अयोध्या में राम मंदिर कब बन पायेगा-हिन्दी हास्य कविता (ayodhya mein ram mandir kab ban paeyga-hindi hasya kavita)


एक राम भक्त ने दूसरे से कहा
‘वैसे तो राम सभी जगह हैं,
हमारे अध्यात्मिक ज्ञान की बड़ी वजह हैं,
घर घर में बसे हैं,
घट घट में इष्ट की तरह श्रीराम सजे हैं श्रीराम
पर फिर भी जिज्ञासावश
अयोध्या के राम मंदिर का ख्याल आता है,
चलो किसी समाज सेवक से चलकर
पूछ लेते हैं कि
वह कब तक बन पाता है।’

सुनकर दूसरे राम भक्त ने कहा
‘भला तुमको भी समाजसेवकों की तरह
अपनी आस्था की परीक्षा क्या ख्याल क्यों आता है,
अरे, अयोध्या के मंदिर का मामला
बड़े लोगों का है
यह पता नहीं उनका वास्तव में
राम भक्ति से कितना नाता है,
अलबत्ता चाहो तो किसी सट्टेबाज या
बाज़ार के सौदागरों से पूछ लेते हैं,
चाहे जो भी जनचर्चा को विषय हो
उसमें अपने भगवान पैसे को पूज लेते हैं,
प्रचारक अब क्रिकेट जैसे खेल में भी
भगवान का स्वरूप गढ़ने लगे हैं
शिकायत भी वही करते हैं कि
अंधविश्वासी लोग बढ़ने लगे हैं,
चुनाव हो या क्रिकेट
जीत हार फिक्स कर लेते हैं,
सौदा और सट्टा मिक्स कर लेते हैं,
समाज सेवा में भी उनके दलाल पलने लगे हैं,
धर्म कर्म भी उनके इशारे पर चलने लगे हैं,
सट्टेबाज़ जिज्ञासाओं और आशाओं की आड़ में कमाते हैं
इसलिये इंसानों को उसमें फंसाते हैं
हम तो बरसों से सुनते हुए राम मंदिर प्रसंग भुला बैठे,
पर बड़े लोग इसे चाहे जब झुला बैठे,
इसलिये सौदागरों से यह पूछना होगा कि
कब राम मंदिर पर उनका दिल आयेगा,
सट्टेबाजों से पूछना होगा
उनका आंकड़ा कब हिल पायेगा,
अपुन ठहरे आम भक्त,
अंदर से पुख्ता, बाहर अशक्त,
अपने राम तो मन में बसे रहेंगे,
एक जगह न ठहर सभी जगह
कल्याण करते बहेंगे,
कण कण में देखते रूप उनका
काम नहीं करती अक्ल इस पर कि
अयोध्या में राम मंदिर कब बन पायेगा।’’
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हादसे और सर्वशक्तिमान का दरब़ार-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (hadsa aur darbar-hindi vyangya kavitaen)


अब तो हादसों के इतिहास पर भी
सर्वशक्तिमान के दरबार बनते हैं,
जिनके पास नहीं रही देह
उन मृतकों के दर्द को लेकर
जिंदगी के गुढ़ रहस्य को जो नहीं जानते
वही उफनते हैं,
जज़्बातों के सौदागरों ने पहन लिया
सर्वशक्तिमान के दूत का लबादा,
भस्म हो चुके इंसानों के घावों की
गाथा सुना सुनाकर
करते हैं आम इंसानों से दर्द का व्यापार
क्योंकि उनके महल ऐसे ही तनते हैं।
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इंसानों को दर्द से जड़ने का जज़्बा
भला वह अक्लमंद क्या सिखायेंगे,
जो हादसों में मरों के लिये झूठे आंसु बहाकर,
सर्वशक्तिमान के दरबार सजाकर
लोगों का अपना दर्द दिखायेंगे,
यह अलग बात है कि उनके भौंपू
उनका नाम इतिहास में
सर्वशक्तिमान के दूत की तरह लिखायेंगे।
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खुल गयी प्यार की पोल-हिन्दी हास्य कविता(khul gayi pyar ki pol-hindi haysa kavita)


आशिक ने कहा माशुका से
‘‘मुझसे पहले भी बहुत से आशिकों ने
अपनी माशुकाओं के चेहरे की तुलना
चांद से की होगी,
मगर वह सब झूठे थे
सच मैं बोल रहा हूं
तुम्हारा चेहरा वाकई चांद की तरह है खूबसूरत और गोल।’’

सुनकर माशुका बोली
‘‘आ गये अपनी औकात पर
जो मेरी झूठी प्रशंसा कर डाली,
यकीनन तुम्हारी नीयत भी है काली,
चांद को न आंखें हैं न नाक
न उसके सिर पर हैं बाल
सूरज से लेकर उधार की रौशनी चमकता है
बिछाता है अपनी सुंदरता का बस यूं ही जाल,
पुराने ज़माने के आशिक तो
उसकी असलियत से थे अनजान,
इसलिये देते थे अपनी लंबी तान,
मगर तुम तो नये ज़माने के आशिक हो
अक्षरज्ञान के भी मालिक हो,
फिर क्यूं बजाया यह झूठी प्रशंसा का ढोल,
अब अपना मुंह न दिखाना
खुल गयी तुम्हारी पोल।’’
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हिन्दू धर्म संदेश-अपव्ययी का पतन शीघ्र होता है


अनालोक्य व्ययं कर्ता ह्यनाथःः कलहप्रियः।
आतुर सर्वक्षेत्रेपु नरः शीघ्र विनश्चयति ।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि बिना विचारे ही अपनी आय के साधनों से अधिक व्यय करने वाला सहायकों से रहित और युद्धों में रुचि रखने वाला तथा कामी आदमी का बहुत शीघ्र विनाश हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-आज समाज में आर्थिक तनावों के चलते मनुष्य की मानसिकता अत्यंत विकृत हो गयी है। लोग दूसरों के घरों में टीवी, फ्रिज, कार तथा अन्य साधनों को देखकर अपने अंदर उसे पाने का मोह पाल लेते हैं। मगर अपनी आय की स्थिति उनके ध्यान में आते ही वह कुंठित हो जाते हैं। इसलिये कहीं से ऋण लेकर वह उपभोग के सामान जुटाकर अपने परिवार के सदस्यों की वाहवाही लूट लेते हैं पर बाद में जहां ऋण और ब्याज चुकाने की बात आयी वहां उसके लिये आय के साधनों की सीमा उनके लिये संकट का कारण बन जाती है। अनेक लोग तो इसलिये ही आत्महत्या कर लेते हैं क्योंकि उनको लेनदार तंग करते हैं या धमकी देते हैं। इसके अलावा कुछ लोग ठगी तथा धोखे की प्रवृत्ति अपनाते हुए भी खतरनाक मार्ग पल चल पड़ते हैं जिसका दुष्परिणाम उनको बाद में भोगना पड़ता है। इस तरह अपनी आय से अधिक व्यय करने वालें जल्दी संकट में पड़ जाने के कारण अपने जीवन से हाथ धो बैठते हैं। समझदार व्यक्ति वही है जो आय के अनुसार व्यय करता है। आय से अधिक व्यय करना हमेशा ही दुःख का मूल कारण होता है।
यही स्थिति उन लोगों की भी है जो नित्य ही दूसरों से झगड़ा और विवाद करते हैं। इससे उनके शरीर में उच्च रक्तचाप और हृदय रोग संबंधी विकास अपनी निवास बना लेते हैं। अगर ऐसा न भी हो तो कहीं न कहीं उनको अपने से बलवान व्यक्ति मिल जाता है जो उनके जीवन ही खत्म कर देता है या फिर ऐसे घाव देता है कि वह उसे जीवन भर नहीं भर पाते। अतः प्रयास यही करना चाहिये कि शांति से अपना काम करें। जहाँ तक हो सके अपने ऊपर नियत्रण रखें।

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-बुद्धि और परिश्रम के संयुक्त प्रयास से ही सफलता संभव


धातोश्चामीकरमिव सर्पिनिर्मथनादिव।
बुद्धिप्रयत्नोपगताध्यवसायाद्ध्रवं फलम्।।
हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह अनेक धातुओं में मिला होने पर भी गलाने से प्रकट होता है तथा दही मथने से घृत प्रगट होता है वैसे बुद्धि और उद्योग से के संयुक्त उद्यम से फल की प्राप्ति भी होती है।
सूक्ष्मा सत्तवप्रयत्नाभ्यां दृढ़ा बुद्धिरधिष्ठिता।

प्रसूते हि फलं श्रीमदरणीय हुताशनम्।।

हिन्दी में भावार्थ-जो बुद्धि सूक्ष्म तत्त्वगुण का ज्ञान होने से दृढ़ स्थिति में है वह धन रूपी फल को उत्पन्न करती है जिस प्रकार अरणी काष्ट अग्नि को प्रकट करता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्रीगीता में वर्णित ज्ञान की लोग यह सोचकर उपेक्षा करते हैं कि वह तो सांसरिक कार्य से विरक्ति की ओर प्रेरित कर सन्यास मार्ग की ओर ले जाता है। यह अल्पज्ञान का प्रंमाण है। सच तो यह है कि उसमें वर्णित तत्व ज्ञान को जिसने भी धारण कर लिया उसकी बुद्धि दृढ़ मार्ग पर चल देती है। वह छोटी मोटी बातों पर न ध्यान देता है न उसे मान अपमान की चिंता रहती है। जिनसे मनुष्य को विचलित किया जा सकता है वह मायावी प्रयास उसे अपने मार्ग से डिगा नहीं सकते।  यही कारण है कि अपने बौद्धिक संतुलन और एकाग्रता से अन्य के मुकाबले तत्वज्ञानी  अधिक सफल रहता है।  निष्काम भाव से उद्योग करने का आशय यह कतई नहीं है कि सारे संसार के काम को तिलांजलि देकर बैठा जाये बल्कि उपलब्धि प्राप्त होने पर हर्षित होकर चुप न बैठें और न नाकामी होने पर हताश हों, यही उसका आशय है। 

तत्वज्ञान का आशय यह भी है कि जीवन पथ पर उत्साह के साथ बढ़ें। समय के साथ मनुष्य को भी बदलना पड़ता है। अच्छे, बुरे, मूर्ख और चतुर व्यक्तियों से उसका संपर्क होता है, उनसे व्यवहार करने का तरीका केवल तत्वज्ञानी ही जानते हैं। तत्व ज्ञान से जो बुद्धि में स्थिरता आती है उससे दूसरे लोग अपने छल, चालाकियों तथा मिथ्या ज्ञान से विचलित नहीं कर सकते।  वर्तमान में हम देखें तो विश्व आर्थिक शिखर पर बैठे लोगों का  सारा ढांचा ही मिथ्या ज्ञान तथा काल्पनिक स्वर्ग बेचने पर आधारित है। अगर लोगों में तत्व ज्ञान हो तो शायद ऐसे दृश्य देखने को नहीं मिलें जिसमें लोगों को जीते जी जमीन पर मरने पर आसमान में स्वर्ग खरीदते हुए अपना धन तथा समय बरबाद करते हैं। इस दुनियां में अनेक लोगों का व्यापार तो केवल इसलिये ही चल रहा है कि लोगों को अध्यात्म का ज्ञान नहीं है।
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खामोश तूफान-हिन्दी शायरी (khamosh toofan-hindi shayari)


दीवार के उस तरफ
वह आग की तरह उफन रहे हैं
यह सोचकर कि इस पार
पहुंचते ही तिनके को जला डालेंगे।
अंदाज नहीं उनको इस बात का कि
यहां भी कोई खामोश तूफान सांस ले रहा है
यह ख्याल करते हुए कि
हवाओं का रुख पलटा है कई बार
इस बार आग को भी भस्म कर डालेंगे।
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थोड़े प्यार की उम्मीद थी
उसे भी न दे सके
लगाई ऊंची कीमत उन्होंने अपनी दोस्ती की
यह सोचकर कि
लाचार को बिचारा बना देंगे।
टूट गया है तिलिस्म उनके विश्वास का
भले ही अपने घमंड का आसरा है उनको
पर जब आकर देखेंगे टूटा दिल
तब अपने ख्याल ही उनको हरा देंगे।
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चाणक्य नीति-उत्तम पुरुषों को गलत बताने वाले कष्ट उठाते हैं


दारिद्रयनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी।।
हिंदी में भावार्थ-
दान से दरिद्रता, शील भाव से दुर्भाग्य तथा निष्ठा से भय का नाश होता है।
अन्यथा वेदपाण्डितयं शास्त्रमाचारमन्यतथा।
अन्यथा कुवचः शान्तं लोकाः क्लिश्चन्ति चान्यथा।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो लोग वेदों में वर्णित तत्वज्ञान, शास्त्रों में विधान और उत्तम पुरुषों के चरित्र को गलत बताते हैं वह इस लोक में स्वयं ही भारी कष्ट उठाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-कभी भी किसी भी प्रकार के धर्मग्रंथ की आलोचना या विरोध नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि धर्म ग्रंथ तो निश्चित कालावधि में तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार लिखे जाते हैं जबकि पृथ्वी और प्रकृति के स्वरूप में बदलाव के साथ ही मनुष्य की जीवन शैली में बदलाव आता है और इसी कारण धर्मग्रंथों के कुछ संदेश समय के साथ अप्रासंगिक लगते हैं। अतः धर्म ग्रंथों की आलोचना करना उचित नहीं है।
हां, भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित तत्वज्ञान में कभी बदलाव नहीं आता क्योंकि उसमें जीवन के मूल तत्वों की जानकारी देने के साथ ही उसका सदुपयोग करने की प्रक्रिया का भी वर्णन मिलता है। विश्व में भले ही कितने प्रकार के भौतिक परिवर्तन आयें पर जीवन के तत्वों का निर्धारण करने वाली प्रक्रिया में बदलाव संभव नहीं है।
इसके अलावा एक बात ध्यान रखें कि प्राचीन ग्रंथों में वर्णित महापुरुषों पर विश्वास करें या नहीं पर उनको गलत नहीं बताना चाहिये। संभव है उनका चरित्र वर्तमान समय के हिसाब से अतार्किक या चमत्कारी लगता हो पर यह बात याद रखना चाहिये कि अनेक लोग उनको बहुत मानते हुए उनकी भक्ति तक करते हैं। ऐसे में महापुरुषों को गलत बताना या उपहास नहीं उड़ाना चाहिये क्योंकि इससे उनके भक्तों का मन रुष्ट होता है। महापुरुष स्वयमेव इस धरा पर न हों इसलिये उनसे किसी प्रकार की हानि की आशंका नहीं होती पर उनके भक्तों के मन को जो कष्ट पहुंचता है उसका बुरा प्रभाव जरूर पड़ सकता है। जो लोग प्राचीन महापुरुषों की निंदा करते हैं या उनका मजाक उड़ात हैं अंततः उनको इसका दुष्परिणाम भोगना ही पड़ता है।
भारतीय वेदों तथ अन्य धर्मग्रंथों की आलोचना करने वाले अपना उल्लू सीधा करने करने के लिये भारतीय धर्मग्रंथों के ऐसे चंद श्लोक या दोहे लेकर लोगों को बरगलाते हैं जो अब अप्रासांगिक हो गये हैं या लोग उस पर ध्यान नहीं देते। ऐसे लोग अज्ञान के अंधेरे में रहते हैं क्योंकि वह उनमें वर्णित तत्वज्ञान को नहीं जानते। ऐसे लोग भले ही चाहे कितनी भी प्रतिष्ठा या धन अर्जित कर लें पर सुखी नहीं रहते। वह नहीं जानते कि समाज के सहज संचालन के लिये भारतीय अध्यात्मिक दर्शन बहुत महत्वपूर्ण है। वह धनिक लोगों को दान देने के लिये प्रेरित करता है ताकि समाज की गरीब पर नियंत्रण हो। इतना ही नहीं उत्तम चरित्र से ही व्यक्ति के साथ ही समाज का निर्माण होता है। अक्सर लोग दूसरों के चरित्र पर तो लांछन लगाते हैं पर अपनी तरफ नहीं देखते। अगर सभी लोग तय करें तकि हम अपना चरित्र सही रखेंगे तो निश्चित रूप से देश में एक महान समाज का निर्माण होगा। यही बात भय के संबंध में भी कही जा सकती है। जब व्यक्ति की सब तरफ निष्ठा समाप्त हो जाती है तो वह अपने आप को एकाकी अनुभव करता है जिससे उसके मन भय का निर्माण होता है। इसलिये भगवान भक्ति से पुण्य मिले या नहीं पर अपने अंदर एक भय होता है जिससे हम निजात पा सकते हैं। कहने का का तात्पर्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथो की आलोचना करने वाले न अपने को सुखी रख पाते हैं न उन लोगों को लाभ होता है जो उनका अनुसरण करते हैं। सच बात तो यह है कि दूसरे की आस्था और भक्ति पर सवाल उठाने की बजाय अपने चरित्र और स्थितियों का मंथन करना चाहिये। भारतीय धर्म ग्रंथों पर आक्षेप करने वाले यह भूल जाते हैं कि उनमें वर्णित ऐसा ज्ञान है जिसकी आज विदेशों में भी साख है।

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