पत्थर कभी इतने नहीं उड़े जितनी खबरें बनी-हास्य व्यंग्य कविता


पत्थर कभी इतने नहीं उड़ाये गये
जितनी खबरें बन गयी।
खंजर कभी इतने नहीं घौंपे गये
जिनकी चर्चा से जमाने की भौहें तन गयी।

बस! बात इतनी है कि
अमन से रहते लोगों के दिमाग में
खौफ के जज़्बात की हवा का
एक झटका देना बहुत होता है
जिसमें बहकर वह बाजार चला आता है
दिल बहलाने के लिये
सौदागरों की जेब भर जाता है
घबड़ाने की बाद क्या
इससे शायरों के पास भी अमन का
पैगाम सुनाने का मौका आता है
जमाने को चलाने के लिये
बने कुछ दस्तूर है
कलम के साथ खंजर का भी होना जरूर है
जमीन पर पसरे खून से इंसान दहल जाता है
मगर अल्फाजों और चीजों से फिर बहल जाता है
इसलिये जब पत्थर बरसे या खंजर चला
तब सौदागरों के खिल उठे चेहरे
भले आम इंसान की नसें तन गयी

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मंदी का दौर:नया उपभोक्ता वर्ग कहां से आयेगा-आलेख


अमेरिका के उद्योगपति बिल गेट्स ने कहा है कि वर्तमान मंदी अगले चार साल तक चल सकती है। बिल गेट्स विश्व में प्रसिद्ध उद्योगपति हैं और नये लोगों को उनसे प्रेरणा लेने को कहा जाता है। वैसे उन्होंने जो अनुमान लगाया है उसके जो आधार होंगे वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के बाजार को दृष्टिगत बनाये गये होंगे। वैसे तो भारत में भी मंदी का दौर चल रहा है पर आज तक यह कोई नहंी बता पा रहा है कि आखिर यह मंदी आई कैसे?

जिन लोगों ने दृष्टा की तरह इस बाजार को देखा होगा वह कभी न कभी इस आशंकित मंदी पर विचार अवश्य करते रहे होंगे। नित प्रतिदिन नवीन उत्पादों की चर्चा आये दिन प्रचार माध्यमों में आती है पर यह बात याद रखने लायक है कि वह पुराने प्रचलित उत्पादों को बाहर अधिक करते हैं बनिस्बत नये ग्राहक बनाने के। अभी में भारत में एक सस्ती कार के निर्माण और बाजार में और की चर्चा है इस कार को देखने के बाद-एक टीवी में एक मेले में इसका माडल दिखाया गया था-कोई भी कह सकता है कि वह लोगों में कम दाम से अधिक अपनी डिजाइन के कारण लोकप्रिय होगी। जिन लोगों के पास महंगी और आकर्षक कारें हैं वह भी इसका उपयोग स्थानापन्न रूप से कर सकते हैं या पुरानी बेचकर वही लेना चाहेंगे। इस कार को नये उपभोक्ता खरीदेंगे पर उनकी संख्या कम होगी। अब यह संभव है कि अनेक महंगी और बड़ी गाडि़यों की बिक्री में कमी उसकी वजह से हो सकती है। कहने का तात्पर्य है कि जो तेजी बाजार में चल रही थी-कम से कम भारत में-वह सीमित वर्ग के धन के व्यय पर चल रही थी। यही वर्ग बदल बदल कर आ रहे उत्पादों को खरीद रहा था। हां शुरुआताी दौर में फ्रिज,टीवी,कूलर,कार,मोटर साइकिल तथा अन्य औद्योगिक उत्पादों को नये होने के कारण भारत में बहुत बड़ा बाजार मिला पर जैसे ही मध्यम वर्ग के सभी लोगों से इसे प्राप्त कर लिया तो उसके बाद फिर वही वर्ग नये उत्पादों को खरीद रहा जिसके पास अपने मूल स्त्रोत से अलग भी आय है-या फिर कहा जाये कि उनके पास एक से अधिक आय के स्त्रोत हैं। इसके अलावा निजी क्षेत्र में ं नयी और आकर्षक नौकरी के कारण भी एक वर्ग नये उत्पादों को खरीदता रहा। देश में उदारीकरण के प्रारंम्भिक दौर में उस समय अनेक उद्योगों और व्यवसायों को अपना मूल ढांचा खड़ा करने के लिये लोग चाहिये थे और उन्होंने इसलिये अपने यहां बड़े पैमाने पर नौकरियां दीं। इनमे आप टेलिफोन कंपनियों का नाम ले सकते हैं। उनकेा नये कनेक्शन और ग्राहक जुटाने थे इसलिये उन्होंने अपना संगठन बढ़ाया। अब वह स्थापित हो गये हैं। शहरों में उन्होंने अपना नेटवर्क स्थापित कर लिया है और नई लाईनें डालने और ग्राहक बनाने का उनका दायरा अब उतना नहीं है जितना दो या तीन वर्ष पूर्व था। तय बात है कि उनको अपने यहां नौकरियां ओर कर्मचारी कम करना पड़ सकते हैं। इसका असर उन लोगों की क्रय क्षमता पर पड़ना है जो वहां से हटाये जायें या कहीं ऐसी जगह रखें जायें जहां उनका स्वयं का व्यय ही अधिक हो जाये। फिर मंदी के दौर के चलते जहां अनेक लोग नौकरियां गंवा रहे हैं या उनके वेतन में कमी हो रही है इससे भी एक उपभोक्ता के रूप में उनकी क्रय क्षमता का हृास हो रहा है।

दरअसल इस मंदी का मुख्य कारण यह है कि कंपनियों ने अपने विनिवेशकों को खुश करने के लिये अधिक लाभांश या ब्याज दिया। यह अलग बात है कि कंपनी के उच्चाधिकारियों के पास भी अधिक मात्रा में शेयर होते हैं और उनको स्वयं भी लाभ मिलता है। इतना ही नहीं कितनी भी मंदी हो कंपनियों के उच्चाधिकारियों के लाभों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह अपना उच्च स्तर बनाये रखते हैं-कई जगह वेतन के साथ वह कमीशन भी प्राप्त करते हैं-उनके व्यय में कमी नहीं आती। अभी हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ने अपने देश की कंपनियों को इस बात के लिये लताड़ा भी था कि उनके उच्चाधिकारी न केवल ठाठ से रह रहे हैं बल्कि बोनस भी ले रहे हैं जबकि उनकी कंपनियां मंदी का संकट झेलते हुए सरकार से मदद की गुहार लगा रही हैं।

भारत में तो वैसे भी कर्मचारियों और मजदूरों का शोषण होता रहा है और कंपनियां भी इससे पीछे नहीं हैं। मुख्य बात यह है कि उन छोटे कर्मचारियों का सभी जगह शोषण होता है जो मजदूरी या लिपिकीय कार्य करते हैं। इनके वेतन बहुत कम रखे जाते हैं यह सोचकर कि उनका कोई महत्वपूर्ण नहीं है या उन जैसे बहुत मिल जायेंगे। कंपनियां यह भूल जाती हैं कि उनके कर्मचारी किसी के उपभोक्ता होते हैं जैसे कि अन्य जगह कार्यरत कर्मचारी उनके भी उपभोक्ता होते है। एक टेलीफोन कंपनी मेंं कार्यरत टीवी और फ्रिज भी खरीदता है तो टीवी कंपनी के लिये कार्य करने वाला अपने यहां टेलीफोन भी लगवाता है। अगर हम इस चक्र को देखें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अधिकतर कंपनियां या उद्योगपति समाज के दोहन में लगे रहते हैं और उपभोक्ता के रूप मेंं दूसरे की जेब से पैसा निकालने के लिये तत्पर होते हैं पर जब उसे भरने की बात आती है तो उनको अपने लाभ की चिंता सताती है। इन उद्योगतियों और कंपनियों के उच्चाधिकारियों का बहुत सारा यकीनन बैंकों में सड़ता होगा और वह बैठकर इस मंदी का लुत्फ उठाते हैं और प्रचार माध्यमों में मंदी का रोना रोते हैं।

भारत में जो नवीन उपभोक्ता वर्ग गुणात्मक रूप से बढ़ रहा था उसमें अब घनात्मक वृद्धि ही संभव है इसलिये नवीन उत्पाद किसी पुराने उत्पाद को या तो रीसेल के लिये भेजेंगे या कबाड़ में डाल देंगे। इससे बाजार उठने वाला नहीं है। वैसे भी आदमी कितना कबाड़ घर में रखेगा? घर भी आखिर भरने लगता है। यह मंदी का दौर कब तक चलेगा कोई नहीं जानता क्योंकि सभी जगह समस्या यही रहने वाली है कि नया उपभोक्ता वर्ग कहां से आयेगा या उसकी जेब कैसे भरेगी। आखिर आदमी भी कब तक कबाड़ में चीजें रखेगा।
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