रहीम दास के दोहे: पशु अपना हित करने वाला गुड़ कभी नहीं खाते


कविवर रहीम कहते हैं
रहिमन आलस भजन में, विषय सुखहिं लपटाय
घास चरै पसु स्वाद तै, गुरु गुलिलाएं खाय

मनुष्य भजन में तो आलस्य कर जाता है पर जिन विषयों में सुख लिप्त है उनको अपने साथ सदैव लिपटाये रहता है। जैसे पशू बेस्वाद घास को तो स्वयं ही खाते हैं पर जो गुड़ उनके स्वास्थ्य के लिये हितकर है वह कभी भी अपने आप नहीं खाते। वह तभी खाते हैं जब उनके मूंह में जबरन ठूंसा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यह मनुष्य स्वभाव है जहां से उसे थोड़ी बहुत प्रसन्नता या धन मिलने की संभावना होती है वहां वह दौड़ा चला जाता है पर जहां मन की शांति और एकांत मिलता है वहां से वह भागता है। उसे लगता है कि धन और मान पाने में ही सारे सुख अंतर्निहित हैं और वह जीवन भर उसके पीछे दौड़ता है। भगवान का भजन, ध्यान, स्मरण और सत्संग उसको सुखद नहीं लगते क्योंकि उसमें कोई देखने वाला नहीं होता और एकांत में मिलने वाले उस सुख के लिये अपने मित्रों, रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों से उसे कुछ देर अपना मन विरक्त करना पड़ता है और सभी लोग इससे घबड़ाते हैं। उनको लगता है कि इस विरक्ति के दौरान कहीं उनके मन में पूर्ण सन्यास भाव न पैदा हो जाये और फिर वह अपने पर आश्रित लोगों को दुःख में छोड़ कर संसार में स्वतंत्र रूप से विचरण करने लगें। मतलब वह अपने ही मन से स्वयं डरते हैं और विषयों की गुलामी में उनको अपना हित लगता है। अगर कोई व्यक्ति उनको ज्ञान देता है तो कहते हैं कि हमें तो भजन आदि के लिये फुरसत ही नहीं मिल पाती। सच तो यह है कि सच्ची भक्ति में कोई आकर्षण नहीं है इसलिये लोग उससे कतराते हैं।
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रहीम के दोहेःईश्वर का वर्णन कोई नहीं कर सकता


रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं
जो जानत सो कहत नहिं, कहत त जानत नाहिं

कविवर रहीम कहते हैं कि परमात्मा का वर्णन करना कठिन है। उसका स्वरूप अगम्य है और कहना सुनना कठिन है जो जानते हैं वह कहते नहीं हैं जो कहते हैं वह जानते नहीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सच तो यह है कि परमात्मा के स्वरूप कोई समझ नहीं सकता । उसकी व्याख्या हर कोई अपने अनुसार हर कोई करता है पर वास्तविकता का वर्णन करना कठिन है। अनेक लोग अपने अनुसार भगवान के स्वरूप की व्याख्या करते है। पर सच तो यह है कि उनके स्वरूप का वर्णन कहना और सुनना कठिन है। उनको तो केवल भक्ति से ही धारण किया जा सकता है। परमात्मा का चरित्र वर्णनातीत है और सच्चे भक्त इस बात को जानते हैं पर कहते नहीं है और जो कहते हैं वह जानते नहीं है। अनेक लोग परमात्मा के अनेक स्वरूपों में से हरेक के जीवन चरित्र पर व्याख्या करते हुए अपना ज्ञान बघारते हैं पर सच तो यह है कि यह उनका व्यवसाय है और वह उसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं। उनके वास्तविक स्वरूप को सच्चे भक्त ही जानते हैं पर वह उसका बखान कर अपने अहंकार का प्रदर्शन नहीं करते। अनेक लोग तमाम तरह की खोज का दावा करते हैं तो कुछ लोग कहीं एकांत में तपस्या कर सिद्धि प्राप्त कर फिर समाज में अपना अध्यात्मिक सम्राज्य कायम करने के लिये जुट जाते हैं। ऐसे ढोंगी लोग परमात्मा के स्वरूप का उतना ही बखान करते है जितने से उनका हित और आय का साधन बनता हो।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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रहीम के दोहे:देता तो परमात्मा है किसी अन्य का भ्रम मत पालो


देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन
लोग भरम पै धरे, वाते नीचे नैन

कविवर रहीम कहते हैं कि इस जीवन में कुछ देने वाला तो परमात्मा है पर लोग अपने द्वारा लेने-देने की भ्रम पाल लेते है। इसी कारण हमारे नेत्र झुके रहते है।

दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि
सोच नहीं वित हानि को, जो न होय हित हानि

कविवर रहीम कहते हैं कि जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग पहचानना भी भूल जाते है। ऐसे समय में यदि अपने सहृदय लोगों से सम्मान ओर प्रेम मिलता रहे तो फिर धन की हानि की पीड़ा कम हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में कुछ लोग तो गरीब है और कुछ अमीर, पर मनुष्य का स्वभाव है कि वह माया के इस भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे लगता है कि जो अमीर है वह कुछ अधिक योग्य है और जो गरीब है वह अयोग्य। आजकल तो यह भ्रम और बढ़ गया है लोग चर्चित और धनवान लोगों को देवता समझ लेते हैं जैसे कि उनमें इंसानों जैसे गुणों के साथ कोई दोष हो ही नहीं। चारों तरफ भ्रम का साम्राज्य है। इसलिये लोग छलकपट और अपराध करके अधिक से अधिक धन कमा कर समाज में प्रतिष्ठित होना चाहते है।

समझदार और ज्ञानी लोग कभी भी भ्रम का शिकार नहीं होते उनको पता होता है कि यह सब माया का खेल है। इसलिये वह अमीर गरीब का भेद नहीं करते। ऐसे सहृदय सज्जन ऐसे किसी अमीर मित्र या रिश्तेदार का साथ नहीं छोड़ते तो उस व्यक्ति को अपने आप को धनी ही समझना चाहिए। माया तो आनी जानी है पर अगर कोई अपने लोग फिर भी सम्मान देते हैं तो समझ लो कुछ नहीं गया।

रहीम के दोहे:अपने मन की वेदना सबके सामने मत प्रगट करो


रहिमन आंसुवा नैन ढरि, जिस दुख प्रगट करेइ
जाहिं निकारो गेह तें, कस न भेद कहिं देइ

कविवर रहीम कहते हैं कि अपने दिल का हाल हर किसी से मत कहो। सबके सामने आपने आंसु गिराने से कोई लाभ नहीं। यहां लोग दूसरे की वेदना का रहस्य सबके सामने कहकर उपहास उड़ाते हैं। अपने दुःख भुलाने के लिये दूसरों की वेदना का मजाक उड़ाने में उनको मजा आता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समाज सिकुड़ रहा छोटे और विघटित परिवारों तथा अन्यत्र स्थानों पर कार्य करने की वजह से कई लोग अकेलेपन को झेल रहे हैं। ऐसे में जब उनकी पीड़ा असहनीय हो जाती है तब वह अपने आसपास के लोगों को अपना समझकर कहने लगते हैं जबकि वही लोग बाद में उनका उपहास उड़ाते है। उसके बाद होता यह है कि अपनी समरूया का हल तो होता नहीं उल्टे लोग हंसी उड़ाकर तकलीफ और देते हैं। सच बात तो यह है कि सभी लोग अनेक प्रकार के तनाव झेल रहे हैं पर जब कोई उनको तकलीफ सुनाता है तो वह यह सोचकर तसल्ली कर लेते हैं कि चलो दूसरा भी दुःखी है। अपना दर्द पीते हैं फिर कोई अपनी तकलीफ सुना जाये तो सबके सामने उसका मजाक कर अपना मनोरंजन करते हैं। उसके साथ यह हुआ। देखो उसने यह गलती कर डाली।

ऐसे में अच्छा यही है कि अपनी पीड़ा आप झेलते रहो। समय कभी एक जैसा नहीं रहता। अच्छा समय निकल गया तो बुरा भी निकल जायेगा-यही सोचकर दिल को तसल्ली देना ठीक है। अगर कोई सोचता है कि दिल का हाल सुनाकर तसल्ली हो जाये तो वह संभव नहीं है। हां, अगर यह विश्वास हो जाये कि कोई व्यक्ति वाकई समस्या का हल कर देगा तो फिर उसे सच बता देना चाहिए।

रहीम के दोहे:मांगने से सम्मान कम होता है


जानि अनीती जे करैं, जागत ही रह सोई।
ताहि सिखाई जगाईबो, उचित न होई ॥

अर्थ-समझ-बूझकर भी जो व्यक्ति अन्याय करता है वह तो जागते हुए भी सोता है, ऐसे व्यक्ति को जाग्रत रहने के शिक्षा देना भी उचित नहीं है।
कविवर रहीम का आशय यह कई जो लोग ऐसा करते हैं उनके मन में दुर्भावना होती है और वह अपने आपको सबसे श्रेष्ठ समझते हैं अत: उन्हें समझना कठिन है और उन्हें सुधारने का प्रयास करना भी व्यर्थ है।

मांगे घटत रहीम पद, कितौ करौ बढ़ि काम
तीन पैग बसुधा करो, तऊ बावनै नाम

यहाँ आशय यह है कि याचना कराने से पद कम हो जाता है चाहे कितना ही बड़ा कार्य करें। राजा बलि से तीन पग में संपूर्ण पृथ्वी मांगने के कारण भगवान् को बावन अंगुल का रूप धारण करना पडा।

रहीम के दोहे:प्रेम-पथ पर बुद्धिहीन होकर मत चलो


रहिमन मार्ग प्रेम को, मत मतिहीन मझाव
जो डिगिहै तो फिर कहूं, नहिं धरने को पाँव

कविवर रहीम कहते हैं की प्रेम-पथ पर बुद्धिहीन होकर मत चलो। यदि प्रेम में कहीं पग डगमगा गए तो फिर पैर रखने को भी स्थान नहीं मिलेगा।

रहिमन मांगत बडेन की, लघुता होत अनूप
बलि मख मांगत को गए, धरि बावन को रूप

कविवर रहीम कहते हैं की महान पुरुषों की याचना का छोटा रूप भी अनुपम होता है। भगवान ने राजा बलि के यज्ञ में संपूर्ण पृथ्वी को मांगने हेतु केवल बावन अंगुल का स्वरूप धारण किया था।

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