कवि ने वरदान माँगा -हास्य कविता


कवि की हाजिरी पर प्रसन्न होकर
अपने दरबार में प्रकट हुए सर्वशक्तिमान
और बोले
‘दो में से एक वर मांग ले
पहला इस जन्म में अपनी
कविताओं के हिट होने का वरदान
पर इससे नहीं पैसे के लिहाज से तुम धनवान
या अगले जन्म में किसी प्रकाशक का
चमचा बनकर दौलत कमायेगा
और पायेगा दुनियां भर का सम्मान
पर कविता की नहीं होगी लोगों में शान’
कवि तुरंत बोला-
‘अगर इस जन्म में नहीं अपने नसीब है
कविताऐं तो फ्लाप हम भी गरीब हैं
जितने हिट हैं उतने ही ठीक हैं
अब तो निकल गयी उमर
इसलिये सुरक्षित रख लो
अगले जन्म के लिये अपना वरदान
तब युवावस्था में ही सारी
कामयाबी दिलाना
चमचे बनने की पूरी शक्ति देना
भले ही कविता लिखने की कम कर लेना
साहित्यकारों में करना शुमार
भले ही किसी प्रकाशक का चमचा बना देना
लिखें चाहें जैसा भी पर बढ़ाना सम्मान
किसी हालत में न हो इस जन्म जैसा भान

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बाज़ार में खौफ का अफ़साना-हिन्दी शायरी


<strong>कुछ हकीकत कुछ ख्वाव
बन जाता है  यूँ ही अफसाना
सुर्खियों में बने रहें अख़बारों की 
चर्चा करे नाम की पूरा ज़माने
इसलिए कभी वह हादसों को ढूंढते हैं
न मिलें तो कर लेते, आगे होने  का बहाना
जिन्हें आदत हो गयी भीड़ में चमकने की
उनको पसंद नहीं है हाशिये पर आना
लोगों की मस्ती और बेचैनी में ही
आता हैं उनको कमाना
जो चाहो चैन अपनी जिंदगी में
तो कभी उनकी आवाजों से डर मत जाना
उनके लिखे शब्द पढ़ना खूब
पर बहक मत जाना
बाज़ार में अमन की हकीकत नहीं
बिकता है अब खौफ का अफसाना </strong>
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रौशनी ने भी अपने रूप बदले हैं-हिंदी शायरी


निकले थे अंधेरे में माटी के चिराग ढूंढने
पर कांच के बल्ब के टुकड़े लग गये पांव में
रौशनी ने भी अपने रूप बदले हैं
शहर चमक रहे हैं चकाचौंध में
अंधेरे का घर है गांव में

मधुर स्वर सुनने की चाह में
पहुंच गये महफिल में
पर कान लगने फटने
सभी गाने वाले लगे थे कांव-कांव में

आंखों से देखने की चाह में
निकले रास्ते पर
पर दिखावटी चेहरों को देखकर
हो गये निराश
बनावटी दृश्यों से हो गये हताश
परिश्रम का पसीना बहता है
सूरज की किरणों मे निरंतर
आलस्य पलता है छांव में

फिर सोचते हैं कि
दुनियां के हैं रंग निराले
क्यों करें अपने विचार काले
कुछ लोगों समझते है जिंदगी का मतलब
खुशनुमा पल से जीने के लिये
जहां कुछ भी न मिले
पर दिल का चैन अमन का अहसास ही
सुकून है सब कुछ अपने लिये
पर बाकी के लिये है जूआ
जो खेलते हैं अपने ख्वाबों पर दांव पर दांव

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क्यों अपना दिल जलाते हो अपना यार
इस दुनियां में होते हैं नाटक अपार

कभी कहीं कत्ल होगा
कहीं कातिल का सम्मान होगा
चीखने और चिल्लाने की आवाजें होंगीं
कुछ लोग सच में रोएंगे
कुछ बहायेंगे घडि़याली आंसु
तुम न कभी नहीं रोना
अपनी रात चैन से सोना
दिल के उजियाले में
दिखाई देते हैं रात के नजारे
लोग भी क्या समझेंगे
सोच रख चुके गुलाम, अब क्या करेंगे
बमों की आवाज से कांप मत जाना
किसने किया इस पर मत दिमाग खपाना
रोटी से ज्यादा लोग रूपया जोड़ते हैं
गैर क्या, मौका पड़ जाय तो
अपने का घर तोड़ते हैं
आंखों की नहीं अक्ल की भी
उनकी रोशनी कम हो गयी है
जो चश्में लगे हैं उनकी आंखों पर
दौलत,शौहरत और ओहदे की शान से बने हैं
मत पूछा यह कि वह अमृत में नहाये कि
खून से सने हैं
खुल गया है
दुनियां के हर जगह बाजार
आतंक यहां भी मिलता है वहां भी
तुम हैरान और परेशान क्यों हो
अपनी अक्ल से सोचो
जो हर पल पैसे का ही सोचते हैं
वह गैर को कम अपने को अधिक नौचते हैं
शिकायत कहां करोगे
जहां जाओगे मरोगे
कातिलों ने दुनियां पर राज्य कायम कर लिया है
खूबसूरत चेहरों को मुखौटे की तरह ओढ लिया है
वह मुस्कराते हुए बात करते हैं
कातिल तो अपना काम पीछे ही करते हैं
देशभक्ति और लोगों के कल्याण का नारा सुनते जाना
खामोशी से सोचना और फिर अनसुना कर जाना
नारों में बह जाते लोग
भूल जाते अपना असली रोग
जमाने र्की िफक्र बात में करना
ओ सबकी सोचने वाले यार
सरकारी अस्पताल में डाक्टर ने जो
बताई है जो महंगी दवा
तुम्हारी मां के लिये
वह पहले खरीद करना
क्योंकि उसका कोई विकल्प नहीं है
पिता है बिस्तर पर कई सालों से
उसे भी ले जाना अस्पताल
बेटे के लिये रोजगार के लिये भी
चलना है कोई चाल
जीवन में कोई समस्या अल्प नहीं है
जो देते हैं तुम्हें समाज के लिये
हमेशा काम करने का संदेश
उनके लिये अपने घर बड़े हैं न कि देश
तुम मत करना विरोध किसी का
हां में हां करते जाना
जहां अवसर मिल जाये लाभ उठाना
चिल्लाना बिल्कुल नहीं
खामोशी में ही सबसे अधिक है धार

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कतरनों में मनोरंजन -हास्य कविताऐं


बेच रहे हैं मनोरंजन
कहते हैं उसे खबरें
भाषा के शब्दकोष से चुन लिए हैं
कुछ ख़ास शब्द
उनके अर्थ की बना रहे कब्रें
परदे पर दृश्य दिखा रहे हैं
और साथ में चिल्ला रहे हैं
अपनी आँख और कान पर भरोसा नहीं
दूसरों पर शक जता रहे हैं
इसलिए जुबान का भी जोर लगा रहे हैं
टीवी पर कान और आँख लगाए बैठे हैं लोग
मनोरंजन की कतरनों में ढूँढ रहे खबरें
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चीखते हुए अपनी बात
क्यों सुनाते हो यार
हमारी आंख और कान पर भरोसा नहीं है
या अपने कहे शब्द घटिया माल लगते हैं
जिसका करना जरूरी हैं व्यापार

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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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