इंटरनेट पर हिन्दी लिखने वालों को साहित्यकार ही माने-हिन्दी लेख


                 प्रतिदिन कोई न कोई सम्मानीय अपना सम्मान पुराने सामान की तरह बाहर फैंक रहा है। इससे तो यही लगता है जितने साहित्यक सम्मान देश में बांटे गये हैं उससे तो अगले दस वर्ष तक टीवी चैनलों पर रोज सम्मान वापसी की प्रमुख खबर रहने वाली है।  खासतौर से विशिष्ट रविवार की सामग्री केवल सम्मान वापसी रहने वाली है।  हमारी सलाह है कि अब ज्ञानपीठ तथा अन्य सम्मान सभी भाषाओं के ब्लॉग लेखकों को ही दिया जाना चाहिये जो कभी भी यह वापस नहीं करेंगे और करेंगे तो खबर भी नहीं बनेगी।  अंतर्जाल पर भारत की क्षेत्रीय भाषाओं के ब्लॉग लेखक सक्रिय है।  वह कैसा लिखते हैं यह तो पता नहीं पर यही स्थिति पुराने सम्मानीय लेखकों की भी है। इनमें से अनेक तो ऐसे हैं जिन्हें अपनी भाषा के लोग भी तब जान पाये जब उन्हें सम्मानित किया गया।

                                   हमारी यह सलाह है कि जिस तरह यह लोग अब फनी-इसका मतलब न पूछिये हमें पता नहीं-हो रहे हैं तो उसका मुकाबला भी उनके फन से होना चाहिये।  ब्लॉग भी अब एक किताब की तरह हैं। एक बार सम्मान प्रदान करने वाली संस्था के प्रबंधक भी फनी होकर ब्लॉग लेखकों को ज्ञानीपीठ से सम्मानित कर दें। यही प्रतिक्रियात्मक प्रयास इन पुराने सम्माानीयों के जख्म पर नमक छिड़कने की तरह होगा। एक अध्यात्मिक ज्ञान साधक की दृष्टि से हमारा मानना है कि राजसी कर्म में जस से तस जैसा व्यवहार करना ही चाहिये।  कम से कम हिन्दी में अनेक ऐसे ब्लॉग लेखक हैं जिन्हें हम बहुत काबिल मानते हैं। उन्हें ज्ञानपीठ सम्मान इसलिये भी मिलना चाहिये क्योंकि अंतर्जाल पर हिन्दी उन्हीं की वजह से जमी है। सबसे बड़ी बात यह पुराने सम्मानीय उन्हें दोयम दर्जे का मानते हैं और जब उन्हें ज्ञानपीठ तथा अन्य सम्मान मिलने लगे तो सारी हेकड़ी निकल जायेगी।

                                   हमारा ज्ञानपीठ के लिये कोई दावा नहीं है, यह बात साफ कर देते हैं क्योंकि हमें नहीं लगता कि फन इतना भी स्तरहीन नहीं होना चाहिये कि भन-इसका मतलब भी नहीं पूछिये- लगने लगे। अगर बात जमे तो  गहन चिंत्तन करें नहीं तो व्यंग्य समझकर आगे बढ़ जायें।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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उच्च राजसी पुरुषों से दया की अपेक्षा करना व्यर्थ-21 जून विश्व योग दिवस पर विशेष लेख


     अध्यात्मिक दर्शन का संबंध आंतरिक मनस्थिति से है। उसके ज्ञान से  व्यक्ति सात्विक भाव धारण करता है या फिर इस संसार में विषयों से सीमित संबंध रखते हुए योग भाव को प्राप्त होता है।  एक बात तय रही कि दैहिक विषयों से राजसी भाव से ही  राजसी कर्म के साथ संपर्क रखा जा सकता है। ज्ञान होने पर व्यक्ति अधिक सावधानी से राजसी कर्म करता है और न होने पर वह उसके लिये परेशानी का कारण भी बन जाता हैं।  हम देख यह रहे है कि लोग अपने साथ उपाधि तो सात्विक की लगाते हैं पर मूलतः राजसी प्रवृत्ति के होते हैं। ज्ञान की बातें आक्रामक ढंग से इस तरह करेंगे कि वह उन्हीं के पास है पर उनमें धारणा शक्ति नाममात्र की भी नहीं होती और राजसी सुख में लिप्त रहते हैं। राजसी कर्म और उसमें लिप्त लोगों में लोभ, क्रोध, मोह, अहंकार की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है अतः उनसे सात्विक व्यवहार करने और विचार रखने की आशा करना ही अज्ञान का प्रमाण है। सात्विकता के साथ राजसी कर्म करने वालों की संख्या नगण्य ही रहती है।

            धर्म, अर्थ, समाज सेवा, पत्रकारिता और कला क्षेत्र में धवल वस्त्र पहनकर अनेक लोग सेवा का दावा करते हैं। उनके हृदय में शासक की तरह का भाव रहता है। स्वयंभू सेवकों की भाषा में अहंकार प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। प्रचार में विज्ञापन देकर वह नायकत्व की छवि बना लेते हैं।  शुल्क लेकर प्रचार प्रबंधक जनमानस में उन्हें पूज्यनीय बना देते हैं। कुछ चेतनावान लोग इससे आश्चर्यचकित रहते हैं पर ज्ञान के अभ्यासियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता। राजसी कर्म में लोग फल की आशा से ही लिप्त होते हैं-उनमें पद, प्रतिष्ठा पैसा और प्रणाम पाने का मोह रहता ही है। हमारे तत्वज्ञान के अनुसार यही सत्य है।

             सामान्य जन उच्च राजसी कर्म और पद पर स्थित शिखर पुरुषों से सदैव परोपकार की आशा करते हैं पर उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि इस संसार में सभी मनुष्य अपने और परिवार के हित के बाद ही अन्य बात सोचते हैं। परोपकार की प्रवृत्ति सात्विक तत्व से उत्पन्न होती है और वह केवल अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली मनुष्यों में संभव है। सात्विक लोगों में बहुत कम लोग ही राजसी कर्म में अपनी दैहिक आवश्यकता से अधिक संपर्क रखने का प्रयास करते हें। उन्हें पता है कि व्यापक सक्रियता काम, क्रोध, मोह लोभ तथा अहंकार के पंचगुण वाले  मार्ग पर ले जाती है। ऐसे ज्ञान के अभ्यासी कभी भी राजसी पुरुषों की क्रियाओं पर प्रतिकूल टिप्पणियां भी नहीं करते क्योंकि उनको इसका पता है कि अंततः सभी की देह त्रिगुणमयी माया के अनुसार ही संचालित होती है। उनके लिये अच्छा या बुरा कुछ नहीं होता इसलिये काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार को वह राजसी कर्म से उत्पन्न गुण ही मानते हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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दूसरे की निंदा कर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने का प्रयास अनुचित-संत तुलसीदास दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख


      सामान्य मनुष्य की इंद्रियां अपने समक्ष घटित दृश्य, उपस्थित वस्तु तथा व्यक्ति के साथ ही स्वयं से जुड़े विषय पर ही केंद्रित रहती है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य सहजता से बहिर्मुखी रहता है जिस कारण उसे जल्दी ही मानसिक तनाव घेर लेता है। अगर कोई व्यक्ति साधक बनकर योगाभ्यास तथा ज्ञानार्जन का प्रयास करे तो ंअंततः उसकी अंतर्चेतना जाग्रत हो सकती है।  बाहरी विषयों से तब उसका संपर्क सीमित रह जाता है।  बहिर्मुखी  भाव कभी थकावट तो कभी बोरियत का शिकार बनाता है।  यही कारण है कि जिन लोगों के पास धनाभाव है वह अधिक धनी को देखकर उसके प्रति ईर्ष्या पालकर कुंठित होते हुए स्वयं को रोगग्रस्त बना लेते हैं। उसी तरह धनी भी आसपास गरीबी देखकर इस भय से ग्रसित रहता है कि कहीं उसकी संपत्ति पर किसी की वक्रदृष्टि न पड़े। वह अपने वैभव की रक्षा की चिंता में अपनी देह गलाता है। आर्थिक विशेषज्ञ  कहते हैं कि हमारे देश में धनिकों की संख्या बढ़ी है तो स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात की जानकारी भी सार्वजनिक रूप से करते हैं कि देश में राजरोगों का प्रकोप बढ़ा है। हमारे समाज में चर्चायें अब अध्यात्म विषय पर कम संसार के भोगों पर अधिक होती है। इससे चिंतायें, ईर्ष्या तथा वैमनस्य का जो भाव बढ़ा है उसका अंाकलन किया जाना चाहिये।

संत तुलसीदास जी कहते हैं कि

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पर सुख संपति देखि सुनि, जरहिं जे लड़ बिनु आगि।

तुलसी’ तिनके भागते, चलै भलाई भागि।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-दूसरे की सुख और संपत्ति देखकर जलने वाले बिना आग के ही जलते हैं। उनके भाग्य से कल्याण दूर भाग जाता है।

तुलसी’ के कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।

तिनके मुंह मस लागिहै, मिटिहि न मरिहै धोइ।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में जो दूसरे की निंदा कर अपनी कीर्ति बढ़ाना चाहते हैं वह अज्ञानी हैं।  उनके मुख पर ऐसी कालिख लगती है वह बहुत धोने पर भी मिटती नहीं है।

     अपनी भौतिक भूख शांत करने के लिये जीवन बिताने वाले लोगों के लिये यह संभव नहीं है कि वह परोपकार का काम करें इसलिये अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये दूसरे की निंदा करते हैं।  अपनी बड़ी लकीर खींचने की बजाय थूक से दूसरे की खींची लकीर को छोटा करने लगते हैं। यह अलग बात है कि पीठ पीछे ऐसे निंदकों के विरुद्ध भी जनमत बन ही जाता है।  उनके विरुद्ध लोग अधिक अनर्गल प्रलाप करते हैं।  सच बात तो यह है कि अगर अपनी प्रतिष्ठा बनानी है तो हमें वास्तविक रूप से दूसरों की भलाई करने का काम करना चाहिये न कि अपना बखान स्वयं कर हास्य का विषय बने।

      हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार हमारे संकल्प के अनुसार ही हमारे लिये इस संसार का निर्माण होता है इसलिये न केवल अपने तथा परिवार के लिये बल्कि मित्र, पड़ौसी तथा रिश्तेदारों के लिये भी मंगलकामना करना चाहिये। यह संभव नहीं है कि हम अपने लिये तो सुखद भविष्य की कामना करें और दूसरे के अहित का विचार करें। ऐसे में यह उल्टा भी हो सकता है कि आप दूसरे का अनिष्ट सोचें उसका तो भला हो आये पर आपकी मंगल कामना करने की बजाय सुख की बजाय दुख चला आये। इसलिये अपने हृदय में सुविचारों को स्थान देना चाहिये।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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अमीरों को ढेर सारे दोस्त मिल जाते हैं-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख


      एक तरफ कुछ लोगों के पास एकदम सहजता से धन आ रहा है तो दूसरी तरफ अधिकतर लोग भारी परिश्रम के बाद भी वैसी सफलता हासिल नहीं कर पा रहे जिसकी वह अपेक्षा करते हैं। विश्व में राज्य से मुक्त अर्थव्यवस्था ने समाज में अनेक प्रकार के विरोधाभास पैदा किये हैं। कृषि, लघु उद्योग तथा व्यापार में लगे लोगों की संख्या कम होती जा रही है। अधिकतर लोग नौकरियों के लिये कंपनियों की तरफ दौड़े जा रहे हैं। एक तरह से मध्यम वर्ग का दायरा सिमट रहा है। समाज में अधिक अमीरों की संख्या नगण्य मात्रा  जबकि गरीबों की संख्या गुणात्मक रूप से बढ़ रही है।  इन दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाला मध्यम वर्ग जहां संख्यात्मक दृष्टि से सिमटा है वहीं उसका आत्मविश्वास भी कम हुआ है।  वह गरीब कहलाना नहीं चाहता और अमीर बन नहीं पाता।  इतना ही नहीं अपने अस्तित्व के लिय संघर्ष कर रहे लोगों से यह अपेक्षा भी नहीं की जा सकती कि वह समाज में सामंजस्य का वातावरण बनाये।

      भौतिकवाद के चक्कर मे फंसा समाज हार्दिक प्रेम, निष्प्रयोजन मित्रता तथा आदर्श व्यवहार के भाव से परे होता जा रहा है।  देखा जाये तो हमारे देश में जिस तरह धनिकों का भंडार बढ़ने के साथ ही  ही समाज में व्यसन, अपराध तथा शोषण की प्रवृत्ति भी तेजी बढ़ती  जा रही है।  कथित आर्थिक विकास ने नैतिकता का जहां विध्वंस करने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान की धारा को अवरुद्ध कर दिया है। सबसे बड़ी बात तो यह कि विभिन्न समाजों के बीच ही नहीं बल्कि उनक अंदर ही सद्भाव काम कर दिया है। लोग औपचारिक रूप से आपसी संपर्क तो रखते हैं पर हार्दिक प्रेम का नितांत अभाव है।

कविवर रहीम कहते हैं कि

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रहिमन कीन्ही प्रीति, साहब को भावै नहीं,

जिनके अनगिनत भीत, हमैं, गरीबन को गनै।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-धनियों के अनेक मित्र बन जाते हैं। उनको गरीब लोगों से मित्रता करना अच्छा नहीं लगता। बड़े लोगों को छोटे लोगों की प्रीति अच्छी नहीं लगती।

कंपनी नाम की व्यवस्था ने साहब, सचिव और सहायक का अंतर इस तरह स्थापित किया है कि लगता है कि यह कोई आधुनिक विभाजन है। विभिन्न पदों के लिये होने वाले प्रशिक्षण में यह बता दिया जाता है कि अपने से निचले स्तर के व्यक्ति के साथ समान सबंध स्थापित न करें वरना आपको अपने काम में ही परेशानी उठानी पड़ेगी।  धनिका परिवारों में भी निम्न वर्ग के लोगों को अपना अनुचर मानकर व्यवहार करने के संस्कार स्वाभाविक रूप से ही मिलते हैं।  अमीरों के अनुचर बनने वाले मध्यम और निम्न वर्ग के युवक युवतियों को यह आभास नहीं होता कि उन्हें उच्च वर्ग से हार्दिक प्रेम की आशा नहीं  करनी चाहिये।  जीवन का यथार्थ यही है कि हर बड़ी मछली छोटी को ही खा जाती है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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पतंजलि योग साहित्य-इन्द्रियों की क्रियाएँ ही दृश्य हैं


                                    हमारी इंद्रियां हमेशा बाहर ही सक्रिय रहने को लालायित रहती है।  विशेष रूप से हमारी आंखें हमेशा ही दृश्य देखने को उत्साहित रहती है।  हम जिन दृश्यों को देखते हैं वह दरअसल प्रकृति में विचर रहे विभिन्न जीवों की लीला है।  जिनकी उत्पति भोग तथा मुक्ति के लिये होती है। कुंछ लोग अपने भोग करने के साथ ही उसके लिये साधन प्राप्त करने का उपक्रम करते हैं तो उनकी यह सक्रियता दूसरे मनुष्य के लिये दृश्य उपस्थिति करती है।  कुछ लोग मुक्ति के लिये योग साधन आदि करते हैं तो भी वह दृश्य दिखता है।  मुख्य विषय यह है कि हम किस प्रकार के दृश्य देखते हैं और उनका हमारे मानस पटल पर  क्या प्रभाव पड़ता है इस पर विचार करना चाहिये।

                        हम कहीं खिलते हुए फूल देखते हैं तो हमारा मन खिल उठता है। कहीं हम सड़क पर रक्त फैला देख लें तो एक प्रकार से तनाव पैदा होता है। यह दोनों ही स्थितियां भले ही विभिन्न भाव उत्पन्न करती हैं पर योग साधक के लिये समान ही होती है।  वह जानता है कि ऐसे दृश्य प्रकृति का ही भाग हैं।

                        हम देख रहे हैं कि मनोरंजन व्यवसायी कभी सुंदर कभी वीभत्य तो कभी हास्य के भाव उत्पन्न करते हैं। वह एक चक्र बनाये रखना चाहते हैं जिसे आम इंसान उनका ग्राहक बना रहे। पर्दे पर फिल्म चलती है उसमें कुछ लोग  अभिनय कर रहे हैं।  वहां एक कहानी है पर उसे देखने वाले  व्यक्ति के हृदय में पर्दे पर चल रहे दृश्यों के साथ भिन्न भिन्न भाव आते जाते हैं। यह भाव इस तरह आते हैं कि जैसे वह कोई सत्य दृश्य देख रहा है।  ज्ञानियों के लिये पर्दे के नहीं वरन् जमीन पर चल रहे दृश्य भी उसके मन पर प्रभाव नहीं डालते।  वह जानता है कि जो घटना था वह तय था और जो तय है वह घटना ही है।  सांसरिक विषयों के जितने प्रकार के  रस हैं उतने ही मनुष्य तथा उसकी सक्रियता से उत्पन्न दृश्यों के रंग हैं।

पतंजलि योग शास्त्र में कहा गया है कि

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प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थ दृश्यम

                        हिन्दी में भावार्थ-प्रकाश, क्रिया तथा स्थिति जिनका स्वभाव है भूत वह  इंद्रियां जिसका प्रकट स्वरूप है और  भोग और मुक्ति का संपादन करना ही जिसका लक्ष्य है ऐसा दृश्य है।

                        हम दृश्यों के चयन का समय या स्थान नहीं तय कर सकते पर इतना तय जरूर कर सकते हैं कि किस दृश्य का प्रभाव अपने दिमाग पर पड़ने दें या नहीं।  जिन दृश्यों से मानसिकता कलुषित हो उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिये। हृदय विदारक दृश्य कोई शरीर का रक्त नहीं बढ़ाते।  हमें समाचारों में ऐसे दृश्य दिखाने का प्रयास होता है। आजकल सनसनी ऐसे दृश्यों से फैलती है हो हृदय विदारक होती हैं। लोग उसे पर्दे पर देखकर आहें भरते हैं।  अखबारों में ऐसी खबरे पढ़कर  मन ही मन व्यग्रता का भाव लाते हैं।  अगर आदमी ज्ञानी नहीं है तो वह यंत्रवत् हो जाता है। मनोरंजन व्यवसायी तय करते हैं कि इस यंत्रवत खिलौने में कभी श्रृंगार, तो कभी हास्य कभी वीभत्स भाव पैदा कर किस तरह संचालित किया जाये।  आनंद वह उठाते हैं यंत्रवत् आदमी सोचता है कि मैने आनंद उठाया। इस भ्रम में उम्र निकल जाती है। चालाक लोग कभी स्वयं इन रसों में नहीं डूबते। ठीक ऐसे ही जैसे हलवाई कभी अपनी मिठाई नहीं खाता। फिल्म और धारावाहिकों में अनेक पात्र मारे गये पर उनके अभिनेता हमेशा जीवित मिलते हैं मगर उनके अभिनय का रस लोगों में बना रहता है।  संसार के विषयों और दृश्यों  में रस है पर ज्ञानी उनमें डूबते नहीं यही उनके प्रतिदिन के मोक्ष की साधना होती है।

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होली के अवसर पर चुनावी रंग तो चढ़ना ही था-हिन्दी चिंत्तन लेख


      अगर अंतर्मन सूखा हो तो बाहर पानी में कितने भी प्रकार के रंग डालकर उन्हें उड़ाओ क्षणिक प्रसन्नता के बाद फिर वही उष्णता घिर आती है।  बाह्य द्रव्यमय रंगों का रूप है दिखता है उसमें गंध है जो सांसों में आती है , एक दूसरे पर रंग डालते हुए शोर होता है उसका स्वर है, दूसरे की देह का स्पर्श है। पांचों इंद्रियों की सक्रियता तभी तक अच्छी लगती है जब तक वह थक नहीं जाती।  थकने के बाद विश्राम की चाहत! एक पर्व मनाने का प्रयास अंततः थकावट में बदल जाता है।

      आदमी बोलने पर थकता है, देखने में थकता है, सुनने में थकता है, चलते हुए एक समय तेज सांसें लेते हुए थकता है, किसी एक चीज का स्पर्श लंबे समय तक करते हुए थकता है। आनंद अंततः विश्राम की तरफ ले जाता है।  यह विश्राम इंद्रियों की  सक्रियता पर विराम लगाता है। यह विराम देह की बेबसी से उपजा है। देह की बेबसी मन में होती है और तब दुनियां का कोई नया विषय मस्तिष्क में स्थित नहीं हो सकता।  व्यथित इंद्रियां विश्राम करने  के समय स्वयं को सहमी लगती हैं। 

      योग साधकों की होली अंतर्मन में रंगों के दर्शन करते हुए बीतती है।  एकांत में आत्मचिंत्तन करने का सुअवसर पर मिलने पर अध्यात्मिक चक्षु, कर्ण, नासिका, मुख तथा मस्तिष्क  काम करने लगता है।  बाहर के रंग सूर्य की उष्मा से सूखने के साथ ही फीके होते हैं पर आंतरिक रंग ध्यान से उत्पन्न ऊर्जा से अधिक गहरे होते जाते हैं।  ऐसे में इस बात की अनुभूति होती है कि बाह्य सुख सदैव दुःख में बदलते हैं। जिस तरह हम करेला खाये या मिठाई अंततः पेट में कचड़े का ही रूप उनको मिलता है।  उसी तरह कानों से सुने गये स्वर, आंखों से देखे गये सुदंर दृश्य, नासिका से ली गयी सुगंध और हाथ से स्पर्श की गयी वस्तुओं का अनुभव अंततः स्मृतियों में बसकर कष्ट का कारण बनता है।  हमने वह खाया उसे फिर खाना चाहते हैं। हमने वह देखा फिर देखना चाहते हैं। हमने वह सुना फिर सुनना चाहते हैं। हमने गुलाब के फूल की खुशबू ली फिर लेना चाहते हैं। हमने सुंदर वस्तु को छुआ हम उसे फिर छूना चाहते हैं।  यह लोभ सताता है।   इसका कारण यह कि इन सुखों से प्राप्त विकार मन में बना हुआ है।  योग साधक अपनी साधना से विकार रहित हो जाते हैं। इंद्रियों के गुणों के पांचों विषय-रूप, रस, गंध, स्वर तथ स्पर्श-का सत्य जानते हैं।  इन गुणों के भी गुण वह समझते हैं। इसलिये वह किसी विषय को अपनी इंद्रियों के साथ  ग्रहण करते हुए भी उसके गुणों में लिप्त नहीं होते। योग साधक किसी विषय या वस्तु को छूते हैं, स्वर सुनते हैं, दृश्य देखते हैं, गंध सूंघते हैं, भोजन का स्वाद भी लेते हैं पर उससे प्राप्त सुख का तुरंत त्याग भी कर देते हैं ताकि वह अंदर जाकर दुःख का रूप न ले। अपने अभ्यास से वह विकारों को ध्यान से ध्वस्त कर देते हैं।

      मनुष्य की इंद्रियां बाहर सहजता से विचरण करती है। उन पर नियंत्रण करना कठिन है यह कहा जाता है।  योगसाधकों का इंद्रियों पर नियंत्रण सहज नहीं वरन् स्वभाविक रूप से होता है। इस संसार में मनुष्य मन के चलने के दो ही मार्ग हैं। एक सहज योग दूसरा असहज योग। योग सभी करते हैं। सामान्य आदमी इंद्रियों के वश होकर सांसरिक विषयों से जुड़ता है जिससे वह अंततः असहज को प्राप्त होता है  पर योग साधक उन पर नियंत्रण कर उपभोग करता है और हमेश सहज बना रहता है।  सामान्य मनुष्य होने का अर्थ असिद्ध होना नहीं है और योग साधक को सिद्ध भी नहीं समझना चाहिये।  असहज योगी में नैतिक और चारित्रिक दृढ़ता का अभाव होता है। कोई योग साधक है उसके लिये यह दोनों शक्तियां प्रमाण होती हैं। अगर नहीं है तो इसका आशय यह है कि उसके अभ्यास में कमी है। अपने योग साधक होने का प्रमाण दूसरों को दिखाने की बजाय स्वयं देखना चाहिये।  हम भीड़ में जाकर अगर यह प्रमाण दिखायेंगे तो सामान्य लोग यकीन नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास ज्ञान नहीं होता। सहज योगियों के सामने प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि वह दूसरे योग साधक की चाल देखकर ही समझ लेते हैं।

      अध्यात्मिक चिंत्तन, अध्ययन, मनन और अनुसंधान एकांत का विषय है। सत्संग करना चाहिये ताकि दूसरे लोगों से भी अनुभव किये जा सकें।  आत्म प्रचार की भूख सभी को होती है पर योग साधक के कार्य उनके लिये प्रचार का काम स्वतः करते हैं। फिर पं्रचार कर प्रभावित भी किसे करना है? उन लोगों के सामने स्वप्रचार का क्या लाभ जिन्हें सांसरिक विषय भी अच्छे लगते हैं और त्यागियों के सामने प्रचार कोई लाभ भी नहीं है क्योंकि वह परमात्मा के स्वरूप में स्थित हो जाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमें अपने को प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिये। सहज योग के लिये यह संभव है। जब संसार के सभी लोग असहज योग में रत हों तक सहज योगी को अपनी अनुभूतियां आनंद देती हैं। इनको बांटना संभव नहीं क्योंकि इनका न कोई रूप है न रंस है न ही स्वर है न गंध है न ही इसे स्पर्श किया जा सकता है।

      इस होली और घुलेड़ी पर एकांत चिंत्तन करते हुए हमने इतना ही पाया। इस अवसर पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठको को बधाई।

दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

ग्वालियर मध्यप्रदेश

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भर्तृहरि नीति शतक-आम आदमी का स्वयं पर नियंत्रण सहजता से नहीं होता


      आजकल हमारे देश में अनेक कथित बाबाओं के यौन अपराधों पर प्रचार माध्यम सनसनी खबरें पर प्रस्तुत कर अपना जनहित धर्म निभाते हुए फूले नहीं समाते। जब यह खबरें प्रसारित होती हैं तो संवाददाता और उद्घोषक बाबाओं के बारे में यह कहते हुए नहीं थकते थे कि समाज में अनेक पाखंडी धर्म के ठेकेदार हैं। यह नहीं  जानते हैं कि धर्म एक अलग विषय है और उसके नाम पर प्रचार का व्यवसाय करना कभी किसी के धार्मिक होने का प्रमाण पत्र नहीं हो जाता।  दूसरी बात यह है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के रूप में चार अलग अलग प्रकियायें हैं जिनका आपस में प्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं होता।  हां, इतना अवश्य है कि प्रातः धर्म निर्वाह के बाद अन्य प्रक्रियाओं में सात्विकता का भाव स्वतः आ जाता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान न होने के कारण पश्चिमी शिक्षा से ओतप्रोत इन प्रचार माध्यमों में कार्यरत बुद्धिमान लोगों से तो यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह धर्म को काम से न जोड़ें बल्कि उनके दर्शकों में बहुत कम लोग इस बात को समझ पाते हैं कि काम की अग्नि धर्म के कच्चे खिलाड़ी को ही नहीं वरन् परिपक्व मनुष्य को भी पथ से भ्रष्ट कर देती है।

महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि

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विश्वामित्रपराशरप्रभृत्यो वाताम्बुपर्णाशनास्तेऽपि स्त्रीमुखपङ्कजं सुललित। दृष्ट्वैव मोहं गताः।।

शाल्पन्नं सघृतं पयोदधियुतं भुञ्जन्ति ये मानवा।स्तेपामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेत् विन्ध्यस्तरेत् सागरे।।

      हिन्दी में भावार्थ-विश्वमित्र और पाराशर ऋषि पत्ते और जल का सेवन कर तप करते थे वह भी काम की अग्नि का वेग सहन नहीं कर सके तो फिर अन्न, घी, दूध तथा दही का सेवन करने वाले मनुष्य काम पर नियंत्रण कर लें तो समझ लो समुद्र में विंध्याचल तैर रहा है।

      जब सतयुग में कुछ ऋषि अपनी तपस्या में कामदेव को विध्न डालने से नहीं रोक सके तो आज के व्यवसायिक धर्मगुरुओं से यह आशा करना कि वह कामाग्नि से बच पायेंगे मूर्खता है।  हमारे देश में अनेक गुरु हैं जो अपने आसपास शिष्याओं का जमावड़ा इसलिये दिखाते हैं ताकि भक्त अधिक से अधिक उनके पास आयें।  अगर हम भारतीय अध्यात्मिक पात्रो का अध्ययन करें तो कहीं भी किसी नारी का गुरु पुरुष नहीं होता।  जब भगवान श्रीराम वनवास को गये थे तब श्रीसीता के साथ अनेक ऋषियों के आश्रम में गये। वहां भगवान श्रीराम उन ऋषियों से चर्चा करते थे गुंरु पत्नियां ही श्रीसीता को ज्ञान देती थीं।  आजकल जब नारी और पुरुष समान का नारा लगा है तब धर्मगुरुओं ने उसका लाभ जमकर उठाया है।  अनेक धर्मगुरु तो प्रवचन के समय अपनी निकटस्थ शिष्याओं को मंच पर ही बिठा देते हैं ताकि आकर्षण बना रहे।

      इधर जब से यौन अपराधों पर नया कानून आया है तब अनेक गुरुओं पर मामले दर्ज हो चुके हैं।  कभी कभी तो कुछ लोगों को  यह लगता है कि अपने भारतीय धर्म की बदनामी प्रायोजित ढंग से की जा रही है। इस तरह का संदेह करने वाले लोग कहते हैं कि दूसरे धर्म की कोई चर्चा नहीं करता।  हमारा मानना है कि हमारे देश में भारतीय धर्मावलंबियों को बहुमत है इसलिये उनकी घटनायें अधिक सामने आती हैं।  दूसरी बात यह कि अन्य धर्मों में कहीं पैसे तो पहलवानी के दम पर ऐसी घटनाओं को आने से रोका जाता है जबकि भारतीय धर्म में ऐसा नहीं हो पाता। जहां तक विश्व के सभी धर्मों के ठेकेदारों का सवाल है वह चाहे लाख पाखंड करें पर जिनके पास महिला शिष्यों का अधिक जमावड़ा है वहां पूरी तरह से मर्यादित व्यवहार की आशा कम ही हो जाती है। यह अलग बात है कि कुछ स्वयं नियंत्रित कर लेते हैं पर कुछ कामाग्नि में जल ही जाते हैं। कुछ का अपराध सामने आ जाता है जिनका दुष्कर्म अप्रकट है वह साधु ही बने रहते हैं।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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दूसरों को ज्ञान देने वाले तीतर की तरह-संत कबीर दर्शन


      हमारे देश में जैसे जैसे भौतिक समृद्धि के कारण जैसे जैसे विलासिता बढ़ रही है लोगों के शरीर टूट रहे हैं। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है।  आलस्य, विलास तथा प्रमाद के भाव की समाज में प्रधानता हो तो लोगों के मानसिक रूप से समृद्ध होने की कल्पना करना ही निरर्थक है। स्थिति यह है कि लोगों के पास धन और विलासिता के ढेर सारे साधन है पर हार्दिक प्रसन्नता उनसे कोसों दूर रहती है। ऐसे में उनका मन उनको मनोरंजन के लिये इधर उधर दौड़ता है जिसका लाभ भारतीय धार्मिक ग्रंथों के वाचकों ने खूब उठाया है।

           वैसे तो हमारे यहां कथा और सत्संग की परंपरा अत्यंत पुरानी है पर भौतिक युग में पेशेवर धार्मिक वाचकों ने उसे मनोरंजन स्वरूप दे दिया है।  वह स्वयं ज्ञान पढ़कर दूसरों को सुनाते हैं।  मनोरंजन से ऊबे लोग उसे ही अध्यात्म का मार्ग समझते हुए  भीड़ की भेड़  बनकर ऐसे उपदेशकों को अपना गुरु बना लेते हैं।  स्थिति यह है कि लोगों को त्याग, दया और दान की प्रेरणा देने वाले यह उपदेशक अपनी कथाओं के प्रायोजन के लिये सौदेबाजी करते हैं।  यह स्वाभाविक भी है क्योंकि इन उपदेशकों को अपनी कथााओं के लिये अपने साथ ऐसे दल की व्यवस्था करनी होती है जैसे कि नाटक निर्देशक  करते हैं।  अपने साथ संगीत और नृत्य  कलाकार लेकर अपनी कथाओं के पात्रों का मंच पर नाटक की तरह प्रस्तुत कर  यह कथा वाचक खर्च भी करते हैं।  ऐसे में उनको अपने कार्यक्रमों के लिये व्यवसायिक प्रबंध कौशल का परिचय देना होता है।  देखा जाये तो अध्यात्म साधना एकांत का विषय है पर गीत संगीत तथा नृत्य के माध्यम से शोर मचाकर यह लोगों का मन वैसे ही हरते हैं जैसे कि मनोरंजन करना ही अध्यात्म हो।

संत प्रवर कबीर दास जी कहते हैं कि

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पण्डित और मसालची, दोनों सूझत नाहिं।

औरन को करै चांदना, आप अंधेरे माहिं।।

         सामान्य हिन्दी में भावार्थ-पण्डित और मशाल दिखाने वाले दूसरों को प्रकाश दिखाते हैं, पर स्वयं अंधेरे में रहते हैं।

पण्डित केरी पोथियां, ज्यों तीतर का ज्ञान।

और सगुन बतावहीं, आपन फंद न जान।।

        सामान्य हिन्दी में भावार्थ-पण्डित पोथियों पढ़कर ज्ञानोपदेश करत हैं। उनका ज्ञान तीतर की तरह ही है जो दूसरे पक्षियों को ज्ञान देता पर स्वयं पिंजरे में रहता है।     

         हमारा अध्यात्म अत्यंत समृद्ध है। देखा जाये तो हमारे अध्यात्म का सार श्रीमद्भागवत गीता में पूर्ण रूप से समाहित है। इस छोटे पर महान ग्रंथ का अध्ययन करने पर यह साफ लगता है कि उसमें वर्णित सदेशों से  प्रथक अन्य कोई सत्य हो ही नहीं सकता। कहा भी जाता है कि जिसने श्रीगीता का अध्ययन कर लिया उसे फिर अन्य किसी ग्रंथ से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है। हैरानी की बात है कि अपने आपको श्रीगीता सिद्ध बताने वाले उसके संदेश भी इतने विस्तार से बताते हैं कि सामान्य भक्तों के सिर के ऊपर से निकल जाते हैं।  उससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि लोग श्रीगीता के प्रवचन के समय ही प्रमाद कर अपनी बात से भक्तों को हंसाते हुए समझाते हैं।  प्रमाद राजसी कर्म का परिचायक है और स्वयं को सात्विक कहने वाले इन उपदेशकों को इससे बचना चाहिये।

      जिन लोगों को अधिक पुस्तकों से माथा पच्ची न करनी हो वह प्रातःकाल एक दो श्लोक ही गीता का पढ़ लिया करें।  उसका शाब्दिक अर्थ लेकर मन ही मन उसका चिंत्तन कर भावार्थ समझने का प्रयास करें।  आजकल सिद्ध गुरु मिलना कठिन है। कथित गुरु अपने आश्रमों के विस्तार और भक्तों के संग्रह को ही अपना लक्ष्य बनाते हें।  अतः भगवान श्रीकृष्ण को अपना गुरु मानते हुए श्रीगीता का अध्ययन करें तो यकीन मानिए स्वतः ही अध्यात्म का ऐसा ज्ञान प्राप्त होगा जो कथित बड़े संतों के लिये भी दुर्लभ है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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मित्रों की रक्षा कर ही शत्रु को हराया जा सकता है-कौटिल्य का अर्थशास्त्र के आधार पर हिन्दी चिंत्तन लेख


      भारतीय अध्यात्म दर्शन  में न केवल प्रथ्वी के जीवन रहस्य को वर्णन किया गया है कि वरन् उसमें सांसरिक विषयों से पूर्ण सामर्थ्य के साथ ही लिप्त रहने के लिये पठनीय सामग्री भी शामिल है। भारतीय दर्शन मनुष्यों में जाति या भाषा के आधार पर भेद करने की बजाय स्वभाव, कर्म तथा प्रकृति की दृष्टि से उनमें प्रथकता का ज्ञान कराता है। भारतीय अध्यात्म दर्शन यह दावा कभी नहीं  करता कि उसके अध्ययन से सभी मनुष्य देवता हो जायेंगे बल्कि वह इस सत्य की पुष्टि करता है कि मनुष्यों में आसुरी और दैवीय प्रकृतियां वैचारिक  रूप में हमेशा मौजूद रहेगी।  इसके विपरीत भारत के बाहर से आयातित विचारधारायें सभी मनुष्य को फरिश्ता बनाने के दावे का स्वप्न मनुष्य मन में प्रवाहित कर उसे भ्रमित करती हैं।  हमारे देश में राजा की परंपरा समाप्त हो गयी तो उसकी जगह विदेशों से आयातित लोकतांत्रिक व्यवस्था की विचाराधाराओं ने यहां जड़े जमायीं।  हैरानी की बात है कि देश की प्रबंधकीय व्यवस्था का स्तर इतना गिर गया है कि लोग आज राजाओं के साथ ही अंग्रेजों की राज्य व्यवस्था को  याद करते हैं।   तय बात है कि आज के राजनीतिक प्रबंधकों से उनके मन में भारी निराशा व्याप्त है।  इसी निराशा का लाभ शत्रु राष्ट्र उठाकर सीमा पर नित्त नये खतरे पैदा कर रहे हैं।

       दरअसल आधुनिक लोकतंत्र में चुनाव जीत कर ही कोई शासन प्राप्त कर सकता है।  यह भी पांच वर्ष की सीमित अवधि के लिये मिलता है।  फिर चुनाव जीतने के लिये भारी प्रचार का व्यय करने के साथ ही कार्यकर्ताओं को भी पैसा देना पड़ता है। परिणाम यह हुआ है कि भले ही लोग समाज सेवा के लिये चुनावी राजनीति करने का दावा करते हों पर उनके कार्य करने की शैली उनके व्यवसायिक रूप का अनुभव कराती है। स्थिति यह है कि कानून में निर्धारित  राशि से कई गुना खर्च चुनाव जीतने के लिये उम्मीदवार करते हैं।  चुनाव जीतन के बाद राजकीय पद पर बैठने पर भी उनकी व्यक्तिगत चिंतायें कम नहीं होतीं। कहा भी जाता है कि जिसे राजनीति का चस्का लग जाये तो फिर आदमी उसे छोड़ नहीं सकता। तात्कालिक रूप से अपना पद बचाये रखने के साथ ही  अगली बार चुनाव  जीतने का सोच चुनावी राजनीति में सक्रिय लोगों को परेशान किये रहता है। जहां तक प्रजा के लिये व्यवस्था के प्रबंध का प्रश्न है तो वह अंग्रेजों की बनायी लकीर पर फकीर की तरह चल ही रही है।  भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अपने कौशल के अनुसार राज्य चलाते हैं।  वह अपने सिर पर बैठे चुनावी राजनीति से आये शिखर पुरुषों को भी संचालित करते हैं।  राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों को राजाओं जैसी सुविधा मिलती है तो वह प्रशासन तथा प्रबंधकीय स्थानों पर बैठे लोगों की कार्यप्रणाली पर अधिक दृष्टिपात नहीं करते। दिखाने के लिये भले ही वैचारिक द्वंद्व प्रचार माध्यमों में होता है पर मूल व्यवस्था में कभी कोई बदलाव नहीं होता।

    जहां तक राजनीति का प्रश्न है तो उच्च पदों पर पहुंचे लोगों की चाल भी आम आदमी की तरह ही होती है।  जिस तरह आम आदमी अपने राजसी कर्मों के निष्पादन के लिये चिंतित रहता है उसी तरह चुनाव राजनीति में भी केवल चुनाव जीतना ही मुख्य लक्ष्य रह जाता है। चुनाव जीतने के बाद पद मिलते ही अनेक लोग यह भूल जाते हैं कि निज जीवन और सार्वजनिक जीवन की राजनीति में अंतर होता है। राजनीति तो हर आदमी करता है पर सार्वजनिक जीवन की राजनीति करने वालों का समाज में मुख्य दर्जा प्राप्त होता है। प्रजा के धन से ही उनको अनेक सुविधायें मिलती हैं। वह समाज के प्रेरक और आदर्श होते हैं। यह अलग बात है कि चुनावी राजनीति में सक्रिय बहुत कम लोग अपनी सकारात्मक छवि समाज में बना पाते हैं।  राज्य के अंदर की व्यवस्था तो प्रशासकीय अधिकारी करते हैं पर सीमा के प्रश्न पर उनका नजरिया हमेशा ही अस्पष्ट रहता है। इसका मुख्य कारण यह है कि बाह्य विषयों पर  चुनावी राजनीति से पद प्राप्त व्यक्ति ही निर्णायक होता हैै।  ऐसे में जिस देश में राजनेता और प्रशासन में वैचारिक  अंतद्वंद्व हो वह बाहरी संकटों से कठिनाई अनुभव करते हैं।  दूसरी बात यह कि लोकतांत्रिक नेता सैन्य नीतियों पर कोई अधिक राय नहीं रख पाते।  खासतौर से जहां शत्रु राष्ट्र को दंडित करने का प्रश्न है तो लोकतांत्रिक देश के नेता अपनी झिझक दिखाते हैं। युद्ध उनके लिये अप्रिय विषय हो जाता है।  हम पूरे विश्व में जो आतंकवाद का रूप देख रहे हैं वह कहीं न कहीं लोकतांत्रिक नेताओं में युद्ध के प्रति अरुचि का परिणाम है।     

कौटिल्य महाराज अपने अर्थशास्त्र में कहते हैं कि

————————

अरयोऽपि हि मित्रत्वं यान्ति दण्डोवतो ध्रुवम्।

दण्डप्रायो हि नृपतिर्भुनक्तयाक्रम्य मेदिनीम्।।

          हिन्दी में भावार्थ-दण्डग्रहण करने वाले के शत्रु भी मित्र हो जाते हैं। दण्ड धारण करने वाला राजा या राज्य प्रमुख आक्रमण कर इस धरती पर सुख भोग सकता है।

सस्तम्भयति मित्राणि ह्यभित्र नाशयत्यपि।

भूकोषदण्डैर्वृजति प्राणश्वाप्युपकारिताम्।।

       हिन्दी में भावार्थ-अपने मित्रों को स्थिर रखने के साथ ही शत्रुओं को मारने वाले, प्रथ्वी, कोष और दण्डधारक राजा या राज्य प्रमुख की दूसरे लोग अपने प्राण दाव पर लगाकर रक्षा करते हैं।

     परिवार की हो या देश की राजनीति, वही मनुष्य अपने आपको सफल प्रमाणित कर सकता है जो अपने मित्र की रक्षा तथा शत्रु का नाश करने का सामर्थ्य रखता है। मुख्य बात यह है कि जिस तरह पुरुष अपने परिवार की रक्षा के लिये अपने अंदर आक्रामक प्रवृत्ति बनाये रखता है उसी तरह उसे राज्य की रक्षा के लिये भी तत्पर रहना चाहिये।  राज्य प्रमुख चाहे सैन्य क्षमता से सत्ता प्राप्त करे या चुनाव से, राज्य करने के नियम बदल नहीं सकते। भारत में इस समय चारों  तरफ से सीमा पर खतरा व्याप्त है और हम शांतिपूर्ण राष्ट्र होने की दुहाई देते हुए उनसे बचने का मार्ग ढूंढते हैं तो कहंी न कहीं हमारे राजनीति कौशल के अभाव का ज्ञान उससे होता है। जब हमारे पास अपनी एक शक्तिशाली सेना है तब हमें अहिंसा या शांति की बात कम से कम अपनी सुरक्षा को लेकर करना ही नहीं चाहिये। शांति या अहिंसा की बात करना सार्वजनिक जीवन के राजनयिकों का नहीं है वरन यह सामाजिक तथा धार्मिक शीर्ष पुरुषों पर छोड़ देना चाहिये कि वह समाज को ऐसे संदेश दें।  राजकीय विषयों का निष्पादन हमेशा ही मानसिक दृढ़ता से होता है। वहां सभी को साथ लेकर चलने की नीति की बजाय सभी को साधने की नीति अपनानी चाहिये। कम से कम कौटिल्य का अर्थशास्त्र तो यही कहता है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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मनु स्मृति-नियमों से यमो का पालन महत्वपूर्ण


    हमारे देश में धर्म के नाम पर जितना भ्रम है अन्यत्र कहीं है।  श्रीमद्भागवत गीता में यज्ञों के दो प्रकार बताये गये हैं-एक द्रव्यमय यज्ञ दूसरा ज्ञान यज्ञ!  द्रव्यमय यज्ञ का आशय यही है कि भौतिक पदार्थों के माध्यम से परमात्मा का स्मरण किया जाये। ज्ञान यज्ञ का आशय यह है कि परमात्मा को तत्व से जानकर उसका स्मरण किया जाये।  देखा यह गया है कि हमारे देश के कथित घार्मिक ठेकेदारों ने धर्म के नाम पर अपने व्यवसाय चमकाने के लिये द्रव्यमय यज्ञ का ही प्रचार किया करते है।  स्थिति यह है कि अनेक जगह कथित रूप से ज्ञानयज्ञ भी होते हैं पर उसमें लोगों को दान दक्षिणा देकर पैसे की उगाही की जाती है। उनसे द्रव्य का दान करने के लिये कहा जाता है।  स्पष्टतः ज्ञान का यह एक तरह से व्यापार है।

      धर्म के निर्वाह के दो रूप हैं- यम और नियम।  यमों का पालन किया जाये तो धर्म स्वतः ही फल प्रदान करने लगता है।  यम में अहिंसा,सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह का पालन करना होता है।  यमों को धारण करना बाहर दिखता नहीं है इसलिये उसके आधार पर पाखंड करना कठिन है।  जबकि नियमों का पालन बाहर नजर आता है और उससे दूसरे की प्रशंसा पाने का मोह पूरा हो सकता है इसलिये लोग उनका पालन करते दिखना चाहते हैं।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

————–

यमान्स्सेवेत सततं न नित्यं नियमानबुधः।

यमान्यतन्यकुर्वाणो नियमान्केवलान्भजन्।।

         हिन्दी में भावार्थ-मनुष्य का नियमों की उपेक्षा कर यमो का पालन करना ही वास्तविक धर्म है। यमों की बजाय   जो मनुष्य  नियमों के  पालन की तरफ जो ध्यान देता है वह अधिक समय तक सफलता प्राप्त न करते हुए  शीघ्र पतन को प्राप्त होता है।

      हमारे यहां धर्म के नाम पर इधर उधर जाकर परमात्मा के विभिन्न स्वरूपों के मंदिरों पर उनके दर्शन करने की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है। दरअसल जिनके पास पैसा और समय होता है वह उसे व्यय करने को मार्ग ढूंढते हैं।  ऐसे लोग धर्म का मतलब नहीं जानते पर धार्मिक दिखना चाहते हैं।  इसलिये पर्यटन के नाम पर रमणीक स्थलों पर मंदिरों के दर्शन करने जाते हैं।  इनमें ऐसे भी शामिल लोग हैं जो अपने ही शहरों के मंदिरों पर जाना तो दूर घर में ही परमात्मा के स्वरूपों की मूर्तियों पर मत्था तक नहीं टेकते। मत्था टेकने की बात तो छोड़िये, अनेक लोग  मूर्ति बाज़ार से खरीदकर अपने घर की दीवार पर टांगते हैं या फिर अलमारी में रखते हैं पर फिर उसे देखते तक भी नहीं है। ऐसे लोग दूर शहरों  में मंदिरों में भगवान के दर्शन करने का दावा इस तरह करते हैं कि वह प्रथ्वी के अकेले ऐसे वासी हैं जिनको साक्षात भगवान ने दर्शन दिये।  यह धर्म के नाम पर पाखंड के अलावा कुछ नहीं है। ऐसा करके दूसरों के सामने आत्मप्रवंचना करना धर्म नहीं होता। धर्म वह विषय है जिसमें संलिप्त होने से स्वयं को प्रसन्नता का आभास हो। 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

मनुस्मृति का आधार पर सन्देश-स्वस्थ व्यक्ति ही समाज का हित कर सकता है


                        हमारे दर्शन के अनुसार पूर्णतः स्वस्थ होने पर ही किसी मनुष्य को राजसी कर्म करना चाहिये। ऐसे में जिन लोगों पर राज्य का भार है उनको प्रजा हित के लिये अधिक ही परिश्रम करना होता है इसलिये उनका पूर्णतः स्वस्थ होना आवश्यक है।  आधुनिक लोकतंत्र ने पूरे विश्व में राज्य व्यवस्थाओं में इस नीति का पालन नहीं किया जा रहा है। आज तो सभी देशों में यही देखा जाता है कि चुनाव में कौन जीत सकता है? चुनाव जीतने की योग्यता और क्षमता ही राज्यपद पाने का एक आधार बन गयी है।  ऐसे में अनेक देशों के राज्य प्रमुख शासन में आने के बाद जनता में अपनी लोकप्रियता खो देते हैं। दूसरी बात यह भी है कि पद की अवधि पांच या छह साल होती है उसमें राज्य पद पर प्रतिष्ठित होने पर व्यक्ति की चिंतायें प्रजा हित से अधिक अपने चुनाव के लिये चंदा देने वालों का उधार चुकाने या फिर अगले चुनाव में फिर अपना पद बरबकरार रहने की होती है।  कुछ समय विपक्षियों का सामना करने तो बाकी समय जनता के सामने नये वादे करते रहने में लग जाता है।

                        अनेक देशों के राज्य प्रमुख शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक दृष्टि से अस्वस्थ होने के बावजूद सत्ता रस पीते रहते हैं। राज्य के अधिकारी भी अपनी नौकरी चलाते हुए केवल राज्य प्रमुख की कुर्सी बचाये रखने में अपना हित समझते हैं। विश्व प्रसिद्ध चिंत्तक कार्लमार्क्स ने अपने पूंजी नामक पुस्तक में इन पूंजीपतियों के हाथ लग चुकी व्यवस्थाओं की चर्चा बहुत की है।  यह अलग बात है कि उसके अनुयायियों ने भी अपने शासित राष्ट्रों में शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक दृष्टि से बीमार लोगों को उच्च पदों पर बैठाये रखा और बेबस जनता तानाशाही की वजह से उनको ढोती रही।  वामपंथी व्यवस्था में बौद्धिकों को वैचारिक मध्यस्थ बन कर मजे लूटने की सुविधा मिलती है इसलिये वह जनहित की बातें बहुत करते हैं पर अपने शिखर पुरुषों की शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक अस्वस्थता को निजी विषय बताते हैं।  मजे की बात यही है कि यही वामपंथी बौद्धिक मध्यस्था मनुस्मृति का जमकर विरोध करते हैं।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

 

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अमात्यंमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्भवम्।

 

स्थापयेदासने तस्मिन् खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम्।।

 

                        हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य प्रमुख अपने खराब स्वास्थ्य की वजह से प्रजाहित के कार्यों का निरीक्षण करने में असमर्थ हो तब उसे अपना कार्यभार किसी बुद्धिमान, जितेन्द्रिय, सभ्य तथा शिष्ट पुरुष को सौंप देना चाहिये।

 

विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद्धियन्ते दस्युभिः प्रजाः।

 

सम्पतश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तु जीवति।।

 

                        हिन्दी में भावार्थ-उस राजा या राज्य प्रमुख को जीवित रहते हुए भी मृत समझना चाहिये जिसके अधिकारियों के सामने ही डाकुओं से लूटी जाती प्रजा हाहाकर मदद मांगती है पर वह उसे बचाते ही नहंी है।

                        सामान्य सिद्धांत तो यही है कि अस्वथ्यता की स्थिति में राज्य प्रमुख किसी गुणी आदमी को अपना पदभार सौप दे पर होता यह है कि वामपंथी विचारक शिखर पर बैठे पुरुष को अपने अनुकूल पाते हैं तो वह उसकी जगह किसी दूसरे को स्वीकार नहंी करते। दूसरी बात यह है कि आजकल के राज्य प्रमुखों में इतनी मानवीय चतुराई तो होती है कि वह अपने बाद के दावेदारों को आपस में लड़ाये रखते है ताकि कोई उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सके। अनेक जगह तो राज्य प्रमुख इस तरह की व्यवस्था कर देते हैं कि उनके बाद उनके परिवार के सदस्यों को ही जगह मिले। वामपंथियों के सबसे बड़े गढ़ चीन में भी अब शासन में परिवारवाद आ गया है।  वामपंथियों ने शायद इसलिये ही हमेशा मनुस्मृति का विरोध किया है ताकि उसकी सच्चाई से आम लोग अवगत न हों और उनका छद्म समाज सुधार का अभियान चलता रहे।

                        हम आजकल पूरी विश्व अर्थव्यवस्था चरमराने की बात करते हैं। उसका मुख्य कारण यही है कि अनेक महत्वपूर्ण देशों का शासन पुराने राजनीतिक सिद्धांतों की अनदेखी कर चलाया जा रहा है। स्थिति यह है कि तानाशाही व्यवस्था हो या लोकतांत्रिक सत्य कहने का अर्थ अपने लिये शत्रुओं का निर्माण करना होता है। अपनी आलोचना सहन करने के लिये पर्याप्त प्राणशक्ति बहुत कम लोगों में रह गयी है। इसका मुख्य कारण शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक अस्वस्थता ही है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

 

 

 

                        हमारे दर्शन के अनुसार पूर्णतः स्वस्थ होने पर ही किसी मनुष्य को राजसी कर्म करना चाहिये। ऐसे में जिन लोगों पर राज्य का भार है उनको प्रजा हित के लिये अधिक ही परिश्रम करना होता है इसलिये उनका पूर्णतः स्वस्थ होना आवश्यक है।  आधुनिक लोकतंत्र ने पूरे विश्व में राज्य व्यवस्थाओं में इस नीति का पालन नहीं किया जा रहा है। आज तो सभी देशों में यही देखा जाता है कि चुनाव में कौन जीत सकता है? चुनाव जीतने की योग्यता और क्षमता ही राज्यपद पाने का एक आधार बन गयी है।  ऐसे में अनेक देशों के राज्य प्रमुख शासन में आने के बाद जनता में अपनी लोकप्रियता खो देते हैं। दूसरी बात यह भी है कि पद की अवधि पांच या छह साल होती है उसमें राज्य पद पर प्रतिष्ठित होने पर व्यक्ति की चिंतायें प्रजा हित से अधिक अपने चुनाव के लिये चंदा देने वालों का उधार चुकाने या फिर अगले चुनाव में फिर अपना पद बरबकरार रहने की होती है।  कुछ समय विपक्षियों का सामना करने तो बाकी समय जनता के सामने नये वादे करते रहने में लग जाता है।

                        अनेक देशों के राज्य प्रमुख शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक दृष्टि से अस्वस्थ होने के बावजूद सत्ता रस पीते रहते हैं। राज्य के अधिकारी भी अपनी नौकरी चलाते हुए केवल राज्य प्रमुख की कुर्सी बचाये रखने में अपना हित समझते हैं। विश्व प्रसिद्ध चिंत्तक कार्लमार्क्स ने अपने पूंजी नामक पुस्तक में इन पूंजीपतियों के हाथ लग चुकी व्यवस्थाओं की चर्चा बहुत की है।  यह अलग बात है कि उसके अनुयायियों ने भी अपने शासित राष्ट्रों में शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक दृष्टि से बीमार लोगों को उच्च पदों पर बैठाये रखा और बेबस जनता तानाशाही की वजह से उनको ढोती रही।  वामपंथी व्यवस्था में बौद्धिकों को वैचारिक मध्यस्थ बन कर मजे लूटने की सुविधा मिलती है इसलिये वह जनहित की बातें बहुत करते हैं पर अपने शिखर पुरुषों की शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक अस्वस्थता को निजी विषय बताते हैं।  मजे की बात यही है कि यही वामपंथी बौद्धिक मध्यस्था मनुस्मृति का जमकर विरोध करते हैं।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

 

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अमात्यंमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्भवम्।

 

स्थापयेदासने तस्मिन् खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम्।।

 

                        हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य प्रमुख अपने खराब स्वास्थ्य की वजह से प्रजाहित के कार्यों का निरीक्षण करने में असमर्थ हो तब उसे अपना कार्यभार किसी बुद्धिमान, जितेन्द्रिय, सभ्य तथा शिष्ट पुरुष को सौंप देना चाहिये।

 

विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद्धियन्ते दस्युभिः प्रजाः।

 

सम्पतश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तु जीवति।।

 

                        हिन्दी में भावार्थ-उस राजा या राज्य प्रमुख को जीवित रहते हुए भी मृत समझना चाहिये जिसके अधिकारियों के सामने ही डाकुओं से लूटी जाती प्रजा हाहाकर मदद मांगती है पर वह उसे बचाते ही नहंी है।

                        सामान्य सिद्धांत तो यही है कि अस्वथ्यता की स्थिति में राज्य प्रमुख किसी गुणी आदमी को अपना पदभार सौप दे पर होता यह है कि वामपंथी विचारक शिखर पर बैठे पुरुष को अपने अनुकूल पाते हैं तो वह उसकी जगह किसी दूसरे को स्वीकार नहंी करते। दूसरी बात यह है कि आजकल के राज्य प्रमुखों में इतनी मानवीय चतुराई तो होती है कि वह अपने बाद के दावेदारों को आपस में लड़ाये रखते है ताकि कोई उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सके। अनेक जगह तो राज्य प्रमुख इस तरह की व्यवस्था कर देते हैं कि उनके बाद उनके परिवार के सदस्यों को ही जगह मिले। वामपंथियों के सबसे बड़े गढ़ चीन में भी अब शासन में परिवारवाद आ गया है।  वामपंथियों ने शायद इसलिये ही हमेशा मनुस्मृति का विरोध किया है ताकि उसकी सच्चाई से आम लोग अवगत न हों और उनका छद्म समाज सुधार का अभियान चलता रहे।

                        हम आजकल पूरी विश्व अर्थव्यवस्था चरमराने की बात करते हैं। उसका मुख्य कारण यही है कि अनेक महत्वपूर्ण देशों का शासन पुराने राजनीतिक सिद्धांतों की अनदेखी कर चलाया जा रहा है। स्थिति यह है कि तानाशाही व्यवस्था हो या लोकतांत्रिक सत्य कहने का अर्थ अपने लिये शत्रुओं का निर्माण करना होता है। अपनी आलोचना सहन करने के लिये पर्याप्त प्राणशक्ति बहुत कम लोगों में रह गयी है। इसका मुख्य कारण शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक अस्वस्थता ही है।

 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

 

 

तुलसीदास का दर्शन-दुष्ट को विष और सज्जन को अमृत पसंद आता है


     पता नहीं हमारे देश में मानवता के नाम पर कितनी विचाराधारायें विदेश से आयातित  गयी हैं।  देखा जाये तो यह विचाराधारायें धरती पर स्वर्ग की कल्पना करती है। सभी मनुष्यों में देवत्व ढूंढने का प्रयास करती हैं।  इसमें अपराधियों का हृदय परिवर्तन कर उन्हें सामाजिक विकास की कथित मुख्यधारा से जोड़ने का  प्रयास करती हैं। अनेक लोग तो ऐसे हैं जो खुल्लम खुल्ला अपराधियों की गरीबी, लाचारी और बेबसी का उल्लेख करते हुए उनसे सुधरने का अवसर देने की मांग करते हैं।  हमारे देश में अनेक मानवाधिकार संगठन सक्रिय हैं जो केवल अपराधियों के हकों की लड़ाई यह कहते हुए लड़ते हैं कि उनका अपराध अभी प्रमाणित नहीं हुआ है।  इतना ही नहीं कुछ तो आतंकवादियों को भी  निर्दोष होने का प्रमाण खुद देते हैं और अपने दावे के पक्ष में न्यायालय में चल रहे मुकदमों के निर्णय न होने का तर्क रखते हैं। जांच एजेंसियों के दावों को लगते वह उनके आरोपों को प्रमाण तो स्वीकार नहीं करते पर अपने दावों को प्रमाणपत्र मानते हैं।

      यह मानवाधिकार कार्यकर्ता और नेता हमेशा ही भारतीय जांच एजेंसियों पर आक्षेप करते हैं।  कहीं कहीं आतंकवाद अधिक होने पर उस क्षेत्र की गरीबी और भुखमरी की समस्या का हल करने की मांग करते हुए यह तर्क भी देते हैं कि भूखा आदमी बंदूक नहीं उठायेगा तो क्या करेगा?

  जिसके पास रोटी खरीदने को पैसा नहंीं है वह बंदूक और गोलियां खरीद सकता है यह हास्याप्रद तर्क इन कथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के श्रीमुख से हमारे प्रचार माध्यमों में खूब सुना जा सकता है।  अधिकतर मानवाधिकार संगठन पश्चिमी विचारधाराओं के पोषक हैं जो राक्षस या शैतान को असांसरिक जीव मानती हैं। इसके विपरीत हमारा दर्शन मानता है कि सुर और असुर दोनों ही इस संसार में समान रूप से विचरते ही  रहेंगे। श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इस संसार में सुर तथा असुर प्रवृत्तियां दोनों प्रकार के लोग होते हैं।  इसलिये ज्ञान प्राप्त कर अपने अंदर सुर प्रकृति को जीवंत बनाये रखने के साथ आसुरी प्रकृति के लोगों से दूर रहना चाहिये।  उनसे सुधरने की आशा करना व्यर्थ है।

संत तुलसीदास ने कहा है कि

—————-

भलो भलाहहि पै लहई, लहई निचाइहि नीचु।

सुधा सराहिअ अमरतां, गरल सराहिअ मीचु।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-भले मनुष्य को भलाई तथा नीच व्यक्ति को नीचता ही पसंद आती है। अमरता चाहने वाले अमृत की और मरने मारने के लिये उत्सुक आदमी विष की प्रशंसा करता है।

मिथ्या माहुर सज्जनहि, खालहि गरल सम सांच।

तुलसीछुवत पराई ज्यों, पारद पावक आंच।।

         सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-सज्जन पुरुष के लिये असत्य  तो दुर्जन के लिये  सत्य विष की तरह होता है। सज्जन असत्य तथा तथा तथा दुर्जन सत्य से वैसे ही भागते हैं जैसे अग्नि की आंच से पारा उड़ जाता है।

   जिनके अंदर आसुरी प्रकृत्तियां हैं उन्हें ज्ञान देकर उन्हें सुधारने की आशा करना व्यर्थ है।  फिर गुण ही गुणों को बरतते का सिद्धांत भी समझना चाहिये। जिनके हाथ में हथियार हैं उनमें क्रूरता का भाव स्वाभाविक रूप से आयेगा यह बात समझना चाहिये। इस मामले में नारियों में श्रेष्ठ सीता ने वनवास के दौरान अपने पति श्रीराम को यही समझाया था कि अगर आप इस तरह अस्त्र शस्त्र अपने पास रखेंगे तो आपके हाथ से जीव हत्या होती ही रहेगी।  तब श्रीराम ने यह कहते हुए अस्त्र शस्त्र त्यागने से इंकार किया कि इससे वह समाज के लिये हिंसक जीवों का वध करने के लिये ही धारण किये हुए हैं। सीता जी ने एक कथा भी श्री राम को सुनाई थी।  उनके अनुसार एक ऋषि की तपस्या से देवराज इंद्र विचलित हुए। उन्होंने उनको अपनी तपस्या के मार्ग से हटाने का मार्ग यह निकाला कि उसे अपना एक फरसा धरोहर के रूप में रखने का आग्रह किया। वह  ऋषि रोज उस फरसे को देखते थे। धीरे वह उसमें इतना लिप्त हो गये कि उसी फरसे से हिंसा करने लगे।  वह देवत्व से राक्षसत्व को प्राप्त हो गये।

        कहने का अभिप्राय है कि जिनके अंदर दुष्टता का भाव है उनसे सुधरने की आशा करना बेकार है।  दुष्ट लोग सत्य से बिदकते हैं।  वह दूसरों को अमृत बांटने की बजाय विष देने के लिये अधिक तत्पर रहते हैं।  ऐसे लोगों से सुधारने के प्रयास की बजाय उनसे दूर रहने का प्रयास करना ही श्रेयस्कर है। यदि वह लोगा आक्रामक हों तो उसका वैसा ही प्रतिकार करने के लिये तत्पर भी होना चाहिये।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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मनु स्मृति-राज्य व्यवस्था में पंचायत प्रणाली अपनाई जानी चाहिए


         भारत में गांवों  की बदहाल स्थितियां किसी से छिपी नहीं है। आधुनिक व्यवस्था में गांवों के विकास की बात तो बहुत कही जाती है पर देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण गांवों में आज भी पेयजल, स्वास्थ्य तथा शिक्षा की स्थिति बद से बदतर ही होती जा रही हैं।  भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों को एकदम विस्मृत कर पश्चिमी विचाराधाराओं का अनुकरण तो किया गया है पर उन्हें भी व्यवहार में नहीं लाया जा रहा।  गरीब और गांवों के विकास के नारे भी खूब लगते है।  हैरानी तब आती है जब गांवों के विकास तथा पंचायती राज की कल्पना के लिये हर कोई श्रेय लेना चाहता है। सच बात तो यह है कि मनृस्मृति में पहले से ही पंचायती राज का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। यह सिद्धांत कोई प्रचलित सामाजिक पंचायतों के रूप में नहीं वरन् प्रशासनिक व्यवस्था के लिये बनाया गया है। अक्सर कहा जाता है कि भारत में पंचायत प्रणाली केवल सामाजिक उद्देश्यों के लिये थी। यह सोच गलत है क्योंकि मनु महाराज जिन पंचायतों की बात करते हैं उनका स्वरूप प्रशासनिक है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

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ग्रामस्याधिपतिं कुर्याद्दशग्रामपतिं तथा।

विंशतीशं शतेशं च सहस़्पतिमेव च।।

    हिन्दी में भावार्थ-प्रत्येक गांव में एक मुखिया नियुक्त करना चाहिये। दस गांवों को मिलाकर बीस गांवों का और बीस बीस गांवों के पांच समूहों को मिलाकर सौ गांवों का तथा सौ गावों के दस वर्गों का एक समूह बनाकर उनकी देखभाल करने हेतु एक मुखिया नियुक्त कराना चाहिये।

तेषां ग्राम्याणि कार्याणि पृथक कार्याणिं चैव हि।

राज्ञोऽन्यः सचिवः स्निग्धस्तानि पश्चवैदतन्द्रितः।।

     हिन्दी भाषा में भावार्थ-सभी गांवों  के काम की देखभाल करने के लिये सचिवों की नियुक्ति करते उसे उसे सभी गावों के अधिपतियों पर दृष्टि बनाये रखने का आदेश देना चाहिये।

            कहा जाता है कि महात्मा गांधी मानते थे कि असली भारत गांवों में रहता है जबकि मनुस्मृति में तो गांवों को ही बड़े राष्ट्र का आधार माना गया है। इतना ही नहंी नगरों के साथ गांवों की देखभाल पर जोर दिया गया है। हम यह भी कह सकते हैं कि पंचायती राज्य की कल्पना का श्रेय आधुनिक समय के कथित विद्वानों को नहीं दिया जा सकता। मनुस्मृति में यह कल्पना पहले ही प्रस्तुत की गयी है। इतना ही प्राचीन काल की व्यवस्था में इसे अपनाया भी गया था। इसी कारण हमारे यहां अनुशासन तथा व्यवस्था बनी हुई थी।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-गरीब के गुणों से धनी अपनी तुलना न करें


         मनुष्य में यह प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से दूसरों के साथ होड़ करने की प्रवृत्त् िहोती है। यही उसके दुःख का मूल कारण भी है।  सच बात तो यह है कि आज कोई भी सुखी नहीं है।  इसका कारण यह कतई नहीं है कि माया की कृपा का लोगों के  पास अभाव है वरन् वह दूसरों पर भी कृपा करती है इसको लेकर सभी लोग परेशान रहते हैं।  सभी लोग:तेरी कमीज  मेरी कमीज से सफेद कैसेकी तर्ज पर जीवन पथ पर चलते हुए चिंतायें पाल रहे हैं।  अनेक लोगों के पास बहुत सारी भौतिक सुविधायें हैं इससे उनको सुख नहीं मिलता बल्कि दूसरे के पास भी वैसे ही साधन हैं यह चीज सभी को परेशान करती है।

           उससे भी बड़ी समस्या यह है कि आधुनिक समय में ढेर सारे सुख सभी के पास हैं। कोई किसी से कम नहंी है इसलिये एक दूसरे की प्रशंसा करने का समय किसी के पास नहीं है।  न ही शब्द है न अभ्यास कि दूसरे की प्रशंसा कर उसका मनोबल बढ़ाया जाये।  इसके विपरीत सभी एक दूसरे को नीचा दिखाकर मनोबल गिराने का प्रयास करते हैं। जिनके पास धन, पद और प्रतिष्ठा है उनका अनुकरण वह लोग भी करना चाहते हैं जिनके पास अधिक धन, उच्च पद और प्रतिष्ठा का अभाव है।  परिणाम यह है कि समाज में स्वस्थ प्रतियोगिता की बजाय ईर्ष्या, वैमनस्य और घ्णा का वातावरण बन गया है।  उस पर प्रचार माध्यम भी क्रिकेट, फिल्म तथा राजनीति के शिखर पृरुषों का प्रचार इस तरह करते हैं कि वह समाज के प्रेरक बन जायें।  तय बात है कि उन जैसा स्तर आम आदमी के भाग्य मे नहीं होता पर सपने पालने के कारण वह तनाव झेलता है।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

————–

वेषभाषा अनुकरणं न कुर्य्यात्प्थ्विीपतैः।

         सम्पन्नोऽपि हि मेघावी स्पर्द्धेत न च सद्गुणे।।

      हिन्दी में भावार्थ-राजा  के वेष तथा वार्तालाप की नकल नहीं करना चाहिये। उसी तरह स्वयं भले ही धनी हों पर कभी बुद्धिमान के गुणों से स्पर्धा न करें।

      नीति विशारद चाणक्य यह स्पष्ट रूप से मानते  हैं कि धनी का पूरा समाज सम्मान करता है। यह बात स्वाभाविक है क्योंकि आपत्ति विपत्ति में कोई भी रुपये पैसे के लिये धनी से ही आशा करता है। भले ही कोई धनी पूरे समाज के निर्धनों को उधार या सहायता नहीं देता पर स्वभाविक रूप से  एक आशा तो सभी को बंधी रहती है। इससे अनेक धनी लोग अपने को देवता या भगवान समझते हुए अल्पधनी बुद्धिमान को भी हेय समझने लगते हैं।  वह मानते हैं कि उनके अंदर बुद्धिमानी के गुण स्वाभाविक रूप से होते हैं।  यह उनका भ्रम है।  जिस तरह बुद्धिमान व्यक्ति अपने पास अधिक धन न होने पर धनिकों की होड़ नहीं करते उसी तरह धनवानों को भी चाहिये कि वह बुद्धिमानों की होड़ करते हुए ऐसे काम न करे जिससे उनका धन जाता रहे। हो सके तो बुद्धिमानों से अपनी स्थिति पर चर्चा करते हुए उनसे सलाह  भी लेते रहना चाहिये।                      

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-असावधान राजा प्रजा के लिए दु:खदायी


 

पिछले कई दिनों से भारतीय प्रचार माध्यम स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों की घटनाऐं प्रचारित कर समाज की स्थिति का रोना रोते हुए  अपने विज्ञापन का समय पास कर रहे हैं।  अनेक प्रकार की बहस होती  है पर निष्कर्ष के रूप में नतीजा शून्य ही रहा है।  सच बात तो यह है कि हमारे देश की  ही नहीं वरन् पूरे विश्व की दंडप्रणालियां अत्यंत अपराधों के अन्वेषण तथा  विलंब से निर्णय करने का कारक बन गयी हैं।  दूसरी बात यह है कि अपराध अन्वेषण तथा न्यायिक प्रणाली के सदुपयोग की योग्यता जिन लोगों में अधिक नहीं  है वह भी राज्य कर्म में लिप्त होकर समाज की रक्षा का जिम्मा ले लेते हैं।  पुरातन सभ्यताओं में अपराध की प्रकृत्ति के अनुसार दंड की व्यवस्था थी। इनमें कई सजायें क्रूर थी जिनको पश्चिमी सभ्यता के लोग पशुवत मानते थे।  अपने को सभ्य समाज साबित करने के लिये पश्चिम के लोगों ने पशुवत अपराधों के प्रति भी मानवीय दृष्टिकोण अपनाने का सिद्धांत स्थापित किया जिससे समाज में अपराध बढ़े ही हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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यदि प्रणयेराजा दण्डं उण्ड्येष्वतन्द्रितः।

शले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः।

           हिन्दी में भावार्थजब राज्य अपनी प्रजा की रक्षा करने के लिये अपराधियों को दंड देने में सावधानी से काम नहीं करता तब अव्यवस्था फैलती है। शक्तिशाली मनुष्य कमजोर लोगों पर भारी अनाचार करने लगते हैं।

अद्यात्काकः परोडाशं श्वा लिह्याद्धविस्तथा।

स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चित्प्रवर्तेताधरोत्तरम्

          हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य अपराधियों को दंड नहीं देता तो कौआ पुरोडाश खाने लगेगा, कुत्ता हवि खाकर स्वामी की बात नहीं मानेगा और समाज उच्च से निम्न स्थिति में चला जायेगा।

भारत में भी कथित रूप से पश्चिमी व्यवस्था को अपनााया गया है। जिस भारतीय संविधान के आधार पर हमारे देश का वर्तमान स्वरूप विद्यमान है वह भी अंग्रेजों से विरासत में मिला है। हमने अपना संविधान बनाया पर उसके साथ ऐसे अनेक नियम हैं जो अंग्रेजों के काल से ही बने हैं।  अंग्रेज आधुनिक सभ्यता के प्रवर्तक होने का दावा करते हैं जो अपराधियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की बात करती है।  इसके विपरीत हमारा दर्शन मानता है कि क्रूरतम अपराधों की सजा भी क्रूर होना चाहिये।  चूंकि हमारे देश में पश्मिमी सभ्यता के समर्थकों के पास सारी शक्ति है इसलिये यह संभव नहीं है कि यहां अपराध के अन्वेषण तथा दंड के लिये अपने ही देश के अनुरूप कोई नयी प्रणाली बनायी जाये।

       हमारा दर्शन मानता है कि कुत्ते की पूंछ कभी सीधी नहीं हेाती जबकि पश्चिमी दर्शन अपराधियों के सुधरने की कल्पनातीत आशा पालता है।  उहापोह फंसे हमारे देश की स्थिति दिन ब दिन इसलिये बिगड़ती जा रही है क्योंकि हमारे यह अपराध तथा  अन्वेषण तथा न्यायालय में उनके प्रमाणीकरण में विलंब होता है।  अनेक अपराधी तो अपने पुराने अपराध के लिये क्षमा तक की आशा करते हैं।  कुछ तो बिना सजा के ही देह छोड़ जाते हैं।  जब तक हम अपने देश के मूल स्वभाव के अनुसार अपराध के अन्वेषण तथा उनके दंड देने की कोई तीव्र प्रणाली नहीं अपनायेंगे तब तक भयमुक्त समाज की आशा करना व्यर्थ है।

 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

 

दादूदयांल के दोहे के आधार पर चिंत्तन लेख-जिन के पास अधिक धन और उच्च पद हो उनको घमंड होना स्वाभाविक


        अनेक मासूम दिल वाले लोग धनी, उच्च पदस्थ तथा बाहुबली लोगों से दया की आशा से निहारते हैं। कुछ लोग बड़े होने पर भी विनम्र हो सकते हैं पर सभी के अंदर सहृदयता का भाव होना  संभव नहीं है। माया के फेर में फंसे लोगों से दया, परोपकार और अपने से कमजोर व्यक्ति के प्रति सहृदयता दिखाने की उम्मीद करना निरर्थक है।  खासतौर से आजकल अंग्रेजी शिक्षा तथा जीवन पद्धति के साथ जीने के आदी हो चुके समाज में तो यह आशा करना ही मूर्खता है कि धनी, उच्च पदस्थ तथा शक्तिशाली लोग समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभायेंगे।  अंग्रेजी शिक्षा उपभोग के लिये गुलाम तक बनने के लिये प्रेरित करती है तो जीवन शैली अपना पूरा ध्यान सांसरिक विषयों की तरफ ले जाती है।  ऐसे में सामान्य मनुष्य से आशा करना कि वह भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन करेगा, बेकार है |

कविवर दादू दयाल कहते हैं कि

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दादू’ माया का खेल देखि करि, आया अति अहंकार।

अंध भया सूझे नहीं, का करिहै सिरजनहार ।।

        सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-माया का खेल अत्यंत विकट है। यह संभव ही नहीं है कि जिस मनुष्य के  पास धन, पद और प्रतिष्ठा का अंबार हो वह अहंकार का समंदर में न डूबे। जिसके पास माया है उसे कभी भी परमात्मा की भक्ति हो ही नहीं सकती।

माखन मन पांहण भया, माया रस पीया।

पाहण मन मांखण भया, राम रस लीया।।

      सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जिनका मन मक्खन की तरह है उनके पास धन, पद और प्रतिष्ठा यान माया के प्रभाव में वह भी पत्थर हो जाता है। राम का रस पी ले तो पत्थर मन भी मक्खन हो जाता है।

       सच बात तो यह है कि भारत ने हर क्षेत्र में पाश्चात्य व्यवस्था का अनुकरण किया है। एक अंग्रेजी विद्वान ने बहुत पहले कहा था कि इस संसार में बिना बेईमानी या दो नंबर के धन के बिना कोई धनपति बन ही नहीं सकता।  जब हम अपनी प्राचीन पद्धतियों  से दूर हो गये हैं और  भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात नहीं भी करें तो  पश्चिमी विद्वानों का सिद्धांत भी यही कहता है कि बिना बेईमानी के किसी के पास अधिक धन आ ही नहीं सकता।  हम यह भी देखें कि जब किसी के पास बेईमानी से काला धन आता है तो यकीनन उसके साथ अनेक प्रकार के संकट भी जुउ़ते हैं।  ऐसे में ऐसे काले धन के स्वामियों की रात की नींद हराम हो जाती है तो दिन का चैन भी साथ छोड़ देता है। अपने संकटों से दो चार हो रहे बड़े लोग  अपनी रक्षा करेंगे या दूसरों पर दया करने का समय निकालेंगे? इसलिये जहां तक हो सके अपने ही पवित्र साधनों से जीवन बिताना चाहिये और धनी, उच्च पदस्थ तथा प्रतिष्ठावान लोगों से कोई सरोकार न रखते हुए उनसे आशा करना त्याग देना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

 

विदुर नीति-जिस धन को पाने में कष्ट हो उसके लिए प्रयास व्यर्थ


          मनुष्य जीवन को धारण करने वालों के मन मस्तिष्क में  यह भ्रम रहता कि वह केवल धनर्जान करने के लिये ही पैदा हुए हैं।   संसार के अधिकतर मनुष्य  धन को ही सत्य मानते हैं।  धन कमाने के बाद  उसके व्यय का प्रदर्शन कर समाज में अपनी श्रेष्ठता साबित करने का मोह कोई नहीं छोड़ पाता। हमारे देश में धर्म तथा  समाज के नाम पर ऐसी परम्पराएं  बनायीं गयी हैं जिनका निर्वाह बिना धन के संभव नहीं हो सकता।  पुत्र  के लिये व्यवसाय तथा पुत्री के लिये वर ढूंढते हुए हमारे देश के अधिकतर लोगों का जीवन ही निकल जाता है।  हमारे देश के लोगों में धन संचय की प्रवृत्ति इतनी गहरी है कि आधुनिक समय में चालाक बुद्धिमानों के लिये उनके साथ  ठगी करना आसान हो गया है।

         देश भर में अनेक चिटफंड कंपनियां यह काम इस तरह कर रही है कि लोग अपनी सारी जमा पूंजी उनके पास जमा कर आते हैं।  अधिक व्याज का लोभ लोगो के लिये संकट का कारण तब बनता है जब उनका मूल धन भी हाथ से निकल जाता है।  पीड़ित लोग अधिकतर अपने पृत्र के व्यवसाय या नौकरी तथा बेटी की शादी के लिये धन जमा करने की बात कहते है।  हमारे यहां विवाह तथा मृत्यु के अवसर पर जितनी नाटकबाजी होती है वह धन से ही संभव है।  यही कारण है कि भारत में लोग बच्चों के भविष्य के लिये अधिक से अधिक संचय करते हैं। इतना ही नहीं अपने बुजुर्गों की मृत्यु पर उनके दाह संस्कार के बाद भोज के प्रबंध का जिम्मा भी उन पर रहता है।  समाज में अपनी कथित छवि बचाये रखने के लिये भारत के लिये हर आम आमदी जूझता रहता है।  हमारे देश में सीध सच्चे धंधे में अधिक धनवान होने के अवसर करीब करीब बंद कर दिये गये हैं, जिसका परिणाम यह हुआ है कि अपने पास मौजूद धन की वृद्धि के लिये ऐसे ठगों के जाल में आमजन  आसान से फंस जाते हैं।

                      विदुरनीति में कहा गया है कि

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            अतिक्लेशेन येऽर्याः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेश वा।

            अरेवां प्रणपातेन मा स्म तेषु मन‘ कृथाः।।

        हिंदी  में भावार्थ-जिस धन को अर्जित करने में मन तथा शरीर को अत्यंत क्लेश हो, धर्म का उल्लंघन  करना पड़े या फिर शत्रु के सामने अपना सिर झुकाने की बाध्यता उपस्थित हो, उसे प्राप्त  करने का विचार ही त्याग देना श्रेयस्कर है।

            सहस्त्राणिऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनानथा।

            धृतराष्ट्र निमुंचेच्छां न कथंचिन्न जीव्यते।

       हिन्दी में भावार्थ-जिनके पास हजार है वह जिंदा रहते हैं पर जिनके पास सौ वह भी जिंदा  रहते हैं। धन का लोभ छोड़ने वाले लोग भी हर हालत में अपना जीवन धारण किये रहते ही  हैं।

        हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार  जिस जीव में परमात्मा ने प्राणवायु प्रवाहित की है माया उसकी सेवा करने के लिये बाध्य है। कहा भी जाता है कि जिसने पेट दिया है वह दाना भी देगा।  परमात्मा की दासी माया है न कि उसकी स्वामिनी।  यह भी कहा जाता है कि जिसके भाग्य में माया का जितना भाग आना लिखा है उतना ही मिलेगा। इसके बावजूद धर्मभीरुता का दावा करने वाले हमारे भारतीय समाज के अधिकांश लोगों  को इस पर विश्वास नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता से कथित रूप से कर्मप्रेरणा मिलने का दावा करने वाले यहां अनेक लोग मिल जायेंगे पर यह कोई नहीं समझ पाया कि उसमें निष्कर्म की बात कही गयी है न कि सकाम कर्म का सिद्धांत स्थापित किया गया है।  स्थिति यह है कि लोग धन के लिये देह तथा मन को भारी संताप देने के लिये तैयार हो जाते हैं। अपने ही धन के शत्रुओं की चिकनी चुकडी बातों में आकर उसे सौंप देते हैं।  परिणाम यह है कि बाद में जब धोखा मिलता है तो सिवाय आर्तनाद करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प् नहीं रहता।

         अतः अपने नियमित स्वाभाविक कर्म करते हुए परमात्मा का स्मरण ही करते रहना चाहिये।  संसार के विषयों का चक्र माया की कृपा से चलता ही रहता है।  उसमें एक दृष्टा की तरह शामिल होना चाहिये। समय आने पर सारे काम हो जाते हैं यह विश्वास धारण कर जीवान आनंद से बिताना चाहिये।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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अर्थववेद से सन्देश-ओम (ॐ)शब्द अत्यन्त मूल्यवान


        श्रीमद्भागवत गीता में ओम (ॐ ) शब्द को परमात्मा का पर्याय माना गया है। अनेक ऋषियों, मुनियों और संतों ने माना है कि ओम शब्द का निरंतर वाणी और मन से उच्चारण करने पर हृदय में पवित्र विचार आते हैं।  बुद्धि और मन शुद्ध होकर सकारात्मक कार्यों के लिये प्रवृत्त होता हैं।  ओम शब्द के वाणी से उच्चारण करने पर शरीर के सारे अंगों पर ऐसा प्रभाव होता है कि अंतर्मन में अद्भुत प्रकाश दीप प्रज्जवलित हो उठता है। उनके विचार तथा व्यवहार में यह प्रकाश विसर्जित दूसरे लोगों को भी प्रसन्नता देता हैं जिन लोगों को संस्कृत के श्लोक मन ही मन दोहराने में परेशानी होती है वह चाहें तो केवल ओम शब्द का जाप करें।

अथर्ववेद में कहा गया है कि

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त्रयः सुपर्णास्त्रिवृता यदायत्रेकाक्षस्मभि-संभूय शका शका।

प्रत्यौहन्मृत्युमृतेन सत्कमन्तर्दधान्त दुरितानी विश्वा।।

        हिन्दी में भावार्थ-जब समर्थ तीन सुवर्ण तिहरे होकर एक अक्षर में सब प्रकार मिल रहे हैं। वे अमृत के साथ सब अनिष्टों को मिटाकर मृत्यु को दूर करते हैं।

     योगासन के दौरान या बाद में ओम शब्द का उच्चारण करने से शरीर में एक अद्भुत रोमांच का अनुभव होता है। ओम शब्द के उच्चारण से वाणी, विचार और व्यवहार में जो स्वर्णिम परिवर्तन आता है उसकी अनुभूति इसका नियमित जाप करने पर ही पता चल सकती है। प्रयोगों से यह बात सिद्ध हो जाती है कि ओम शब्द का निरंतर जाप करने वालों के अंदर गुणात्मक रूप से परिवर्तन आते हैं जो उसके जीवन को उज्जवल पक्ष की तरफ ले जाते हैं।  यह प्रमाण विदेशी अनुसंधानकर्ताओं ने ही प्रस्तुत किया है।  अतः जिन लोगों को अपने जीवन, विचार तथा व्यवहार को प्रकाशमय बनाना है उन्हें ओम शब्द का दीपक अपने मन में स्थापित करना चाहिए। जब हम नियनित  रूप से ॐ  शब्द का जाप करेंग तब निश्चित रूप से दिव्यानुभूति होंगी।

लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

 

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर

writer and editor-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’, Gwalior

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भर्तृहरि नीति शतर्क-दौलत की बजाय परमात्मा का स्मरण करें


         हमारे देश में श्रीमद्भागवत गीता की चर्चा एक पवित्र ग्रंथ की तरह होती है।  अनेक संत और साधु इसके ज्ञान का प्रचार भी करते हैं पर फिर भी लगता है कि बहुत कम लोग इस समझ पाये हैं।  इसका कारण यह है कि भले ही गीता का अध्ययन कर उसका ज्ञान रट लिया जाये पर जब तक हृदय में वह स्थापित नहीं होगा किसी आचरण मे दृष्टिगोचर न हो वह गीता सिद्ध नहीं माना जा सकता।  दरअसल गीता का नाम लेकर कोई राजयोग का प्रचार करता है तो कोई सहज योग की धारणा व्यक्त करता है। इससे आम भक्तों में यह भाव आता है कि योग केवल सिद्ध लोग ही कर सकते हैं अथवा योग एक कठिन विषय है।

      लोगों ने गीता ज्ञान में सिद्ध हैं या उसकी साधना करत हैं उनको यह बात समझ में तो आ जाती है कि योग एक महत्वपूर्ण विधा है पर उनमें भी बहुत कम लोग बाह्य स्थितियों पर चिंतन या मनन कर यह जान पाते हैं कि योग तो हर आदमी चाहे अनचाहे कर रहा है।  योग का सीधा मतलब यह है कि अपनी इंद्रियों को परमात्मा से जोड़ा जाये।  यह योग ज्ञान होने पर ही किया जा सकता है।  अगर ज्ञान न हो तो आदमी दुर्योग को प्राप्त होता है। मनुष्य की इंद्रियां वह चाहे या न चाहे संसार के विषयों से जुड़ती हैं अंतर यह है कि जो ज्ञानी या साधक हैं वह स्वविवेक से सहजता पूर्वक योग करता है पर अज्ञानी आदमी जहां उसके मन जोड़ दे वहीं बैठ जाता है।  ज्ञानी या साधक परमात्मा का स्मरण करते हुए अपनी इंद्रियों को सांसरिक विषयों से स्वयं जुड़ते हुए सहज स्थिति में ही रहता है जबकि अज्ञानी कभी अपने मन तो कभी दूसरे की राय पर अपने सारे काम करने के कारण क्षणिक सुख प्राप्त करने के बाद दुःख की स्थिति में होता है।

महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि
………………………………..
क्षान्तं न क्षमया गृहोचितसुखं त्यक्तं न संतोषत।
सोढो दुस्सहशीतापपवनक्लेशो न तप्तं पदं।।
ध्यातं वित्तमहर्निश नियमितप्राणैर्न शंभौः पदं।

     हिन्दी में भावार्थ-हमने दान तो किया किन्तु धर्मपूर्वक नहीं, हमने सुख का त्याग किया पर संतुष्ट होकर

नहीं, कष्ट सहन किये पर तप के लिये नहीं, ध्यान तो किया पर अपने प्राण भगवान शंकर की बजाय धन में फंसाये। यही कारण है कि मुनियों की तरह काम करने पर भी फल उन जैसा नहीं मिला।

               हम अगर पतंजलि योग   विज्ञान के साथ ही श्रीमद्भागवत गीता भी  अध्ययन करें तो यह पायेंगे कि ज्ञानी और ज्ञान साधक सहज योग करते हैं पर जिन लोगों के पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है वह असहज योग को प्राप्त होते हैं।  इंद्रियों अच्छे विषय से भी जुड़ती है तो हमारा कभी उनको दुःखद स्थितियों की तरफ धकेल देता है।  ऐसे में अच्छे विषयों से जुड़ने पर भी अज्ञानी को वह सुख नहीं मिलता तो जो ज्ञानी को मिलता है।  दुःख के साथ  सुख तो जीवन में आते हैं पर ज्ञानी और अज्ञानी  अपने विवेक के अनुसार उसे अलग अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।   ज्ञानी सहजयोग करते है जबकि अज्ञानी असहज योग में फंसा रहता है।

लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

 

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर

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सामवेद से संदेश-अच्छा काम करने के लिये सत्य ही शस्त्र


            अंग्रेज विद्वान जार्ज बर्नाड शॉ के अनुसार बिना बेईमानी के कोई भी धनी नहीं हो सकता। हमारे देश में अंग्रेजी राज व्यवस्था, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा संस्कारों ने जड़ तक अपनी स्थापना कर ली है जिसमे छद्म रूप की प्रधानता है। इसलिये अब यहां भी कहा जाने लगा है कि सत्य, ईमानदारी, तथा कर्तव्यनिष्ठा से कोई काम नहीं बन सकता। दरअसल हमारे यहां समाज कल्याण अब राज्य की विषय वस्तु बन गया है इसलिये धनिक लोगों ने इससे मुंह मोड़ लिया है। लोकतंत्र में राजपुरुष के लिये यह अनिवार्य है कि वह लोगों में अपनी छवि बनाये रखें इसलिये वह समाज में अपने आपको एक सेवक के रूप में प्रस्तुत कर कल्याण के ने नारे लगाते हैं। वह राज्य से प्रजा को सुख दिलाने का सपना दिखाते हैं। योजनायें बनती हैं, पैसा व्यय होता है पर नतीजा फिर भी वही ढाक के तीन पात रहता है। इसके अलावा गरीब, बेसहारा, बुजुर्ग, तथा बीमारों के लिये भारी व्यय होता है जिसके लिये बजट में राशि जुटाने के लिये तमाम तरह के कर लगाये गये हैं। इन करों से बचने के लिये धनिक राज्य व्यवस्था में अपने ही लोग स्थापित कर अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ात जाते हैं । उनका पूरा समय धन संग्रह और उसकी रक्षा करना हो गया है इसलिये धर्म और दान उनके लिये महत्वहीन हो गया है।
सामवेद में कहा गया है कि

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ऋतावृधो ऋतस्पृशौ बहृन्तं क्रतुं ऋतेन आशाये।

                ‘‘सत्य प्रसारक तथा सत्य को स्पर्श करने वाला कोई भी महान कार्य सत्य से ही करते हैं। सत्य सुकर्म करने वाला शस्त्र है।’’
‘‘वार्च वर्थय।
             ‘‘सत्य वचनों का विस्तार करना चाहिए।’’
वाचस्पतिर्मरवस्यत विश्वस्येशान ओजसः।
           ‘‘विद्वान तेज हो तो पूज्य होता है।’’
              कहने का अभिप्राय है कि हमारे देश में सत्य की बजाय भ्रम और नारों के सहारे ही आर्थिक, राजकीय तथा सामाजिक व्यवस्था चल रही है। राज्य ही समाज का भला करेगा यह असत्य है। एक मनुष्य का भला दूसरे मनुष्य के प्रत्यक्ष प्रयास से ही होना संभव है पर लोकतांत्रिक प्रणाली में राज्य शब्द निराकार शब्द बन गया है। करते लोग हैं पर कहा जाता है कि राज्य कर रहा है। अच्छा करे तो लोग श्रेय लेेते हैं और बुरा हो तो राज्य के खाते में डाल देते हैं। इस एक तरह से छद्म रूप से ही हम अपने कल्याण की अपेक्षा करते हैं जो कि अप्रकट है। भारतीय अध्यात्म ज्ञान से समाज के परे होने के साथ ही विद्वानों का राजकीयकरण हो गया है। ऐसे में असत्य और कल्पित रचनाकारों को राजकीय सम्मान मिलता है और समाज की स्थिति यह है कि सत्य बोलने विद्वानों से पहले लोकप्रियता का प्रमाणपत्र मांगा जाता है। हम इस समय समाज की दुर्दशा देख रहे हैं वह असत्य मार्ग पर चलने के कारण ही है।
              सत्य एक ऐसा शस्त्र है जिससे सुकर्म किये जा सकते हैं। जिन लोगों को असत्य मार्ग सहज लगता है उन्हें यह समझाना मुश्किल है पर तत्व ज्ञानी जाते हैं कि क्षणिक सम्मान से कुछ नहीं होता इसलिये वह सत्य के प्रचार में लगे रहते है और कालांतर में इतिहास उनको अपने पृष्ठों में उनका नाम समेट लेता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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भारतीय अध्यात्मिक संदेश-छह दुर्गुण आदमी की आयु को क्षय करते हैं


           भारतीय दर्शन के अनुसर प्रकृति आधार पर  मनुष्य की आयु सौ वर्ष निर्धारित है।  ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि आखिर मनुष्य अपनी आयु पूरी क्यों नहीं कर पाता? इसका उत्तर यह है कि जिस बुद्धि की वजह से मनुष्य प्रकृत्ति के अन्य जीवों से अधिक विकसित माना जाता है वही उसकी शत्रु भी बन जाती है।  मनुष्य अपनी बुद्धि और मन को स्वच्छ रखने का कोई उपाय नहीं करता बल्कि संसार के उन लुभावने विषयों में पूरी तरह से लिप्त हो जाता है जो कालांतर में उसके अंदर मानसिक तथा दैहिक दोष उत्पन्न करते हैं।
     महाराज धृतराष्ट्र ने महात्मा विदुर से प्रश्न किया कि ‘‘जब परमात्मा ने मनुष्य की आयु कम से कम सौ वर्ष निर्धारित की है तो वह कम आयु में क्यों देह त्यागने को बाध्य होता है?’’
इसके उत्तर में महात्मा विदुर ने कहा कि


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अतिमानोऽतिवादश्च तथात्यागो नराधिप।


क्रोधश्चात्मविधित्सवा च मित्रद्रोहश्च तानि षट्।।


एत एवासयस्तीक्ष्णः कृन्तन्त्यायूँषि देहिनाम्।


एतानि मानवान् धनन्ति न मृत्युर्भद्रमस्तृ।।


हिन्दी में भावार्थ-अत्यंत अहंकार, अधिक बोलना, त्याग न करना, क्रोध करना, केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति की चिंता में रहना तथा मित्रों से द्रोह करना यह छह दुर्गुण मनुष्य की आयु का क्षरण करते हैं। दुर्गुण वाले मनुष्य का मृत्यु नहीं बल्कि अपने कर्मो के परिणाम ही मारते हैं।
      आदमी की सौ वर्ष से पहले मृत्यु हो जाने पर अनेक लोग यह सवाल करते हैं कि आखिर मनुष्य अपनी आयु क्यों होती है? दरअसल उसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य उपभोग में इतना व्यस्त रहता है कि उसे लगता ही नहीं कि यह संसार कभी वह छोड़ेगा, इसलिये वह शारीरिक और मानसिक विकार एकत्रित करता रहता है।  अगर हम देखें तो प्राचीन काल में लोग अधिक समय तक जीवित रहते थे।  आज भी ग्रामीण क्षेत्र में श्रम करने वाले अनेक लोग शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक आयु तक जीवित रहते हैं।  शहरी क्षेत्रों में जहां आधुनिक आदमी सुविधाभोगी दुषित वातावरण में सांस ले रहा समाज रोगों का प्राप्त होता है वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में मेहनतकश लोग स्वच्छ हवा में सांस लेकर उन राजरोगों से दूर रहते हैं।  शहरी क्षेतों में तो अब साठ  साल तक आदमी शारीरिक दृष्टि  से लाचारी की स्थिति में आ जाता है, जबकि अभी भी  गाँवों  में मेहनत  की वजह से लोग हष्ट पुष्ट दिखते  हैं। इसके अलावा शहरों में धन संपदा की वृद्धि ने लोगों के अंदर अहंकार, गद्दारी तथा अधिक बोलने की ऐसी बीमारियां भर दी हैं जो अंततः आयु का क्षरण करती हैं।
         महात्मा विदुर एक महान विद्वान थे।  सच्चा विद्वान वह है जो जीवन के रहस्यों को जानता हो। इसलिये हमें उनके वचनों का अध्ययन कर जीवन बिताने का प्रयास करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

 

सामवेद के आधार पर चिंत्तन-मनुष्य हर दिन युद्ध करता है


           श्रीमद्भागवत गीता के आलोचक उसे युद्ध से उपजा मानकर उसे तिरस्कार करते हैं पर शायद वह नहीं जानते कि आधुनिक सभ्यता में भी युद्ध एक व्यवसाय है जिसे कर्म की तरह किया जाता है। सारे देश अपने यहां व्यवसायिक सेना रखते हैं ताकि समय आने पर देश की रक्षा कर सकें।
         भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के समय श्री अर्जुन से कहा था कि अभी तू युद्ध छोड़ देगा पर बाद में तेरा स्वभाव इसके लिये फिर विवश करेगा। अर्जुन एक योद्धा थे और उनका नित्य कर्म ही युद्ध करना था। जब श्रीकृष्ण उसे युद्ध करने का उपदेश दे रहे थे तो एक तरह से वह कर्मप्रेरणा थी। मूलतः योद्धा को क्षत्रिय माना जाता है। इसे यूं भी कहें कि योद्धा होना ही क्षत्रिय होना है। इसलिये श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म प्रेरणा दी है यह अलग बात है कि युद्ध करना उसका स्वाभाविक कर्म था। श्रीमद्भागवत में कृष्ण यह भी कहते हैं कि अपने स्वाभाविक कर्म में लगा कोई भी व्यक्ति हो-कर्म के अनुसार क्षत्रिय, ब्राह्मण वैश्य और शुद्र का विभाजन माना जाता है-मेरी भक्ति कर सकता है। इस तरह श्रीमद्भागवत गीता को केवल युद्ध का प्रेरक मानना गलत है बल्कि उसके अध्ययन से तो अपने कर्म के प्रति रुचि पैदा होती है। इसी गीता में अकुशल और कुशल श्रम के अंतर को मानना भी अज्ञान कहा गया है। आजकल हम देखते हैं कि नौकरी के पीछे भाग रहे युवक अकुशल श्रम को हेय मानते हैं।
सामवेद में कहा गया है कि
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अभि विश्वानि काव्या
‘‘सारे सुकर्म कर।’
दिवे दिवे वाजं सस्निः।
‘‘प्रतिदिन तुम युद्ध करते हो।’’
मो षु ब्रह्मेव तन्द्रर्भवो।
‘‘आत्मज्ञानी बनकर कभी आलसी मत बनना।’’
             मनुष्य अपनी देह पालन के लिये कर्म करता है जो युद्ध का ही रूप है। हम आजकल सामान्य बातचीत में यह बात मानते भी हैं कि अब मनुष्य का जीवन पहले की बनस्पित अधिक संघर्षमय हो गया है। जबकि हमारे वेदों के अनुसार तो हमेशा ही मनुष्य का जीवन युद्धमय रहा है। जब हम भारतीय अध्यात्म में वर्णित युद्ध विषयक संदर्भों का उदाहरण लेते हैं तो यह भी देखना चाहिए कि उन युद्धों को तत्कालीन कर्मप्रेरणा के कारण किया गया था। इतना ही नहीं इन युद्धों को जीतने वाले महान नायकों ने अपने युद्ध कर्म का नैतिक आधार भी प्रस्तुत किया था। वह इनको जीतने पर राजकीय सुविधायें भोगने में व्यस्त नहीं हुए वरन् उसके बाद समाज हित के लिये काम करते रहे।
      संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’, Gwalior
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मनु स्मृति-जिस खेल में पैसा दाव पर लगे जुआ कहलाता है


            हमारे देश में क्रिकेट खेल को लेकर अनेक प्रकार की चर्चायें होती हैं। सच तो यह है कि इसे खेलने वाले बहुत कम हैं उससे ज्यादा अधिक तो इसे देखने वाले हैं। यह शुद्ध रूप से मनोरंजन का खेल है और इसके साथ ऐसे लोग भी जुड़ गये हैं जो इस पर सट्टा लगाते हैं।  आजकल खेलों में अनेक प्रकार की फिक्सिंग की चर्चा होती है। अभी हाल में पाकिस्तान के तीन क्रिकेट खिलाड़ियों को स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में सजा भी हुई थी। ऐसा नहीं भारत कोई इस समस्या से बचा हुआ है। भारत के भी दो खिलाड़ियों पर इस अपराध में आजीवन खेलने पर प्रतिबंध लगाया गया था। विश्व में भारत की आर्थिक शक्ति पर ही क्रिकेट खेल चल रहा है। जिन पाकिस्तानियों को ब्रिटेन में क्रिकेट खेल फिक्स करने के आरोप में सजा हुई हैए बताया जा रहा है कि भारत के सट्टेबाज भी उनसे संबंधित हैं। इधर हम देख रहे हैं कि भारत में भी अनेक सट्टेबाज पकड़े जा रहे हैं। कहने को क्रिकेट एक खेल है पर जैसे जैसे इससे जुड़े काले कारनामों का पर्दाफाश हो रहा है उससे तो जुंआ ही अधिक दिखने लगा है। अनेक परिवार इसके चक्कर में बरबाद हो गये हैं। हैरानी तो इस बात की है कि इस खेल में पैसा लगाने वाले वह लोग भी हैं जो इसको कभी खेले ही नहीं है। भले ही वह इसे मनोरंजन मानते हों पर अंततः यह जुआ है।
इस विषय पर मनु स्मृति में कहा गया है कि
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अप्राणिभिर्यत्क्रियते तल्लोके द्यूतमच्यते।
प्राणिभिः क्रियतेयस्तु सः विज्ञेयः समाह्वयः।।
             ‘‘जिस खेल में धन आदि निर्जीव वस्तुओं से हार या जीत का निर्णय हो वह खेल जुआ कहलाता है। पशु-पक्षी या अन्य सजीव प्राणियों को दांव पर रखकर खेले जाने वाले खेल का नाम समाह्व्य है।’’
एते राष्ट्रे वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्नत्सकराः।
विकर्म क्रियर्यानित्य बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः।।
          ‘‘जो लोग  जुआ या समाह्वय जैसे कर्म करवाते हैं वह राष्ट्र के लिये डाकू की तरह होते हैं और सदैव अपने कुकर्मों से प्रजा को कष्ट देते हैं।’’
         देश में एक बहुत बड़ा सट्टा समूह सक्रिय हैं। ऐसा कोई मैच नहीं होता जिसके होने पर कहीं न कहीं सट्टेबाज न पकड़े जाते हों। हैरानी इस बात की है कि यह केवल भारतीय टीम के खेलने पर ही नही होता बल्कि प्रसिद्धि विदेशी टीमों के मैच पर भी हमारे देश में सट्टा लगता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आज के अनेक युवा अधिक धन पर उसे पचा नहीं हो पाते और स्वयं जुआ खेलकर अपने खिलाड़ी होने का गर्व पालते हैं। उनको यह पता नहीं कि इन सट्टेबाजों का धन अंततः अपराध जगत के अन्य लोगों के पास पहुंचता है। सट्टेबाजी से जुड़े विदेश में बैठे अनेक भारतीयों के माध्यम से यह धन आतंकवादियों और अतिवादियों के पास पहुंचने के समाचार भी आते हैं। देश के युवाओं को यह बात समझना चाहिए कि वह सट्टा खेलकर ऐसे लोगों को साथ दे रहे हैं जो अंततः राष्ट्र के लिये डाकू की तरह होते हैं। वह ऐसे तत्वों को प्रोत्साहन देते हैं जो आमजनों को परेशान करते हैं।
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मनु स्मृति से संदेश-राज्य के पैसे में हेराफेरी करने वालों को कड़ी सजा देना जरूरी


           प्राचीन समय में भारतवर्ष में राजकोष से हेराफेरी करना एक तरह से राजद्रोह जैसा अपराध माना जाता था।  एक तरह से कहा जाये तो इस संसार में परमात्मा के बाद राजा को इसलिये ही दूसरा स्थान दिया गया था कि वह समाज में सभ्यता, शिक्षा तथा शांति का वातावरण बनाये रखेगा।  इसलिये ही उसे राजस्व वसूल का अधिकार दिया गया।  स्वाभाविक रूप से इसके लिये कर्मचारियों को नियुक्ति करनी होती है।  कर्मचारी भले ही राजा के लिये राजस्व संग्रह करते हैं पर अंततः उसे प्रजा की संपत्ति माना जाता है इसलिये उसमें हेराफेरी के अपराध के लिये कड़े दंड की व्यवस्था की गयी।  आधुनिक मानव सभ्यता में विभिन्न देशों में कथित मानवीय आधार पर अपराधियों को मुलायम सजायें देने की व्यवस्था का निर्माण हुआ है। अब तो यह स्थिति है कि अगर किसी को किसी की हत्या पर मृत्यु दंड दिया जाये तो मानव अधिकार संगठन विलाप करने लग जाते हैं। अनेक लोग तो पाश्चात्य कानून से सीख लेकर भारत में मौत की सजा समाप्त करने की मांग करने लगे हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार तो केवल हत्या करना ही जघन्य अपराध नहीं है वरन् स्त्री के साथ जबरदस्ती करना, राजकोष की चोरी करना तथा सार्वजनिक संपत्ति को हानि पहुंचाना भी जघन्य अपराध है जिनकी सजा मौत ही होना चाहिए। अक्सर कुछ लोग कहते हैं कि मृत्युदंड से अपराध होना बंद नहीं होता। यह सत्य है पर इससे अपराध दर अवश्य कम रहती है। जब तक देश में हत्या पर मौत की सजा का भय था तब ऐसा अपराध बहुत कम ही देखने को मिलता था। अब तो गाहे बगाहे हत्या होने की बात सामने आती है। दरअसल अब अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के मन में यह विश्वास घर कर गया है कि वह किसी को मारकर भी बच सकते हैं। सजा हो जाये तो भी जिंदगी बरकरार रह सकती है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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राज्ञः कोषोपहर्तृश्च प्रतिकूलेष च स्थितान्।
घातयेद्विविधैर्दण्डैररीणां चोयजापकान्।।
         ‘‘जो लोग राजकोष का हरण करने के साथ ही राजा की आज्ञा की अवहेलना करते हैं। शत्रु से मिल जाते हैं उनको मृत्युदंड देना ही श्रेयस्कर है।
अग्निदान्भक्तदांश्चैव तथा शस्ववकाशदान्।
सन्निधातृंश्चैव मोषस्य हन्याच्यौरमिवेश्वरः।।
     ‘‘अपराध पर नियंत्रण करने के लिये यह आवश्यक है जो लोग अपराधियों को अग्नि, भोजन, शस्त्र, वस्त्र व आश्रय देते हैं, उन्हें भी अपराधी मानकर मृत्युदंड देना चाहिए।
          आजकल पूरे विश्व में भ्रष्टाचार बढ़ने की बात कही जाती है। दरअसल राज्य के कोष का हरण करना या प्रंजा से उचित काम के पैसे वसूल करना एक सभ्य अपराध मान लेना ही इस भ्रष्टाचार का मूल कारण है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार तो राज्य के कोष से घात करने वाले को मौत की सजा देना चाहिए पर पाश्चात्य आधारों पर बने हमारे कानूनों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इतना ही अपराधों को प्रश्रय देने वाले सफेदपोश तो अपने घरों में सुरक्षित बैठे रहते हैं। इनमे तो कई इतने शक्तिशाली होते हैं कि कोई उनका किसी अपराधी से नाम जोड़ने का साहस तक नहीं कर पाता। यह सब देखते हुए तो लगता है बिना कड़े दंड प्रावधानों के अपराध पर नियंत्रण पाना संभव नहीं है भले ही कोई कितना भी दावा करे।
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भारतीय वेद शस्त्रों के आधार पर संदेश-वायु भी औषधि का काम करती है


        वर्षा के मौसम में अक्सर अनेक प्रकार की बीमारियां फैलती हैं। इसका कारण यह है कि इस मौसम मेंएक तो मनुष्य की पाचन क्रिया इस समय अत्यंत मंद पड़ जाती है जबकि जीभ स्वादिष्ट मौसम के लिये लालायित हो उठती है। दूसरा यह है कि जल में अनेक प्रकार के विषाणु अपना निवास बना लेते हैं। इस तरह स्वाभाविक रूप से इस समय बीमारी का प्रकोप यत्र तत्र और सर्वत्र प्रकट होता है। बरसात के मौसम में जहां चिकित्सकों के द्वार पर भीड़ लगती है वहीं योग साधक अधिक सतर्कता पूर्वक प्राणायाम करने लगते हैं ताकि वह बीमारियों से बचे रहें।
            जल और वायु न केवल जीवन प्रवाह में सहायक होती है बल्कि रोगनिदान में औषधि के रूप में इनसे सहायता मिलती है। वर्षा ऋतु में दोनों का प्रवाह बाधक होता है पर नियम, समय और प्राणयाम के माध्यम से अपनी देह को उन विकारों से बचाया जा सकता है जो इस मौसम में होती है।
वेद शास्त्रों में कहा गया है कि
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वात ते गृहेऽमृतस्य निधिर्हितः।
ततो नो देहि जीवसे।।
           ‘‘इस वायु के गृह में यह अमरत्व की धरोहर स्थापित है जो हमारे जीवन के लिये आवश्यक है।’’
अ त्वागमं शन्तातिभिरथे अरिष्टतातिभिः दक्षं ते भद्रमाभार्ष परा यक्ष्मं सुवामित ते।।
        ऋग्वेद की इस ऋचा अनुसार वायु देवता कहते हैं कि ‘‘हे रोगी मनुष्य! मैं वैद्य तेरे पास सुखदायक और अहिंसाकर रक्षण लेकर आया हूं। तेरे लिये कल्याणकारी बल को शुद्ध वायु के माध्यम से लाता हूँ  और तेरे रोग दूर करता हूं।’’
वातु आ वातु भेषजं शंभु मयोभु नो हृदे।
प्र ण आयूँरिर तारिषत्।।
             ‘‘याद रखें कि शुद्ध ताजी वायु अमूल्य औषधि है जो हमारे हृदय के लिये दवा के समान उपयोगी है, आनंददायक है। वह आनंद प्राप्त करने के साथ ही आयु को बढ़ाता है।
          हमने देखा होगा कि जब कोई मरीज नाजुक हालत में अस्पताल पहुंचता है तो सबसे पहले चिकित्सक उसकी नाक में आक्सीजन का प्रवाह प्रारंभ करते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि सबसे प्रथम दवा तो वायु ही होती है। इसके अलावा जो दवायें मिलती हैं उनके जल का मिश्रण होता है या फिर उनका जल से सेवन करने की राय दी जाती है। हम यहां वायु के महत्व को समझें। हमने देखा होगा जहां जहां घनी आबादी हो गयी है वहां अधिकतर लोग चिढ़चिढ़े, तनाव ग्रस्त और हताशा जनक स्थिति में दिखते हैं। अनेक लोग घनी आबादी में इसलिये रहना चाहते हैं कि उनको वहां सुरक्षा मिलेगी दूसरा यह कि अपने लोग वहीं है पर इससे जीवन का बाकी आनंद कम हो जाता है उसका आभास नहीं होता।
        श्रीमद्भागवत गीता में ‘गुणों के गुणों में ही बरतने’ और ‘इंद्रियों के इंद्रियों मे बरतने’ का जो वैज्ञानिक सिद्धांत दिया गया है उसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जहां प्राणवायु विषाक्त है या जहां उसकी कमी है वहां के लोगों के मानसिक रूप से स्वस्थ या सामान्य रहने की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। आमतौर से सामान्य बातचीत में इसका आभास नहीं होता पर विशेषज्ञ इस बात को जानते हैं कि शुद्ध और अधिक वायु के प्रवाह में रहने वाले तथा इसके विपरीत वातावरण में रहने वाले लोगों की मानसिकता में अंतर होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शक्तिशाली और कुलीन लोग किसी को बेवजह परेशान नहीं करते


             दैहिक रूप से मनुष्य सभी एक जैसे होते हैं। उनमें भी कोई गेहुए तो कोई काले या कोई गोरे रंग का होता है। इससे उसकी पहचान नहीं होती वरन् उसका आचरण, व्यवहार और विचार ही उसके आंतरिक रूप का प्रमाण होते है। सभी गोरे अच्छे हों यह जरूरी नहीं उसी तरह सभी काले बुरे हों यह समझना भी बेकार है। गेहुए रंग के लोग भी सामान्य स्वभाव के हों यह भी आवश्यक नहीं है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य की जाति, धर्म, क्षेत्र अथवा भाषा के आधार पर उसकी पहचान स्थाई नही होती। मनुष्यों में भी कुछ पशु हैं तो कुछ तामसी प्रवृत्ति के हैं। कुल, पद, धन और बाहुबल के दम पर अनेक लोग आमजन के साथ हिंसा कर अपनी शक्ति को प्रमाणित करते हैं। उन्हें इस बात से संतोष नहीं होता कि वह शक्तिशाली वर्ग के हैं वरन् कमजोर पर अनाचार कर वह संतोष प्राप्त करते हैं। ऐसे लोग नीच होते हैं।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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नहि स्वसुखमन्विच्छन् पीडयेत् कृपणं नृपः।
कृषणः पीडयमानोहि मन्युना हन्ति पार्थिवम्।।
        ‘‘राज्य प्रमुख अथवा राजा को चाहिए कि वह अपने सुख के लिये कभी प्रजाजन को पीड़ा न दे। पीड़ित हुआ आम जन राजा को भी नष्ट कर सकता है।’’
कोहि नाम कुले जातः सुखलेशेन लोभितः।’’
अल्पसाराणि भूतानि पीडयेदिविचारम्।।
        बलशाली और कुलीन पुरुष कभी भी अपने से अल्प बलवान पुरुष को बिना विचारे कभी पीड़ित नहीं करते। ऐसा करने वाला निश्चय ही अधम होता है।’’
          जिन लोगों के पास राजपद, धन और शक्ति है उनको यह समझना चाहिए कि परमात्मा ने उनको यह वैभव आमजन की सेवा के लिये दिया है। प्राचीन समय में अनेक राजा लोगों ने प्रजाजनों के हित के लिये इसी विचार को ध्यान में रखकर काम किया। जहां तक हो सकता था अनेक महान राजा प्रजाजनों के हित के लिये काम किया और प्रसिद्धि पाई इसलिये भगवान के बाद दूसरा दर्जा दिया गया। इतिहास में अनेक महान राजाओं के नाम दर्ज हैं। मगर अब जिस तरह पूरे विश्व में हालात हैं उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि आर्थिक, सामाजिक, राजनीति, तथा धार्मिक क्षेत्रों में तामस प्रवृत्तियों वाले लोग हावी हैं। यही कारण है कि प्रजाजनों का ख्याल कम रखा जाता है। सच बात तो यह है कि राजनीतिक कर्म ऐसा माना गया है जिसे करने के लिये उसके शास्त्र का अध्ययन करना अनिवार्य नहीं है। यही कारण है कि राजपद पाने का लक्ष्य रखकर अनेक लोग राजनीति में आते हैं पर प्रजाजनों के हित की बात सोचते नहीं है। उनको लगता है कि राजपद पाना ही राजनीति शास्त्र का लक्ष्य है तब क्यों उसका अध्ययन किया जाये।
           यही कारण है कि हम आज पूरे विश्व में जनअसंतोष के स्वर उठते देख रहे हैं। अनेक देशों हिंसा हो रही है। आतंकवाद बढ़ रहा है। अपराधियों और पूंजीपतियों का गठजोड राजपद पर बैठे लोगों पर हावी हो गया है। राजपद पर बैठे लोग भले ही प्रजाजनों के हित की सोचें पर कर नहीं सकते क्योंकि उनको राजनीति शास्त्र का ज्ञान नहीं होता जिससे कोई काम नहीं कर पाते। राजपदों पर बैठे लोग और उनके परिवार के सदस्य अपनी सुविधा के लिये प्रजाजनों को आहत करने के किसी भी हद तक चले जाते हैं। बात भले ही धर्म करें पर उनकी गति अधम की ही होती है। अतः वर्तमान युवा पीढ़ी के जो लोग राजनीति में सक्रिय होना चाहते हैं उनको कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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भगवान श्रीविष्णु कर्म के प्रेरणा स्तोत्र-सामवेद से संदेश


             भगवान विष्णु कर्म और फल के प्रतीक भगवान माने जाते हैं। यही कारण है कि भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी के अनेक अवतार समय समय पर हुए है। ब्रह्मा संसार के रचियता तो भगवार शिव संहारक और उद्धारकर्ता कहे गये हैं और भगवान नारायण को पालनहार माना गया है। ब्रह्मा और शिव का कोई अवतार नहीं होता जबकि भगवान नारायण अवतार लेकर अपनी सक्रियता से भक्तों की रक्षा करते है-यह आम धारण हमारे देश के धर्मभीरु लोगों की रही है।  ऐसे में वह संसार में सक्रियतापूर्ण जीवन जीने वालों के प्रेरक भी है।

यह आश्चर्य की बात है कि प्रकृति ने मनुष्य को देह, बुद्धि और मन की दृष्टि से अन्य जीवों की अपेक्षा सर्वाधिक शक्तिशाली जीव बनाया है तो सबसे अधिक आलसी भाव भी प्रदान किया। अधिकतर लोग लोग अपने तथा परिवार के स्वार्थ सिद्ध करने के बाद आराम करना चाहते है और परमार्थ उनको निरर्थक विषय लगता है जबकि पुरुषार्थ का भाव निष्काम कर्म से ही प्रमाणित होता है। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस देह से मनुष्य संसार का उपभोग करता है उसका ही महत्व नहीं समझता और भोगों में उसका नाश करता है। जिससे अंत समय में रोग उसके अंतिम सहयात्री बन जाते हैं और मृत्यु तक साथ रहते हैं।

      योग साधना, ध्यान, भजन और उद्यानों की सैर करने से जो देह के साथ मन को भी जो नवीनता मिलती है उसका ज्ञान अधिकतर मनुष्यों को नहीं रहता। सच बात तो यह है कि शरीर और मन को प्रत्यक्ष रूप से प्रसन्न करने वाले विषय मनुष्य को आकर्षित करते है और वह इसमें सक्रिय होकर जीवन भर प्रसन्न रहने का निरर्थक प्रयास करत है। वह अपनी इसी सक्रियता को पुरुषार्थ समझता है जबकि अप्रत्यक्ष लाभ देने वाले योगासन, ध्यान, भजन तथा प्रातः उद्यानों में विचरण करना उसे एक निरर्थक क्रिया लगती है। सीधी बात कहें तो इस अप्रत्यक्ष लाभ के लिये निष्काम भाव से इन कर्मो में लगना ही पुरुषार्थ कहा जा सकता है।
           हमारे पावन ग्रंथ सामवेद में कहा गया है कि
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           विष्णोः कर्माणि पश्चत यतो व्रतानि पस्पशे।
          ‘‘भगवान विष्णु के पुरुषार्थों को देखो और उनका स्मरण करते हुए अनुसरण करो।’
         ऋतस्य पथ्या अनु।
        ‘‘ज्ञानी सत्य मार्ग का अनुसरण करते हैं।’’
        ‘प्रेता जयता नर।’
        आगे बढ़ो और विजय प्राप्त करो।’’
      पुरुषार्थ करना मनुष्य का धर्म है और इसके लिये जरूरी है कि सत्य को मार्ग का अनुसरण किया जाये। आजकल जल्दी धनवान बनने के लिये असत्य मार्ग को भी अपनाने लगते हैं और उनको कामयाबी भी मिल जाती है पर जब उनको इसका दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग कभी भी ऐसे गलत कार्य में अपना मन नहीं लगाते जिसका कालांतर में दुष्परिणाम भोगना पड़े।
     कर्म और पुरुषार्थ के विषय में भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। वह संसार के पालनहार माने जाते हैं। ऐसा महान केवल पुरुषार्थ करने वालों को ही मिल सकता है। भगवान विष्णु के चौदह अवतार माने जाते हैं और हर अवतार में कहीं न कहीं उनका पुरुषार्थ प्रकट होता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior

Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
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पाप की कमाई होली पर चुराई गयी लकड़ी की तरह शीघ्र नष्ट होती है-हिन्दू धार्मिक विचार (paap ki kamai holi ki lakdi ki tarah-hindu dharmik vichar)


अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि‘आजकल समय खराब हो गया है और नयी पीढ़ी व्यसनों का शिकार हो रही है।’
हम समाज के नैतिक और अध्यात्मिक पतन के लिये बढ़ते हुए भौतिकतावद को दोष देते हैं। यह सही है पर इसके लिये मनुष्य के की शारीरिक सुख सुविधा तथा मनोरंजन के लिये बनी वस्तुओं का उपभोग नहीं बल्कि उनको खरीदने की लिये धन का वह स्वरूप है जो अधर्म पर आधारित होता है। सच तो यह है कि जब पहले देश में जब कृषि आधारित व्यवस्था में श्रम की प्रधानता थी तब लोग ईमानदारी और परिश्रम के मार्ग से अपना भौतिक विकास करते थे। यह मार्ग लंबा होता था पर लोग सहजता से जीवन व्यतीत करते थे। विश्व में आर्थिक उदारीकरण की लहर के बाद देश की सामान्य कार्यप्रणाली में परिवर्तन आया है। अब जिसे देखो नौकरी के पीछे भाग रहा है। जिनके पास शिक्षा की उपाधि है उनमें कोई भी व्यवसाय या कृषि को अपना लक्ष्य नहीं बनाता। जल्दी जल्दी धन कमाने के लिये अनेक व्यक्ति अधर्म तथा अपराध का काम करने लगते हैं। ऐसे में उनकी उपभोग की प्रवृत्ति भी वैसी होती जा रही है। शराब, जुआ तथा सट्टा जैसे व्यसनों का प्रकोप बड़ रहा है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागै बार।
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार।।
‘‘पाप के धन को नष्ट होने में अधिक समय नहीं लगता। ठीक उसी तरह जैसे होली के अवसर पर कुछ लोग लकड़ी चुराकर लाते हैं और वह जलकर जल्दी नष्ट हो जाती है।’’
पाप का धन होली के लिये चुराई गयी लकड़ी की तरह ही नष्ट होता है। जिन लोगों के पास अधर्म की कमाई है उनका पैसा भी वैसे ही खर्च होता है। किसी को स्वयं ही शराब, जुआ, तथा सट्टे की आदत लग जाती है या फिर उनके परिवार के सदस्य इसका शिकार होते हैं। यह भी नहीं हुआ तो बीमारी अपना रौद्र रूप प्रकट कर पैसा बाहर निकलवाती है। इसलिये जहां तक संभव हो धर्म की कमाई करें क्योंकि शरीर के अच्छ स्वास्थ्य और मन की प्रसन्नता का यही एक उपाय है।

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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior

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संत कबीर के दोहे-जहां विवाद होते हों, वहां न जायें


कबीर न तहां न जाइये, जहां जु नाना भाव।
लागे ही फल ढहि पड़े, वाजै कोई कुबाव।।
संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि वह कभी न जायें जहां नाना प्रकार के भाव हों। ऐसे लोगों से संपर्क न कर रखें जिनका कोई एक मत नहीं है। उनके संपर्क से के दुष्प्रभाव से हवा के एक झौंके से ही मन का प्रेम रूपी फल गिर जाता है।
कबीर तहां न जाइये, जहां कपट का हेत।
जानो कली अनार की, तन राता मन सेत।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि वहां कभी न जायें जहां कपट का प्रेम मिलता हो। ऐसे कपटी प्रेम को अनार की कली की तरह समझें जो उपरी भाग से लाल परंतु अंदर से सफेद होती है। कपटी लोगों का प्रेम भी ऐसा ही होता है वह बाहर तो लालित्य उड़ेलते हैं पर उनके भीतर शुद्ध रूप से कपट भरा होता है।
वर्तमान संदर्भ  में संपादकीय व्याख्या-जीवन में प्रसन्न रहने का यह भी एक तरीका है कि उस स्थान पर न जायें जहां आपको प्रसन्नता नहीं मिल जाती। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बाहर से तो बहुत प्रेम से पेश आते हैं जैसे कि उनका दिल साफ है पर व्यवहार में धीरे धीरे उनके स्वार्थ या कटु भाव दिखने लगता है तब मन में एक तरह से व्यग्रता का भाव पैदा होता है।  अनेक लोग अपने घर इसलिये बुलाते हैं ताकि दूसरे को अपमानित कर स्वयं को सम्मानित बनाया जा सके।  वह बुलाते तो बड़े प्यार से हैं पर फिर अपमान करने का मौका नहीं छोड़ते।  ऐसे लोगों के घर जाना व्यर्थ है जो मन को तकलीफ देते हैं वह चाहे कितने भी आत्मीय क्यों न हों? मुख्य बात यह है कि हमें अपने जीवन के दुःख या सुख की तलाश स्वयं करनी है अतः ऐसे ही स्थान पर जायें जहां सुख मिले। जहां जाने पर हृदय में क्लेश पैदा हो वहां नहीं जाना चाहिये।  उसी तरह ऐसे लोगों का साथ ही नहीं करना चाहिये जो एकमत के न हों। ऐसे भ्रमित लोग न स्वयं ही परेशान होते हैं बल्कि साथ वाले को भी तकलीफ देते हैं। अनेक जगह लोग निरर्थक विवाद करते हैं। ऐसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं जिनका हल उनके स्वयं के हाथ में ही नहीं होता। इतना ही नहीं सार्वजनिक विषयों पर बहस करने वाले अनेक लोग आपस में ही लड़ पड़ते हैं और शांतप्रिय आदमी के लिये यही अच्छा है कि वह उनसे दूर रहे। जहां लोग हर बात पर वाद विवाद करते हैं वहां का वातावरण कलुषित हो जाता है और अगर उनके बीच जाकर बैठेंगे तो हमारा मन भी त्रस्त हो जायेगा।

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रहीम दर्शन-भक्ति न करने पर विषय घेर लेते हैं


कविवर रहीम कहते है कि
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रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय

भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय लोग भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।
वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।

आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिय लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। भगवान श्रीराम के नाम की जगह डाक्टर को दहाड़ें मारकर पुकार रहे होते है।

अगर लोग शुद्ध हृदय से राम का नाम लें तो उनके कई दर्दें का इलाज हो जाये पर माया ऐसा नहीं करने देती वह तो उन्हें डाक्टर की सेवा कराने ले जाती है जो कि उसके भी वैसे ही भक्त होते हैं जैसे मरीज। फिर विषय आदमी के मन में ऐसे विचरते हैं कि वह पूरा जीवन यह भ्रम पाल लेता है कि यही सत्य है। वह उससे मुक्ति तो तब पायेगा जब वह अपनी सोच के कुंऐं से मुक्त हो। जब तक राम का नाम स्मरण न करे तब तक वह इससे मुक्त भी नहीं हो सकता।
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