुष्य जब अपने पास उपलब्ध धन से अधिक मूल्यवान वस्तु की कामना करता है और अस्वस्थ या कमजोर होने पर क्रोध की शरण लेता है तब वह अपने ही शरीर को सुखाने का काम करता है।’’

द्वावम्भसि निचेष्टच्यौ गलै बध्वा दृढां शिलाम्।

धनवन्तमदातारं दरिद्र चापस्विनम्।।

‘‘मनुष्य धन होने पर दान न करे और गरीब होने पर कष्ट सहन न कर सके उसे गले में पत्थर मजबूत पत्थर बांधकर पानी में डुबा देना चाहिए।’’

           इसलिये जहां तक हो सके मनोरंजन के लिये बने इस तरह के कार्यक्रम देखें पर उनको दिल और दिमाग में इस तरह न स्थापित होने दें कि पूरा समय कल्पना में खोकर अपना जीवन नष्ट कर डालें। मूल बात यह है कि हमें अपने चरित्र पर दृढ़ रहना चाहिए। अपने अंदर यह आत्मविश्वास होना चाहिए कि जैसी भी स्थिति हमारे सामने आयेगी उससे निपट लेंगे। यह दुनियां पल पल रंग बदलती है और अगर कभी भूख है तो कभी रोटी का अंबार भी लग सकता है। कभी प्यास है तो सामने शीतल जल का तालाब भी आ सकता है। इसलिये छल, कपट या चाटुकारिता से सफलता प्राप्त कर अपने लिये संकट को आमंत्रण नहीं देना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

चाणक्य नीति दर्शन-खामोशी में बहुत बड़ी ताकत है


            इस संसार में मनुष्यों को अन्य जीवों की अपेक्षा बुद्धि तथा विवेक की अथाह शक्ति प्राप्त है। इसके परिणामस्वरूप उसमें अहंकार का भाव भी बहुत है। अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिये उसे वाणी के रूप में एक ऐसा हथियार मिला है जिसका उपयोग करते हुए वह कभी नहीं थकता। सच बात तो यह है कि जीभ के साथ कान भी सुनने को मिले हैं पर बहुत कम लोग उसका सार्थक उपयोग करते है। कहीं आप अपने खेत की बात करिये तो दूसरा भी अपने खेत की सुनाने लगेगा। आप अपने व्यापार की चर्चा करें दूसरा बात पूरी से होने पहले ही अपनी कहने लगेगा। अपनी बात को शोर के साथ कहने के आदी मनुष्यों के बीच में बैठकर मौन तो एक बहुत बड़ा शत्रु लगता है। स्थिति यह है कि उत्सवों के अवसर पर भोजन करते हुए लोग भी अपनी वाणी का उपयोग करने से बाज नहीं आते।
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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ये तु संवत्सरं पूर्ण नित्यं मौनेन भुंजते।
युगकोटिसहस्त्रं तु स्वर्गलोके महीयते।।
‘‘जो मनुष्य एक वर्ष तक मौन रहकर बिना बोले भोजन करता है, वह अवश्य ही जीवन में मान सम्मान प्राप्त करने के अलावा बाद में भी स्वर्ग भोगता है।’’
आधुनिक चिकित्साशास्त्री कहते हैं कि भोजन करते समय मौन रहना चाहिये जिससे पेट का हाजमा ठीक रहता है। हालांकि चाणक्य का मानना है कि मनुष्य को अपने जीवन में एक वर्ष मौन भी रखना चाहिए पर हमारा मानना है कि अगर यह संभव नहीं हो तो कम से कम भोजन, स्नान तथा कोई अन्य काम करते समय जहां तक हो सके अपनी इंद्रियों  की शक्ति बढ़ाने के लिये मौन रहना ही श्रेयस्कर है। कुछ विद्वान तो यह भी मानते हैं कि जीवन में जितना मौन रहा जाये उतनी ही शक्ति का अपव्यय कम होता है जिससे सृजनात्मक कार्य करने में सुविधा होती है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’, Gwalior
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मनु स्मृति-जिस खेल में पैसा दाव पर लगे जुआ कहलाता है


            हमारे देश में क्रिकेट खेल को लेकर अनेक प्रकार की चर्चायें होती हैं। सच तो यह है कि इसे खेलने वाले बहुत कम हैं उससे ज्यादा अधिक तो इसे देखने वाले हैं। यह शुद्ध रूप से मनोरंजन का खेल है और इसके साथ ऐसे लोग भी जुड़ गये हैं जो इस पर सट्टा लगाते हैं।  आजकल खेलों में अनेक प्रकार की फिक्सिंग की चर्चा होती है। अभी हाल में पाकिस्तान के तीन क्रिकेट खिलाड़ियों को स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में सजा भी हुई थी। ऐसा नहीं भारत कोई इस समस्या से बचा हुआ है। भारत के भी दो खिलाड़ियों पर इस अपराध में आजीवन खेलने पर प्रतिबंध लगाया गया था। विश्व में भारत की आर्थिक शक्ति पर ही क्रिकेट खेल चल रहा है। जिन पाकिस्तानियों को ब्रिटेन में क्रिकेट खेल फिक्स करने के आरोप में सजा हुई हैए बताया जा रहा है कि भारत के सट्टेबाज भी उनसे संबंधित हैं। इधर हम देख रहे हैं कि भारत में भी अनेक सट्टेबाज पकड़े जा रहे हैं। कहने को क्रिकेट एक खेल है पर जैसे जैसे इससे जुड़े काले कारनामों का पर्दाफाश हो रहा है उससे तो जुंआ ही अधिक दिखने लगा है। अनेक परिवार इसके चक्कर में बरबाद हो गये हैं। हैरानी तो इस बात की है कि इस खेल में पैसा लगाने वाले वह लोग भी हैं जो इसको कभी खेले ही नहीं है। भले ही वह इसे मनोरंजन मानते हों पर अंततः यह जुआ है।
इस विषय पर मनु स्मृति में कहा गया है कि
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अप्राणिभिर्यत्क्रियते तल्लोके द्यूतमच्यते।
प्राणिभिः क्रियतेयस्तु सः विज्ञेयः समाह्वयः।।
             ‘‘जिस खेल में धन आदि निर्जीव वस्तुओं से हार या जीत का निर्णय हो वह खेल जुआ कहलाता है। पशु-पक्षी या अन्य सजीव प्राणियों को दांव पर रखकर खेले जाने वाले खेल का नाम समाह्व्य है।’’
एते राष्ट्रे वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्नत्सकराः।
विकर्म क्रियर्यानित्य बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः।।
          ‘‘जो लोग  जुआ या समाह्वय जैसे कर्म करवाते हैं वह राष्ट्र के लिये डाकू की तरह होते हैं और सदैव अपने कुकर्मों से प्रजा को कष्ट देते हैं।’’
         देश में एक बहुत बड़ा सट्टा समूह सक्रिय हैं। ऐसा कोई मैच नहीं होता जिसके होने पर कहीं न कहीं सट्टेबाज न पकड़े जाते हों। हैरानी इस बात की है कि यह केवल भारतीय टीम के खेलने पर ही नही होता बल्कि प्रसिद्धि विदेशी टीमों के मैच पर भी हमारे देश में सट्टा लगता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आज के अनेक युवा अधिक धन पर उसे पचा नहीं हो पाते और स्वयं जुआ खेलकर अपने खिलाड़ी होने का गर्व पालते हैं। उनको यह पता नहीं कि इन सट्टेबाजों का धन अंततः अपराध जगत के अन्य लोगों के पास पहुंचता है। सट्टेबाजी से जुड़े विदेश में बैठे अनेक भारतीयों के माध्यम से यह धन आतंकवादियों और अतिवादियों के पास पहुंचने के समाचार भी आते हैं। देश के युवाओं को यह बात समझना चाहिए कि वह सट्टा खेलकर ऐसे लोगों को साथ दे रहे हैं जो अंततः राष्ट्र के लिये डाकू की तरह होते हैं। वह ऐसे तत्वों को प्रोत्साहन देते हैं जो आमजनों को परेशान करते हैं।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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