सांसरिक चतुराई तो हर कोई सीख लेता है-हिन्दू धर्म सन्देश


लिखना पढ़ना चातुरी, यह संसारी जेव।
जिस पढ़ने सों पाइये, पढ़ना किसी न सेव।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि लिखना, पढ़ना चतुराई करना यह तो संसार की सामन्य बातें हैं। जिस परमात्मा का नाम पढ़कर समझना चाहिये उसे कोई नहीं मानता।
ज्ञानी ज्ञाता बहु मिले, पण्डित कवी अनेक।
राम रता इन्द्री जिता, कोटी मध्ये अनेक।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं इस संसार में ज्ञानी और विद्वान बहुत मिले। पण्डित और कवि भी बहुत हैं। परन्तु राम भक्ति में लीन अपनी इंद्रियों को जीतने वाला करोड़ो में कोई एक होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी यही कहा कि हजारों में कोई एक मुझे भजता है। उन हजारों में भी कोई एक मुझे हृदय से भजता है।
मनुष्य का मन जब संसार के कार्य से ऊब जाता है तब वह कुछ नया चाहता है। कुछ लोग फिल्म और धारावाहिक देखकर मनोरंजन करते हैं तो कुछ गाने सुनकर। कुछ लोग भगवान भक्ति भी यह सोचकर करते हैं कि इससे मन को राहत मिल जाये। उनमें श्रद्धा का अभाव होता है इसलिये भक्ति करने के बाद उनके आचार, विचार और कर्म में कोई अंतर दृष्टिगोचर नहीं होता। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो सच्ची श्रद्धा से भगवान की भक्ति कर पाते हैं।

इस संसार में जिसे अवसर मिलता है वह पढ़ता लिखता तो अवश्य ही है और इस कारण उसमें चतुराई भी आती है। मगर इससे लाभ कुछ नहीं है। ऐसे कई प्रसंग अब सामने आने लगेे हैं जिसमें पढ़े लिखे लोग ही धर्म परिवर्तन कर दिखाते हैं कि उनमें समाज और परिवार के प्रति विद्रोह है। धर्म परिवर्तन कर विवाह करने वाले अधिकतर लोग शिक्षित ही रहे हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि आधुनिक शिक्षा आदमी को शिक्षित तो बना देती है पर अध्यात्मिक ज्ञानी नहीं। कहने को यही शिक्षित कहते हैं कि धर्म क्या चीज है पर भारतीय अध्यात्म ज्ञान के अभाव में वही धर्म परिवर्तन कर लेते हैं। आप उनसे पूछिये कि धर्म अगर कोई चीज नहीं है तो उसे बदला क्यों? अगर आप देश में चल रहे भाषा, जाति, धर्म और क्षेत्र के नाम पर चल रहे झगड़ों को देखें तो उनमें शिक्षित लोग ही अधिक लिप्त हैं। इससे यह तो जाहिर हो जाता है कि शिक्षित होने से इंसान ज्ञानी नहीं हो जाता। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में आदमी भटकाव की राह पर चला जाता है। इसलिये जितना हो सके अपने घर पर अध्यात्मिक ज्ञान की पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए।
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विदुर नीति-अर्थ प्राप्ति के लिए धर्म का पालन करें (arth aur dharm-hindu adhyamik sandesh)


यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च निवेशितः।
तेन स्र्वमिदं बुद्धम् प्रकृतिर्विकृतिश्चय वा।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिसकी बुद्धि पाप से परे होकर कल्याण के मार्ग पर आ जाये वह इस संसार में हर वस्तु कि प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह से जान लेता है।

अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्।
न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अर्थ प्राप्त करने की इच्छा है उसे धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए। जिस तरह स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह कहना गलत है धर्म के मार्ग पर अर्थ की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्म-ईमानदारी, सहजता, परमार्थ, और अपने कर्तव्य से प्रतिबद्धता-का परिणाम ही अर्थ की प्राप्ति ही है। यह अलग बात है कि जल्दी अमीर बनने या आवश्यकता से अधिक धनार्जन के के लिये लोग अपने जीवन में आक्रामक और बेईमानी की प्रवृत्ति अपना लेते हैं। इस संसार में ऐसे लोग भी है जो बेईमानी से धन कमाकर कथित रूप से प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का आकर्षण समाज के युवाओं को आकर्षित करता है पर उनको यह समझ लेना चाहिये कि बेईमान और भ्रष्ट लोगों को धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल की शक्ति की वजह से सामने कोई कुछ नहीं कहता पर पीठ पीछे सभी लोग उनके प्रति घृणा का भाव दिखाने से नहीं चूकते। फिर भ्रष्ट और बेईमान लोग का धन जिस तरह बर्बाद होता है उसे भी देखना चाहिये।

नीति विशारद विदुर जी के अनुसार जिस व्यक्ति ने ज्ञान प्राप्त कर लिया वह इस संसार में व्यक्तियों, वस्तुओं और स्थितियों की प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह समझ जाते हैं। इस ज्ञान से वह विकृतियों से परे रहने में सफल रहते हैं और प्रकृतियां उनका स्वतः ही मार्ग प्रशस्त करती हैं। अत: जितना हो सके योग साधना तथा अन्य उपायों द्वारा अपनी बुद्धि को शुद्ध रखने का प्रयास करना चाहिए।
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श्री गीता से-वेद ज्ञान से बड़ी है ह्रदय से की गए भक्ति (ved aur bhakt-shri geeta in hindi)


यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदावादरताः पार्थ नान्यदरस्तीति वादिनः।।
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।
भोगैश्वर्यप्रस्कतानां तयापहृतचेसाम्।।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।।
(श्री गीता के अध्याय दो के श्लोक क्र. 42, 43, 44)
हिंदी में भावार्थ-जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है जो कहते हैं कि स्वर्ग से बढ़कर कोई वस्तु नहीं है, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकार दिखावटी आकर्षक वाणी कहते हैं, जो मनुष्य जन्म रूप कर्मफल देने वाले भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये अनेक प्रकार के प्रयास करते हैं और वाणी द्वारा जिनका चित हर लिया गया है, जिनकी बुद्धि भोग और ऐश्वर्य प्राप्ति के व्यवसाय में आसक्त है उनकी परमात्मा में निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती।
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रविष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्।।
(श्री गीता के अध्याय 8 का श्लोक क्रमांक 28)
हिंदी में भावार्थ-योगी पुरुष ज्ञान रहस्य के तत्व को जानकर वेदों को पढ़ने तथा यज्ञ, तप दानादि के करने में पुण्यफल कहा है उन सबका निःसंदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परमपद को प्राप्त होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार भी है। अगर हम श्रीगीता के उपरोक्त श्लोकों को देखें तो उनसे यही आशय निकलता है कि भगवान श्रीकृष्ण जी ने वेदों में स्वर्ग दिलाने वाले कर्मकांडों को महत्व न देते हुए केवल उनमें ही लिप्त रहने को अज्ञान का प्रमाण माना है। हालांकि श्रीगीता में अनेक स्थानों पर वेदों की चर्चा है पर स्वर्ग के लिये कर्मकांडों में मनुष्य को लिप्त करने वाले उनके संदेशों को एक तरह से भगवान श्री कृष्ण ने द्वारा खारिज किया गया है।
दूसरे शब्दों में कहें तो भगवान श्रीकृष्ण जी ने इन पवित्र वेदों से तत्वज्ञान के साथ जीवन एवं सुष्टि रहस्यों का सार लेकर अपने गीता संदेश में प्रस्तुत किया और स्वर्ग के प्रयासों सकाम भक्ति मान लिया। यही कारण है कि उनके द्वारा निष्काम भक्ति तथा निष्प्रयोजन दया के सिद्धांत का प्रतिपादन करने से समाज में वेदों से अधिक श्रीगीता का महत्व बढ़ गया। यहां याद रहे वेदों में सभी प्रकार की भक्ति की बात कही गयी है। यही कारण है कि समाज में बहुदेव वादी संस्कृति और पूजा पद्धतियों का निर्माण हुआ। अपने समय में वेदों का बहुत महत्व रहा है पर श्रीगीता की स्थापना के बाद उनकी सहायक भूमिका ही रह गयी। अक्सर वेदों को लेकर देश के ही कुछ कथित विद्वान अपने ही धर्म की आलोचना करते हैं पर उनको पता ही नहीं कि श्रीगीता में ही अब भारतीय अध्यात्म में मूल तत्व विराजमान हैं।
भगवान श्रीकृष्ण समाज में धर्म के नाम पर वैमनस्य फैलने की प्रवृत्ति को रोकना चाहते थे और इसलिये उन्होंने श्रीगीता की स्थापना की। उसमें केवल अध्यात्मिक शांति के लिये तत्वज्ञान ही नहीं है बल्कि दैहिक रूप से मनुष्य अपना जीवन स्वस्थ और प्रसन्नचित होकर गुजारे इसके लिये विज्ञान रहस्य भी उसमें शामिल है। अक्सर अनेक लोग आलोचकों के प्रतिकार के लिये वेदों की प्रशंसा कर अपना समय नष्ट करते हैं उनको इस बात का आभास ही नहीं है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अनेक स्थानों पर वेदों के ज्ञान को अस्वीकार किया है। दरअसल हमारा समाज सतत चलता रहता है और उसमें रूढ़ता की प्रवृत्ति नहीं है इसलिये वेदों से निकले ज्ञान को अनेक महापुरुष अपने उन वचनों और रचनाओं में स्थान देते रहे हैं जो हमेशा ही समाज के लिये हितकर हैं और समाज भी उनको ग्रहण करता रहा है। श्रीगीता की स्थापना ने भारतीय समाज को न केवल अध्यात्मिक रूप से दृढ़ता प्रदान की बल्कि सांसरिक कार्यों को संपन्न करने का संबल भी प्रदान किया। यही कारण है कि आज समाज में लोग वेदों में अधिक दिलचस्पी नहीं लेते क्योंकि श्रीगीता के साथ ही बाल्मीकी रामायण तथा श्रीमद्भागवत भी हृदय को प्रसन्न करने वाले ग्रंथ हैं। मजे की बात यह है कि भारतीय धर्मों के आलोचक वेदों से तो श्लोक उठाते हैं पर इन ग्रंथों में कुछ ढूंढने से कतराते हैं क्योंकि उनको अपने ही हृदय परिवर्तन की आशंका रहती है।
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चाणक्य नीति-प्रतिकार प्रतिहिंसा और प्रतिकार के भाव में दोष नहीं (chankya niti-time to time, life style)


संसार विषवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे।
सुभाषितं च सुस्वादु संगतिः सुजने जनै।।

हिन्दी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य जी कहते हैं कि इस विषरूपी संसार में दो तरह के फल अमृत की तरह लगते हैं। एक तो सज्जन लोगों की संगत और दूसरा अच्छी वाणी सुनना।
कृते प्रतिकृतं कुर्याद् हिंसने प्रतिहिसंनम्।
तत्र दोषो न पतति दुष्टे दुष्टे सामचरेत्
हिंदी में भावार्थ-
अपने प्रति अपराध और हिंसा करने वाले के विरुद्ध प्रतिकार और प्रतिहिंसा का भाव रखने में कोई दोष नहीं है। उसी तरह दुष्ट व्यक्ति के साथ वैसे ही व्यवहार करना कोई अपराध नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में वैसे तो दुःख और विष के अलावा अन्य कुछ नहीं दिखता पर दो तरह के फल अवश्य हैं जिनका मनुष्य अगर सेवन करे तो उसका जीवन संतोष के साथ व्यतीत किया जा सकता है। इसमें एक तो है ऐसे स्थानो पर जाना जहां भगवत्चर्चा होती हो। दूसरा है सज्जन और गुणी लोगों से संगत करना। दरअसल इस स्वार्थी दुनियां में निष्काम भाव से कुछ समय व्यतीत करने पर ही शांति मिलती है और यह तभी संभव है जब हम स्वार्थ की वजह से बने रिश्तों से अलग ऐसे संतों और सत्पुरुषों की संगत करें जिनका हम में और हमारा उनमें स्वार्थ न हो। इसके अलावा आत्मा को प्रसन्न करने वाली कहीं कोई बात सुनने को मिले तो वह अवश्य सुनना चाहिये।
कहते हैं कि मन में बुरा भाव नहीं रखना चाहिये पर अगर कोई हमारे साथ बुरा बर्ताव करता है तो उससे चिढ़ हो ही जाती है। पंच तत्व से बनी इस देह में बुद्धि, मन और अहंकार ऐसी प्रकृतियां हैं जिन पर चाहे जितना प्रयास करो पर नियंत्रण हो नहीं पाता। सज्जन लोग किसी अन्य द्वारा बुरा बर्ताव करने पर उससे मन में चिढ़ जाते हैं पर बाद में वह इस बात से पछताते हैं कि उनके मन में बुरी बात आई क्यों? अगर किसी बुरे व्यक्ति के बर्ताव से गुस्सा आता है तो उससे विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। वैसे जीवन में सतर्कता और सक्रियता आवश्यक है। कोई व्यक्ति हमारे अहित के लिये तत्पर है तो उसका वैसा ही प्रतिकार करने में कोई बुराई नहीं है। बस! इतना ध्यान रखना चाहिये कि उससे हम बाद में स्वयं मानसिक रूप से स्वयं प्रताड़ित न हों।
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मनु स्मृति-अध्ययन में सुस्ती नहीं करें (manu smriti-shiksha aur susti)


अध्येयष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः।
‘अधीष्व भो! इति ब्रुयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
शिष्य को पढ़ाने के विषय में गुरु को कभी भी आलस नहीं बरतना चाहिये। इसके अलावा बेमन से भी अध्यापन का कार्य करना उचित नहीं है। अध्यापन प्रारंभ करने से पहले छात्र से कहना चाहिये कि ‘पढ़ो’ और समाप्ति पर कहना चाहिये कि विश्राम करो।
ब्रह्यणः प्रणवः कुर्यादादावन्ते च सर्वदा।
स्त्रवत्यनोंकृतं पूर्व परस्ताच्च विशीर्यति।।
हिंदी में भावार्थ-
गुरु का यह कर्तव्य है कि वह अध्यापन प्रारंभ करने से पहले ॐ शब्द का आप छात्र से करावे। ऐसा न करने से पढ़ा हुआ स्मरण में नहीं रहता। इस कारण दोनों का परिश्रम व्यर्थ हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वर्तमान शिक्षा पद्धति में अनेक दोष हैं और इसी कारण हमारे यहां समाज में विकृत्तियां बढ़ती जा रही है। हम समाज के आचरण को लेकर तमाम तरह की निराशाजनक प्रतिक्रियायें तो व्यक्त करते हैं पर उसमें सुधार की कोई योजना हमारे पास नहीं है। किसी भी मनुष्य में संस्कार और बौद्धिक निर्माण का समय उसका छात्र जीवन ही रहता है। उस समय संयम और नियम से जीवन व्यतीत करने पर ही शिक्षा प्राप्त हो सकती है। समाज चल रहा है इसकी विपरीत दिशा में। आजकल तो छात्र जीवन ही मौज मस्ती का माना जाता है और कहा जाता है कि आजकल बच्चे अपने माता पिता से अधिक कुशाग्र बुद्धि हैं क्योंकि वह मोबाइल और टीवी का रिमोट चलाना जानते हैं। मगर हम संस्कारों की बात नहीं करते जिनके बारे में सभी मानते हैं कि उनका क्षरण हो गया है। छात्र जीवन में ज्ञान प्राप्त करने के साथ ही इस बात की भी होड़ लगी है कि उसका अधिक से अधिक प्रदर्शन किया जाये।
कहते हैं कि भजन और भक्ति तो बुढ़ापे में किया जाना चाहिये जबकि सच यह है कि जो संस्कार बचपन में नहीं पड़े फिर उनकी स्थापना एकदम कठिन है। ऐसे में बचपन से बच्चों को अपनी नियमित शिक्षा के साथ ही आध्यात्म का ज्ञान भी दिया जाना चाहिये। विद्यालयों में तो यह शिक्षा मिलती नहीं है इसलिये माता पिता या दादा दादी को ही यह दायित्व उठाना चाहिये।
ॐ शब्द का हमारे अध्यात्म में बहुत महत्व है और इसलिये अध्ययन से पूर्व उसका जाप मन ही मन में अवश्य करना चाहिये। शब्दों में ओम को सर्वोत्तम माना गया है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में तो इसका जाप अध्यापक कराते नहीं है इसलिये माता पिता को चाहिये कि वह अपने बच्चों को इसका जाप करने का संदेश दें। इसके जाप से पढ़ा हुआ याद रहता है और इससे मन भी स्वच्छ रहता है।
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विदुर नीति-अमीर रिश्तेदार के पास जाकर बेकार में दुःख पाना (vidur niti-amir ke pas jana)


ज्ञातयस्यतारयन्तीह ज्ञातयो मज्जयन्ति च।
सुवृत्तास्तारयन्तीह दुर्वंतत्ता मज्ज्यन्ति च।।
हिंदी में भावार्थ-
इस संसार में अपने ही जाति बंधु जीवन की नैया पार भी लगाते हैं तो डुबोते भी है। जो सदाचारी है वह तो तारने के लिये तत्पर रहते हैं और जो दुराचारी है वह डुबा देते हैं।

श्रीमन्तं ज्ञातिमासाद्य यो ज्ञातिरवसीदति।
दिग्धहस्तं मृग इव स एनस्तस्य विन्दति।।
हिंदी में भावार्थ
-जिस तरह मृग विषैला बाण हाथ में लिये शिकारी के पास पहुंचकर कष्ट पाता है वैसे ही मनुष्य अपने धनी बंधु के पास कष्ट पाता है। वह धन देने से इंकार कर दे तो कष्ट होता है और दे तो उसके पाप का भागी बनता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पता नहीं कब कैसे जातियां बनी पर मनुष्य के स्वभाव को देखते हुये तो यही कहा जा सकता है कि अपनी सुरक्षा के लिये उसने जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म के नाम पर समूह बना लिये। यह पक्रिया इतने स्वाभाविक ढंग से हुई कि पता ही नहीं चला होगा। बहरहाल प्रत्येक मनुष्य में अपने समाज या समूह के प्रति लगाव होता है भले ही वह स्वार्थ के कारण हों। इसका उसे लाभ भी मिलता है जब कोई शादी या गमी का अवसर आता है तब अनेक लोग एक दूसरे से जुड़ते हैं। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि अगर किसी व्यक्ति के यहां कोई दुर्घटना हो जाये और वह अगर उससे छिपाना चाहे तो भी नहीं छिप सकती। वजह! जाति भाई जाकर सभी जगह वैसे ही बता देंगे। अगर किसी व्यक्ति के घर या परिवार में कोई दोष हो तो अन्य समाज या समूह के लोग नहीं जान पाते पर सजातीय बंधु यह काम करने में चूकते नहीं है-मतलब यह कि सजातीय लोग ही बदनाम करने में लग जाते हैं।
सदाचारी जातीय बंधु तो जीवन नैया तार देते हैं और दुराचारी डुबो देते हैं पर आजकल यह भी देखना चाहिये कि इस धरती पर कितने सदाचारी और कितने दुराचारी लोग विचरण कर रहे हैं। सजातीय बंधुओं से खतरा इस कारण भी बढ़ता है कि हम उन्हें अपना समझकर अपने घर की बात या घटना बता देते हैं ताकि समय पर वह हमारी सहायता करे। इसकी बजाय वह उसका प्रचार कर बदनाम करते हैं। अगर उनके साथ घर के राज की चर्चा ही नहीं की जाये तो फिर वह ऐसा नहीं कर सकते।

वैसे आजकल तो रहन, सहन, और व्यवहार का स्वरूप एक जैसा ही हो गया है अतः सजातीय बंधुओं से सहयोग और संपर्क की अपेक्षा करने की बजाय समस्त मित्रों और पड़ौसियों से-जातीय भाव की उपेक्षा कर-व्यवहार रखना चाहिये। पहले सजातीय बंधुओं से संपर्क स्वाभाविक रूप से इसलिये भी होता था क्योंकि सभी लोग मोहल्लों और गलियों में जातीय समूह की अधिकता देखकर बसते थे। अब तो कालोनियां बन गयी हैं जिसमें विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग रहते हैं। ऐसे मेें सजातीय बंधुओं से एक सीमा तक ही संपर्क रह पाता है।
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विदुर नीति-बुद्धिमान से बैर करना ठीक नहीं (buddhiman se bair-vidur niti)


विदुर महाराज कहते हैं कि
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बुद्धिमान व्यक्ति के प्रति अपराध कर कोई दूर भी चला जाये तो चैन से न बैठे क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति की बाहें लंबी होती है और समय आने पर वह अपना बदला लेता है।
संक्षिप्त व्याख्या-कई मूर्ख लोग सभ्य और बुद्धिमान व्यक्तियों को अहिंसक समझकर उनका अपमान करते हैं। उनके प्रति अपराध करते हुए उनको लगता है कि यह तो अहिंसक व्यक्ति है क्या कर लेगा? आजकल तो हिंसा के प्रति लोगों का मोह ऐसा बढ़ गया है कि लोग बुद्धिमान से अधिक बाहूबलियों का आसरा लेना पसंद करते हैं। एक सभ्य और बुद्धिमान युवक की बजाय लोग दादा टाईप के आदमी से मित्रता करने को अधिक तरजीह देते हैं। ऐसा करना लाभदायक नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति शारीरिक रूप से हिंसक नहीं होते पर उनकी बुद्धि इतनी तीक्ष्ण होती है कि उससे उनकी कार्य करने की क्षमता व्यापक होती है अर्थात उनकी बाहें लंबी होती है। अपने स्वयं ये मित्र के प्रति अपराध या अपमान किये जाने का समय आने पर वह बदला लेते हैं। हमें इसलिये बुद्धिमान लोगों से मित्रता करना चाहिये न कि उनके प्रति अपराध।
2.जो विश्वास का पात्र नहीं है उसका तो कभी विश्वास किया ही नहीं जाना चाहिये पर जो विश्वास योग्य है उस पर भी अधिक विश्वास नहीं किया जाना चाहिये। विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है वह मूल उद्देश्य का भी नाश कर डालता है।
संक्षिप्त व्याख्या-सच तो यह है कि जहां विश्वास है वहीं धोखा है। इसलिये विश्वास तो करना ही नहीं चाहिये। किसी कार्य या उद्देश्य के लिये अपनी शक्ति पर निर्भर रहना ही अच्छा है पर अगर करना भी पड़े तो अधिक विश्वास नहीं करना चाहिये। जहां हमने अपने कार्य या उद्देश्य के लिये पूरी तरह किसी पर विश्वास किया तो उसके पूर्ण होने की संभावना नगण्य ही रह जाती है।
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भर्तृहरि नीति शतक: भक्ति को धंधा न समझें


भर्तृहरि कहते हैं कि
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कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।

हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के लये कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता है उसका स्मरण और भजन करना ही एकमात्र उपाय है शेष तो मनुष्य की व्यापारी बुद्धि का परिचायक है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने जीवन यापन के लिये व्यापार करते हुए इतना व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाता है कि वह भक्ति और भजन में भी सौदेबाजी करने लगता है और इसी कारण ही कर्मकांडों के मायाजाल में फंसता जाता है। कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार संग्रह है और उसमें स्वर्ग में प्रीति उत्पन्न करने वाले वेद वाक्यों से दूर रहने का संदेश इसलिये ही दिया गया है कि लोग कर्मकांडों से लौकिक और परलौकिक सुख पाने के मोह में निष्काम भक्ति न भूल जायें।

वेद, पुराण और उपनिषद में विशाल ज्ञान संग्रह है और उनके अध्ययन करने से मतिभ्रम हो जाता है। यही कारण है कि सामान्य लोग अपने सांसरिक और परलौकिक हित के लिये एक नहीं अनेक उपाय करने लगते हंै। कथित ज्ञानी लोग उसकी कमजोर मानसिकता का लाभ उठाते हुए उससे अनेक प्रकार के यज्ञ और हवन कराने के साथ ही अपने लिये दान दक्षिणा वसूल करते हैं। दान के नाम किसी अन्य सुपात्र को देने की बजाय अपन ही हाथ उनके आगे बढ़ाते हैं। भक्त भी बौद्धिक भंवरजाल में फंसकर उनकी बात मानता चला जाता है। ऐसे कर्मकांडों का निर्वाह कर भक्त यह भ्रम पाल लेता है कि उसने अपना स्वर्ग के लिये टिकट आरक्षित करवा लिया।

यही कारण है कि कि सच्चे संत मनुष्य को निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करने के लिये प्रेरित करते हैं। भ्रमजाल में फंसकर की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत तनाव बढ़ता है। जब किसी यज्ञ या हवन से सांसरिक काम नहीं बनता तो मन में निराशा और क्रोध का भाव पैदा होता है जो कि शरीर के लिये हानिकारक होता है। जिस तरह किसी व्यापारी को हानि होने पर गुस्सा आता है वैसे ही भक्त को कर्मकांडों से लाभ नहीं होता तो उसका मन भक्ति और भजन से विरक्त हो जाता है। इसलिये भक्ति, भजन और साधना में वणिक बुद्धि का त्याग कर देना चाहिये।
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मनुस्मृति-भावावेश में गधे जैसे शब्द नहीं बोलें


न नृत्येन्नैव गायेन वादित्राणि वादयेत्।
नास्फीट च क्ष्वेडेन्न च रक्तो विरोधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि नाचना गाना, वाद्य यंत्र बजाना ताल ठोंकना, दांत पीसकर बोलना ठीक नहीं और भावावेश में आकर गधे जैसा शब्द नहीं बोलना चाहिये।

न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्य´्जलिना पिबेत्।
नौत्संगे भक्षयेद् भक्ष्यानां जातु स्यात्कुतूहली।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि जिस कार्य को करने से अच्छा फल नहीं मिलता हो उसे करने का प्रयास व्यर्थ है। अंजली में भरकर पानी और गोद में रखकर भोजन करना ठीक नहीं नहीं है। बिना प्रयोजन का कौतूहल नहीं करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब आदमी तनाव रहित होता है तब वह कई ऐसे काम करता है जो उसकी देह और मन के लिये हितकर नहीं होते। लोग अपने उठने-बैठने, खाने-पीने, सोने-चलने और बोलने-हंसने पर ध्यान नहीं देते जबकि मनुमहाराज हमेशा सतर्क रहने का संदेश देते हैं। अक्सर लोग अपनी अंजली से पानी पीते हैं और बातचीत करते हुए खाना गोद में रख लेते हैं-यह गलत है।
जब से फिल्मों का अविष्कार हुआ है लोगों का न केवल काल्पनिक कुतूहल की तरफ रुझान बढ़ा है बल्कि वह उन पर चर्चा ऐसे करते हैं जैसे कि कोई सत्य घटना हो। फिल्मों की वजह से संगीत के नाम पर शोर के प्रति लोग आकर्षित होते हैं।
मनुमहाराज इनसे बचने का जो संदेश देते है उनके अनुसार नाचना, गाना, वाद्य यंत्र बजाना तथा गधे की आवाज जैसे शब्द बोलना अच्छा नहीं है। फिल्में देखना बुरा नहीं है पर उनकी कहानियों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों को देखकर कौतूहल का भाव पालन व्यर्थ है इससे आदमी का दिमाग जीवन की सच्चाईयों को सहने योग्य नहीं रह जाता।

नाचने गाने और वाद्य यंत्र बजाना या बजाते हुए सुनना अच्छा लगता है पर जब उनसे पृथक होते हैं तो उनका अभाव तनाव पैदा करता है। इसके अलावा अगर इस तरह का मनोरंजन जब व्यसन बन जाता है तब जीवन में अन्य आवश्यक कार्यों की तरफ आदमी का ध्यान नहीं जाता। लोग बातचीत में अक्सर अपना प्रभाव जमाने के लिये किसी अन्य का मजाक उड़ाते हुए बुरे स्वर में उसकी नकल करते हैं जो कि स्वयं उनकी छबि के लिये ठीक नहीं होता। कहने का तात्पर्य यह है कि उठने-बैठने और चलने फिरने के मामले में हमेशा स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिए।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शत्रु पर सिंह की तरह प्रहार करें


कौमे संकोचभास्य प्रहारमपि मर्धयेत्।
काले प्रापते तु मतिमानुत्तिश्ठेत्क्रूरसर्पवत्।।
हिंदी में भावार्थ-
अपने समय के अनुसार जीवन में रणनीति बनाते हुए कछुए के समान अंग समेटकर शत्रु का प्रहार भी सहन करें तो और उचित अवसर देखकर सांप के समान प्रहार भी करें।
मतप्रमतवत् स्थित्वा ग्रसदुत्पलुत्य पण्डितः।
अपरिभश्यमानं हि क्रमप्राप्ते मृगेन्द्रवत्।।
हिंदी में भावार्थ-
बुद्धिमान व्यक्ति को मत्त और प्रमत्त के समान दिखावे में स्थित होकर शत्रु पर ऐसे ही प्रहार करते हैं जैसे सिंह करता है। उसका वार कभी खाली नहीं जाता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में कई बार ऐसा अवसर आता है जब हमें दूसरे के शब्दिक और शारीरिक आक्रमण को झेलना पड़ता है। उस समय हमें अपनी स्थितियों और शक्ति का अवलोकन करते हुए इस बात को भी देखना चाहिये कि हमारे सहयोगी कौन है? अगर समय हमारे अनुकूल न हो तो अपनी सहनशक्ति को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि उस समय क्रोध या निराशा में उठाया गया कदम आत्मघाती होता है।
इसके विपरीत जब हमारा समय अनुकूल हो और लगता हो कि हमारे मित्र और सहयोगी साथ देने के लिये तैयार हैं और शत्रु या विरोधी को दबाया जा सकता है तब उस पर शाब्दिक या शारीरिक आक्रमण किया जा सकता है। वैसे आजकल के सभ्य युग में शारीरिक कम शाब्दिक संघर्ष अधिक होते हैं। चाहे किस प्रकार का भी आक्रमण हो उसकी तैयारी विवेक से करना चाहिये। कहीं कहीं हम पर शाब्दिक आक्रमण भी होता है और अगर लगता है कि वहां प्रत्युत्तर देने का उचित समय नहीं है तो मौन रहना ही बेहतर है परंतु यदि लगता है कि उससे सामने वाले को अनावश्यक लाभ मिल रहा है तो स्थिति देखकर उस पर पलटवार करना बुरा नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है जीवन में अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये रणनीति से काम करना चाहिए। कहा भी जाता है कि यह जिंदगी को युद्ध या जंग से कम नहीं होती।
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संत कबीर वाणी-मूर्ख लोग सभी की पीड़ा एक समान नहीं मानते


पीर सबन की एकसी, मूरख जाने नांहि
अपना गला कटाक्ष के , भिस्त बसै क्यौं नांहि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी जीवों की पीड़ा एक जैसी होती है पर मूर्ख लोग इसे नहीं समझते। ऐसे अज्ञानी और हिंसक लोग अपना गला कटाकर स्वर्ग में क्यों नहीं बस जाते।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस दोहे में अज्ञानता और हिंसा की प्रवृत्ति वाले लोगों के बारे में बताया गया है कि अगर किसी दूसरे को पीड़ा होती है तो अहसास नहीं होता और जब अपने को होती है तो फिर दूसरे भी वैसी ही संवेदनहीनता प्रदर्शित करते हैं। अनेक लोग अपने शौक और भोजन के लिये पशुओं पक्षियों की हिंसा करते हैं। उन अज्ञानियों को यह पता नहीं कि जैसा जीवात्मा हमारे अंदर वैसा ही उन पशु पक्षियों के अंदर होता है। जब वह शिकार होते हैं तो उनके प्रियजनों को भी वैसा ही दर्द होता है जैसा मनुष्यों के हृदय में होता है। बकरी हो या मुर्गा या शेर उनमें भी मनुष्य जैसा जीवात्मा है और उनको मारने पर वैसा ही पाप लगता है जैसा मनुष्य के मारने पर होता है। यह अलग बात है कि मनुष्य समुदाय के बनाये कानून में के उसकी हत्या पर ही कठोर कानून लागू होता है पर परमात्मा के दरबार में सभी हत्याओं के लिऐ एक बराबर सजा है यह बात केवल ज्ञानी ही मानते हैं और अज्ञानी तो कुतर्क देते हैं कि अगर इन जीवो की हत्या न की जाये तो वह मनुष्य से संख्या से अधिक हो जायेंगे।

आजकल मांसाहार की प्रवृत्तियां लोगों में बढ़ रही है और यही कारण है कि संवदेनहीनता भी बढ़ रही है। किसी को किसी के प्रति हमदर्दी नहीं हैं। लोग स्वयं ही पीड़ा झेल रहे हैं पर न तो कोई उनके साथ होता है न वह कभी किसी के साथ होते हैं। इस अज्ञानता के विरुद्ध विचार करना चाहिये । आजकल विश्व में अहिंसा का आशय केवल ; मनुष्यों के प्रति हिंसा निषिद्ध करने से लिया जाता है जबकि अहिंसा का वास्तविक आशय समस्त जीवों के प्रति हिंसा न करने से है।
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श्री गुरुवाणी-सत्संग से विचार निर्मल होते हैं


‘जो जो कथै सुनै हरि कीरतन ता की दुरमति नासु।’
सगन मनोरथ पावै नानक पूरन होवै आसु।।’’
हिंदी में भावार्थ-
श्रीगुरु ग्रंथ साहिब वाणी के अनुसार जो व्यक्ति हरि का कीर्तन सुनते है उनकी दुर्बुद्धि का नाश होता है। श्री गुरुनानक जी कहते हैं कि उनकी सारी आशायें पूरी हो जाती हैं।
‘कलजुग महिं कीरतन परधाना।‘
हिंदी में भावार्थ-
श्रीगुरु ग्रंथ साहिब वाणी के अनुसार कलियुग में केवल कीर्तन ही प्रमुख है।
‘कीरतन निरमोलक हीरा‘।
हिंदी में भावार्थ-
श्रीगुरु ग्रंथ साहिब वाणी के अनुसार कीर्तन (सत्संग) एक अनमोल हीरा है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल की भागदौड़ की जिंदगी में काम करने के बाद हर आदमी अपना दिल बहलाने के लिये मनोरंजन चाहता है। अवकाश के दिन आदमी अपने दिमागी मनोरंजन की तलाश करता है। टीवी चैनलों के धारावाहिकों और फिल्मों के दृश्यों से बह दिल बहलाने का प्रयास करता है। मगर विचार करें तो उनमें क्या दिखाया जाता है? डरावने दृश्य,दिल दिमाग में तनाव पैदा करने संवाद और कल्पनातीत कहानियों से भला कहीं दिल बहलता है? इसके विपरीत दिमाग की नसों पर नकारात्मक प्रभाव उसे अधिक कष्ट पहुंचाता है। अपना दिमागी तनाव दूर करने के लिये नई ऊर्जा को मनोरंजन से प्राप्त करने का प्रयास व्यर्थ है बल्कि अपने मौजूद विकार बाहर निकालने की आवश्यकता होती है और यह केवल सत्संग या कीर्तन से ही संभव है।
टीवी चैनलों के धारावाहिकों और फिल्मों के दृश्यों में द्वंद्वात्मक प्रस्तुतियों की भरमार होती हैं। एक कल्पित खलपात्र और एक सहृदय पात्र रचकर जो द्वंद्व होता है उसे देखकर अपने दिल दिमाग को शांति देने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। दिमाग की शांति के लिये द्वंद्वों से पर रहना चाहिये न कि उनमें उनमें शंाति पाने की लालसा करना चाहिये। हमें आवश्यकता होती है अपने अंदर से विकार बाहर निकालने की न कि ग्रहण करने की। इसका एक ही उपाय है कि आदमी नियमित रूप से भगवान का भजन करे। अवकाश के दिन सत्संग में जाये।
इसमें यह नहीं देखना चाहिये कि सत्संग करने वाला कौन है या वहां कौन आता है। मुख्य बात यह है कि हमें अपनी अध्यात्मिक शांति के लिये नियमित रूप से चलने वाले कार्य से हटकर कुछ करने की आवश्यकता है। यह तभी संभव है जब हम कीर्तन और सत्संग में भाग लें।
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भर्तृहरि नीति शतक: धनी दोस्त से धन और दुर्जन से दया कि याचना न करें



भर्तृहरि महाराज कहते हाँ कि
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असन्तो नाम्यथ्र्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः प्रियान्याच्या वृत्तिर्मलिनमुसुभंगेऽप्यसुकरं।
चिपद्युच्चैः स्थेयं पदमनृविधेयं च महतां सत्तां केनाद्दिष्टं विषमममसिधाराव्रतमिदम्?
हिंदी में भावार्थ-
दृष्ट लोगों से दया के लिये प्रार्थना और अमीर मित्रों से याचना न कर केवल सत्य आचरण से ही जीवन पथ पर आगे बढ़ना चाहिये-ऐसे विचार का प्रतिपादन सज्जन लोगों के लिये किसने किया? मृत्यु के समक्ष भी उच्च विचारों की रक्षा की जाती है और महापुरुषों के मार्ग का ही अनुसरण करना पड़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन के अनेक नियम हैं जिनमें यह भी है कि जो व्यक्ति दुष्ट प्रवृत्ति का है उससे दया की याचना करने का कोई अर्थ नहीं है। उससे अपनी दुष्टता का प्रदर्शन करना ही है। दया दिखाने पर हो सकता है वह कुछ देर अपने दुष्कर्म से रुक जाये पर फिर उसे उसी मार्ग पर जाना है। अतः दुष्ट प्रकृति के लोगों का प्रतिकार करने का सामर्थ्य हमेशा अपने पास रखना चाहिये या फिर उस स्थान से ही चले जाना चाहिये जहां वह निवास करते है।
उसी तरह अपने धनी मित्र से किसी प्रकार की याचना कर अपने संबंध बिगाड़ने की आशंकायें पैदा करना व्यर्थ है। धन एक माया का रूप है और वह सभी को भ्रम, लालच और लोभ की प्रवृत्तियों के कारण अपने बंधन में जकड़े रहती है। अतः अपने धन बंधु-बांधवों और मित्रों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह याचना करने पर आर्थिक सहायता देंगे। जहां तक आर्थिक सहायता का प्रश्न है तो जिसके मन में यह उदार भाव होता है वह बिना मंागे ही करता है और जिसका हृदय संकीर्ण मानसिकता वाला है उससे कितना भी आग्रह करें वह आर्थिक सहायता नहीं करेगा।
जीवन में अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिये जरूरी है कि उसके कुछ नियमों को समझाया जाये। महापुरुष द्वारा ने अपने अनुभवों से जो सत्य का मार्ग दिखाया है उस पर चलकर ही सामान्य मनुष्य जीवन में स्वस्थ और प्रसन्न रह सकता है। उससे पृथक चलना अपने आपको ही शारीरिक और मानसिक कष्ट देना है।
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संत कबीर वाणी:मिल बाँट कर खाएं वही हैं वीर


संत कबीर महाराज कहते हैं कि
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कबीर तो सांचै मतै, सहै जू सनमुख वार
कायर अनी चुभाय के, पीछे झखै अपार

सच्चा वीर तो वह है जो सामने आकर लड़ता है पर जो कायर है वर पीठ पीछे से वार करता है।

तीर तुपक सों जो लड़ैं, सो तो सूरा नाहिं
सूरा सोइ सराहिये, बांटि बांटि धन खांहि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो अस्त्र शस्त्र से लड़ते है। उनको वीर नहीं कहा जा सकता है। सच्चे शूरवीर तो हैं जो आपस में मिल बैठकर खाते हैं। वह जो भी कमाते हैं उसे समान रूप से आपस में बांटते हैं।

वर्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-शूरवीर हमेशा उसे ही माना जाता है जो अस्त्र शस्त्र का उपयोग करता है। उनमें भी वही वीर है जो सामने से वार करता है पर जो कायर हैं वह पीठ पीछे वार करते हैं। वैसे अस्त्र शस्त्र से लड़ने में भी साहस की आवश्यकता कहां होती है। अगर अस्त्र शस्त्र हाथ में हों तो वेसे भी मनुष्य के मन में दुस्साहस आ ही जाता है और कोई भी उपयोग कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि हथियार रखने से क्या होता है उसे चलाने के लिये साहस भी होना चाहिये-विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर लोहे से बना कोई हथियार मनुष्य के हाथ में हो तो उसमें आक्रामता आ ही जाती है।

असली साहस तो अपने कमाये धन का दूसरे के साथ बांटकर खाने में दिखाना चाहिये। आदमी जब धन कमाता है तो उसके प्रति उसका मोह इतना हो जाता है कि वह उसे किसी को थोड़ा देने में भी हिचकता है। मिलकर बांटने की बात तो छोडि़ये अपनी रोटी का छोटा टुकड़ा देने में भी आदमी की जान जाती है।

हमारे प्राचीन मनीषियों ने दान की महिमा को इसलिये प्रतिपादित किया कि समाज में सामाजिक समरसता का भाव रहे। हमारे अध्यात्म में इतना तक कहा गया है कि किसी को दान देते हुए आंखें नीची करना चाहिये ताकि दूसरे को हमारा अहंकार नहीं दिखाई दे और उसके अंदर अपने प्रति कुंठा भाव न उत्पन्न हो। मगर अब तो समाज कल्याण की बात राज्य के भरोसे छोड़ दी गयी है और वही लोग जन कल्याण के लिये मैदान में उतर रहे हैं जिनको उससे कुछ आर्थिक फायदा है। यह लोग कायर होते हैं क्योंकि दान और कल्याण क लिये प्राप्त धन का वह हरण करते हैं।

कलुषित तरीके से प्राप्त धन का भी वह दान करने का साहस नहीं कर पाते। अपने धन देने में सभी का हृदय कांपने लगता है। सच है कि जो दानी है वही सच्चा शूरवीर है। वह भी सच्चा वीर है जो अस्त्र शस्त्र लेकर कहकर सामने से प्रहार करता है पर आजकल तो कायरों की पूरी फौज है जो पीठ पीछे से वार करती है। चोर और डकैतों द्वारा किये गये और अपराध और निरंतर बम धमाकों की बढ़ती घटनायें इस बात का प्रमाण हैं।

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भर्तृहरि नीति शतक: जिनकी देह,मन और विचार में अमृत हो ऐसे लोग नगण्य


मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णास्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः
परगुणपनमाणून्पर्वतीकृत्य नित्यं
निजहृवि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः

हिंदी में भावार्थ- जिनकी देह मन और वचन की शुद्धता और पुण्य के अमृत से परिपूर्ण है और वह परोपकार से सभी का हृदय जीत लेते हैं। वह तो दूसरों को गुणों को बड़ा मानते हुए प्रसन्न होते हैं पर ऐसे सज्जन इस संसार में हैं ही कितने?
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-दूसरों के दोष गिनाते हुए अपने गुणों का बखान तथा दिखाने के लिये समाज के कल्याण में जुटे कथित लोगों की कमी नहीं है। आत्म विज्ञापन से प्रचार माध्यम भरे पड़े हैं। अपने अंदर गुणों का विकास कर सच्चे हृदय से समाज सेवा करने वालों का तो कहीं अस्तित्व हीं दिखाई नहीं देता। अपनी लकीर को दूसरे की लकीर से बड़ा करने वाले बुद्धिमान अब कहां हैं। यहां तो सभी जगह अपनी थूक से दूसरे की लकीर मिटाने वाले हो गये हैं। ऐसे लोगों की सोच यह नहीं है कि वह समाज कल्याण के लिये कार्य कैसे करें बल्कि यह है कि वह किस तरह समाज में दयालू और उदार व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हों। प्रचार करने में जुटे लोग, गरीबों और मजबूरों के लिये तमाम तरह के आयोजन करते हैं पर वह उनका दिखावा होता है। ‘मैंने यह अच्छा काम किया’ या ‘मैंने उसको दान दिया’ जैसे वाक्य लोग स्वयं ही बताते हैं क्योंकि उनके इस अच्छे काम को किसी ने देखा ही नहीं होता। देखेगा भी कौन, उन्होंने किया ही कहां होता?

इस संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो परोपकार और दया काम चुपचाप करते हैं पर किसी से कहते नहीं। हालांकि उनकी संख्या बहुत नगण्य है पर सच तो यह है कि संसार के सभी सभ्य समाज उनके त्याग और बलिदान के पुण्य से चल रहे हैं नकली दयालू लोग तो केवल अपना प्रचार करते हैं।
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अध्यात्म ज्ञान के बिना धर्म को समझना कठिन-चिंत्तन


धर्म क्या है यह समझे बिना उसकी आलोचना करना गलत है। किसी भी धार्मिक विद्वान् ने अपने विचार से धर्म की आज तक कोई एक परिभाषा तय नहीं की , इसका कारण यह है कि जिन लोगों ने बुद्धिमान और शिक्षित होने का ठेका लिया है वह वादों-विवादों में इतना फंस जाते हैं उन्हें पता ही नहीं रहता कि कोई निष्कर्ष क्या निकला? एक तरफ वह लोग हैं जिन्हें धर्म नहीं सुहाता और वह इसे भ्रम घोषित कर देते हैं तो दूसरी तरफ वह हैं जो धर्म के रक्षक और पोषक होने का दावा करते हैं और कर्मकांडों को ही उसका पर्याय घोषित कर देते हैं । यह लेखक कोई बहुत बड़ा विद्धान है या नहीं यह तो पढने वाले लोग ही तय करेंगे, पर यहाँ साफ करना जरूरी है कि मेरे पास अपने धर्म के लिए कोई पदवी नहीं है फिर भी अपने विचार व्यक्त करने से बाज नहीं आऊंगा क्योंकि धर्म के आलोचक और प्रशंसक दोनों के तर्कों से में प्रभावित नहीं हूँ ।
देश के वर्तमान हालत जो हैं उसकी वजह लोगों का अपने धर्म से दूर होना ही है-यह लेखक की स्पष्ट मान्यता है। धर्म को अगर हम कर्मकांडों से जोड़कर ही देखेंगे तो उसके स्वरूप में एक नहीं सेंकड़ों दोष दिखाई देंगे , और केवल अध्यात्म से जोड़ कर देखेंगे तो धर्म अंध समर्थक नहीं मानेंगे । जबकि लेखक मानना है कि धर्म की सबसे बड़ी पहचान अध्यात्म ही है । आध्यात्मिक साधना एकांत में होती है और उसके लिए कोई शोर-शराबा नहीं होता और जो लोग शोर-शराबा कर अपने धार्मिक होने का प्रमाण देते हैं वह दूसरे को कम अपने को ज्यादा धोखा देते हैं। अध्यात्म वह है जो इस शरीर में विद्यमान है और उससे साक्षात्कार किये बिना हम चल रहे हैं तो यह समझ लेना चाहिए कि अज्ञान के उस अँधेरे में हैं जहां हमें दोषों के अलावा कुछ और नहीं दिखाई देगा और उनको देखते हम अपनी पूरी ज़िन्दगी बिता देते हैं ।
आजादी के बाद लार्ड मैकाले की द्वारा रची गयी शिक्षा पध्दति को ही जारी रखा गया जो केवल गुलाम पैदा करती है और नकारात्मक सोच उत्पन्न करती है। हिंदू धर्म के आलोचक ग्रंथों के कुछ ऐसे हिस्सों को पढ़कर सुनते है जो वर्तमान समय में लोगों की दृष्टि में अप्रासगिक हो चुके और धर्मभीरू होने के बावजूद लोग उसे महत्व नहीं देते। इससे फायदा किसे हुआ? इस देश में एक ऐसा वर्ग हमेशा रहा है जो यहां के लोगों के बुद्धि तत्व पर नियंत्रण कर उसका लाभ उठाना चाहते हैं -और इसने धर्म के आलोचक और प्रशंसक दोनों ही शामिल है । इन दोनों ने मिलकर समाज में ऐसे द्वन्द्वों को जन्म दिया जिससे न केवल देश में नैतिक आचरण का पतन हुआ बल्कि समाज में सामाजिक समरसता के भाव का भी क्षरण हुआ। भगवान श्रीराम और श्री कृष्ण जी के चरित्रों को शैक्षिक पाठ्यक्रमों में न रखने से दोनों वर्गों को लाभ हुआ। धर्म के प्रशंसकों को अपने ढंग से व्याख्या कर धन और प्रतिष्ठा अर्जित करने का स्वर्णिम अवसर मिला तो आलोचकों को नये भगवान् गड़कर स्वयं को विद्धान साबित कराने का अवसर मिला।

अगर श्रीराम और श्री कृष्ण आज भी देश के आराध्य होते तो बाल्मीकि, तुलसी और वेदव्यास का नाम होता और नये भगवानों को गढ़ने वाले को लेखक और विद्वान् होने का गौरव कहॉ मिलता? धर्म प्रशंसक भी कम नहीं है उन्होने भी नये भगवान् भले नहीं बनाए पर उनका नाम लेकर भक्तों को भ्रमित कम नहीं किया। कई संत और साधू तो ऐसे हैं कि अपने पीछे भगवन की तस्वीर रखकर आरती करवाते हैं जो भगवान् की भी लगे तो उनकी भी। यानी आलोचकों को यह न लगे कि वह अपनी आरती करवा रहे हैं तो भक्त को यह लगे के उनकी आरती हो रही हैं।
धर्म प्रचारक नहीं होने के बावजूद लेखक इस बात को ख़ूब समझता है कि धर्म और अध्यात्म एकांत साधना है और अंतर्मन की शुध्दी के लिए हमें यह करना भी चाहिए । लेखक आधुनिक शिक्षा का विरोधी नहीं है क्योंकि अपने धर्म ग्रंथों के अध्ययन से ही यह ज्ञान पाया है कि आदमी को विज्ञान के साथ ज्ञान भी होना चाहिए। मैं यह पंक्तिया लिख रहा हूँ यह मेरी इसी शिक्षा का परिणाम है । हाँ जो मुझे अध्यात्म की शिक्षा अपने माता-पिता से मिली है उसकी चर्चा भी जरूर करना चाहूँगा जो अब बहुत कम लोगों को मिल रही है। अगर वह शिक्षा मेरे पास नहीं होती तो इतनी मेहनत से यह ब्लोग नहीं लिख रहा होता। कुछ काम ऐसे भी करना चाहिए जिससे लोगों को प्रसन्नता और ज्ञान मिले। मैं इस ज्ञान चर्चा को सत्संग का हिस्सा मानता हूँ जिसे अंतर्मन में शुद्धता और स्फूर्ति आती है, और कोई आपकी बुद्धि का हरण कर आपको भटका नहीं सकता , जैसा कि आजकल लोगों के साथ हो रहा है। आपने देखा ही होगा कि किस तरह जाति, धर्म, पंथ, भाषा और वर्ग के नाम पर लोगों को बरगलाकर देश में हिंसा और अशांति का माहौल बनाया जा रहा है। अगर लोगों के पास अपने धर्म और आध्यात्म की शिक्षा होती तो ऐस नहीं होता क्योंकि तब उनके पास अपना ज्ञान होता और किसी के बरगलाने में वह नहीं आते । शेष अगले अंक में (यह चर्चा इसी ब्लोग पर जारी रहेगी)

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संत कबीर संदेशः खोटी मनोवृत्ति के लोगों के सामने अपने रहस्य न खोलें


हीरा तहां न खोलिए,जहां खोटी है हाट
कसि करि बांधो गठरी, उठि चालो बाट

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि अगर अपनी गांठ में हीरा है तो उसे वहां मत खोलो जहां बाजार में खोटी मनोवृत्ति के लोग घूम रहे हैं। उस हीरे को कसकर अपनी गांठ में बांध लो और अपने मार्ग पर चले जाओ।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीर दास जी ने यह बात व्यंजना विद्या में कही हैं। इसका सामान्य अर्थ तो यह है कि अपनी कीमती वस्तुओं का प्रदर्शन वहां कतई मत करो जहां बुरी नीयत के लोगों का जमावड़ा है। दूसरा इसका गूढ़ आशय यह है कि अगर आपके पास अपना कोई ज्ञान है तो उसे सबके सामने मत बघारो। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आपकी बात सुनकर अपना काम चलायेंगे पर आपका नाम कहीं नहीं लेंगे या आपके ज्ञान का मजाक उड़ायेंगे क्योंकि आपके ज्ञान से उनका अहित होता होगा। अध्यात्म ज्ञान तो हमेशा सत्संग में भक्तों में ही दिया जाना चाहिए। हर जगह उसे बताने से सांसरिक लोग मजाक उड़ाने लगते हैं। समय पास करने के लिये कहते हैं कि ‘और सुनाओ, भई कोई ज्ञान की बात’।
अगर कोई तकनीकी या व्यवसायिक ज्ञान हो तो उसे भी तब तक सार्वजनिक न करें जब तक उसका कोई आर्थिक लाभ न होता हो। ऐसा हो सकता है कि आप किसी को अपने तकनीकी और व्यवसायिक रहस्य से अतगत करायें और वह उसका उपयोग अपने फायदे के लिये कर आपको ही हानि पहुंचाये।
अक्सर आदमी सामान्य बातचीत में अपने जीवन और व्यवसाय का रहस्य उजागर कर बाद में पछताते हैं। कबीरदास जी के अनुसार अपना कीमती सामान और जीवन के रहस्यों को संभाल कर किसी के सामने प्रदर्शित करना चाहिए।
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रहीम के दोहे:देता तो परमात्मा है किसी अन्य का भ्रम मत पालो


देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन
लोग भरम पै धरे, वाते नीचे नैन

कविवर रहीम कहते हैं कि इस जीवन में कुछ देने वाला तो परमात्मा है पर लोग अपने द्वारा लेने-देने की भ्रम पाल लेते है। इसी कारण हमारे नेत्र झुके रहते है।

दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि
सोच नहीं वित हानि को, जो न होय हित हानि

कविवर रहीम कहते हैं कि जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग पहचानना भी भूल जाते है। ऐसे समय में यदि अपने सहृदय लोगों से सम्मान ओर प्रेम मिलता रहे तो फिर धन की हानि की पीड़ा कम हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में कुछ लोग तो गरीब है और कुछ अमीर, पर मनुष्य का स्वभाव है कि वह माया के इस भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे लगता है कि जो अमीर है वह कुछ अधिक योग्य है और जो गरीब है वह अयोग्य। आजकल तो यह भ्रम और बढ़ गया है लोग चर्चित और धनवान लोगों को देवता समझ लेते हैं जैसे कि उनमें इंसानों जैसे गुणों के साथ कोई दोष हो ही नहीं। चारों तरफ भ्रम का साम्राज्य है। इसलिये लोग छलकपट और अपराध करके अधिक से अधिक धन कमा कर समाज में प्रतिष्ठित होना चाहते है।

समझदार और ज्ञानी लोग कभी भी भ्रम का शिकार नहीं होते उनको पता होता है कि यह सब माया का खेल है। इसलिये वह अमीर गरीब का भेद नहीं करते। ऐसे सहृदय सज्जन ऐसे किसी अमीर मित्र या रिश्तेदार का साथ नहीं छोड़ते तो उस व्यक्ति को अपने आप को धनी ही समझना चाहिए। माया तो आनी जानी है पर अगर कोई अपने लोग फिर भी सम्मान देते हैं तो समझ लो कुछ नहीं गया।

रहीम के दोहे:शरीर रुपी बाजार में मन बिक गया


यों रहीम तन हाट में, मनुआ गयो बिकाय
ज्यों जल में छाया परे, काया भीतर नांव
कविवर रहीम कहते हैं की शरीर-रुपी बाजार में मन बिक गया, जैसे पानी में व्यक्ति का प्रतिबिबं पड़ने से जल के अन्दर समाहित व्यक्ति का शरीर वास्तविक नहीं होता. वह केवल परछाईं मात्र होता है,

रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो ना प्रीति
कटे चाटै स्वान के, दोउ भांति विपरीति

कविवर रहीम कहते हैं की तुच्छ विचार वाले नीच मनुष्य से प्रेम और द्वेष नहीं करना चाहिए, उससे किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहिऐ.

संत कबीर वाणी:टोना-टोटका सब झूठ है


जंत्र मंत्र झूठ है, मति भरमो जग कोय
सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यंत्र और मंत्र एकदम बेकार है और इसके भ्रम में कभी मत पड़ो। जब तक परम सत्य और शब्द को नहीं जानेगा तब तक वह सिद्ध नहीं हो सकता। कौवा कभी हंस नहीं हो सकता।

जिहि शब्दे दुख ना लगे, सोईं शब्द उचार
तपत मिटी सीतल भया, सोई शब्द ततसार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मुख से ऐसे शब्द बोलना चाहिए जिससे दूसरा प्रसन्न हो जाये। अगर दूसरा व्यक्ति हमारे बोलने से प्रसन्न होता है तो हमें स्वाभाविक रूप से आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है।

संपादकीय व्याख्या-कहते हैं कि शिक्षा व्यक्ति को जागरूक बनाती है पर कुछ हमारे देश में कुछ लोग ऐसे है जो शिक्षित होने के बावजूद टोने टोटके वालों के पास जाकर अपनी समस्याओं का हल ढूंढते हैं या कथित ढोंगी साधुओं की दरबार में उपस्थित होकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। यह यंत्र-मंत्र और टोना टोटका कई लोगों के लिये व्यापार बना हुआ है। कहीं पैसा लेकर यज्ञ हो रहा है तो कही तावीज आदि बेचा जाता है। किसी के हाथ में कोई सिद्धि नहीं है पर सिद्ध कहलाने वाले बहुत लोग मिल जायेंगे। सच तो यह है जीवन का पहिया घूमता है तो कई काम स्वतः बनते हैं तो कई आदमी के बनाने के बावजूद बिगड़ जाते हैं। ऐसे में अंधविश्वासों की सहायता लेना अपने आपको धोखा देना है।

संत कबीर वाणी:प्रपंची गुरूओं से कोई लाभ नहीं


शब्द कहै सौ कीजिये, बहुतक गुरु लबार
अपने अपने लाभ को, ठौर ठौर बटपार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो सत्य का शब्द हो उसी के अनुसार कार्य करो। इस संसार में कई ऐसे गुरू हैं जो पांखडी और प्रपंची होते हैं। वह अपने स्वार्थ के अनुसार कार्य करते हुए उपदेश देते हैं और उनसे कोई लाभ नहीं होता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संबंध में मेरे द्वारा एक आलेख अन्य ब्लाग पर लिखा गया था जो यहां प्रस्तुत है।

आज के कथित संत और भक्त प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं
भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है।

भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.

भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं.

यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और अध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ”हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।”

मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं।

एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता।

चाणक्य नीति:शास्त्रों की निंदा करने वाले अल्पज्ञानी


1.आकाश में बैठकर किसी से वार्तालाप नहीं हो सकता, वहां कोई किसी का संदेश वाहक न जा सकता है और न वहां से आ सकता है जिससे कि एक दूसरे के यहां के रहस्यों जाना जा सकें। अंतरिक्ष के बारे में सामान्य मनुष्यों को कोई ज्ञान नहंी रहता पर फिर भी विद्वान लोगों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे में ज्ञान कर लिया। ऐसे विद्वान प्रतिभाशाली और दिव्य दृष्टि वाले होते हैं।

2.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वेद की निंदा करने वाले वेद की महानता को कम नहीं कर सकते। शस्त्र निहित आचार-व्यवहार को कार्य बताने वाले अल्पज्ञ लोग शास्त्रों की मर्यादा को नष्ट नहीं कर सकते।

3.बुद्धिमान मनुष्य को कौवे से पांच बातें सीखनी चाहिए। छिपकर मैथुन करना, चारों और दृष्टि रखना अर्थात चैकन्ना रहना, कभी आलस्य न करना, तथा किसी पर विश्वास न करना।

संपादकीय व्याख्या-कई लोग भारतीय वेद शास्त्रों के बारे में दुष्प्रचार में लगे हैं। इनमें तो कई अन्य धर्मों के विद्वान भी हैं। उन्होंने इधर-उधर से कुछ श्लोक सुन लिये और अब वेदों के विरुद्ध विषवमन करते हैं। उनके बारे में वह कुछ नहीं जानते। लाखों श्लोकों में से दो चार श्लोक पढ़कर उन पर टिप्पणियां करना अल्पज्ञान का ही प्रतीक है। इन वेदों के अध्ययन से ऐसा लगता है कि आज अप्रासंगिक लगने वाले कुछ संदेश अपने समय में उपयुक्त रहे होंगे। भारतीय वेदों ने ही इस विश्व में सभ्यता स्थापित की है। वेदों मेें यह कहीं नहीं लिखा हुआ है कि समय के साथ अपने अंदर परिवर्तन नहीं लाओ।

आधुनिक विज्ञान में पश्चिम का गुणगान करने वालों को यह पता होना चहिए कि सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे मेें भारतीय विद्वान बहुत पहले से ही जानते थे। भारत के अनेक पश्चिम को ही आधुनिक विज्ञान को सर्वोपरि मानता है जो आज भी पूर्ण नहीं है और प्रयोगों के दौर से गुजर रहा है।

भृतहरि शतक:नौकर का धर्म निभाना होता है कठिन


मौनान्मूकः प्रवचनपटूर्वातुलो जल्पको वा
धृष्टः पाश्र्वे वसति च सदा दूरतश्र्चाऽप्रगल्भ
क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः
सेवाधर्मः परमगहना योगिनामप्यगम्यः

हिंदी में भावार्थ-इस संसार में सेवा का धर्म अत्यंत कठिन है। यदि सेवाक मौन रहे तो उसे गूंगा और बात करे तो बकवादी कहेंगे। अगर हमेशा ही अपने पास बैठा रहे तो ढीठ और दूर रहे तो मूर्ख माना जायेगा। क्षमाशील होता भीरु और अगर कोई बात सहन न करे तो निम्न कोटि का कहा जायेगा। इस बात को तो योगीजन भी समझ नहीं पाते।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यहां सेवा से आशय परमार्थ के लिए की जाने वाली सेवा नहीं है वरन् जो अपने पेट पालने के लिए दूसरों की नौकरी करने से है। आज हमारे देश के सभी शिक्षित लोग नोकरी के पीछे भाग रहे हैं और जो नौकरी कर रहे हैं वह सब ऐसी हालत का सामना करते हैं जिसमें उन्हें अपनी स्थिति समझ मेे नहीं आती। कुल मिलाकर अगर हम कहीं नौकरी कर रहे हैं तो अपने आत्म सम्मान की बात आजकल तो भूल ही जाना चाहिए। नौकरी चाहे निजी हो या सरकारी उसमें आदमी के लिऐ तनाव तो रहता ही है। यहां बोस के ऊपर बोस है पर हैं सभी नौकरी करने वाले। नौकरी करते हुए किसी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता हैं। इसलिये निश्चिंत होकर नौकरी करें तो ही ठीक है। उसमें अगर आत्म सम्मान बचाने का विचार किया तो वह संभव नहीं है।

कबीर संदेशःअहंकार होता है पतन का कारण


मैं मेरी तू जनि  करै, मेरी मूल विनासि
मेरी पग का पैखड़ा, मेरी गल की फांसि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि इस संसार में मनुष्य देह पाकर अहंकार के जाल में मत फंसा क्योंकि यह तो पांव की फांस है जो भक्ति मार्ग पर चलने नहीं देती। बाद में यही गले की फांसी भी बन जाती है।
तन सराय मन पाहरु, मनसा उतरी आय
को काहू का है नहीं, देखा ठोंकि बजाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह देह धर्मशाला की तरह है और इसका पहरेदार हमारा मन है। इस देह में इच्छाएं और कामनाएं अतिथि के रूप में आकर ठहर जाती हैं। एक का काम पूरा होता है तो दूसरी वहां रहने चली आती है। यहां कोई किसी का सगा नहीं है यह ठोक बजाकर देख लिया।

इत पर घर उत है घरा बनिजन आये हाट
करम करीना बेचि के, उठि करि चालो बाट

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में देह धारण करने का आशय यह समझना चाहिए कि हम व्यापारी की तरह हाट में आये है। इसलिये हमें सत्कर्मों का व्यापार करना चाहिए। अतः यहां जाने से पहले अपना समय भगवान भक्ति और परमार्थ करते रहना चाहिए। आखिर फिर अपने घर वापस भी तो जाना है।

व्याख्या-हमेशा कहा जाता है कि हमारा आत्मा परमात्मा से बिछड़ कर यहां आया है इसलिये उनका घर ही हमारा घर है। यही कबीरदास जी का आशय है। इसलिये वह यह कहते हैं कि यह देह धारण करना मतलब बाजार में आना है। 

संत कबीर वाणी:मन का अहंकार नहीं छूट पाता


माया तजो तो क्या भया मान तजा न जाय
मन बडे मुनिवर गले, मान सभी को खाम

यदि माया मोह का किसी साधक ने अपने आत्मबल से त्याग भी कर दिया, तो भी व्यर्थ है क्योंकि वह अभिमान का त्याग नहीं हो पाता. इसके विपरीत यह अहंकार हो जाता है कि हमने अहंकार का त्याग कर दिया.

मोटी माया सब तजैं, झीनी तजी न जाय
पीर पैगंबर, औलिया, झीनी सबको खाय

स्थूल माया जो दिखती हैं उसका त्याग तो किया जा सकता हैं पर जो सूक्ष्म माया यानी जो मन में अहं का भाव है वह कभी ख़त्म नहीं होता और कई ऐसे लोग जो सिद्ध होने का दावा करते हैं वह भी इससे नहीं बच पाते

रहीम के दोहे:मांगने से सम्मान कम होता है


जानि अनीती जे करैं, जागत ही रह सोई।
ताहि सिखाई जगाईबो, उचित न होई ॥

अर्थ-समझ-बूझकर भी जो व्यक्ति अन्याय करता है वह तो जागते हुए भी सोता है, ऐसे व्यक्ति को जाग्रत रहने के शिक्षा देना भी उचित नहीं है।
कविवर रहीम का आशय यह कई जो लोग ऐसा करते हैं उनके मन में दुर्भावना होती है और वह अपने आपको सबसे श्रेष्ठ समझते हैं अत: उन्हें समझना कठिन है और उन्हें सुधारने का प्रयास करना भी व्यर्थ है।

मांगे घटत रहीम पद, कितौ करौ बढ़ि काम
तीन पैग बसुधा करो, तऊ बावनै नाम

यहाँ आशय यह है कि याचना कराने से पद कम हो जाता है चाहे कितना ही बड़ा कार्य करें। राजा बलि से तीन पग में संपूर्ण पृथ्वी मांगने के कारण भगवान् को बावन अंगुल का रूप धारण करना पडा।

रहीम के दोहे:प्रेम-पथ पर बुद्धिहीन होकर मत चलो


रहिमन मार्ग प्रेम को, मत मतिहीन मझाव
जो डिगिहै तो फिर कहूं, नहिं धरने को पाँव

कविवर रहीम कहते हैं की प्रेम-पथ पर बुद्धिहीन होकर मत चलो। यदि प्रेम में कहीं पग डगमगा गए तो फिर पैर रखने को भी स्थान नहीं मिलेगा।

रहिमन मांगत बडेन की, लघुता होत अनूप
बलि मख मांगत को गए, धरि बावन को रूप

कविवर रहीम कहते हैं की महान पुरुषों की याचना का छोटा रूप भी अनुपम होता है। भगवान ने राजा बलि के यज्ञ में संपूर्ण पृथ्वी को मांगने हेतु केवल बावन अंगुल का स्वरूप धारण किया था।

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