विदुर नीति-जिस धन को पाने में कष्ट हो उसके लिए प्रयास व्यर्थ


          मनुष्य जीवन को धारण करने वालों के मन मस्तिष्क में  यह भ्रम रहता कि वह केवल धनर्जान करने के लिये ही पैदा हुए हैं।   संसार के अधिकतर मनुष्य  धन को ही सत्य मानते हैं।  धन कमाने के बाद  उसके व्यय का प्रदर्शन कर समाज में अपनी श्रेष्ठता साबित करने का मोह कोई नहीं छोड़ पाता। हमारे देश में धर्म तथा  समाज के नाम पर ऐसी परम्पराएं  बनायीं गयी हैं जिनका निर्वाह बिना धन के संभव नहीं हो सकता।  पुत्र  के लिये व्यवसाय तथा पुत्री के लिये वर ढूंढते हुए हमारे देश के अधिकतर लोगों का जीवन ही निकल जाता है।  हमारे देश के लोगों में धन संचय की प्रवृत्ति इतनी गहरी है कि आधुनिक समय में चालाक बुद्धिमानों के लिये उनके साथ  ठगी करना आसान हो गया है।

         देश भर में अनेक चिटफंड कंपनियां यह काम इस तरह कर रही है कि लोग अपनी सारी जमा पूंजी उनके पास जमा कर आते हैं।  अधिक व्याज का लोभ लोगो के लिये संकट का कारण तब बनता है जब उनका मूल धन भी हाथ से निकल जाता है।  पीड़ित लोग अधिकतर अपने पृत्र के व्यवसाय या नौकरी तथा बेटी की शादी के लिये धन जमा करने की बात कहते है।  हमारे यहां विवाह तथा मृत्यु के अवसर पर जितनी नाटकबाजी होती है वह धन से ही संभव है।  यही कारण है कि भारत में लोग बच्चों के भविष्य के लिये अधिक से अधिक संचय करते हैं। इतना ही नहीं अपने बुजुर्गों की मृत्यु पर उनके दाह संस्कार के बाद भोज के प्रबंध का जिम्मा भी उन पर रहता है।  समाज में अपनी कथित छवि बचाये रखने के लिये भारत के लिये हर आम आमदी जूझता रहता है।  हमारे देश में सीध सच्चे धंधे में अधिक धनवान होने के अवसर करीब करीब बंद कर दिये गये हैं, जिसका परिणाम यह हुआ है कि अपने पास मौजूद धन की वृद्धि के लिये ऐसे ठगों के जाल में आमजन  आसान से फंस जाते हैं।

                      विदुरनीति में कहा गया है कि

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            अतिक्लेशेन येऽर्याः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेश वा।

            अरेवां प्रणपातेन मा स्म तेषु मन‘ कृथाः।।

        हिंदी  में भावार्थ-जिस धन को अर्जित करने में मन तथा शरीर को अत्यंत क्लेश हो, धर्म का उल्लंघन  करना पड़े या फिर शत्रु के सामने अपना सिर झुकाने की बाध्यता उपस्थित हो, उसे प्राप्त  करने का विचार ही त्याग देना श्रेयस्कर है।

            सहस्त्राणिऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनानथा।

            धृतराष्ट्र निमुंचेच्छां न कथंचिन्न जीव्यते।

       हिन्दी में भावार्थ-जिनके पास हजार है वह जिंदा रहते हैं पर जिनके पास सौ वह भी जिंदा  रहते हैं। धन का लोभ छोड़ने वाले लोग भी हर हालत में अपना जीवन धारण किये रहते ही  हैं।

        हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार  जिस जीव में परमात्मा ने प्राणवायु प्रवाहित की है माया उसकी सेवा करने के लिये बाध्य है। कहा भी जाता है कि जिसने पेट दिया है वह दाना भी देगा।  परमात्मा की दासी माया है न कि उसकी स्वामिनी।  यह भी कहा जाता है कि जिसके भाग्य में माया का जितना भाग आना लिखा है उतना ही मिलेगा। इसके बावजूद धर्मभीरुता का दावा करने वाले हमारे भारतीय समाज के अधिकांश लोगों  को इस पर विश्वास नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता से कथित रूप से कर्मप्रेरणा मिलने का दावा करने वाले यहां अनेक लोग मिल जायेंगे पर यह कोई नहीं समझ पाया कि उसमें निष्कर्म की बात कही गयी है न कि सकाम कर्म का सिद्धांत स्थापित किया गया है।  स्थिति यह है कि लोग धन के लिये देह तथा मन को भारी संताप देने के लिये तैयार हो जाते हैं। अपने ही धन के शत्रुओं की चिकनी चुकडी बातों में आकर उसे सौंप देते हैं।  परिणाम यह है कि बाद में जब धोखा मिलता है तो सिवाय आर्तनाद करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प् नहीं रहता।

         अतः अपने नियमित स्वाभाविक कर्म करते हुए परमात्मा का स्मरण ही करते रहना चाहिये।  संसार के विषयों का चक्र माया की कृपा से चलता ही रहता है।  उसमें एक दृष्टा की तरह शामिल होना चाहिये। समय आने पर सारे काम हो जाते हैं यह विश्वास धारण कर जीवान आनंद से बिताना चाहिये।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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अर्थववेद से सन्देश-ओम (ॐ)शब्द अत्यन्त मूल्यवान


        श्रीमद्भागवत गीता में ओम (ॐ ) शब्द को परमात्मा का पर्याय माना गया है। अनेक ऋषियों, मुनियों और संतों ने माना है कि ओम शब्द का निरंतर वाणी और मन से उच्चारण करने पर हृदय में पवित्र विचार आते हैं।  बुद्धि और मन शुद्ध होकर सकारात्मक कार्यों के लिये प्रवृत्त होता हैं।  ओम शब्द के वाणी से उच्चारण करने पर शरीर के सारे अंगों पर ऐसा प्रभाव होता है कि अंतर्मन में अद्भुत प्रकाश दीप प्रज्जवलित हो उठता है। उनके विचार तथा व्यवहार में यह प्रकाश विसर्जित दूसरे लोगों को भी प्रसन्नता देता हैं जिन लोगों को संस्कृत के श्लोक मन ही मन दोहराने में परेशानी होती है वह चाहें तो केवल ओम शब्द का जाप करें।

अथर्ववेद में कहा गया है कि

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त्रयः सुपर्णास्त्रिवृता यदायत्रेकाक्षस्मभि-संभूय शका शका।

प्रत्यौहन्मृत्युमृतेन सत्कमन्तर्दधान्त दुरितानी विश्वा।।

        हिन्दी में भावार्थ-जब समर्थ तीन सुवर्ण तिहरे होकर एक अक्षर में सब प्रकार मिल रहे हैं। वे अमृत के साथ सब अनिष्टों को मिटाकर मृत्यु को दूर करते हैं।

     योगासन के दौरान या बाद में ओम शब्द का उच्चारण करने से शरीर में एक अद्भुत रोमांच का अनुभव होता है। ओम शब्द के उच्चारण से वाणी, विचार और व्यवहार में जो स्वर्णिम परिवर्तन आता है उसकी अनुभूति इसका नियमित जाप करने पर ही पता चल सकती है। प्रयोगों से यह बात सिद्ध हो जाती है कि ओम शब्द का निरंतर जाप करने वालों के अंदर गुणात्मक रूप से परिवर्तन आते हैं जो उसके जीवन को उज्जवल पक्ष की तरफ ले जाते हैं।  यह प्रमाण विदेशी अनुसंधानकर्ताओं ने ही प्रस्तुत किया है।  अतः जिन लोगों को अपने जीवन, विचार तथा व्यवहार को प्रकाशमय बनाना है उन्हें ओम शब्द का दीपक अपने मन में स्थापित करना चाहिए। जब हम नियनित  रूप से ॐ  शब्द का जाप करेंग तब निश्चित रूप से दिव्यानुभूति होंगी।

लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

 

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर

writer and editor-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’, Gwalior

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भर्तृहरि नीति शतर्क-दौलत की बजाय परमात्मा का स्मरण करें


         हमारे देश में श्रीमद्भागवत गीता की चर्चा एक पवित्र ग्रंथ की तरह होती है।  अनेक संत और साधु इसके ज्ञान का प्रचार भी करते हैं पर फिर भी लगता है कि बहुत कम लोग इस समझ पाये हैं।  इसका कारण यह है कि भले ही गीता का अध्ययन कर उसका ज्ञान रट लिया जाये पर जब तक हृदय में वह स्थापित नहीं होगा किसी आचरण मे दृष्टिगोचर न हो वह गीता सिद्ध नहीं माना जा सकता।  दरअसल गीता का नाम लेकर कोई राजयोग का प्रचार करता है तो कोई सहज योग की धारणा व्यक्त करता है। इससे आम भक्तों में यह भाव आता है कि योग केवल सिद्ध लोग ही कर सकते हैं अथवा योग एक कठिन विषय है।

      लोगों ने गीता ज्ञान में सिद्ध हैं या उसकी साधना करत हैं उनको यह बात समझ में तो आ जाती है कि योग एक महत्वपूर्ण विधा है पर उनमें भी बहुत कम लोग बाह्य स्थितियों पर चिंतन या मनन कर यह जान पाते हैं कि योग तो हर आदमी चाहे अनचाहे कर रहा है।  योग का सीधा मतलब यह है कि अपनी इंद्रियों को परमात्मा से जोड़ा जाये।  यह योग ज्ञान होने पर ही किया जा सकता है।  अगर ज्ञान न हो तो आदमी दुर्योग को प्राप्त होता है। मनुष्य की इंद्रियां वह चाहे या न चाहे संसार के विषयों से जुड़ती हैं अंतर यह है कि जो ज्ञानी या साधक हैं वह स्वविवेक से सहजता पूर्वक योग करता है पर अज्ञानी आदमी जहां उसके मन जोड़ दे वहीं बैठ जाता है।  ज्ञानी या साधक परमात्मा का स्मरण करते हुए अपनी इंद्रियों को सांसरिक विषयों से स्वयं जुड़ते हुए सहज स्थिति में ही रहता है जबकि अज्ञानी कभी अपने मन तो कभी दूसरे की राय पर अपने सारे काम करने के कारण क्षणिक सुख प्राप्त करने के बाद दुःख की स्थिति में होता है।

महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि
………………………………..
क्षान्तं न क्षमया गृहोचितसुखं त्यक्तं न संतोषत।
सोढो दुस्सहशीतापपवनक्लेशो न तप्तं पदं।।
ध्यातं वित्तमहर्निश नियमितप्राणैर्न शंभौः पदं।

     हिन्दी में भावार्थ-हमने दान तो किया किन्तु धर्मपूर्वक नहीं, हमने सुख का त्याग किया पर संतुष्ट होकर

नहीं, कष्ट सहन किये पर तप के लिये नहीं, ध्यान तो किया पर अपने प्राण भगवान शंकर की बजाय धन में फंसाये। यही कारण है कि मुनियों की तरह काम करने पर भी फल उन जैसा नहीं मिला।

               हम अगर पतंजलि योग   विज्ञान के साथ ही श्रीमद्भागवत गीता भी  अध्ययन करें तो यह पायेंगे कि ज्ञानी और ज्ञान साधक सहज योग करते हैं पर जिन लोगों के पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है वह असहज योग को प्राप्त होते हैं।  इंद्रियों अच्छे विषय से भी जुड़ती है तो हमारा कभी उनको दुःखद स्थितियों की तरफ धकेल देता है।  ऐसे में अच्छे विषयों से जुड़ने पर भी अज्ञानी को वह सुख नहीं मिलता तो जो ज्ञानी को मिलता है।  दुःख के साथ  सुख तो जीवन में आते हैं पर ज्ञानी और अज्ञानी  अपने विवेक के अनुसार उसे अलग अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।   ज्ञानी सहजयोग करते है जबकि अज्ञानी असहज योग में फंसा रहता है।

लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

 

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर

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