इंटरनेट पर हिन्दी लिखने वालों को साहित्यकार ही माने-हिन्दी लेख


                 प्रतिदिन कोई न कोई सम्मानीय अपना सम्मान पुराने सामान की तरह बाहर फैंक रहा है। इससे तो यही लगता है जितने साहित्यक सम्मान देश में बांटे गये हैं उससे तो अगले दस वर्ष तक टीवी चैनलों पर रोज सम्मान वापसी की प्रमुख खबर रहने वाली है।  खासतौर से विशिष्ट रविवार की सामग्री केवल सम्मान वापसी रहने वाली है।  हमारी सलाह है कि अब ज्ञानपीठ तथा अन्य सम्मान सभी भाषाओं के ब्लॉग लेखकों को ही दिया जाना चाहिये जो कभी भी यह वापस नहीं करेंगे और करेंगे तो खबर भी नहीं बनेगी।  अंतर्जाल पर भारत की क्षेत्रीय भाषाओं के ब्लॉग लेखक सक्रिय है।  वह कैसा लिखते हैं यह तो पता नहीं पर यही स्थिति पुराने सम्मानीय लेखकों की भी है। इनमें से अनेक तो ऐसे हैं जिन्हें अपनी भाषा के लोग भी तब जान पाये जब उन्हें सम्मानित किया गया।

                                   हमारी यह सलाह है कि जिस तरह यह लोग अब फनी-इसका मतलब न पूछिये हमें पता नहीं-हो रहे हैं तो उसका मुकाबला भी उनके फन से होना चाहिये।  ब्लॉग भी अब एक किताब की तरह हैं। एक बार सम्मान प्रदान करने वाली संस्था के प्रबंधक भी फनी होकर ब्लॉग लेखकों को ज्ञानीपीठ से सम्मानित कर दें। यही प्रतिक्रियात्मक प्रयास इन पुराने सम्माानीयों के जख्म पर नमक छिड़कने की तरह होगा। एक अध्यात्मिक ज्ञान साधक की दृष्टि से हमारा मानना है कि राजसी कर्म में जस से तस जैसा व्यवहार करना ही चाहिये।  कम से कम हिन्दी में अनेक ऐसे ब्लॉग लेखक हैं जिन्हें हम बहुत काबिल मानते हैं। उन्हें ज्ञानपीठ सम्मान इसलिये भी मिलना चाहिये क्योंकि अंतर्जाल पर हिन्दी उन्हीं की वजह से जमी है। सबसे बड़ी बात यह पुराने सम्मानीय उन्हें दोयम दर्जे का मानते हैं और जब उन्हें ज्ञानपीठ तथा अन्य सम्मान मिलने लगे तो सारी हेकड़ी निकल जायेगी।

                                   हमारा ज्ञानपीठ के लिये कोई दावा नहीं है, यह बात साफ कर देते हैं क्योंकि हमें नहीं लगता कि फन इतना भी स्तरहीन नहीं होना चाहिये कि भन-इसका मतलब भी नहीं पूछिये- लगने लगे। अगर बात जमे तो  गहन चिंत्तन करें नहीं तो व्यंग्य समझकर आगे बढ़ जायें।

—————–

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अपना सम्मान बढ़ाने के लिये पाखंड करना अनुचित


         आधुनिक समाज में प्रचार तंत्र का बोलबाला है। फिल्म हो या टीवी इनमें अपना चेहरा देखने और दिखाने के लिये लोगों के मन में भारी इच्छा रहती है।  यही कारण है कि लोग अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये तमाम तरह के पाखंड करते हैं।  हमारे देश में लोग धर्मभीरु हैं इसलिये अनेक पाखंडी धार्मिक पहचान वाले वस्त्र पहनकर उनके मन पर प्रभाव डालते हैं। अनेक गुरु बन गये हैं तो उनके शिष्य भी यही काम कर रहे हैं।  कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इसे बिडाल वृत्ति कहा गया है। मूल रूप से धर्म अत्यंत निजी विषय हैं।  दूसरी बात यह है कि सांसरिक विषयों में लिप्त लोगों से यह अपेक्षा तो करना ही नहीं चाहिये कि वह धर्माचरण का उदाहरण प्रस्तुत करें।  सार्वजनिक स्थानों पर धर्म की चर्चा करना एक तरह से उसका बाजारीकरण करना है।  इससे कथित धर्म प्रचारकों को धन तथा प्रतिष्ठा मिलती है।  सच्चा धार्मिक आदमी तो त्यागी होता है। उसकी लिप्पता न धन में होती है न प्रतिष्ठा पाने में उसका मोह होता है।  उसकी प्रमाणिकता उसके मौन में होती है न कि जगह जगह जाकर यह बताने कि वह धर्म का पालन कर रहा है तो दूसरे भी करें।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है
———————
अधोदृष्टिनैष्कृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः।
शठो मिथ्याविलीतश्च बक्रवतवरो द्विजः।।

         हिन्दी में भावार्थ-उस द्विज को बक वृत्ति का माना गया है जो असत्य भाव तथा अविनीत हो तथा जिसकी नजर हमेशा दूसरों को धन संपत्ति पर लगी रहती हो जो हमेशा बुरे कर्म करता है सदैव अपना ही कल्याण की  सोचता हो और हमेशा अपने स्वार्थ के लिये तत्पर रहता है।

धर्मध्वजी सदा लुब्धश्छाद्मिका  को लोकदम्भका।
बैडालवृत्तिको ज्ञेयो हिंस्त्र सर्वाभिसन्धकः।।

      हिन्दी में भावार्थ-अपनी प्रतिष्ठा के लिये धर्म का पाखंड, दूसरों के धन कर हरण करने की इच्छा हिंसा तथा सदैव दूसरों को भड़काने के काम करने वाला ‘बिडाल वृत्ति’ का कहा जाता है।

 

         जैसे जैसे विश्व में धन का प्रभाव बढ़ रहा है धर्म के ध्वजवाहकों की सेना भी बढ़ती जा रही है।  इनमें कितने त्यागी और ज्ञानी हैं इसका आंकलन करना जरूरी है।  अध्यात्मिक और धर्म ज्ञानी कभी अपने मुख से ब्रह्म ज्ञान का बखान नहंी करते। उनका आचरण ही ऐसा होता है कि वह समाज के लिये एक उदाहरण बन जाता है।  उनका व्यक्तित्व और कृतित्व ही धर्म की पोथी का निर्माण करता है।  अगर उनसे आग्रह किया जाये तो वह संक्षिप्त शब्दों में ही अध्यात्मिक ज्ञान बता देते हैं।  जबकि आजकल पेशेवर ज्ञान  प्रवचक घंटों भाषण करने के बादी श्रोताओं को न तो धर्म का अर्थ समझा पाते हैं न उनके शिष्य कभी उनके मार्ग का अनुसरण करते हैं। यही कारण है कि इतने सारे धर्मोदेशक होते हुए भी हमारा समाज भटकाव की राह पर है।

 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

 

 

ऋग्वेद के आधार पर एकल प्रायोगिक आध्यात्मिक चर्चा


ऋग्वेद के आधार पर एकल प्रायोगिक आध्यात्मिक चर्चा

अध्यात्मिक चर्चा का यह एक अव्यवसायिक प्रयास है|: http://youtu.be/ZINjpehxBhw

संत कबीर के दोहे-पराई नारी से मजाक न करो


                                 मनुष्य अपने सुख के पल तो एकदम सहजता से गुजार लेता है पर जब दुःख आता है तो भगवान को याद करता है।  सच बात तो यह है कि मनुष्य अपने संकटों को स्वयं ही आमंत्रित करता है।  कई बार तो ऐसे वाद विवादों को जन्म देता है जिसके मूल में सिवाय अहंकार के कुछ अन्य नहीं होता।  हंसी मजाक में झगड़े होते हैं।  कुछ पुरुषों की आदत होती है वह अपने साथ वार्तालाप करने वाली स्त्रियों के साथ हंसी मजाक कर अपना दिल बहलाते हैं।  वह समझते हैं कि अपने आपको बुद्धिमान साबित कर अपने लिये प्रतिष्ठा अर्जित कर रहे हैं पर होता उसका उल्टा है।  उनको लोग हल्का या अगंभीर मानते हैं। कभी कभी इस बात पर झगड़े तक हो जाते हैं।

इस विषय पर संत कबीर कहते हैं कि
————————
दीपक झोला पवन का, नर का झोला नारि।
साधू झोला शब्द का, बोलै नाहिं बिचारि।।

                   वायु का झौंका दीपक के लिये भय देने वाला होता है तो नारी का संकट पुरुष के लिये परेशानी का कारण होता है।  उसी तरह यदि ठीक से विचार कर शब्द व्यक्त न किया जाये तो वह साधुओं के लिये संकट का कारण बनता है।

पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचै कोय।
कबहूं छेड़ि न देखिये, हंस हंसि खावे रोय।

                     दूसरे आदमी की नारी से कभी कोई हंसी या मजाक न करो क्योंकि वह उस छुरी के समान है जो आदमी को हंसकर या रोकर अंततः काट देती है।

                    अनेक पुरुष दूसरे की स्त्रियों से वार्तालाप कर अपने मनोरंजन की प्राप्ति करते हैं। यह मनोरंजन अंततः उनको महंगा पड़ता है।  देखा तो यह जा रहा है कि आधुनिक समाज में केवल इसी बात पर अनेक झगड़े हो जाते हैं कि किसी ने परस्त्री के साथ मजाक किया। अनेक लोग इस चक्कर में बदनाम हो जाते हैं कि वह परस्त्रियों से अपने संबंध बनाते हैं। ऐसा नहीं है कि समाज में पहले ऐसा नहीं होता था।  अगर यह बात होती तो हमारे संत महापुरुष इस बुराई की तरफ प्राचीनकाल से सचेत नहीं करते पर वर्तमान आधुनिक समय में परस्त्रियों से से अश्लील अथवा द्विअर्थी संवाद के साथ वार्तालाप करना एक फैशन हो गया है जो कि देश की सांस्कृतिक परंपराओं के भी विरुद्ध है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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आस्था और विश्वास-हिन्दी शायरी


आस्था का रूप
कभी बाहर दिखाया नहीं जाता,
विश्वास का दावा
कभी कागज पर लिखाया नहीं जाता।
कहें दीपक बापू
नीयत से हैं जो फरिश्ते
वह कभी
अपने काम का ढिंढोरा नहीं पीटते,
बदनीयत करते इंसान होने का दावा
मगर जज़्बातों को मतलब के लिये पीसते,
जहान को बर्बाद कर
अपने लिये एय्याशी खरीदने वालों को
जिंदगी का कायदा कभी सिखाया नहीं जाता।
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चमत्कार को नमस्कार-हिन्दी हास्य कविताएँ (chamatkar ko namaskar-hindi hasya kavitaen


पहुंचे लोगों के चमत्कारों से
मुर्दों में जान फूंकने के किस्से
बहुत सुने हैं
पर देखा एक भी नहीं हैं,
जमाने में फरिश्ते की तरह पुज रहे
कई शातिर लोग बरसों से
मगर कोई मुर्दा उनके सच का
सबूत देने आते देखा नहीं है।
अक्ल इंसानों में ज्यादा है
फिर भी फँसता है वहमों के जाल में
जहां देखता है फायदे का दाव
सोचना बंद कर
झूठे ख्वाब सजाता वहीं है।
————–
एक सिद्ध के दरवाजे कुत्ता खड़ा था
शागिर्द ने उसे पत्थर मारकर भगा दिया।
तब सिद्ध ने उससे कहा
“तुमने अच्छा किया
कुत्ते को हटाकर
क्योंकि कोई भी जानवर
चमत्कारों पर यकीन नहीं करता,
इसलिए फिर ज़िंदा नहीं होता
अगर एक बार मरता,
उनमें अक्ल नहीं होती
जिससे हम उसे बहका सकें,
उसकी आँखों के सामने
पर्दे के पीछे सच को ढँक सकें,
सर्वशक्तिमान भी सोचता होगा
मैंने जानवरों को इंसानों से कमतर क्यों किया,
अक्ल देते समय उनका हिस्सा इंसान को दिया।
——————
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ज़िंदगी के मोड़-हिन्दी शायरी


कभी रोकर
कभी चीखकर
हमने क्या पाया,
जिंदगी के सफर में
हर मोड़ पर मुस्कराये तो
तकलीफों में अपने को
हंसता पाया।
——
हालतों का क्या
कभी अच्छी कभी बुरी होती हैं,
रोज ज़माना देखता है
हमारे चेहरे की तस्वीर
जो कभी हंसती कभी रोती है।
क्यों करे जंग हंसाई
अपने दिल के हाल बाहर दिखाकर
जिनकी उम्र कभी बड़ी नहीं होती है।
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अमन और खूनखराबा-हिन्दी शायरी (amana aur khoonkharaba-hindi shayari)


वह बम फटाखे की तरह
और बंदूक फुलझड़ी जैसे जलाएँ,
हम श्रद्धांजलि के लिए मोमबती जलाकर
सहानुभूति के रोते हुए गीत गायें।
इस जहाँ में खून खराबे के
सौदागरों के बाज़ार भी सजाते हैं,
उनके कारिंदे भी अमन के चमन में
फूलों की तरह सजते हैं,
हालात ऐसे हैं कि
हम इधर रह नहीं सकते
लाचारी हैं कि उधर जाएँ।
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जिम्मेदारी में कमीशन-हिन्दी कविता (jimmedar aur commision-hindi kavita)


जिम्मेदारी वह सारे समाज की यू ही नहीं उठाते,
मिलता कमीशन, खरीदकर घर का सामान जुटाते।
बह रही  दौलत की नदियां, उनके घर की ओर,
दरियादिल दिखने के लिये, वह कुछ बूंदें भी लुटाते।
न कहीं शिकायत होती, न करता कोई फरियाद
भाग्य का तोहफा समझ सभी अपने हिस्से उठाते।
लग चुकी है ज़ंग लोगों के सोचने के औजारों में
तयशुदा लड़ाई है, खड़े यूं ही हाथ में तलवार घुमाते।

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गृहलक्ष्मी से बड़ा सामान-हिन्दी हास्य कविता (grihalakshmi ka bada saman-hindi hasya kavita


रिश्ते की बात करते हुए
वर पक्ष ने जमकर डींग मारीं
‘हमारे पास अपना आलीशान मकान है,
अपनी बहुत बड़ी दुकान है,
घर में रंगीन टीवी, फ्रिज,ऎसी और
कपडे धोने की मशीन है
रसोई में बनते तमाम पकवान हैं’.
फिर रिश्ता तय होते ही अपनी
मांगों की सूची कन्या पक्ष को थमा दीं
जिसमें तमाम तरह का मांगा था सामान
जैसे उनका बेटा बिकाऊ इन्सान है

कन्या के पिता ने रिश्ते से
इंकार  करते हुए कहा
‘आपके घर में बहु की कमी थी
वही पूरी करने के लिए मैं अपनी
बेटी का हाथ देने को तैयार था
पर मुझे लगता है कि
उसकी आपको कोई जरूरत नहीं
क्योंकि आपकी प्राथमिकता
गृह लक्ष्मी को घर में जगह देने की बजाय
उसके साथ आने वाला सामान है’,
सामानों के होने की ख़ुशी आपको बहुत है
पर किसी की बेटी का आपका घर रोशन हो
ऐसा लगता नहीं आपके दिल को कोई अरमान है.  
————————

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हिन्दी शायरी-ताज और दौलत (hindi shayari-taj aur daulat)


जिनको पहनाया ताज़
वही दौलत के गुलाम हो गये,
जिन ठिकानों पर यकीन रखा
वही बेवफाई की दुकान हो गये।
किसे ठहरायें अपनी बेहाली का जिम्मेदार
दूसरों की कारिस्तानियों से मिली जिंदगी में ऐसी हार
कि अपनी ही सोच पर
ढेर सारे शक और
मुंह से निकलते नहीं लफ्ज़
जैसे कि हम बेजुबान हो गये।
———-
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मोम की आस्था-हिन्दी कविता (mom kee astha-hindi poem)


आस्था को कौन गिरा सकता है
विश्वास को कौन तोड़ सकता है,
हृदय में उपस्थित देवताओं को
कौन अपमानित कर सकता है,
जिन इंसानों ने तय कर लिया  है कि
किसी भी तरह ज़माने की हवा बिगाड़ेंगे
आसमान के ख्वाबी फरिश्तों को
ज़मीन पर लाकर रंग निखारेंगे
अपने मतलब के लिये जज़्बातों को
जलता दिखाकर
झौंक देंगे पूरे शहर को  आग में
रहबरों का ही आसरा है उनको
इसलिये बड़ा हुआ है हौंसला
कोई उनका क्या बिगाड़ सकता है।

उनकी आस्थाएँ मोम की  बनी हैं
जिनके पिघलने पर इसलिए ही 
तूफ़ान मचता है
———
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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अयोध्या में राम मंदिर कब बन पायेगा-हिन्दी हास्य कविता (ayodhya mein ram mandir kab ban paeyga-hindi hasya kavita)


एक राम भक्त ने दूसरे से कहा
‘वैसे तो राम सभी जगह हैं,
हमारे अध्यात्मिक ज्ञान की बड़ी वजह हैं,
घर घर में बसे हैं,
घट घट में इष्ट की तरह श्रीराम सजे हैं श्रीराम
पर फिर भी जिज्ञासावश
अयोध्या के राम मंदिर का ख्याल आता है,
चलो किसी समाज सेवक से चलकर
पूछ लेते हैं कि
वह कब तक बन पाता है।’

सुनकर दूसरे राम भक्त ने कहा
‘भला तुमको भी समाजसेवकों की तरह
अपनी आस्था की परीक्षा क्या ख्याल क्यों आता है,
अरे, अयोध्या के मंदिर का मामला
बड़े लोगों का है
यह पता नहीं उनका वास्तव में
राम भक्ति से कितना नाता है,
अलबत्ता चाहो तो किसी सट्टेबाज या
बाज़ार के सौदागरों से पूछ लेते हैं,
चाहे जो भी जनचर्चा को विषय हो
उसमें अपने भगवान पैसे को पूज लेते हैं,
प्रचारक अब क्रिकेट जैसे खेल में भी
भगवान का स्वरूप गढ़ने लगे हैं
शिकायत भी वही करते हैं कि
अंधविश्वासी लोग बढ़ने लगे हैं,
चुनाव हो या क्रिकेट
जीत हार फिक्स कर लेते हैं,
सौदा और सट्टा मिक्स कर लेते हैं,
समाज सेवा में भी उनके दलाल पलने लगे हैं,
धर्म कर्म भी उनके इशारे पर चलने लगे हैं,
सट्टेबाज़ जिज्ञासाओं और आशाओं की आड़ में कमाते हैं
इसलिये इंसानों को उसमें फंसाते हैं
हम तो बरसों से सुनते हुए राम मंदिर प्रसंग भुला बैठे,
पर बड़े लोग इसे चाहे जब झुला बैठे,
इसलिये सौदागरों से यह पूछना होगा कि
कब राम मंदिर पर उनका दिल आयेगा,
सट्टेबाजों से पूछना होगा
उनका आंकड़ा कब हिल पायेगा,
अपुन ठहरे आम भक्त,
अंदर से पुख्ता, बाहर अशक्त,
अपने राम तो मन में बसे रहेंगे,
एक जगह न ठहर सभी जगह
कल्याण करते बहेंगे,
कण कण में देखते रूप उनका
काम नहीं करती अक्ल इस पर कि
अयोध्या में राम मंदिर कब बन पायेगा।’’
———-

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ज़रूरत -हिन्दी कविता (zaroorat-hindi poem)


किसी की पीड़ा को देखकर कब तक
दिखावटी आंसु बहाओगे,
उसे जरूरत इलाज की है,

किसी की बेबसी पर कब तक
अपनी हमदर्दी दिखाओगे
उसे ज़रूरत  सहारे की है,

कब तक तकलीफों से बचने के लिये
किसी को हंसाओगे
उसे जरूरत दिल से मुस्कराने की है,

खाली लफ्जों से इंसान का पेट नहीं भरता
मगर जिन का भरा है
वह भी बैचेनी में जीते हैं
जरूरत तसल्ली की रोटी
और रोटी से तसल्ली की है।
————

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खुल गयी प्यार की पोल-हिन्दी हास्य कविता(khul gayi pyar ki pol-hindi haysa kavita)


आशिक ने कहा माशुका से
‘‘मुझसे पहले भी बहुत से आशिकों ने
अपनी माशुकाओं के चेहरे की तुलना
चांद से की होगी,
मगर वह सब झूठे थे
सच मैं बोल रहा हूं
तुम्हारा चेहरा वाकई चांद की तरह है खूबसूरत और गोल।’’

सुनकर माशुका बोली
‘‘आ गये अपनी औकात पर
जो मेरी झूठी प्रशंसा कर डाली,
यकीनन तुम्हारी नीयत भी है काली,
चांद को न आंखें हैं न नाक
न उसके सिर पर हैं बाल
सूरज से लेकर उधार की रौशनी चमकता है
बिछाता है अपनी सुंदरता का बस यूं ही जाल,
पुराने ज़माने के आशिक तो
उसकी असलियत से थे अनजान,
इसलिये देते थे अपनी लंबी तान,
मगर तुम तो नये ज़माने के आशिक हो
अक्षरज्ञान के भी मालिक हो,
फिर क्यूं बजाया यह झूठी प्रशंसा का ढोल,
अब अपना मुंह न दिखाना
खुल गयी तुम्हारी पोल।’’
———–

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रहस्य-हिन्दी शायरी


दौलत, शौहरत और ताकत का नशा
भले चंगे को रास्ते से भटका देता है,
शिखर पर पहुंचे हैं जो दरियादिल
उनसे जज़्बाती हमदर्दी का उम्मीद करना
बेकार है,
क्योंकि हो जाते हैं उनके सपने पूरे
पर दर्द के अहसास मर जाते हैं।

हाथ फैलायें खड़े हैं नीचे
उनसे दया की आशा करने वाले
कल यदि वह भी
छू लें आकाश तो
वैसे ही हो जायेंगे,
इस दुनियां में चलती रहेगी यह अनवरत जंग
मगरमच्छ के आहार के लिये
मछलियों को पालता है समंदर,
शिकार और शिकारी
शोषक और शोषित
और स्त्री पुरुष दोनों का होना जरूरी है शायद
सर्वशक्तिमान का रहस्य हम कहां समझ पाते हैं।
————–

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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दूसरे की सोच पर चलकर-हिन्दी शायरी


हम खुली आंखों से सपने देखते रहें,
हम अमन से जियें, जंग के दर्द दूसरे सहें,
कोई करे वादा तो
शिखर पर बिठा देते हैं वोट देकर।

हम खूब कमाकर परिवार संभालें,
दूसरे अपना घर उजाड़ कर, ज़माने को पालें,
कोई दे पक्की गांरटी तो
पीछा छुड़ाते हैं नोट देकर,

शायद नहीं जानते हम कि
शरीर की विलासिता से
खतरनाक है दिमाग का आलसी होना,
बुरा नहीं है किसी के पैसे का कर्ज ढोना,
बनिस्पत
दूसरे की सोच पर चलकर
पहाड़ से खाई में गिरने पर चोट लेकर।
———–

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विकासवादी और पुरातनवादी-हिन्दी कविता


स्त्री का भला करेंगे,
बच्चों को खुश करने के दावें भरेंगे,
वृद्धों का उद्धार करेंगे,
मजदूरों को न्याय देंगे,
गरीब को करेंगे अमीर,
और लाचार का सहारा बनेंगे,
ऐसे दावे धोखा है,
बेईमानी का खोखा है।
समाज को एक जैसा बनाने की कोशिश
करने वाले विकासवादी अक्लमंद
सभी को बना रहे मूर्ख
इसलिये समाज को
जांत पांत और धर्म के टुकड़ों में बांटकर
अपनी बादशाहत को ज़माने पर ठोका है।
करे जो समदर्शिता की बात
उसे पुरातनवादी बताकर रोका है।
————

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ज़माने में जंग की आग लगाकर-हिन्दी शायरी


बंदूक के सहारे ज़माने में बदलाव
लाने की कोशिश हथियारों के
सौदागरों के दलाल की
चाल लगती है,
खून बहाकर तरक्की के रास्ते
चलने का ख्याल डाकुओं जैसा लगता है,
दुनियां के जिंदा रहने के लिये
कुछ मूर्तियों का टूटना जरूरी है
शैतानों का ख्याल लगता है
दरअसल जिनकी रूह लापता है
अपने ही आपसे
ज़माने में जंग की आग लगाकर
दिल बहलाने में उनका मन लगता है।
—————

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खामोश तूफान-हिन्दी शायरी (khamosh toofan-hindi shayari)


दीवार के उस तरफ
वह आग की तरह उफन रहे हैं
यह सोचकर कि इस पार
पहुंचते ही तिनके को जला डालेंगे।
अंदाज नहीं उनको इस बात का कि
यहां भी कोई खामोश तूफान सांस ले रहा है
यह ख्याल करते हुए कि
हवाओं का रुख पलटा है कई बार
इस बार आग को भी भस्म कर डालेंगे।
———-
थोड़े प्यार की उम्मीद थी
उसे भी न दे सके
लगाई ऊंची कीमत उन्होंने अपनी दोस्ती की
यह सोचकर कि
लाचार को बिचारा बना देंगे।
टूट गया है तिलिस्म उनके विश्वास का
भले ही अपने घमंड का आसरा है उनको
पर जब आकर देखेंगे टूटा दिल
तब अपने ख्याल ही उनको हरा देंगे।
—————

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ईर्ष्या जैसी व्याधि की कोई दवा नहीं


य ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्य कुलान्वये।
सुखभौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिनन्तकः।।
हिंदी में भावार्थ
-जो दूसरे का धन, सौंदर्य, शक्ति और प्रतिष्ठा से ईर्ष्या करता है उसकी व्याधि की कोई औषधि नहीं है।
न कुलं वृत्तही प्रमाणमिति मे मतिः।
अन्तेध्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर प्रवृत्ति नीच हो तो ऊंचे कुल का प्रमाण भी सम्मान नहीं दिला सकता। निम्न श्रेणी के परिवार में जन्मा व्यक्ति प्रवृत्ति ऊंची का हो तो वह अवश्य विशिष्ट सम्मान का पात्र है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ईर्ष्या का कोई इलाज नहीं है। मनुष्य में रहने वाली यह प्रवृत्ति उसका पूरा जीवन ही नरक बना देती है। मनुष्य जीवन में बहुत सारा धन कमाता और व्यय करता है पर फिर भी सुख उससे परे रहता है। सुख कोई पेड़ पर लटका फल नहीं है जो किसी के हाथ में आ जाये। वह तो एक अनुभूति है। अगर हमारे रक्तकणों में आनंद पैदा करने वाले तत्व हों तभी सुख की अनुभूति हो सकती है। इसके विपरीत लोग तो दूसरे के सुख से जले जा रहे हैं। अपनी पीड़ा से अधिक कहीं उनको दूसरे का सुख परेशान करता है। इससे कोई विरला ही मुक्त हो पाता है। ईर्ष्या और द्वेष से मनुष्य में पैदा हुआ संताप मनुष्य को बीमार बना देता है। उसके इलाज के लिये वह चिकित्सकों के पास जाता है। फिर भी उसमें सुधार नहीं होता क्योंकि ईष्र्या और द्वेष का इलाज करने वाली कोई दवा इस संसार में बनी ही नहीं है।

जो लोग जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम पर सम्मान पाने का मोह पालते हैं वह मूर्ख हैं। उसी तरह पैसा, पद, और प्रतिष्ठा पाने पर अगर कोई यह भ्रम पाल लेता है कि लोग उनका सम्मान करते हैं तो वह भी नहीं रखना चाहिये। लोग दिखाने के लिये अपने से अधिक धनवान का सम्मान करते हैं पर हृदय से उसी व्यक्ति को चाहते हैं जो उनसे अधिक गुणवान होता है। गुणों की पहचान ही मनुष्य की पहचान होती हैं। इसलिये अपने अंदर सद्गुणों का संचय करना चाहिए। दूसरे का सुख और वैभव देखकर अपना खून जलाने से कोई लाभ नहीं होता।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd-blogspot.com

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तोहफों के जाल में प्यार-हिन्दी व्यंग्य कविता (love and gift-hinci satire poem)


अब प्यार जताने का सिलसिला
तोहफों से चलने लगा है,
इसलिये आदमी तोहफे देकर
हर इंसान प्यार खरीदने लगा है।

तोहफों की कीमत जितनी बढ़ेगी,
प्यार की ऊंचाई भी उतनी लगेगी,
नजरों का दोष है कि दिल का
प्यार जाहिर करने की ख्वाहिशों के आगे
हर तोहफा सस्ता लगने लगा है,
मगर मजबूरी है
बिना तोहफे के प्यार खाली लगने लगा है।

मुश्किल यह है कि
प्यार दिखाने के लिये तोहफा खरीदने वास्ते
कब तक पतंग की तरह
इधर उधर उड़ते रहें,
कीमत चुकाने के लिये
कमाने के दर्द कब तक सहें,
सरलता से किया जाने वाला प्यार
तोहफों के जाल में फंसने लगा है।

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नये वर्ष का कबाड़ा-हिन्दी लघु व्यंग कथा (new year after on day-hindi satire


 वह दोनों लड़के हमेशा की तरह उस कालोनी में घर से बाहर पड़े कूड़े और और चौराहे पर रखे कूड़ेदानों से बेचने लायक कबाड़ छांट रहे थे।  पास से जाते हुए दो लोगों में से किसी एक को उन्होंने कहते सुना कि‘ कल से नया वर्ष 2010 लग रहा है।  आज पुराने वर्ष 2009 का अंतिम दिन है।’ देखें अगला वर्ष स्वयं को फलता है कि नहीं!

दूसरे ने कहा-‘काहे का नया वर्ष। सब पैसे वालों को चौंचले हैं।’

लड़कों ने यह सुना। एक खुश होकर बोला-‘यार, कल तो बहुत सारा माल मिलेगा। लोग तमाम तरह के सामान लाकर उसके पुट्ठे, कागज़ और पनियां बाहर फैंकेंगे। अपना भी नया साल शुरु होगा जब माल मिल जायेगा।’

दूसरे ने कहा-‘नहीं, अपना नया साल तो एक दिन बाद यानि परसों से शुरु होगा। कल तो लोग खाने पीने और तोहफे के लेनदेन का सामान लायेंगे। उनके ग्रीटिंग कार्ड वगैरह कम से कम एक दिन तो घर में मेहमानी तो करेंगे ही न! उनका जब नया साल एक या दो दिन पुराना होगा तब हमारा शुरु होगा।’

दूसरा निराश नहीं हुआ-‘कोई बात नहीं! एक दिन या दो दिन बाद ही नये साल का कबाड़ हमें मिलेगा तो जरूर न!

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फरिश्तों का सम्मेलन -हिन्दी व्यंग्य कविता (sammelan-hindi satire poem


अब संभव नहीं है
कोई कर सके
सागर का मंथन
या डाले हवाओं पर बंधन।
इसलिये नये फरिश्ते इस दुनियां के
रोकना चाहते हैं
जहरीली गैसों का उत्सर्जन
जिसे छोड़ते जा रहे हैं खुद
समंदर से अधिक खारे
विष से अधिक विषैले
नीम से अधिक कसैले अपनी
उन फरिश्तों ने महफिल सजाने के लिये
ढूंढ लिया है कोपेनहेगन।।
——–
वह समंदर मंथन कर
अमृत देवताओं को देंगे
ऐसे दैत्य नहीं हैं।
पी जायें विष ऐसे शिव भी नहीं हैं।
कोपेनहेगन में मिले हैं
इस दुनियां के नये फरिश्ते,
गिनती कर रहे हैं
एक दूसरे द्वारा फैलाये विष के पैमाने की,
अमृत न पायेंगे न बांटेंगे,
बस एक दूसरे के दोष छाटेंगे,
धरती की शुद्धि तो बस एक नारा है
उनके हृदय का भाव खारा है,
क्या करें इसके सिवाय वह लोग
सारा अमृत पी गये पुराने फरिश्ते
अब तो विष ही हर कहीं है।।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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क्रिकेट मैच विद ब्लाग गासिप-हास्य व्यंग्य


वह ब्लाग क्रिकेट की वजह से ही लोकप्रिय हो रहा है। हुआ यह कि एक अभिनेता की की कोई एक क्रिकेट टीम है। इसी अभिनेता ने अपना एक ब्लाग भी खोल रखा है। यानि क्रिकेट और ब्लाग में उसका बराबर का दखल है। ब्लाग और क्रिकेट दोनेां ही प्रचार के वजह से ही लोकप्रिय होते हैं। अगर कोई क्रिकेट न ख्ेाले और ब्लाग न लिखे-पढ़े तो दोनों ही पटियों पर आ जायेंगे। इसलिये कभी कभी तो यह लगता है कि ब्लाग और क्रिकेट दोनों की प्रचार दिलाने के लिये अभिनेताओं का उपयोग हो रहा है।
अब इसी ब्लाग और क्रिकेट के बीच संघर्ष हो रहा है या कराया जा रहा है जो भी समझ लें। वैसे देखा जाये तो वह ब्लाग जो कि अभिनेता की टीम की आलोचना करते हुए अंदरूनी खबरें दे रहा है उसे देखते हुए तो ऐसा लगता है कि जैसे फिल्मों की गासिप आती है वैसे ही वह भी कर रहा है। तय बात है कि अभिनेताओं को गासिपों की जरूरत होती है-प्रत्यक्ष रूप से वह उन गासिपेां की विरोध करते हुए बयान देते हैं यानि अगर वह गासिप नहीं छपे तो उनको बयान देने का अवसर भी न मिले। प्रत्यक्ष रूप से वह अभिनेता उस ब्लाग लेखक को तलाश करता हुआ दिख रहा है और इधर लोग हैं कि उसे भी शक की नजर से देख रहे हैं। दरअसल यही क्रिकेट के साथ हुआ यही है कि कुछ पुराने क्रिकेट प्रेमी जो अब ब्लागर बन गये हैं उसे शक की नजर से देखते हैं। शक यूं भी होता है कि वह ब्लाग क्रिकेट की वजह से ही मशहूर हो रहा है। वैसे वह ब्लाग अंग्रेजी में हैं-टीवी में इस लेखक ने यही देखा था-पर यह महत्वपूर्ण नहीं है। ब्लाग लिखवाने के लिये कोई हिंदी का टाईपिस्ट नहीं मिला होगा या फिर यूनिकोड का उनको पता नहीं होगा। इस लेखक ने कई बार जिम्मेदार हिंदी ब्लाग लेखकों से कहा है कि इस टूल का प्रचार करो। कभी कभी तो लगता है कि कुछ ब्लाग लेखक बड़े लोगों से मिलते हैं पर उनके यूनिकोड टूल का पता नहीं बताते।
यकीनन अगर वह ब्लाग लिखवाने वालों को हिंदी टूल का पता होता तो वह ऐसा ही करते। एक तीर से दो शिकार! दोनों ही भाषाओं में प्रचार! भले ही अभिनेता और अभिनेत्रियों को हिंदी नहीं आती-उनके टीवी पर साक्षात्कार देखकर ऐसा ही लगता है जिसमें वह हिंदी के प्रश्न का जवाब भी अंग्रेजी में देते हैं-पर वह हिंदी में प्रचार की भूख उनको बहुत है।
आजकल इस लेखक के अनेक ब्लाग अंग्रेजी कर पढ़े जाते हैं जब उनको खोलकर देखते हैं तो अपना लिखा ही समझ में नहीं आता । अगर ब्लाग लेखक वह हिंदी में ब्लाग लिखता तो उसे ढेर सारे पाठक मिल जाते-अंग्रेजी में भी हिंदी वाले पढ़ते हैं पर उनको समझ में कम आता है। फिर टूल से अनुवाद कर उसे अंग्रेजी में प्रस्तुत किया जा सकता था। इधर हिंदी के ब्लाग लेखक भी उस टिप्पणियां लिखने से बाज नहीं आते-तब उनको यह विचार नहीं आता कि ब्लाग लिखवाने वाला उनके ब्लाग नहीं पढ़ता या टिप्पणी नहीं देता। इतने बड़े आदमी से भला मासूम हिंदी ब्लाग लेखक ऐसी आशा करते भी कैसै?

बड्ा आदमी! हां, ब्लाग लेखक के दावे के अनुसार वह उस अभिनेता की टीम में अंदर तक पहुंच रखता है और यकीनन कोई यह काम छोटा आदमी नहीं कर सकता। अनेक लोग अनेक तरह के शक कर रहे हैं पर एक बात तय है कि ब्लाग को प्रचार खूब मिल रहा है। अब इसमें एक पैंच है कि क्रिकेट की लोकप्रियता को ब्लाग के जरिये बनाये रखने का प्रयास हो रहा है या इससे ब्लाग को प्रचार दिलवाया जा रहा है। उसके समाचार ऐसे ही हैं जैसे फिल्मी अभिनेता और अभिनेत्रियों के इश्क के किस्सै! मुश्किल यह है कि क्रिकेट के ग्यारह खिलाड़ियों में सभी पुरुष हैंे और उनमें किसी तरह की महिला की चर्चा करना खेल से अलग चर्चा हो जायेगी इसलिये शायद उससे बचा जा रहा है। इसलिये अभिनेता ओर अभिनेत्रियेां के प्रसंग की बजाय खिलाड़ियों के आपसी विवादों को लिखा जा रहा है।
वैसे इस लेखक ने इस क्रिकेट और ब्लाग की जंग पहले एक ब्लाग लेखक के कंप्यूटर पर आंखों से देखी थी। वह ब्लाग लेखक अपना ब्लाग बना रहा था। लफड़ा यह था कि वह हिंदी टाईप जानता था और उसे यूनिकोड टूल का पता नहीं था। होता तो भी क्या करता? ब्लाग बनाना भी तो उसे नहीं आता था। बार हिंदी में टाईप करके रखता तो वहां सब अंग्रेजी में हो जाता और वह ऐसा कि किसी के समझ में नहीं आता। इधर विश्व क्रिकेट कप प्रतियोगिता प्रारंभ हो चुकी थी। लीग मैच हो रहे थे और वह परेशान था। इधर मन में यह बात थी कि ब्लाग बन जाये तो अपना लिखना शुरू किया जा सके तो उधर क्रिकेट मैच देखने की इच्छा भी थी कि शायद भारत इस बार जीत जाये। उसने ब्लाग की वजह से हल्के मैच देखेन की कुरबानी करने का फैसला किया। मगर यह क्या? इधर पहली छोटी कविता यूनिकोड में लिखकर डालकर उसने ताली बजायी और सोचा कि चलो पता करें मैच का क्या हुआ? पता लगा कि भारत बंग्लादेश से हार गया।

इधर वह ब्लागर हिंदी के हिंदी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरम नारद पर ही अपनी क्रिकेट के वह पाठ भी देख रहा था जो किसी के पढ़ने में नहीं आ रहे थे और वहां से शिकायते आ रही थी। बहरहाल हिंदी ब्लाग ने उसके क्रिकेट प्रेम की कुर्बानी ले ही ली। उसके बाद तो उसने क्रिकेट पर केवल एक ही बार अच्छी बात लिखी वह थी जब भारत ने बीस ओवरीय विश्व प्रतियोगिता जीती और उसमें भी जोड़ दिया कि भारत में लोग क्रिकेट से ऊब रहे थे पर बाजार अब इसे लाइफलाईन की तरह उपयोग करेगा। उस ब्लाग को क्रिकेट का विषय हमेशा व्यंग्य लिखने के लिये ही अच्छा लगता है। बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा शीर्षक की कविता जबरदस्त हिट है जबकि वह उसी के समझ में नहीं आती।

एक बात लगती है कि क्रिकेट खेल ब्लाग के जरिये लोकप्रियता बनाये रखने के इस तरह प्रयास आगे भी होंगे। यह क्लबी टाईप क्रिकेट है और इसमें लोगों की रुचि अब फिल्मों की तरह बनाये रखने का प्रयास होगा क्योंकि देशप्रेम को भुनाना अब कठिन होता जा रहा है। अनेक बुद्धिमान लोग यह मानने लगे है कि क्रिकेट से देशप्रेम जोड़ना एक भ्रम था भले ही उसके साथ देश का नाम जुड़ा था। अंतर्जाल का प्रयोग बढ़ रहा है और फिल्मी हस्तियों को तो यहां वैसे भी लोकप्रियता प्राप्त है पर क्रिकेट खिलाड़ियों की लोकप्रियता बरकरार रखने के लिये चटपटे ब्लाग आगे भी बनेंगे। गनीमत अंग्रेजी में है और हिंदी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरम उसे अपने यहां नहीं दिखा रहे वरना तो किसी भले आदमी का वहां पढ़ना भी भी मुश्किल हो जाये। वहां पाठक चटपटा मसाला पढ़ेगा कि…………….कवितायें या व्यंग्य। अलबत्ता चटपटे होने के कारण हिंदी के ब्लाग लेखक उनके पते यहां छापते रहेंगे।
आखिर बात यह है कि इस लेखक को क्रिकेट और ब्लाग में बैर लगता है क्योंकि जिस दिन मैच होता है उस दिन ब्लाग पर पाठकों की संख्या कम हो जाती है। दिन भर हिट ले रहे ब्लाग स्टेटकांउटर पर अपनी ताकत दिखाते हैं पर रात को क्रिकेट मैच के समय सो जाते हैं। भारतीय समय के अनुसार मैच अगर दिन में हुआ तो फिर रात को ही ब्लाग पर पाठक आते हैं। इसलिये ब्लाग और क्रिकेट की यह जंग भी दिलचस्प है भले ही लोगों को वह प्रयोजित लगती हो।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

कवि ने वरदान माँगा -हास्य कविता


कवि की हाजिरी पर प्रसन्न होकर
अपने दरबार में प्रकट हुए सर्वशक्तिमान
और बोले
‘दो में से एक वर मांग ले
पहला इस जन्म में अपनी
कविताओं के हिट होने का वरदान
पर इससे नहीं पैसे के लिहाज से तुम धनवान
या अगले जन्म में किसी प्रकाशक का
चमचा बनकर दौलत कमायेगा
और पायेगा दुनियां भर का सम्मान
पर कविता की नहीं होगी लोगों में शान’
कवि तुरंत बोला-
‘अगर इस जन्म में नहीं अपने नसीब है
कविताऐं तो फ्लाप हम भी गरीब हैं
जितने हिट हैं उतने ही ठीक हैं
अब तो निकल गयी उमर
इसलिये सुरक्षित रख लो
अगले जन्म के लिये अपना वरदान
तब युवावस्था में ही सारी
कामयाबी दिलाना
चमचे बनने की पूरी शक्ति देना
भले ही कविता लिखने की कम कर लेना
साहित्यकारों में करना शुमार
भले ही किसी प्रकाशक का चमचा बना देना
लिखें चाहें जैसा भी पर बढ़ाना सम्मान
किसी हालत में न हो इस जन्म जैसा भान

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आम ब्लाग लेखक के लिये कमाई अभी दूर की कौड़ी-आलेख


उस दिन चिट्ठकार चर्चा का नियमित ईमेल पढ़ा-यह ईमेल इसके सदस्यों को नियमित भेजा जाता है-जिसमें तमिल बच्चों द्वारा हिंदी सीखने की बात कही गयी थी। यह कोई नई खबर नहीं है क्योंकि अब कई ऐसे तमिल भाषी है जो हिंदी में लिखते और पढ़ते हैं-शायद इस ईमेल का आशय यह हो सकता है कि अब अधिक दिलचस्पी से तमिल भाषी बच्चे इसे पढ़ने लगें हों। इस प्रसंग का उल्लेख इसलिये करना ठीक लगा क्योंकि ईमेल पढ़ते हुए ही एक घटना इस लेखक के जेहन में आयी थी और वह कोई अधिक पुरानी नहीं थी। उस पर लिखने का दिल था पर इस ईमेल को देखकर यह प्रबल विचार उठा कि उस पर लिखा जाये।

एक मित्र सज्जन ने कुछ इस तरह एक घटना सुनाई। एक महिला के दो लड़के हैं एक अमेरिका में दूसरा मध्यप्रदेश में रहता है। मध्यप्रदेश में रहने वाला लड़का अपनी मां को अमेरिका में छोटे बेटे की तरफ रवाना करने के लिये चेन्नई गया। उसने विमानतल से अपनी मां को वायुयान में बिठाकर रवाना किया पर उसे अपनी मां को लेकर एक चिंता थी जो शायद नई थी। इससे पहले भी वह कई बार अमेरिका अकेले जा चुकी है पर इस बार कोई अन्य साथ जाने वाला यात्री नहीं था दूसरा उस महिला को हीथ्रो हवाई अड्डे पर टर्मिनल बदलना था जिसमें भाषा आड़े आने वाली थी। तमिल भाषी महिला को अंग्रेजी कम ही आती है पर हिंदी का ठीकठाक ज्ञान है।
उस महिला के बड़े पुत्र को इस टर्मिनल बदलने के दौरान ही मां के लिये चिंतायें थीं। इन टर्मिनलों पर यात्रियों की सहायता के लिये बहुभाषी होते हैं पर समस्या उनसे संपर्क की थी।

बहरहाल वह भद्र महिला हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरी कोई दुभाषिया ढूंढने लगी क्योंकि उसको दूसरे टर्मिलन पर जाने के लिये बस का पता पूछना था। एक दुभाषिया उससे मिला तो उसने उससे कहा कि‘आधे घंटे में आता हूंं।’
महिला बेबस खड़ी रह गयी। फिर उसने वहां खड़ी एक कर्मचारी से टूटी फूटी अंग्रेजी में उस बस का पता पूछा तो उस लड़की ने बता दिया। वह उस बस में चढ़कर दूसरे टर्मिनल पर पहुंची। वहां फिर वह कोई दुभाषिया ढूंढने लगी। वहां तमाम कर्मचारी थे जो चेहरे से ही विभिन्न देशों के लग रहे थे। वहां एक दुभाषिया उस महिला के पास आया और अंग्रेजी में पूछा कि ‘क्या आप भारत से आईं हैं।’
महिला ने कहा-‘हां!’
वह दुभाषिया उस समय औपचारिक रूप से पेश आ रहा था। फिर उसने महिला से हिंदी में पूछा-क्या आपको हिंदी आती है।’
उस भद्र की महिला की बाछें खिल उठीं और बोली-हां, आती है।’
वह दुभाषिया औपचारिकता की बजाय आत्मीयता से बोला-आपने अपने कागजों में व्हील चेयर की मांग की है। मैं अभी मंगवाता हूं। अच्छा आपने शाकाहारी भोजन की मांग की है यह बात मैं वायुयान के कर्मचारियों को बता दूंगा। अभी आप आराम से उधर बैठ जाईये। आप बेफिक्र होकर अपनी यात्रा जारी रखिये।’
महिला जब तक वहां से रवाना नहीं हुई तब तक उसकी वहां अनेक कर्मचारियों से हिंदी में बातचीत हुई। वह बहुत खुश थी। निर्धारित समय पर वायुयान से वह अमेरिका से रवाना हो गयी। वहां पहुंचकर उसने अपने बड़े बेटे को अपनी पूरी यात्रा का वृतांत फोन पर सुनाया और कहा-‘जब उस लड़के ने हिंदी मेेंं बात की तो मुझे बहुत अच्छा लगा। उससे पहले तो बहुत अकेलापन लग रहा था। उसके मूंह से निकल हिंदी शब्द अमृत की तरह लगे थे।’
हिंदी के विकास को लेकर निराशाजनक बातें करने वालों का निहितार्थ क्या होता है यह समझ में नहीं आता। जहां तक हिंदी के संपर्क भाषा का प्रश्न है तो वह निरंतर बढ़ रही है-यहां अपवादों की चर्चा करना व्यर्थ होगा। सच बात तो यह है कि हिंदी अब भारत में उन क्षेत्रों में पहुंच रही है जहां उसे पहले जाना तक नहीं जाता था। हम जब हिंदी के सम्मान की बात करते हैं तो सवाल यह उठता है कि हम उसे किस रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं? क्या यह चाहते हैं कि सारा विश्व ही हिंदी बोलने लगे। यह अतिश्योक्ति होगी। फिर हिंदी का आधुनिक स्वरूप बरकरार रहना चाहिये, अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग इसमें नियमित रूप से नहीं होना चाहिये, और अंग्रेजी की क्रियायें स्वीकार्य नहीं है जैसी बातों पर सहमति होने के बावजूद रूढि़वादिता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
आजकल अंतर्जाल की हिंदी के वेबसाईटों और ब्लाग को भविष्य में एक समानांतर प्रचार माध्यम के रूप में स्थापित होने की बात कहीं जा रही है पर इधर यह भी दिखाई दे रहा है कि हमारे कुछ ब्लाग लेखक मित्र-जिनका चिंतन और हिंदी ज्ञान वाकई गजब का है-ऐसी रूढि़वादी बातें करते हैं कि लगता है कि उनको समझाना कठिन है। पिछले दो वर्षों से मेरे संपर्क में रहे कुछ मित्र हिंदी लिखने वाले टूलों से जुड़े हैं और सच बात तो यह है कि इस लेखक को आत्मविश्वास से हिंदी में लिखने का आत्मविश्वास भी उन्हीं से मिला है पर उनकी कुछ बातें हैरान कर देती हैं।

यहां विकिपीडिया के हिंदी टूल की बात करना जरूरी रहेगा जो मेरे डेस्कटाप पर है पर उसका उपयोग करने मेंे मुझे असहजता लगती है। यह तो गनीमत है कि गूगल का इंडिक टूल और फिर बाद में कृतिदेव का यूनिकोड टूल मिल गया जो अंतर्जाल पर नियमित लिखना संभव हो पाया। हिंदी के विकिपीडिया का करीब पंद्रह दिन तक उपयोग किया पर बाद में जब उसका संशोधित टूल उपयोग किया तो उससे असहजता लगने लगी। एक मित्र ने कुछ गजब की बातें लिखीं जो हिंदी टाईप राइटर को लेकर थीं
उनकार कहना था कि पता नहीं किसने यह टाईपराईटर बनाया जिसमे ‘ ि’ की मात्र पहले लगती है जबकि इसे बाद में टाईप करना चाहिये क्योंकि इसे पढ़ा भी बाद में जाता है। तक यह था कि हिंदी जैसी बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है तो वैसी टाईप भी हो।
इसके बाद विकिपीडिया में यह परिवर्तन दिखाई दिया। इससे हुआ यह कि उस टूल पर टाईप करते हुए अपना लिखा ही पढ़ने मेें नहीं आता। इंडिक टूल से किसी शब्द के साथ आई लगाने से भी दी पी ही हो जाता है पर अगर इस विचार से विकिपीडिया पर टाईप किया जाये तो दि पि हि नि रहेगा। चलिये यह भी मान लें पर जब ‘’ि’ की मात्रा जब ल ि प ि जैसी दिखती हैं तो समझ में नहीं आता। पहले विकिपीडिया के आफलाईन टूल में हिंदी में ज्ञ शब्द आसानी से बन जाता था पर बाद में वह भी संभव नहीं रहा। हालत यह है कि कभी जल्दी में टिप्पणी लिखने लायक भी यह टूल नहीं रहा। यह कोई शिकायत नहीं है बल्कि कहना यही है कि अधिक रूढ़ता से आगे बढ़ेंगे तो शायद हम हिंदी के साथ न्याय नहीं कर पायेंगे।

अंतर्जाल पर दिखता सब कुछ है पर वैसा ही है जैसा दिख रहा है कहना कठिन है। गूगल के अनुवाद टूल से हिंदी के पाठ अन्य भाषाओं में पढ़े जा रहे हैं यह तो दिख रहा है पर वह वाकई उसी भाषा के लोग पढ़ रहे हैं जिसमें पढ़ा गया यह कहना कठिन है।
आखिर हिंदी को लेकर आशावादी क्यों होना चाहिये? दरअसल हिंदी को लेकर जब हम बात करते हैं तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि हमारे देश की पहचान जिन रचनाओं से है वह मूल रूप से आधुनिक हिंदी में नहीं हैंं। अन्य की बात तो छोडि़ये हिंदी भाषी लोग जो अपनी पहचान वाली रचनायें पढ़ते हैं वह मूल रूप से संस्कृत या क्षेत्रीय भाषाओं में है। आधुनिक हिंदी के शुरुआती दौर में मौलिक रूप से अच्छा लिखा गया पर बाद में तात्कालिक रूप से सम्मान और धन पाने के लिये अनेक समसामयिक विषयों पर लिखकर वाहवाही बटोरने में लग गये। इसलिये हमेशा ही प्रासंगिक रहने वाले विषयों पर बहुत कम ही मौलिक रूप से लिखा गया। यही कारण है कि हिंदी भाषा साहित्य समृद्ध होते हुए भी अप्रासंगिक होता चला जाता है। हास्य कवितायें और व्यंग्य लिखने वाले बहुत मिल जायेंगे पर उनका व्यंग्य सन् 2040 में पढ़ कर समझा जाये यह जरूरी नहीं है-यह इसलिये लिखा गया है क्योंकि इस लेखक के एक मित्र ब्लाग ने उसी सन् में जीवन पर्यंत हिंदी सम्मान देने की बात लिखी है। बहरहाल यह हालत हम आज के संदर्भ में लिख रहे हैं और वह भी अंतर्जाल से पूर्व के हिंदी साहित्य की-जो कि आर्थिक, सामाजिक और वैचारिक दबावों से कभी उबर ही नहीं पाया।

मध्य में एक सूक्ष्म पाठ
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हालांकि यह एक सच्चाई है कि किसी भी अभियान को बिना धन के मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता यही स्थिति हिंदी ब्लाग जगत की है। यहां केवल अपने लिखने के दम पर कमाना संभव नहीं है। हालंाकि कुछ ब्लाग लेखक कमा रहे हैं पर उनकी कमाई का आधार केवल उनका लिखा हुआ नहीं है। हां, यह संभव है कि जो ब्लाग लेखक बेहतर प्रबंधन और संबंध बनाने की क्षमता रखते हैं उनको अतिशीघ्र यहां आय अर्जित हो सकती है। अनेक प्रचार माध्यमों में यह प्रचार जरूर किया जा रहा है कि हिंदी ब्लाग से लोग कमा रहे हैं पर दो वर्षों में इस लेखक को एक पैसा भी इससे नहीं मिला है। इसके बावजूद यह एक सच है कि भविष्य में बेहतर लिखने वालों के लिये यह धन कमाने का एक जरिया बन सकता है।

अंतर्जाल पर भी इसे दबाव में रखने के प्रयास तो होंगे पर जिन लोगों को उस दबाव से लड़ने की ताकत है और जो मौलिक और स्वतंत्र रूप से लिखने के अभ्यस्त होंगे वह अपना अस्तित्व स्वयं ही बनायेंगे। जब वेबसाइटों या ब्लाग की बात करते हैं तो वह केवल हिंदी में लिखने तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि रिपोर्ताज, समाचारों और घटनाओं के सीधे प्रसारण की संभावना भी वेबसाईटों पर हो सकती है। जैसे हम आजकल समाचार या साहित्यक पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों का स्वरूप देखते हैं ऐसा यहां होने की संभावना नहीं है। एक अखबार अनेक समाचारों और आलेखों के साथ पाठक के पास पहुंचता है पर ब्लाग या वेबसाईटें अगर लोकप्रिय हुई तो उन्हें जरूरी नहीं है कि वह सभी एकदम प्रस्तुत करें। दिन में पचास से पांच सों तक वह अपने पाठ जारी कर सकती हैं। कई ब्लाग बनाकर वह उसे चलायमान रख सकती हैं। ऐसे ही साहित्यक पत्रिकाओं के साथ भी है। यह जरूरी नहीं कि सप्ताह या दिन में एक ही बार सब प्रस्तुत किया जाये। प्रतिदिन अनेक रचनायें एक एक कर प्रस्तुत की जा सकती हैं। यही वीडियो और आडियो प्रसारणों के साथ भी हो सकता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि अंतर्जाल पर हिंदी एक नये स्वरूप के साथ सामने आयेगी। हिंदी का बाजार बहुत बड़ा है तो दूसरा सच यह भी है कि हिंदी के अब सार्थक लेखन की अपेक्षायें बढ़ रही है पर हिंदी को दोहन करने वाला बाजार नये और मौलिक लेखकों को संरक्षण देने के लिये उत्सुक नहीं है। वह चाहता है कि उसे लिखने वाले गुलाम मिलें पर हिंदी को अंतर्जाल पर ले जाने का एक ही उपाय है कि मौलिक और स्वतंत्र रूप से लिखा जाये तभी नवीनता आयेगी। अभी अंतर्जाल पर हिंदी में लिखने की विधा शैशवकाल में हैं पर जैसे जैसे विस्तार रूप लेगी नये परिवर्तन आयेंगे। अभी तो यह भी एक ही समस्या है कि गूगल के इंडिक और कृतिदेव यूनिकोड टूल के अलावा कोई अन्य प्रमाणिक और सरल टूल ही लिखने के लिये उपलब्ध नहीं है। गूगल के इंडिक टूल और कृतिदेव यूनिकोड टूल का भी इतना प्रचार अभी लोगों में नहीं है। जब इस बारे में पांच छह वर्ष पहले से इंटरनेट पर काम करने वाले लोगों को बताया जाता है तो हैरान रह जाते हैं-उनको यह जानकारी नवीनतम लगती है। एक ब्लाग लेखक ने लिखा था कि हिंदी नयी भाषा है इसलिये उसका विस्तार प्राकृतिक कारणों से तय है। यह सच भी लगता है अगर इस बात को मान लिया जाये कि हिंदी में सार्थक और दीर्घाकलीन तक प्रभावी लेखन
भविष्य में अंतर्जाल पर होगा।
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पत्थर कभी इतने नहीं उड़े जितनी खबरें बनी-हास्य व्यंग्य कविता


पत्थर कभी इतने नहीं उड़ाये गये
जितनी खबरें बन गयी।
खंजर कभी इतने नहीं घौंपे गये
जिनकी चर्चा से जमाने की भौहें तन गयी।

बस! बात इतनी है कि
अमन से रहते लोगों के दिमाग में
खौफ के जज़्बात की हवा का
एक झटका देना बहुत होता है
जिसमें बहकर वह बाजार चला आता है
दिल बहलाने के लिये
सौदागरों की जेब भर जाता है
घबड़ाने की बाद क्या
इससे शायरों के पास भी अमन का
पैगाम सुनाने का मौका आता है
जमाने को चलाने के लिये
बने कुछ दस्तूर है
कलम के साथ खंजर का भी होना जरूर है
जमीन पर पसरे खून से इंसान दहल जाता है
मगर अल्फाजों और चीजों से फिर बहल जाता है
इसलिये जब पत्थर बरसे या खंजर चला
तब सौदागरों के खिल उठे चेहरे
भले आम इंसान की नसें तन गयी

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पुरुष को बैल बनाने में ही देखते नारी की शान-व्यंग्य ग़ज़ल


लोगों में सोच जगाने के लिये चला रहे सभी अभियान।
किताबों के गुलाम मिटाने निकले हैं गुलामी के निशान।।

नारी स्वतंत्रता का नारा लगाते हुए वह मुस्कराते हैं
गृहस्थी में पुरुष को बैल बनाने में ही देखते नारी की शान।।

पूरी जिंदगी दिखाया समाज को उन्होंने नया रास्ता
अपनी सोच से पैदल रहे,पराये ख्याल पर पाया सम्मान।।

मसीहा बनने की चाहत में ओढ़ लिया अपने आगे अंधेरा
अमन में इधर उधर ढूंढते हैं, जमाने में जंग के पैगाम।।

काट कर लोगों को कर दिया पहले अलग अलग
फिर मांगने निकले है लोगों से एकता का दान।।

कहैं दीपक बापू, बड़े बन गये कई छोटी सोच के कई लोग
चेहरे उनके पर्दे पर चमकते दिखते, पर डोलता लगता ईमान।।

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सादगी से कही बात किसी के समझ में नहीं आती-हिंदी शायरी


सादगी से कही बात
किसी को समझ में नहीं आती है
इसलिए शायद कुछ लोग श्रृंगार रस की
चाशनी में डुबो कर सुनाते हैं
अलंकारों में सजाते हैं
तो कुछ वीभत्स के विष से डराते हैं
आदमी में विषय के लिए जिज्ञासा जगाते हैं
आदमी के दिल में ही रहता है
प्यार और खौफ
जिसे कभी कवियों ने बहलाया था
अब तो बाजार में सजी दुकानों पर
दर्द की दवा हो या ख़ुशी के लिए अमृत
हर शय बिकने के लिए सज जाती हैं

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