ज़रूरत -हिन्दी कविता (zaroorat-hindi poem)


किसी की पीड़ा को देखकर कब तक
दिखावटी आंसु बहाओगे,
उसे जरूरत इलाज की है,

किसी की बेबसी पर कब तक
अपनी हमदर्दी दिखाओगे
उसे ज़रूरत  सहारे की है,

कब तक तकलीफों से बचने के लिये
किसी को हंसाओगे
उसे जरूरत दिल से मुस्कराने की है,

खाली लफ्जों से इंसान का पेट नहीं भरता
मगर जिन का भरा है
वह भी बैचेनी में जीते हैं
जरूरत तसल्ली की रोटी
और रोटी से तसल्ली की है।
————

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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ज़माने में जंग की आग लगाकर-हिन्दी शायरी


बंदूक के सहारे ज़माने में बदलाव
लाने की कोशिश हथियारों के
सौदागरों के दलाल की
चाल लगती है,
खून बहाकर तरक्की के रास्ते
चलने का ख्याल डाकुओं जैसा लगता है,
दुनियां के जिंदा रहने के लिये
कुछ मूर्तियों का टूटना जरूरी है
शैतानों का ख्याल लगता है
दरअसल जिनकी रूह लापता है
अपने ही आपसे
ज़माने में जंग की आग लगाकर
दिल बहलाने में उनका मन लगता है।
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नये वर्ष का कबाड़ा-हिन्दी लघु व्यंग कथा (new year after on day-hindi satire


 वह दोनों लड़के हमेशा की तरह उस कालोनी में घर से बाहर पड़े कूड़े और और चौराहे पर रखे कूड़ेदानों से बेचने लायक कबाड़ छांट रहे थे।  पास से जाते हुए दो लोगों में से किसी एक को उन्होंने कहते सुना कि‘ कल से नया वर्ष 2010 लग रहा है।  आज पुराने वर्ष 2009 का अंतिम दिन है।’ देखें अगला वर्ष स्वयं को फलता है कि नहीं!

दूसरे ने कहा-‘काहे का नया वर्ष। सब पैसे वालों को चौंचले हैं।’

लड़कों ने यह सुना। एक खुश होकर बोला-‘यार, कल तो बहुत सारा माल मिलेगा। लोग तमाम तरह के सामान लाकर उसके पुट्ठे, कागज़ और पनियां बाहर फैंकेंगे। अपना भी नया साल शुरु होगा जब माल मिल जायेगा।’

दूसरे ने कहा-‘नहीं, अपना नया साल तो एक दिन बाद यानि परसों से शुरु होगा। कल तो लोग खाने पीने और तोहफे के लेनदेन का सामान लायेंगे। उनके ग्रीटिंग कार्ड वगैरह कम से कम एक दिन तो घर में मेहमानी तो करेंगे ही न! उनका जब नया साल एक या दो दिन पुराना होगा तब हमारा शुरु होगा।’

दूसरा निराश नहीं हुआ-‘कोई बात नहीं! एक दिन या दो दिन बाद ही नये साल का कबाड़ हमें मिलेगा तो जरूर न!

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हिंदी आध्यात्मिक सन्देश-बेकार के कम न करें तो ही ठीक (vidur niti-bekar kam n karen)


तथैव योगविहितं यत्तु कर्म नि सिध्यति।
उपाययुक्तं मेधावी न तव्र गलपयेन्मनः।।
हिंदी में भावार्थ-
अच्छे और सात्विक प्रयास करने पर कोई सत्कर्म सिद्ध नहीं भी होता है तो भी बुद्धिमान पुरुष को अपने अंदर ग्लानि नहीं अनुभव करना चाहिए।

मिथ्यापेतानि कर्माण सिध्येवुर्यानि भारत।
अनुपायवुक्तानि मा स्म तेष मनः कृथाः।।
हिंदी में भावार्थ-
मिथ्या उपाय से कपट पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाते हैं पर उनमें मन लगाना ठीक नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर आपने सुना होगा कि प्यार और जंग में सब जायज है-यह पश्चिम से आयातित विचार है। जीवन की तो यह वास्तविकता है कि जैसा कर्म करोगे वैसा परिणाम सामने आयेगा। जैसा मन में संकल्प होगा वैसे ही यह संसार हमारे साथ व्यवहार करेगा। अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में मनुष्य इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने कर्म की शुद्धता और अशुद्धता का बोध नहीं रहता। इसी कारण वह ऐसे उपायों का भी सहारा लेता है जो अपवित्र और अनैतिक हैं। फिर उसको अपनी बात के प्रमाण रखने के लिये अनेक प्रकार के झूठ भी बोलने पड़ते हैं। इस तरह वह हमेशा पाप की दुनियां में घूमता है। मगर मन तो मन है वह उसकी तृप्ति के लिये भक्ति और साधना का ढोंग भी करता है। इससे प्रकार वह एक ऐसे मायाजाल में फंसा रहता है जिससे जीवन भर उसकी मुक्ति नहीं होती।
इसलिये अपने जीवन में अच्छे संकल्प धारण करने के साथ ही अपने कार्य की सिद्ध के लिये पवित्र और नैतिक उपायों की ही सहायता लेना चाहिए।

बाकी लोग किस रास्ते पर जा रहे हैं यह विचार करने की बजाय यह देखना चाहिए कि हमारे लिये उचित मार्ग कौनसा है। इसके अलावा यह भी एक अन्य बात यह भी है कि अगर हमारा कोई पवित्र और सात्विक कर्म अपने उचित उपाय से सिद्ध नहीं होता तो भी परवाह नहीं करना चाहिए। याद रखें कार्य सिद्ध होने का भी अपना एक समय होता है और जब आता है तो हमें यह भी पता नहीं लगता कि वह काम कैसे पूरा हुआ। इसलिए कोई भी शुभ काम मन लगाकर करना चाहिए। बहुत जल्दी सफलता के लिए ग़लत मार्ग नहीं पकड़ना चाहिए।
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कौटिल्य दर्शन-दोस्त और दुश्मन दो प्रकार के होते हैं (kautilya darshan-dost aur dushman)


सहज कार्यजश्वव द्विविधः शत्रु सच्यते।
सहज स्वकुलोत्पन्न कार्यजः स्मृतः।
हिंदी में भावार्थ-
शत्रु दो प्रकार के होते हैं-एक तो जो स्वाभाविक रूप से बनते हैं दूसरे वह जो कार्य से बनते हैं। स्वाभाविक शत्रु कुल में उत्पन्न होता है तो दूसरा अपने कार्य के कारण बन जाता है।
उच्छेदापचयो काले पीडनं कर्षणन्तथा।
इति विधाविदः प्राहु, शत्रौ वृतं चतुविंघम्।।
हिंदी में भावार्थ-
उच्छेद, अपचय, समय पर पीड़ा देना और कर्षण यह चार प्रकार की स्थिति विद्वान बताते हैं।
वर्तमान संबंध में संपादकीय-ऐसा कोई जीव इस प्रथ्वी पर नहीं है जिसका कोई शत्रु न हो। बड़े बड़े महापुरुष इस प्रकृत्ति के नियम का उल्लंघन नहीं कर पाये। शत्रु दो प्रकार के बनते हैं। एक तो जो स्वाभाविक रूप होते ही हैं दूसरे हमारे कार्य से बनते हैं। स्वाभाविक रूप शत्रु या विरोधी परिवार, समाज तथा कुल की वजह से बनते हैं। जैसे बिल्ली चूहे की तो कुत्ता बिल्ली का दुश्मन होता है। उसी तरह इंसानों में भी कुछ रिश्ते आपस में प्रतिस्पर्धा पैदा करते हैं। जहां कुल बड़ा होता है वहां आपस में लोग एक दूसरे के विरोधी या दुश्मन पैदा होते हैं। आपने देखा होगा कि किसी आदमी को तब हानि नहीं पहुंचाई जा सकती जब उसका अपना कोई शत्रु न हो। बड़े शत्रु को हराने के लिये छोटे शत्रु से समझौता करना चाहिये यह इसलिये कहा गया है कि क्योंकि दो शत्रुओं से एक साथ लड़ना संभव नहीं होता।

हम यहां शत्रु के साथ विरोधी की भी चर्चा करें तो बात आसानी से समझी जा सकती है। हम जब कोई अपना कार्य करते हैं तो वही कार्य करने वाला अन्य व्यक्ति स्वाभाविक रूप से हमें शत्रु भाव से देखता है। वह इस बात से आशंकित रहता है कि कहीं उसका प्रतिस्पर्धी उससे आगे न निकल जाये। तब वह इस बात का प्रयास भी करता है कि आपको नाकाम किया जाये, आपकी मजाक उड़ायी जाये और तमाम तरह का दुष्प्रचार कर आपका मनोबल गिराया जाये। वह आपके ही छोटे शत्रु या विरोधी को अपना मित्र बना लेता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि इस दैहिक जीवन में शत्रु या विरोधी से मुक्त रहना संभव नहीं है। अतः शत्रु और विरोधी की गतिविधियों को नजर रखें। वह आपकी उपेक्षा करने के साथ ही आपके कार्यसिद्धि के साधनों को हानि पहुंचा सकते हैं। शत्रु या विरोधी की प्रकृत्ति को समझें तो हमेशा सतर्क रहकर उसका मुकाबला कर सकते हैं। याद रहे आपके शत्रु या विरोधी कभी भी आपकी सफलता को न तो स्वीकार कर सकते हैं न ही पचा सकते हैं।
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कबीर के दोहे-अपनी सराहना स्वयं न करें (kabir darshan-dosron ke dosh)


आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?
दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त।
अपना याद आवई, जाका आदि न अन्त।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों के दोष देखकर सभी हंसते हैं पर उनको अपनी देह के स्थाई दोष न तो याद आते हैं न दिखाई देते हैं जिनका कभी अंत ही नहीं है।
आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने मूंह से आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा करना मानवीय स्वभाव है। अपने में कोई गुण न हो पर उसे प्रचारित करना और दूसरे के गुण की जगह उसके दुर्गुण की चर्चा करने में सभी को आनंद आता है पर किसी को अपने दोष नहीं दिखते। जितनी संख्या में लोग परमार्थ करने वाले नहीं है उससे अधिक तो उसका दावा करने वाले मिल जायेंगे। हम अपनी देह में अपने उपरी अंग ही देखते हैं पर नीचे के अंग नहीं दिखाई देते जो गंदगी से भरे रहते हैं चाणक्य महाराज के अनुसार उनको कभी पूरी तरह साफ भी नहीं रखा जा सकता। तात्पर्य यह है कि हम अपने दैहिक और मानसिक दुर्गंण भूल जाते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने बारे में अधिक दावे मत करो अगर किसी ने उनका प्रमाण ढूंढना चाहा तो पूरी पोल खुल जायेगी।
उसी तरह दूसरे की निंदा करने की बजाय अपने गुणों की सहायता से भले काम करने का प्रयास करें यही अच्छा रहेगा। आत्मप्रवंचना कभी विकास नहीं करती और परनिंदा कभी पुरस्कार नहीं दिलाती। यह हमेशा याद रखना चाहिये।
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कबीर वाणी-प्यार को सही ढंग से कोई नहीं समझता(kabir vani-pyar ka gyan)



प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके।

गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय
कबीर प्रीति सो जानिये, इनसे न्यारी होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुणवेताओ-चालाक और ढोंगी लोग- और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो न्यारा-स्वार्थरहित-हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में आजकल प्रेम पर बहुत कुछ दिखाया और लिखा जाता है। यह प्रेम केवल स्त्री पुरुष के निजी संबंध को ही प्रोत्सािहत करता है। हालत यह हो गयी है कि अप्रत्यक्ष रूप से विवाहेत्तर या विवाह पूर्व संबंधों का समर्थन किया जाने लगा है। यह क्षणिक प्रेम एक तरह से वासनामय है मगर आजकल के अंग्रेजी संस्कृति प्रेमी और नारी स्वतंत्रता के समर्थक विद्वान इसी प्रेम मेंें शाश्वत जीवन की तलाश कर हास्यास्पद दृश्य प्रस्तुत करते हैं। एक मजे की बात यह है कि एक तरफ सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन करने की प्रवृति को स्वतंत्रता के नाम पर प्रेमियों की रक्षा की बात की जाती है दूसरी तरफ प्रेम को निजी मामला बताया जाता है। कुछ लोग तो कहते हैं कि सब धर्मों से प्रीति का धर्म बड़ा है। अब अगर उनसे पूछा जाये कि इसका स्वरूप क्या है तो कोई बता नहीं पायेगा। इस नश्वर शरीर का आकर्षण धीमे धीमे कम होता जाता है और उसके साथ ही दैहिक प्रेम की आंच भी धीमी हो जाती है।

वैसे सच बात तो यह है कि प्रेम तो केवल परमात्मा से ही हो सकता है क्योंकि वह अनश्वर है। हमारी आत्मा भी अनश्वर है और उसका प्रेम उसी से ही संभव है। परमात्मा से प्रेम करने पर कभी भी निराशा हाथ नहीं आती जबकि दैहिक प्रेम का आकर्षण जल्दी घटने लगता है। जिस आदमी का मन भगवान की भक्ति में रम जाता है वह फिर कभी उससे विरक्त नहीं होता जबकि दैहिक प्रेम वालों में कभी न कभी विरक्ति हो जाती है और कहीं तो यह कथित प्रेम बहुत बड़ी घृणा में बदल जाता है।
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मनु स्मृति-अध्ययन में सुस्ती नहीं करें (manu smriti-shiksha aur susti)


अध्येयष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः।
‘अधीष्व भो! इति ब्रुयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
शिष्य को पढ़ाने के विषय में गुरु को कभी भी आलस नहीं बरतना चाहिये। इसके अलावा बेमन से भी अध्यापन का कार्य करना उचित नहीं है। अध्यापन प्रारंभ करने से पहले छात्र से कहना चाहिये कि ‘पढ़ो’ और समाप्ति पर कहना चाहिये कि विश्राम करो।
ब्रह्यणः प्रणवः कुर्यादादावन्ते च सर्वदा।
स्त्रवत्यनोंकृतं पूर्व परस्ताच्च विशीर्यति।।
हिंदी में भावार्थ-
गुरु का यह कर्तव्य है कि वह अध्यापन प्रारंभ करने से पहले ॐ शब्द का आप छात्र से करावे। ऐसा न करने से पढ़ा हुआ स्मरण में नहीं रहता। इस कारण दोनों का परिश्रम व्यर्थ हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वर्तमान शिक्षा पद्धति में अनेक दोष हैं और इसी कारण हमारे यहां समाज में विकृत्तियां बढ़ती जा रही है। हम समाज के आचरण को लेकर तमाम तरह की निराशाजनक प्रतिक्रियायें तो व्यक्त करते हैं पर उसमें सुधार की कोई योजना हमारे पास नहीं है। किसी भी मनुष्य में संस्कार और बौद्धिक निर्माण का समय उसका छात्र जीवन ही रहता है। उस समय संयम और नियम से जीवन व्यतीत करने पर ही शिक्षा प्राप्त हो सकती है। समाज चल रहा है इसकी विपरीत दिशा में। आजकल तो छात्र जीवन ही मौज मस्ती का माना जाता है और कहा जाता है कि आजकल बच्चे अपने माता पिता से अधिक कुशाग्र बुद्धि हैं क्योंकि वह मोबाइल और टीवी का रिमोट चलाना जानते हैं। मगर हम संस्कारों की बात नहीं करते जिनके बारे में सभी मानते हैं कि उनका क्षरण हो गया है। छात्र जीवन में ज्ञान प्राप्त करने के साथ ही इस बात की भी होड़ लगी है कि उसका अधिक से अधिक प्रदर्शन किया जाये।
कहते हैं कि भजन और भक्ति तो बुढ़ापे में किया जाना चाहिये जबकि सच यह है कि जो संस्कार बचपन में नहीं पड़े फिर उनकी स्थापना एकदम कठिन है। ऐसे में बचपन से बच्चों को अपनी नियमित शिक्षा के साथ ही आध्यात्म का ज्ञान भी दिया जाना चाहिये। विद्यालयों में तो यह शिक्षा मिलती नहीं है इसलिये माता पिता या दादा दादी को ही यह दायित्व उठाना चाहिये।
ॐ शब्द का हमारे अध्यात्म में बहुत महत्व है और इसलिये अध्ययन से पूर्व उसका जाप मन ही मन में अवश्य करना चाहिये। शब्दों में ओम को सर्वोत्तम माना गया है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में तो इसका जाप अध्यापक कराते नहीं है इसलिये माता पिता को चाहिये कि वह अपने बच्चों को इसका जाप करने का संदेश दें। इसके जाप से पढ़ा हुआ याद रहता है और इससे मन भी स्वच्छ रहता है।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-कार्य के होते हैं तीन व्यसन (kautilya ka arthshastra in hindi)


वस्तुध्वशक्येषु समुद्यनश्चेच्छक्येषु मोहादसमुद्यश्मश्च।
शक्येषु कालेन समुद्यनश्व त्रिघैव कार्यव्यसनं वदंति।।
हिंदी में भावार्थ-
शक्ति से परे वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करना, प्राप्त होने योग्य वस्तु के लिये उद्यम न करना , और तथा शक्ति होते हुए भी शक्य वस्तु की प्राप्ति के लिये समय निकल जाने पर प्रयास करना-यह कार्य के व्यसन हैं।
द्रोहो भयं शश्वदुपक्षणंव शीतोष्णवर्षाप्रसहिष्णुता च।
एतानि करले समुपहितानि कुर्वन्त्यवश्यं खलु सिद्धिविघ्नम्
हिंदी में भावार्थ-
द्रोह, डर, उपेक्षा, सर्दी,गमी, तथा वषा का अधिक होना कार्यसिद्धि समय पर होने मेें बाधा अवश्य उत्पन्न करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब भी हम अपने जीवन में कोई लक्ष्य निर्धारित करते हैं तो उस समय अपनी शक्ति का पूर्वानुमान करना चाहिये। उसी तरह कोई योजना बनाकर कोई वस्तु प्राप्त करते हैं तो उस समय अपने आर्थिक, सामाजिक, तथा पारिवारिक स्त्रोतों की सीमा पर भी विचार कना चाहिये। अपने सामथ्र्य से अधिक वस्तु या लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास एक तरह का व्यसन ही है।
उसी तरह किसी वस्तु या लक्ष्य का अवसर पास आने पर उसकी उपेक्षा कर मूंह फेर लेना भी एक तरह का व्यसन है। अगर कोई कार्य हमारी शक्ति की परिधि में है तो उसे अवश्य करना चाहिये। जीवन में सतत सक्रिय रहना ही मनुष्य जीवन को आनंद प्रदान करता है। अगर किसी उपयोगी वस्तु या लक्ष्य की प्राप्ति का अवसर आता है तो उसमें लग जाना चाहिये।
कोई वस्तु हमारी शक्ति के कारण प्राप्त हो सकती है पर हम उसकी यह सोचकर उपेक्षा कर देते हैं कि यह हमारे किस काम की! बाद में पता लगता है कि उसका हमारे लिये महत्व है और उसे पाने का प्रयास करते हैं। यह भी एक तरह का व्यसन है। हमें अपने जीवन में उपयोग और निरुपयोगी वस्तुओं और लक्ष्यों का ज्ञान होना चाहिये। कई बार कोई चीज हमें उपलब्ध होती है पर धीरे धीरे उसकी मात्रा काम होती है। उसका संग्रह का उपस्थित होने पर उसका विचार नहीं करते-यह सोचकर कि वह तो भंडार में है पर बाद में पता लगता है कि यह अनुमान गलत था। यह वैचारिक आलस्य का परिणाम जीवन में कष्टकारक होता है।
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गुरु पूर्णिमा-तत्वज्ञान दे वही होता है सच्चा गुरु (article in hindi on guru purnima)


गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव।
दो बूड़े वापूरे,चढ़ि पाथर की नाव
जहां गुरु लोभी और शिष्य लालची हों वह दोनों ही अपने दांव खेलते हैं पर अंततः पत्थर बांध कर नदिया पर करते हुए उसमें डूब जाते हैं।
आज पूरे देश में गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है। भारतीय अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और बचपन से ही हर माता पिता अपने बच्चे को गुरु का सम्मान करने का संस्कार इस तरह देते हैं कि वह उसे कभी भूल ही नहीं सकता। मुख्य बात यह है कि गुरु कौन है?
दरअसल सांसरिक विषयों का ज्ञान देने वाला शिक्षक होता है पर जो तत्व ज्ञान से अवगत कराये उसे ही गुरु कहा जाता है। यह तत्वज्ञान श्रीगीता में वर्णित है। इस ज्ञान को अध्ययन या श्रवण कर प्राप्त किया जा सकता है। अब सवाल यह है कि अगर कोई हमें श्रीगीता का ज्ञान देता है तो हम क्या उसे गुरु मान लें? नहीं! पहले उसे गुरु मानकर श्रीगीता का ज्ञान प्राप्त करें फिर स्वयं ही उसका अध्ययन करें और देखें कि आपको जो ज्ञान गुरु ने दिया और वह वैसा का वैसा ही है कि नहीं। अगर दोनों मे साम्यता हो तो अपने गुरु को प्रणाम करें और फिर चल पड़ें अपनी राह पर।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में गुरु की सेवा को बहुत महत्व दिया है पर उनका आशय यही है कि जब आप उनसे शिक्षा लेते हैं तो उनकी दैहिक सेवा कर उसकी कीमत चुकायें। जहां तक श्रीकृष्ण जी के जीवन चरित्र का सवाल है तो इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि उन्होंने अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त कर हर वर्ष उनके यहां चक्कर लगाये।
गुरु तो वह भी हो सकता है जो आपसे कुछ क्षण मिले और श्रीगीता पढ़ने के लिये प्रेरित करे। उसके बाद अगर आपको तत्वज्ञान की अनुभूति हो तो आप उस गुरु के पास जाकर उसकी एक बार सेवा अवश्य करें। हम यहां स्पष्ट करें कि तत्वज्ञान जीवन सहजता पूर्ण ढंग से व्यतीत करने के लिये अत्यंत आवश्यक है और वह केवल श्रीगीता में संपूर्ण रूप से कहा गया है। श्रीगीता से बाहर कोई तत्व ज्ञान नहीं है। इससे भी आगे बात करें तो श्रीगीता के बाहर कोई अन्य विज्ञान भी नहीं है।
इस देश के अधिकतर गुरु अपने शिष्यों को कथायें सुनाते हैं पर उनकी वाणी तत्वाज्ञान से कोसों दूर रहती है। सच तो यह है कि वह कथाप्रवचक है कि ज्ञानी महापुरुष। यह लोग गुरु की सेवा का संदेश इस तरह जैसे कि हैंण्ड पंप चलाकर अपने लिये पानी निकाल रहे हैं। कई बार कथा में यह गुरु की सेवा की बात कहते हैं।
सच बात तो यह है गुरुओं को प्रेम करने वाले अनेक निष्कपट भक्त हैं पर उनके निकट केवल ढोंगी चेलों का झुंड रहता है। आप किसी भी आश्रम में जाकर देखें वहा गुरुओं के खास चेले कभी कथा कीर्तन सुनते नहीं मिलेंगे। कहीं वह उस दौरान वह व्यवस्था बनाते हुए लोगों पर अपना प्रभाव जमाते नजर आयेंगे या इधर उधर फोन करते हुए ऐसे दिखायेंगे जैसे कि वह गुरु की सेवा कर रहे हों।

कबीरदास जी ने ऐसे ही लोगों के लिये कहा है कि
जाका गुरु आंधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।
जहां गुरु ज्ञान से अंधा होगा वहां चेला तो उससे भी बड़ा साबित होगा। दोनों अंधे मिलकर काल के फंदे में फंस जाते है।
बहुत कटु सत्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान एक स्वर्णिम शब्दों का बड़ा भारी भंडार है जिसकी रोशनी में ही यह ढोंगी संत चमक रहे हैं। इसलिये ही भारत में अध्यात्म एक व्यापार बन गया है। श्रीगीता के ज्ञान को एक तरह से ढंकने के लिये यह संत लोग लोगों को सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। भगवान श्रीगीता में भगवान ने अंधविश्वासों से परे होकर निराकर ईश्वर की उपासना का संदेश दिया और प्रेत या पितरों की पूजा को एक तरह से निषिद्ध किया है परंतु कथित रूप से श्रीकृष्ण के भक्त हर मौके पर हर तरह की देवता की पूजा करने लग जाते हैं। गुरु पूर्णिमा पर इन गुरुओं की तो पितृ पक्ष में पितरों को तर्पण देते हैं।
मुक्ति क्या है? अधिकतर लोग यह कहते हैं कि मुक्ति इस जीवन के बाद दूसरा जीवन न मिलने से है। यह गलत है। मुक्ति का आशय है कि इस संसार में रहकर मोह माया से मुक्ति ताकि मृत्यु के समय उसका मोह सताये नहीं। सकाम भक्ति में ढेर सारे बंधन हैं और वही तनाव का कारण बनते हैं। निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया ऐसे ब्रह्मास्त्र हैं जिनसे आप जीवन भर मुक्त भाव से विचरण करते हैं और यही कहलाता मोक्ष। अपने गुरु या पितरों का हर वर्ष दैहिक और मानसिक रूप से चक्कर लगाना भी एक सांसरिक बंधन है। यह बंधन कभी सुख का कारण नहीं होता। इस संसार में देह धारण की है तो अपनी इंद्रियों को कार्य करने से रोकना तामस वृत्ति है और उन पर नियंत्रण करना ही सात्विकता है। माया से भागकर कहीं जाना नहीं है बल्कि उस पर सवारी करनी है न कि उसे अपने ऊपर सवार बनाना है। अपनी देह में ही ईश्वर है अन्य किसी की देह को मत मानो। जब तुम अपनी देह में ईश्वर देखोगे तब तुम दूसरों के कल्याण के लिये प्रवृत्त होगे और यही होता है मोक्ष।
इस लेखक के गुरु एक पत्रकार थे। वह शराब आदि का सेवन भी करते थे। अध्यात्मिक ज्ञान तो कभी उन्होंने प्राप्त नहीं किया पर उनके हृदय में अपनी देह को लेकर कोई मोह नहीं था। वह एक तरह से निर्मोही जीवन जीते थे। उन्होंने ही इस लेखक को जीवन में दृढ़ता से चलने की शिक्षा दी। माता पिता तथा अध्यात्मिक ग्रंथों से ज्ञान तो पहले ही मिला था पर उन गुरु जी जो दृढ़ता का भाव प्रदान किया उसके लिये उनको नमन करता हूं। अंतर्जाल पर इस लेखक को पढ़ने वाले शायद नहीं जानते होंगे कि उन्होंने अपने तय किये हुए रास्ते पर चलने के लिये जो दृढ़ता भाव रखने की प्रेरणा दी थी वही यहां तक ले आयी। वह गुरु इस लेखक के अल्लहड़पन से बहुत प्रभावित थे और यही कारण है कि वह उस समय भी इस तरह के चिंतन लिखवाते थे जो बाद में इस लेखक की पहचान बने। उन्हीं गुरुजी को समर्पित यह रचना।
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भर्तृहरि शतक-मनुष्य के लिए में स्वाभिमान जरूरी (jivan men svabhiman jaroori-hindi sandesh


लांगल चालनमधश्चरणावपातं भू मौ निपत्य बदनोदर दर्शनं च।
श्चा पिण्डदस्य कुरुते गजपुंगवस्तु धीरं विलोकपति चाटुशतैश्चय भुंवते।।
हिंदी में भावार्थ-
श्वान भोजने देने वाले के आगे पूंछ हिलाते हुए पैरों में गिरकर पेट मूंह और पेट दिखाते हुए अपनी दीनता का प्रदर्शन करता है जबकि हाथी भोजन प्रदान करने वालो को गहरी नजर से देखने के बाद उसके द्वारा आग्रह करने पर ही भोजन ग्रहण करता है।
यद चेतनोऽपिपादैः स्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरिनकान्तः।
तत्तेजस्वी पुरुषः परकृत निकृतिंक कथं सहते ।।
हिंदी में भावार्थ-
सूर्य की रश्मियों के ताप से जब जड़ सूर्यकांन्त मणि ही जल जाती है तो चेतन और जागरुक पुरुष दूसरे के द्वारा किये अपमान को कैसे सह सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भले ही आदमी के पास अन्न और धन की कमी हो पर मनुष्य को स्वाभिमानी होना चाहिए नहीं तो अधिक धनवान, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोग उसे गुलाम बनाये रखने के लिये हमेशा तत्पर रहते हैं। आजकल सुख सुविधाओं ने अधिकतर लोगों को शारीरिक और मानसिक तौर से सुस्त बना दिया है इसलिये वह उन्हें बनाये रखने के लिये अपने से अधिक शक्तिशाली लोगों की चाटुकारिता में लगना अपने लिये निज गौरव समझते हैं। यही कारण है कि निजी क्षेत्र में स्त्रियों और पुरुषों का शोषण बढ़ रहा है। हमारे यहां की शिक्षा कोई उद्यमी नहीं पैदा करती बल्कि नौकरी के लिये गुलामों की भीड़ बढ़ा रही है। कितनी विचित्र बात है कि आजकल हर आदमी अपने बच्चे को इसलिये पढ़ाता है कि वह कोई नौकरी कर अपने जीवन में अधिकतम सुख सुविधा जुटा सके। ऐसे में बच्चों के अंदर वैसे भी स्वाभिमान मर जाता है। उनका अपने माता पिता और गुरुजनों से अच्छा गुलाम बनने की प्रेरणा ही मिलती है।

ऐसी स्थिति में हम अपने देश और समाज के प्रति कथित रूप से जो स्वाभिमान दिखाते हैं पर काल्पनिक और मिथ्या लगता है। स्वाभिमान की प्रवृत्ति तो ऐसा लगता है कि हम लोगों में रही नहीं है। ऐसे मेें यही लगता है कि हमें अब अपने प्राचीन साहित्य का अध्ययन भी करते रहना चाहिये ताकि पूरे देश में लुप्त हो चुका स्वाभिमान का भाव पुनः लाया जा सके।
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सादगी से कही बात किसी के समझ में नहीं आती-हिंदी शायरी


सादगी से कही बात
किसी को समझ में नहीं आती है
इसलिए शायद कुछ लोग श्रृंगार रस की
चाशनी में डुबो कर सुनाते हैं
अलंकारों में सजाते हैं
तो कुछ वीभत्स के विष से डराते हैं
आदमी में विषय के लिए जिज्ञासा जगाते हैं
आदमी के दिल में ही रहता है
प्यार और खौफ
जिसे कभी कवियों ने बहलाया था
अब तो बाजार में सजी दुकानों पर
दर्द की दवा हो या ख़ुशी के लिए अमृत
हर शय बिकने के लिए सज जाती हैं

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बाज़ार में बिकती है दवा और अमृत-हिंदी शायरी


सादगी से कही बात
किसी को समझ में नहीं आती है
इसलिए शायद कुछ लोग श्रृंगार रस की
चाशनी में डुबो कर सुनाते हैं
अलंकारों में सजाते हैं
तो कुछ वीभत्स के विष से डराते हैं
आदमी में विषय के लिए जिज्ञासा जगाते हैं
आदमी के दिल में ही रहता है
प्यार और खौफ
जिसे कभी कवियों ने बहलाया था
अब तो बाजार में सजी दुकानों पर
दर्द की दवा हो या ख़ुशी के लिए अमृत
हर शय बिकने के लिए सज जाती हैं

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अंतर्जाल पर अंग्रेजी से नहीं बल्कि हिन्दी से ही बदलाव हो सकता है=आलेख


अंतर्जाल के ब्लाग पर सामाजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये प्रयास कोई अब नयी बात नहीं है। कुछ लोगों ने अभी हाल ही में वेलंटाईन डे के पहले तक इंटरनेट पर चले विवाद पर लिखे गये पाठों को देखकर यही निष्कर्ष निकाला है कि आने वाले समय में भारत के 4.2 करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ता सड़क पर जाकर नारेबाजी करते हुए लाठी झेलने की बजाय अपने घरों पर कंप्यूटर और लैपटाप पर आंदोलन करना ठीक समझ रहे हैं। यह दिलचस्प है। ऐसे में एक प्रश्न जरूर उठता है कि आखिर इस देश में कौनसी भाषा के ब्लाग पर हम ऐसी आशा कर रहे हैं? यकीनन वह हिंदी नहीं है बल्कि अंग्रेजी है और जब देश में सामाजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये प्रयासों की आवश्यकता है तो उसके लिये सबसे महत्वपूर्ण भूमिका हिंदी के ब्लाग की होना चाहिये-बिना उनके यह कल्पना करना कठिन है।
अभी समाचार पत्र पत्रिकायें जिन ब्लाग का नाम अखबारों के दे रहे हैं वह अंग्रेजी के हैं। विवादास्पद विषय पर अखबार में नाम आने से उनको खोलकर पढ़ने वाले बहुत आते हैं-सामान्य रूप से आने पर ब्लाग में कोई दिलचस्पी नहीं लेता। समाचार पत्र पत्रिकाओं में नाम आने से वैलंटाईन डे से पूर्व तक चले विवाद पर जो पाठ अंग्रेजी ब्लाग पर लिखे गये उनको पाठक मिलना स्वाभाविक था पर हिंदी के ब्लाग के बिना किसी भी आंदोलन या जागरुकता के प्रयास में सफलता नहीं मिल सकती।

इस विवाद पर हिंदी के ब्लाग पर भी जमकर लिखा गया। हिंदी ब्लाग लेखकों ने उन अंग्रंेजी ब्लाग के लिंक दिये और इसमें संदेह नहीं कि उनको पाठक दिलवाने में योगदान दिया। नारी स्वातंत्र्य पर एक फोरम अंतर्जाल पर बनाया जिस पर 14 फरवरी वैलंटाईन डे पर दस हजार से अधिक सदस्य शामिल हुए। कुछ वेबसाईट भी जबरदस्त हिट ले रहीं थी पर यह सभी अंग्रेजी भाषा से सुसज्जित समाज का ही हिस्सा था। आम भारतीय जिसकी भाषा हिंदी है उसका न तो वैंलंटाईन डे से लेना देना था न नारी स्वातंत्र्य पर चल रही सतही बहस से। फिर भी समाचार पत्र पत्रिकाओं ने उस विवाद को महत्वपूर्ण स्थान दिया। ऐसे में हिंदी ब्लाग पर चल रही बहस का कहीं जिक्र नहीं आया जो कि इस बात का प्रमाण है प्रचार माध्यम उसकी अनदेखी कर रहे हैं। हालांकि हिंदी ब्लाग लेखकों के दोनों पक्षों ने इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा पर कुछ ब्लाग लेखकों के निजी आक्षेपों ने उनके पाठ को कमजोर बना दिया।
हमारा यहां उद्देश्य वैलंटाईन डे पर हुई बहस के निष्कर्षों पर विचार करना नहीं है बल्कि सामाजिक आंदोलन और जागरुकता में हिंदी ब्लाग के संभावित योगदान का आंकलन करना है। यह बात इस लेखक द्वारा हिंदी क्षेत्र के होने के कारण नहीं लिखी जा रही कि भारत में हिंदी ब्लाग की ही किसी सामाजिक परिवर्तन में भूमिका हो सकती है। अगर अंग्रेजी ब्लाग की भूमिका हुई तो वह हिंदी समाचार पत्र पत्रिकाओं में उनके पाठों के स्थान मिलने का कारण होगी न कि अपने कारण। यह हैरानी की बात है कि ब्लाग का प्रचार तो सभी कर रहे हैं पर इस सत्य से मूंह छिपा रहे हैं कि वह अंग्रेजी भाषा के ब्लाग के बारे में लिख रहे हैं न कि हिंदी के बारे में। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अंग्रेजी के मोह के कारण प्रचार चाहने वाले प्रतिष्ठित लोग अंग्रेजी के ब्लाग पर ही अपना नाम देखना चाहते हैं जैसे कि बी.बी.सी. लंंदन के समाचारों में देखते हैं। जहां तक हिट का प्रश्न है तो अभी अंतर्जाल पर कई तरह के भ्रम हैं कि क्या वाकई अंग्रंजी ब्लाग लेखकों के उतने पाठक हैं जितने कि वह दावा करते हैं। अंग्रेजी के एक ब्लाग लेखक ने अपनी एक टिप्पणी में लिखा था कि अंग्रेजी में वही ब्लाग हिट ले रहे हैं जो प्रायोजित हैं पर जो सामान्य लोगों के ब्लाग हैं उनकी कमोबेश स्थिति हिंदी जैसी है। सच क्या है कोई नहीं जानता। वैसे भी किसी एक के दावे पर यकीन करना ठीक नहीं है।

फिर यह ंअंतर्जाल है। अंग्रेजी का परचम फहरा रहा है यह सही है पर भारतीय विषयों पर हिंदी में लिखा गया है तो उसे पाठक नहीं मिलेंगे यह भी भ्रम है। हां, इतना अवश्य है कि उच्च स्तर पर अंग्रेजी भाषा के लोगों का वर्चस्व है और वह अपने ब्लाग हिट बना लेते हैं पर इसके लिये उनकी तकनीकी कौशल या चतुर प्रबंधन को ही श्रेय दिया जा सकता है न कि पाठों को। यह हैरान करने वाली बात है कि अगर अंग्रेजी ब्लाग के मुकाबले हिंदी ब्लाग के लेखक अधिक भावनात्मक ढंग से अपनी बात रखते हैं और उनके पाठक भी उनको ऐसे ही पढ़ते हैं।

एक बात तय रही कि अंग्रेजी के ब्लाग पढ़ने वाले बहुत मिल जायेंगे क्योंकि उनको हिंदी ब्लाग के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। दूसरा कारण यह है कि हिंदी के प्रचार माध्यम केवल चुनींदा हिंदी ब्लाग लेखकोें पर ही प्रकाश डालते हैं क्योंकि सभी की पहुंच उनके कार्यालयों तक नहीं है। जब किसी विषय के साथ ब्लाग का नाम देना होता है तो अंग्रेजी के ब्लाग का नाम तो दिया जाता है पर हिंदी के ब्लाग को एक समूह के नाम से संबोधित कर निपटा दिया जाता है। कभी कभी झल्लाहट आती है पर फिर सोचते हैं कि अगर कहीं इन्होंने हिंदी के ब्लाग के नाम अपने प्रचार में दिये तो फिर उनको ही तो चुनौती मिलेगी-भला कौन व्यवसायी अपने सामने प्रतिस्पर्धी खड़ा करना चाहेगा। हिंदी के ब्लाग लेखकों के पास साधन सीमित है। मध्यवर्गीय परिवारों के लोग किस तरह अपने ब्लाग चला रहे हैं यह तो वही जानते हैं। फिर जो ब्लाग लेखक हैं उनमें से अधिकतर शांति से रहकर काम करने वाले हैं। किसी प्रकार का दूराव छिपाव नहीं करते इसलिये ही तो अंग्रजी ब्लाग का भी लिंक देते हैं पर अंग्रेजी के ब्लाग ऐसा कहां करने वाले हैं?

लब्बोलुवाब यह है कि बातेंे बड़ी करने से काम नहीं चलेगा। तमाम लोग जो सामजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये ब्लाग की भूमिका चाहते हैं उनको यह समझना चाहिये कि यह केवल हिंदी में ही संभव है। ऐसे में वह इसी बात का प्रयास करें कि हिंदी ब्लाग जगत का ही प्रचार करें। हालांकि इसके आसार कम ही हैं क्योंकि वैलंटाईन डे पर नारी स्वातंत्र्य की समर्थक जिन वेबसाईटों का प्रचार हो रहा है उनके सामने प्रतिवाद प्रस्तुत करने वाला कौन था? यकीनन कोई नहीं। हां, हिंदी ब्लाग जगत में बहुत सारे पाठ थे जो नारी स्वातंत्र्य के रूप में पब के प्रचार के विरुद्ध जोरदार ढंग से लिखे गये तो परंपरा के नाम पर स्त्रियों पर अनाचार के विरुद्ध भी बहुत कुछ प्रभावी ढंग से कहा गया। तीसरे पक्ष भी था जिसमें ब्लाग पर ऐसे भी पाठ लिखे गये जो इस मुद्दे को ही प्रायोजित मानते हुए समर्थन या विरोध करने की बजाय उसका मजाक उड़ा रहे थे। देश का बहुत बड़ा पाठक वर्ग उससे पढ़ने से वंचित रह गया जो शायद अंग्रेजी में लिखे गये पाठों से बहुत अच्छा था। वैसे एक बात भी लगती है कि वैलंटाईन पर एकतरफा बहस शायद अंग्रेजी में ही संभव थी क्योंकि उनके पाठ एकदम सतही थे। हिंदी वाले तो बहुत गहराई में उतरकर लिखते हैं और एक बार कोई अच्छा ब्लाग पढ़ ले तो पाठक् उनको पढ़ने पर ही आमादा हो जाते हैं। अंग्रेजी में जो ब्लाग इस दौरान हिट हुए वह भला अब रोज थोड़े ही हिट रहने वाले हैं। अगर इस बात से सीखा जाये तो भी यही निष्कर्ष निकलता है कि समाज में स्थाई परिवर्तन केवल हिंदी भाषा के ब्लाग से ही संभव है। अंग्रेजी में क्षणिक प्रचार ही संभव है स्थाई परिवर्तन नहीं।
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समाज की इमारत में आदमी पत्थर की तरह लग जाते-कविता साहित्य


हर पल लोगों के सामने
अपना कद बढाने की कोशिश
हर बार समाज में
सम्मान पाने की कोशिश
आदमी को बांधे रहती है
ऐसे बंधनों में जो उसे लाचार बनाते

ऐसे कायदों पर चलने की कोशिश जो
सर्वशक्तिमान के बनाए बताये जाते
कई किताबों के झुंड में से
छांटकर लोगों को सुनाये जाते
झूठ भी सच के तरह बताते

सब जानते हैं कि भ्रम रचे गए
आदमी को पालतू बनाने के लिए
उड़ न सके कभी आजाद पंछी की तरह
फिर भी कोई नहीं चाहता
अपने बनाए रास्ते पर चलना
क्योंकि जहाँ तकलीफ हो वहाँ चिल्लाते
जहाँ फायदा हो वहाँ हाथ फैलाकर खडे हो जाते
समाज कोई इमारत नहीं है
पर आदमी इसमें पत्थर की तरह लग जाते

आदमी अकेला आया है
और अकेला ही जाता भी
पर ताउम्र उठाता है ऐसे भ्रमों का बोझ
जो कभी सच होते नहीं दिख पाते
लोग पंछियों की तरह उड़ने की चाहत लिए
इस दुनिया से विदा हो जाते

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क्यों नहीं देते सुखद अहसास

हाथ के स्पर्श से किसी के बदन को
तसल्ली मिलती है तो
उसे छूकर क्यों नहीं देते सुखद अहसास
चंद अल्फाजों से किसी के दिल को
हमदर्दी मिल जाती है
तो अपनी जुबान से बोलकर
क्यों नहीं देते किसी को सुखद अहसास
अपने देखने से किसी को
अच्छा लगता है
तो क्यों नहीं अपनी नजरें इनायत कर
किसी को क्यों नहीं देते अहसास
क्या डरते हैं
अपने से लड़ते हैं
सोचते हैं
किसी को सुखी देख
परेशान होगा मन
ए जिन्दगी को आकाश वाले का तोहफा
माननी वालों
दुख से सजा है यह उसका तोहफा
इसे मिलजुलकर सुख बना दो
इसलिए अक्ल दी है
बांटकर एक दूसरे का दुख-दर्द
क्यों नहीं देते एक दूसरे को सुख का अहसास

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कहने वाले का कहना ही है व्यापार-व्यंग्य कविता


एक सपना लेकर
सभी लोग आते हैं सामने
दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन

कहते हैं
‘तुम उस पर बैठ सकते हो
और कर सकते हो दुनियां पर शासन

उठाकर देखता हूं दृष्टि
दिखती है सुनसान सारी सृष्टि
न कहीं सिंहासन दिखता है
न शासन होने के आसार
कहने वाले का कहना ही है व्यापार
वह दिखाते हैं एक सपना
‘तुम हमारी बात मान लो
हमार उद्देश्य पूरा करने का ठान लो
देखो वह जगह जहां हम तुम्हें बिठायेंगे
वह बना है सोने चांदी का सिंहासन’

उनको देता हूं अपने पसीने का दान
उनके दिखाये भ्रमों का नहीं
रहने देता अपने मन में निशान
मतलब निकल जाने के बाद
वह मुझसे नजरें फेरें
मैं पहले ही पीठ दिखा देता हूं
मुझे पता है
अब नहीं दिखाई देगा भ्रम का सिंहासन
जिस पर बैठा हूं वही रहेगा मेरा आसन

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जिस घर के अंदर झांका वहीं जंग का मैदान पाता

अपनों में गैर
और गैरों में अजनबी हो जाना
कितना सताता है
जब आदमी अपने को अकेला पाता है

भरी दोपहर में
शरीर से बहता पसीना
चलते जा रहे पांव
चंद पलों के मन के सुख की खातिर
जिस घर के अंदर झांका
वहीं जंग का मैदान पाता है

मांगने पर थोड़ा प्यार
इतराने लगते हैं लोग
देते हैं नसीहतें तमाम
पर चंद प्यार के लफ्ज बोलकर
हमदर्दी जताने का ख्याल
किसी को नहीं आता है

ऊपर से बरसाता आग सूरज
नीचे जलती धरती
नंगे पांव चलता आदमी
ढूंढता है सभी जगह मन की शीतलता
पर भी नजर डाले
लोगों का मन छल से भरा
स्वयं को ही धोखा देता नजर आता है

कुछ पल प्यार की चाह
जलते पांव के लिये शीतलता की राह
मांग कर अपने आपको
शर्मिंदा करने से तो
जलती आग मे चलते रहना ही भाता है
भला आदमी भी कभी आदमी को
सुख के पल दे पाता है
…………………………….
उस महफिल में चंद पल सुकून से
बिताने की खातिर रखा था कदम
हमें मालुम नहीं था दिलजलों ने
अपने लिये उसे सजाया हैं
उनके मसले देखकर ख्याल आया कि
इससे तो घर ही अच्छे थे हम
पहले भी कम नहीं थे साथ हमारे
वहां से बेआबरू होने का लेकर लौटे गम
………………………………..

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चाणक्य नीति:शास्त्रों की निंदा करने वाले अल्पज्ञानी


1.आकाश में बैठकर किसी से वार्तालाप नहीं हो सकता, वहां कोई किसी का संदेश वाहक न जा सकता है और न वहां से आ सकता है जिससे कि एक दूसरे के यहां के रहस्यों जाना जा सकें। अंतरिक्ष के बारे में सामान्य मनुष्यों को कोई ज्ञान नहंी रहता पर फिर भी विद्वान लोगों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे में ज्ञान कर लिया। ऐसे विद्वान प्रतिभाशाली और दिव्य दृष्टि वाले होते हैं।

2.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वेद की निंदा करने वाले वेद की महानता को कम नहीं कर सकते। शस्त्र निहित आचार-व्यवहार को कार्य बताने वाले अल्पज्ञ लोग शास्त्रों की मर्यादा को नष्ट नहीं कर सकते।

3.बुद्धिमान मनुष्य को कौवे से पांच बातें सीखनी चाहिए। छिपकर मैथुन करना, चारों और दृष्टि रखना अर्थात चैकन्ना रहना, कभी आलस्य न करना, तथा किसी पर विश्वास न करना।

संपादकीय व्याख्या-कई लोग भारतीय वेद शास्त्रों के बारे में दुष्प्रचार में लगे हैं। इनमें तो कई अन्य धर्मों के विद्वान भी हैं। उन्होंने इधर-उधर से कुछ श्लोक सुन लिये और अब वेदों के विरुद्ध विषवमन करते हैं। उनके बारे में वह कुछ नहीं जानते। लाखों श्लोकों में से दो चार श्लोक पढ़कर उन पर टिप्पणियां करना अल्पज्ञान का ही प्रतीक है। इन वेदों के अध्ययन से ऐसा लगता है कि आज अप्रासंगिक लगने वाले कुछ संदेश अपने समय में उपयुक्त रहे होंगे। भारतीय वेदों ने ही इस विश्व में सभ्यता स्थापित की है। वेदों मेें यह कहीं नहीं लिखा हुआ है कि समय के साथ अपने अंदर परिवर्तन नहीं लाओ।

आधुनिक विज्ञान में पश्चिम का गुणगान करने वालों को यह पता होना चहिए कि सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे मेें भारतीय विद्वान बहुत पहले से ही जानते थे। भारत के अनेक पश्चिम को ही आधुनिक विज्ञान को सर्वोपरि मानता है जो आज भी पूर्ण नहीं है और प्रयोगों के दौर से गुजर रहा है।

कठपुतली का खेल तो अब भी चल रहा है (हास्य-व्यंग्य)


हम घर से बाहर निकल कर जैसे सायकल से सड़क पर आये तो  एक सज्जन मिल गये और  हमसे बोले-‘कहां जा रहे हो।’

हमने कहा-‘पुतले और पुतली का खेल देखने जा रहे हैं।’
वह बोले-‘‘कहां जा रहे हो? हमें भी बताओ। अरसा हो गया कठपुतली का खेल देखे। हमें भी बताओं तो हम भी अपनी कार से वहां पहुंच रहे हैं।’’
हमने कहा-‘नही, दरअसल हमारे एक मित्र ने हमसे कहा कि आओ पोल खोल देखेंगे। उसी के आग्रह पर उसके घर जा रहे हैं।’

वह बोले-‘‘अरे, वह तो फिल्म का नाम है। उसमें तो मशहूर हीरो  और हीरोइन ने एक्टिंग की है। तुंम उसे पुतले-पुतली का खेल कह रहे हो।’’

हमने कहा-‘मगर फिल्म और कठपुतली के खेल में फर्क क्या हैं?
वह बोला-‘‘कमाल करते हो यार? मैने सुना तुमने पीना छोड़ दी है। लगता है आज सुबह ही पीकर निकले हो। उसमें तो असली हीरो-हीरोइन ने काम किया है।’’

हमने उत्तर दिया कि-‘‘ कब कहा कि नकली ने काम किया है। मगर काम तो वही किया है जो काठ के बने पुतले-पुतली ही करते हैं। उनको जो डायरेक्ट कहता है वैसा ही अभिनय करते हैं। नृत्य निदेशक जैसा कहता है वैसा ही नाचते हैं ओर संवाद लेखक जैसा लिखकर देता है वैसा ही बोलते हैं। बस बोलते खुद है, चलती उनकी टांगे ही है और बोलती उनकी जुबान है। कोई प्रत्यक्ष कोई डोर पकड़े नहीं रहता। अप्रत्यक्ष रूप से तो कोई न कोई पकड़े रहता ही है फिर हुए तो वह भी पुतले-पुतली ही न!’’

वह बातचीत का विषय बदलते हुए बोले-‘छोड़ो यार, कल तुमने क्रिकेट मैच देखा। क्या जोरदार मैच हुआ?’

अमने च ौंककर पूछा-‘‘क्या भारत की टीम का कोई क्रिकेट मैच हो रहा है?’

‘नही यार,‘‘वह बोले-‘वह ट्वंटी-ट्वंटी के मैच हो रहे हैं। क्या जोरदार मैच हो रहे हैं? तुम तो क्रिकेट के शौकीन हो तुम्हें यह मैच देखना चाहिए।

हम बुद्धुओं की तरह खड़े रहे फिर पूछा-‘‘पर मैच किस देश से हो रहा है?
वह झल्लाकर बोले-‘तुमसे बात करना बेकार है। बहस पर बहस करते हो। अरे किसी देश की टीम से नहीं बल्कि ऐसे ही कुछ टीमें हैं उनके मैच हो रहे हैं।’’

हमने बनते हुए कहा-‘‘अच्छा! तुम उन मैचों की बात कर रहे हो। हमने टीवी पर सुना था कि कुछ उस पर बीस हजार करोड़ रुपये का दांव लग रहा है। अब जब दांव लगेगा तो फिर कहीं यह भी कठपुतली के नाच की तरह तो नहीं है।’ जब इतने बड़े मैचों पर जिनमें देश का नाम दांव पर लगा होता है तब ऐसी ही बातें होतीं हैं कि अमुक ने मैचा फिक्स कर लिया  और अमुक ने अपना प्रदर्शन क्षमता से कम किया उसमें सच्चाई न भी होत तो इनमें तो ऐसा हो सकता है क्योंकि इसमें किसी के प्रति जवाबदेही नहीं है।
वह बोले-‘‘अपने का इन चीजों से क्या लेना देना? अपने को तो मैच देखना है।’

हमने शुष्क स्वर में कहा-‘इनसे कोई लेना देना नहीं है इसलिये तो वह मैच नहीं देख रहे। डांस  चाहे इसमे देखें या उसमें है तो डांस ही।  
वह बोले-‘‘तुमसे अब बहस करना बेकार है। मनोरंजन का मतलब ही नहीं समझते।’
हमने कहा-‘‘नहीं समझते तो दोस्त के आमंत्रण पर उसके घर क्यों जा रहे हैं? बस फर्क यह है कि तुम फिल्म कहते हो हम पुतले-पुतली का नाच कहते हैं।

वह सज्जन झल्लाकर चले गये। हमने अपनी राह ली। हम भी सोच रहे थे कि सुबह-सुबह क्योंे पंगा लिया।

दरअसल पहले लोग अपनी शक्ल ही आइने में देख पाते थे और फिर अपने सामने चलते फिरते लोगोंे से मजा किसको आता है। इसलिये कठपुतली के अभिनय को देखकर उनको मजा आता है। अब आ गये हैं कैमरे। उसमें तो हाड़मांस के पुतले काम करते हैं तो हम कह देते है। कि हीरो-हीरोइन हैं। काम तो वह वैसा ही कर रहेे हैं सच तो यह कि हर कोई हीरो-हीरोइन बनने के सपने देखने का आदी है इसलिये कठपुतली कहने से झिझकता है। यह भी हो सकता है कि कठपुतली का खेल कहने से लोगों को अपने गंवार होने का अहसास होता हो क्योंकि आजकल तो हर कोई माडर्न बनकर रहना चाहता है। उन हांड़मांस के पुंतलों में अपने को देखता है इसलिये ही कहता है कि हीरो-हीरोइन है।  हम भी पहले ऐसे ही देखते थे। इधर जब से ज्ञान और ध्यान में घुसे हैं तब से र्थोड़ा देखने का नजरिया बदला है। क्रिकेट खेल देखकर हमने अपना जीवन बरबाद कर लिया और अगर वह वक्त हमने कहीं अगर और लगाया होता तो आज क्या होते? उसक मलाल अब दूर हो गया है जब से इस ब्लाग विधा में घुसे हैं। हम अपने को पुतला नहीं कहते क्योंकि स्वयं ही विचार कर लिखते हैं। हम तो उसे ही मनुष्य की तरह कर्म करने वाला मानते हैं जो अपनी बुद्धि से चलता है न कि दूसरे की बुद्धि से। कहने को खिलाड़ी और अभिनेता भी अपनी बुद्धि से चलते हैं और हम उन्हें अपने जैसा मानते है पर उनकी फिल्म और ऐसे छोटे मैचों में उनकी सक्रियता को ही पुंतलों जैसा मानते हैं। आखिर हमारी इस राय में क्या कमी है?
 

 

Translation, the author of nearly all the languages of tools will


I have some lessons to the Blog English translation in Hindi to read them. It is also written by Indian writers were. It seems that the world’s entire world Blog at the same time, however, one of them will appear as the written content of your country and the region has been the subject of a separate – will appear on the fundamentals of a separate not like the reflection.

Hindi with English translation tool to use the Blog writer also went out of his linguistic limitations of the prestigious English may not know that. Hindi on the forums of unregistered Blog English translation of the lessons I am also presented. I read stories in English could be so clear on the translation tool, I will be working hard on the curiosity I am. The English – Hindi tool of the information now found on the already being used elsewhere. I have a Blog writer that day was his comment on a post and when I was there on his Blog post in Hindi. Blog writer’s name in English. A number of English first names to write on, I think the comment was such that it will be placed. Blog author of a comment on my Blog in a Hindi – English tool of the discussion was a day when I felt it was a tool that would so quickly I did not expect such a warning.

it is hindi article and it translasion in inglish by googl tool. i dont more knowledge in inglish-Deepak Bharatdeep.enough knowledge of English is not so sorry for any error – Deepak Bharatdeep

The point is that the translation is not the result cent of its English-reading assistance, has been found. So it has been used to write for me. When I am on my translation of the text for many words, I brought it back to him does not accept the word alternative keeps me. I created a little English, they may also be understood very well, I will take. It seems that his reaction to the positive. Blog writer also some English writers of Hindi Blog for striving to make contact are showing. Blog writer to remember the mood of Hindi-speaking foreign writers Blog for the remains of his contacts should take place. This Blog is not here and who walks through the translation tool at their other speaking Blog writers come in contact with the full possibility.

Blog of a word in the language translation is not a Blog and writers for the Wall of the language seems to have ended. Yesterday an English writer Blog has posted a response on the matter, in the sense that he has been reading my post as he is writing Jennifer Lancey wrote Hello there. I was sent a link to your blog by a friend a while ago. I have been reading a long for a while now. Just wanted to say HI. Thanks for putting in all the hard work. Now is not surprising that I am writing in Hindi read, is the only people who know only English. I read it and the English translation of his address about his opinions do not run, but we will also go well where such comments are alleging that it is clear that our understanding of that. Yes, I can not wait for this thing to me is that a Hindi translation of the Blog tool to read the translation itself but also keeping am. To correct the translation of impurities so am working hard so that my posts and more clearly readable. Now it’s time to write the attention that I am keeping Blog of the translation of other languages. All the languages of the world’s Blog writer for a day so that they will be close to the longer distances will be named. I want Hindi Blog writer, and they are also the world at his prestigious posts to be on time sometimes on the translation tool that should see the full translation in English that comes from reading. The word translation are not optional for him to choose words as possible. English translation is not necessary that we keep enough of it, that it can be translated in English, the maximum net. There is not any objectionable because we are writing in Hindi and other languages if the author of Blog contact us if they’re willing to keep the facility would be. One thing is the experience that we all their lessons in pure Hindi words maximum use it as pure English translation.

Stories
Google’s translation of the text has been presented here to

Good news was not read – comic satire अच्छा हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य


My wife has asked the night -”What will eat?”
We have said -”Where we eat at night? So you take a cup of milk with him a small toast to be so afraid. Although you asked why?
Ira said – ‘you just write something to eat. I thought that perhaps you saw the hunger will take. When preparing food at night and not on the account, he writes, why?
I said – ‘write for yourself, not what the think. Read the account of the night will not! How serious is the matter of foreign dignitaries that the people of our country, people are accused of taking more food, it is important to understand that it is no worry about that.
my wife -”out-you must have been like a man. And all the people to say that I am an account at the time you eat at night and come home with only two to four tea and biscuits account of the night with a cup of milk toast two accounts. It is not, and what to eat? And people say I am a time account.

it is hindi article and it translasion in inglish by googl tool. i dont more knowledge in inglish-Deepak Bharatdeep

I have said -”I did that I would tell people to account and I am the account. This is the thing that set our house on the night, caused not eat.”

I has been silent wife. One morning, and visited the gentleman replied – yaar”Look, our country, what people are saying out of India’s people eat more food in the world because of the crisis. Tell me now, the people of this country was poor, and the flag poles on the ideologies of this country to do with the attack. End! Privatization liberalization live. Now say that more accounts. Now what not to eat bread filled the stomach?

I has said -”if food is not enough. A need to eat less bread.
He said a gentleman – you yaar”as one that can not be any time to eat eat.
I has said -”Today we are less physical effort of so little account.
Mrs them were familiar with them and we spoke -”Where an account of time? Almost at night with tea and biscuits at night with a cup of milk toast must account. What is eating less?

We has thought of speaking lies did not help and i said – ‘We do not say that low?
He said a gentleman – ‘It is also, we still eat on the account. After eating glass of milk must take. Ha, etc. do not pay with her toast. bhabhiji, Do you understand that the only people you drink the milk. After we eat, sleep sip of milk is not only not come.
We have said – ‘you eat with, why are so upset? Your boy’s wedding will, we must also lashed eat like other people. No such oath not to eat that night and never eat. Yes, yoga meditation since the start of the night, then eat free from worry, you have not ever say that the dinner to take leave. Some also say the man said.

He said – ‘The issue is that really what we eat too?
We have said -”Do not think more? You are already complaining of diabetes and it will only benefit those companies who are out of their pills because of the food is digested you get. Yoga, meditation may be that publicity from now increasing the number of healthy people and those on the ‘more food’ campaign to increase the tension will be the same again made them sick The move may be the same.
He said a gentleman -”it has not yet informed you of what we eat more Indian?
I has said – in this country,”one hundred and five million people live. Far more people eat wheat, rice, said something and. No one has a scale. A house in four age groups of four are members of the amount of food on their own – is different. Now, how the people of this country say that the accounts are more or less.
He said a gentleman – the last ten years, we are seeing that in your home comes as wheat not take more than once. But eating out of its low consumption have been going. Like many small children, etc. ate the chips enter the stomach, pizzs, burger and ate the stomach, then fill in the house where eat?
I has said – ‘eating out of the account appear to other people. On the road to the movement of money out of people to see such things are doing so. Eating places them in the market and a crowd of people watching the money flow seems that the nation is the very account.
The concern of a gentleman, after all, if my wife would have said – ‘brother Sahib, so why would you worry? The people of this country, an account of seized a short account. A field in sight, not kill. Any of the seized is not happy to see him come? Went on a looting the house, do not. This is your home you told we eat at night when to come? If you ever bhabhiji and children to come not just to eat on.

He said a gentleman – ‘You Kamal doing? Such a debate has been on the field and you eat, then sat been talking about. At tea, you will eat, so she does not force us not come to your house, including family. Yes, once you come to eat, think again.
Then we went and he changed the subject of talks were the wife said -”it said that the people of India who are more account?

I has said -”We know you try to learn why their concerns have been raised. More concern to a great loss of body fat. “
As he spoke out – if it is a matter of course. Although such a title today in the newspaper, saw on the news was read out. Was not a good read. Without meaning to read the news of what advantage?हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य

हमने कहा-‘‘हम रात को कहां खाते हैं?तुम दूध का एक कप ले आओ तो उसके साथ एक छोटा टोस्ट खाकर सो जायेंगे। वैसे तुमने यह पूछा क्यों?’
कहने लगीं-‘तुम अभी कुछ खाने पर लिख रहे थे। मैने देखा तो सोचा कि शायद तुम्हें भूख लग जाये। जब रात को खाना नहीं खाते तो उस पर लिखते क्यों हो?’
मैने कहा-‘अपने लिये तो लिखते नहीं है जो यह सोचें। पढ़ने वाले तो रात को खाते होंगे न! फिर कितनी गंभीर बात है कि अपने देश के लोगों पर अधिक खाने का आरोप लग रहा है तो यह समझाना जरूरी है कि ऐसी कोई बात नहीं है।’
हमारी श्रीमती जी बोली-‘‘लगाने वाला भी तुम जैसा कोई आदमी रहा होगा। सारी दुनियां से कहते हो कि एक समय खाना खाता हूं पर तुम रात को घर आते ही चाय के साथ  दो से चार बिस्कुट  खाते हो और रात को दूध के कप के साथ एक दो टोस्ट उदरस्थ कर जाते हो। यह खाना नहीं तो और क्या है? और लोगों से कहते हो कि एक समय खाता हूं।’

हमने कहा-‘‘तो क्या लोगों का बताता फिरूं कि मैं यह खाता हूं और वह खाता हूं। यह तो तय बात है कि रात को हमारे घर पर खाना नहीं बनता।’’

हमारी श्रीमती जी चुप हो गयीं। सुबह ही एक सज्जन आये और बोले-‘‘देखो यार, अपने देश के  बाहर के लोग क्या कह रहे हैं  भारत के लोग अधिक खाते हैं इसलिये दुनियां में खाद्यान्न का संकट है। अब बताओ, इस देश के लोग गरीब थे तो झंडे और डंडे लेकर इस देश पर विचाराधाराओं के साथ हमला करते थे। सरकारीकरण खत्म करो उदारीकरण चलो। अब कह रहे हैं कि अधिक खाते हैं। अब क्या रोटी भी पेट भरकर  नहीं खायें?’

हमने कहा-‘‘भरपेट तो खाना नहीं चाहिए। जरूरत से एक रोटी कम खाना चाहिए।
वह सज्जन बोले-‘‘यार तुम जैसा तो कोई हो नहीं सकता कि एक समय खाना खाये।’
हमने कहा-‘‘हम आजकल शारीरिक मेहनत कम कर रहे हैं इसलिये कम खाते हैं।
हमारी श्रीमती उनसे परिचित थीं और उनसे बोलीं-‘‘कहां एक समय खाते हैं? रात को आते ही चाय के साथ बिस्किट और रात को दूध के कप के साथ टोस्ट जरूर खाते हैं। वह क्या खाने से कम है?’

हमने सोचा झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है और हमने कहा-‘हम कम कहते हैं कि नहीं लेते?’
वह सज्जन बोले-‘यह तो हम भी करते है पर फिर भी खाना खाते हैं। खाने के बाद दूध का ग्लास जरूर लेते हैं। हा,ं उसके साथ टोस्ट वगैरह नहीं लेते। भाभीजी, आप क्या समझ रही हो कि केवल आप लोग ही दूध पीते हैं। खाने के बाद हम दूध न पियें तो नींद ही नहीं आये।’
हमने कहा-‘पर आप खाने को लेकर इतने परेशान क्यों हो रहे हैं? आपके लड़के की शादी में आयेंगे तो जरूर हम भी जमकर खायेंगे जैसे दूसरे। ऐसी कोई कसम नहीं खा रखी कि रात को कभी नहीं खायेंगे। हां, जबसे योग साधना शूरू की है तब से रात को खाने की चिंता से मुक्त हो गये हैं पर आपको कभी यह नहीं कहेंगे कि रात का भोजन लेना छोड़ दें। कहने वाला कुछ भी कहता रहे।’

वह बोले-‘मुद्दे की बात यह है कि क्या वाकई हम बहुत खाते हैं?’
हमने कहा-‘‘अधिक मत सोचो? पहले ही तुम मधुमेह की शिकायत करते हो  और उसमें फायदा उन कंपनियों का ही होगा जो बाहर की हैं क्योंकि उनकी गोलियों से ही तुम खाना पचा पाते हो। हो सकता है कि योग साधना के प्रचार से  अब स्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही हो और उन पर ‘अधिक खाने’ के शगूफे से तनाव बढ़ाकर फिर उनको बीमार बनाया जाये यही इसके पीछे यही चाल हो सकती है।
वह सज्जन बोले-‘‘पर तुमने यह अभी तक नहीं बताया कि क्या हम भारतीय अधिक खाते हैं?’
हमने कहा-‘‘इस देश में एक सौ पांच करोड़ लोग रहते हैं। कहीं लोग गेंहूं अधिक खाते हैं तो कही चावल तो कहीं कुछ और। किसी के पास कोई पैमाना नहीं है। घर में चार एक आयु वर्ग के चार सदस्य होते हैं पर उनके खाने की मात्रा अलग-अलग होती है। अब कैसे कहें कि इस देश के लोग अधिक खाते हैं या कम।’
वह सज्जल बोले-‘हम तो पिछले दस साल से देख रहे हैं कि अपने घर में जितना गेंहूं आता है उससे अधिक कभी लेते नहीं है। बल्कि बाहर के खाने से उसकी खपत कम होती जा रही है। छोटे बच्चे तो तमाम तरह की चिप्स वगैरह खाकर पेट भरते हैं, पीजा, बर्गर और पैट्रीज खाकर पेट भरेंगे तो फिर घर में कहां खायेंगे?’
हमने कहा-‘फिर बाहर खाने से दूसरे लोगों को खाते दिखते हैं। पैसे की आवाजाही सड़क पर होने से बाहर के लोगों को दिख रही हैं इसलिये ऐसी बातें कर रहे हैं। उनको बाजार में खाने के स्थानों पर लोगों की भीड़ और पैसे का बहाव देखकर ऐसा  लगता है कि यह देश बहुत खाता है।’
वह सज्जन चिंता में पड़े रहे तो आखिर हमारी श्रीमती जी ने कहा-‘भाई साहब, इतनी चिंता में आप पड़े क्यों हैं? इस देश के लोग खाते हैं तो किसी से छीनकर थोड़े ही खाते हैं। किसी के खाने में नजर तो नहीं डालते। किसी को सुखी देखकर उससे छीनते तो नहीं हैं? किसी के घर पर जाकर लूटपाट तो नहीं करते। आप यह बताईये हम आपके घर रात के खाने पर कब आयें? आप तो भाभीजी और बच्चों को लेकर कभी खाने पर लेकर  आते ही नहीं।’
 
वह सज्जन बोले-‘आप कमाल कर रही हो? इतनी बहस हो गयी खाने पर और आप फिर खाने की बात  लेकर बैठ गयीं। कभी आयेंगे चाय पीने पर आप खाने के जबरदस्ती करतीं हैं इसीलिये नहीं हम परिवार सहित आपके घर नहीं आते।ं हां, आप एक बार खाने पर आयें तो फिर सोचेंगे।’
फिर हमने बातचीत का विषय बदला और वह चले गये तो श्रीमतीजी ने कहा-‘‘पर यह कहा किसने है कि भारत के लोग खाते अधिक हैं?’

हमने कहा-‘‘हमें पता है पर तुम जानने की कोशिश कर अपनी चिंता क्यों बढ़ा रही हो। अधिक चिंता शरीर को हानि पहुंचाती है।’
वह बाहर जाते हुए बोलीं-हां यह तो बात है। वैसे आज अखबार में ऐसा कोई ऐसा शीर्षक तो देखा था पर खबर पूरी नहीं पढ़ी। अच्छा हुआ नहीं पढ़ी। बिना मतलब की खबर पढ़ने से क्या फायदा?’

 

 

क्रिकेट मैच में एक्शन का सीन-हास्य कविता


बगल में अखबार दबाकर
घर आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापु तुमने
पहले अखबारों  और अब ब्लाग पर
क्रिकेट पर ही लिखना शुरू किया
फिर क्यों अब मूंह फेर लिया
देखो क्रिकेट में फिल्म के एक्शन का
मजा भी आ रहा है
पहले पिटा  हीरो
अब पीटकर बाहर जा रहा है
क्यों नहीं तुम भी देखा करते
बैट-बाल के खेल में
मारधाड़ की भी मजा क्यों नहीं लिया करते
ऐसे क्रिकेट से क्यों किनारा किया’

सुनकर पहले हैरान हुए फिर बोले
‘‘हम फिल्म के वक्त फिल्म और
क्रिकेट के वक्त क्रिकेट देख करते हैं
यह टू-इन-वन मजा तुम ही लो
हमें तो अब इससे दूर ही समझ लो
हमने पहले भी कहा था
क्रिकेट अब कम खेली जायेगी
पर उससे पहले उसकी पटकथा लिखा जायेगी
फिल्म वालों ने लिया है मोर्चा
क्रिकेट को चमकान का
तो उनकी कला यहां भी नजर आयेगी
आस्ट्रेलिया में किया था जिसने हीरो को रोल
उसे अब विलेन बनाकर पेश किया
उस समय के विलेन को दे रहे थें जो गालियां
अब बजा रहे उनके लिये तालियां
यह हीरो-हीरोइन भला कब  डायरेक्टर के
 हुक्म के बिना एक्शन के कब होते है
जरूर लिखी होगी किसे ने पटकथा
जो झगड़े की फोटो कैमरे से लेने में रोकते हैं
झगड़ा करने वाले खिलाड़ी
बाद में ऐसे होकर मिलते हैं
जैसे कोई बढि़या अभिनय किया
कह तो रहे है सभी
पर किसने देखा यह कि 
थप्पड़ मारने वाले ने अपना कितना नुक्सान किया
हमने ने देखा न मैच न झगड़ा
पर एक बात मानते हैं कि
क्रिकेट खेल में एक्शन का सीन लिखकर
पटकथा लिखने वाले ने कमाल किया
……………………….


धोनी कप्तान की तरह पेश आयें-a article in hindi on cricket


धोनी कप्तान की तरह पेश आयें
एक दिवसीय मैचों के श्रंखला में आस्ट्रेलिया ने भारत को हराकर यह सिद्ध कर दिया है कि अभी भी विश्व में उसके सामने कोई टीम टिक नहीं सकती। बीस ओवर के मैचों में भारत को विश्व विजेता का खिताब क्या मिला लोग फिर एक बार क्रिकेट की तरफ आकर्षित होने लगे थे पर अब इन दो पराजयों से उनकी खुमारी उतरने लगी है। समस्या यह है कि दोनों के खेल नियमों बहुत अंतर है और फिर पचास ओवर में हमेशा खिलाड़ियों के खेल के साथ उनके और कप्तान के रणनीतिक कौशल की भी परीक्षा होती है। इस मामले में भी हमेशा भारतीय खिलाडी कमजोर रहे हैं। कप्तान बनना तो सभी चाहते हैं पर उसके दायित्व को कोई नहीं समझता। सबको यह सम्मान तो चाहिए पर इस पद का निर्वाह कैसे हो यह कोई नहीं जानता। जब टीम जीतती है तो कप्तान वाह-वही लूटने को तैयार है और हारते हैं तो सारा आरोप खिलाडियों पर डाल देते हैं-उसमें भी किसी खिलाडी का नाम लेने से कराते हैं। कभी कोई कप्तान अपने खिलाड़ियों को निर्देश देते नज़र नहीं आते। भारतीय गेंदबाज कभी कप्तान से निर्देश लेकर गेंद डाल रहे हों ऐसा नहीं लगता।

मैने एक कप्तान को यह कहते हुए सुना था कि ‘सभी खिलाडी प्रोफेशनल हैं और कोई चीज समझाने की जरूरत नहीं है, वह सब खुद ही जानते है’। मैं सोच रहा था कि फिर अखिर कप्तान आखिर किस मर्ज की दवा है। क्या वह अपने साथी खिलाडियों को सख्ती से अपने मूल स्वरूप के साथ हालत के अनुसार खेलने का निर्देश नहीं दे सकता? ऐसा लगता है कि भारतीय टीम में सीनियर-जूनियर का कहीं न कहीं भेद चलता है इसीलिये ही सीनियर खिलाड़ी चाहे जैसा खेलने लगते हैं क्योंकि इनको वहां समझ या चेतावनी देने वाला कोई नहीं होता। अगर आज हम धोनी से यह अपेक्षा करें कि वह अपनी से वरिष्ठ खिलाडियों पर उनके निराशाजनक खेल पर नाराजगी जताए तो इसकी संभावना नहीं लगती। शायद यह भारतीय टीम के अभ्यास में ही नहीं है कि उसका कप्तान अपने से वरिष्ठ या कनिष्ठ खिलाडी पर ग़ुस्सा जाहिर करे क्योंकि कब सामने वाला उसका कप्तान बनकर आ जाये और फिर बदला लेने। फिर धोनी तो अपनी सामने ही तीन ऐसे भूतपूर्व कप्तानों के खेलते देख रहे हैं जो कभी भी फिर कप्तान बन सकते हैं और ऎसी स्थिति में ‘जैसा चल रहा है वैसे चलने दो’ की नीति पर चलने के अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं है।

बीस ओवर की विश्व कप प्रतियोगिता में धोनी इस मामले में बडे भाग्यशाली थे कि उनके व्यक्तित्व को वहाँ चुनौती देने वाला युवराज के अलावा और कोई नहीं था और उसने भी उनका बखूबी साथ निभाया। पर इन एक दिवसीय मैचों में जिस तरह भारतीय टीम पिट रही हैं उससे तो यह लगता है कि धोनी अब कप्तान के रूप में असफल होते जा रहे हैं और खिलाड़ियों पर उनका कोई नियन्त्रण नहीं है। इस तरह लगतार असफल होने पर अगर वह अपने साथी खिलाडियों पर अगर इस वजह से गुस्सा नहीं हुए कि भविष्य में कोई उनमें से पुन: उनका कप्तान बनकर उनका भी भविष्य चौपट कर सकता है तो इस टीम के खिलाडियों के खेल में कोई सुधार नहीं होने वाला। अगर धोनी चाहते हैं कि उनका नाम सफल कप्तानों की सूची में शामिल हो तो उन्हें वरिष्ठ खिलाड़ियों को भी हालत के अनुसार खेलने के निर्देश देने होंगे।

पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए-hindi poem


मनोरंजन के लिए किसी
दृश्य, वस्तु या आदमी की चाहत
इन्सान को मजबूर करती है
इधर-उधर जाने के लिए
बाजार में कई बुत खडे है
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए

भटकते मन को चैन और खुशी
चंद सिक्के दिला देते हैं
जब ऊब जाये हंसने से
मनोरंजन के लिए दहला भी देते हैं
बिकता है मनोरंजन भी
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए

पर कोई ऐसी चीज नहीं मिलती जो
हर पल मन बहला सके
रोज पनपते दर्द को सहला सके
हालत यह होती की
जितने दर्द हल्का कर पाते
वह नये दर्द में जुड़कर चले आते
फिर चले जाते उन ठिकानों पर
जहाँ सजे हैं बाजार
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए

क्यों नहीं तलाशते
अपने मन में ही मनोरंजन
क्यों जाते उन लोगों के पास
जो बेचते नकली दवा दिल की
फिक्र उनको आदमी की नहीं
होती केवल अपने बिल की
कभी गानों की सजाते झूठी महफ़िल
कभी डर की रचना से बहलाते दिल
पूरी जिन्दगी गुजारते हैं
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए
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फ़िर भी लिखता रहूँगा


अब धीरे-धीरे यह समझ में आ रहा है कि ब्लॉग बनाना और लिखना वैसे ही है जैसे किसी शो के लिए एस.एम् एस. करना. जिस तरह टीवी चैनल पर शो होते हैं उनके लिए लोग आत्म मुग्ध होकर एस.एम् एस करते हैं कि हमने अपनी जोरदार भूमिका अदा की. इसी तरह रेडियो पर भी ज़रा-ज़रा से प्रश्नों पर जवाब के लिए एस.एम्. एस कराया जाता है. कुछ लोगों को विजेता बनाकर उनकी आवाज वहाँ सुनाई जाती है ताकि सब लोग उससे प्रेरित हों.
उससे किसका फायदा होता है सब जानते हैं. अलबता बड़े शहर के लोगों के लिए अपना नाम कमाने का खूब यहाँ अवसर हैं पर छोटे शहरों के ब्लॉग लेखकों को तो केवल भीड़ ही माना जायेगा.

इधर अब देश में भी ब्लॉग पर लिखने वालों को प्रोत्साहित किया जा रहा है. मैंने एक वर्ष पूर्व जब ब्लॉग लिखना शुरू किया तो मुझे लगा कि शायद कुछ पढने वाले मिल जायेंगे. यहाँ उस समय नारद करके एक फॉरम था जिस पर सब हिन्दी के ब्लॉग दिखते थे. उसके बाद तीन अन्य फॉरम भी खुल गए. वैसे वर्डप्रेस स्वयं भी अपने आप में एक फॉर्म चला रहा है पर ब्लागस्पाट.कॉम के लिए यह सभी हिन्दी फॉरम बहुत उपयोगी हैं क्योंकि उसके हिन्दी ब्लॉग एक साथ देखने के लिए कोई अन्य जगह नहीं है. बहरहाल मैंने अन्य लोगों के आग्रह पर वहाँ अपना ब्लॉग पंजीकृत कराया. शुरू में ऐसा लगा कि शायद कोई बहुत अच्छी जगह है पर अब लगाने लगा कि वहाँ अपनी रचना दिखाने का मतलब है कि उसको बाजार में बेचना. वहां ग्राहक आपकी चीज पर कोई प्रतिकूल कमेन्ट भी कर सकता है.

पर अब उसका दूसरा रूप भी सामने आ रहा है. मैंने एक वर्ष तक जमकर लिखा कि शायद पाठक संख्या बढे पर ऐसा हुआ नहीं उल्टे ऐसा लगा कि ब्लॉग लेखकों संख्या बढाकर कुछ लोग अपनी भीड़ बढाना चाहते हैं. पुराने ब्लोगर जिनके वेब साईटों में अपने संपर्क लगते हैं अपने लिए खूब प्रचार जुटा रहे हैं. मीडिया में ऐसे लोगों को प्रचार मिल रहा है जिनकी पढने की दृष्टि से हिन्दी ब्लॉग जगत में अधिक मान्यता नहीं है. इन लोगों ने पुरस्कार बांटे और फ़िर उनका अखबारों में खूब प्रचार किया. मुझे हैरानी हुई कि किसी ने भी मेरे नाम का उल्लेख नहीं किया जब कि मैंने १२ सौ से अधिक पोस्टों को लिखा. हद तो इस बात की हो गयी कि ब्लोगों के विषयों का उल्लेख करते हुए उन महत्वपूर्ण विषयों-चाणक्य,कबीर, रहीम, मनु स्मृति, और कौटिल्य, विदुर नीति श्री गीता-का उल्लेख तक नहीं किया जाता क्योंकि इसे मैं लिखता हूँ. इतना भयभीत लोग हैं मैं समझता नहीं था. बड़े शहरों के लोगों के दो समूह बन गए हैं जिनका लिखने से अधिक इस बात पर यकीन है कि आत्मप्रचार किया जाए. वैसे मैं इन विषयों पर लिखते हुए किसी सम्मान की आशा करता भी नहीं क्योंकि इसके लिए कोई प्रायोजक नहीं मिल सकता. उल्टे अपमानित किए जाने पर कोई पुरस्कार जरूर पा सकता है ऐसी मैं आशा नहीं करता था.

छोटे शहरों के ब्लोगरों के लिए नाम,नामा और इनाम जैसी अभी कोई संभावना नहीं बनती दिखती. अब तो यही सोच रहा हूँ कि हिन्दी फोरमों पर जो ब्लॉग हैं उन पर अधिक नहीं लिखा जाए क्योंकि वहाँ सम्मान न मिले पर अपमानित कर कुछ लोग पुरस्कृत जरूर हो सकते हैं. जैसे-जैसे यह संख्या बढेगी मुझे अपने आत्म सम्मान के बचाव के लिए अधिक मानसिक संघर्ष करना पड़ेगा और ऐसे में मेरी रचनाधर्मिता प्रभावित होगी. मैंने किसी से कुछ नहीं माँगा-न नाम, न नामा न इनाम पर इससे वह संतुष्ट नहीं है. क्योंकि मेरे विषय अगर कुछ लोगों को प्रिय हैं तो कुछ लोग उनको अपमानित कर अपने लिए सम्मान भी जुटा सकते हैं. एक तो विषय है फ़िर छोटे शहर का और फ़िर लिखकर उसका पीछा न करने की आदत मुझे कहीं पुरस्कृत कराएगी यह तो मैं सोचता भी नहीं पर अपमानित करने पर कुछ लोग पुरस्कृत हों क्या मैं यह स्वीकार कर लेता. बहरहाल फ़िर भी इन फोरमों पर लिखूंगा ताकि कुछ और कहानियाँ यहाँ पर मिल सकें. वैसे मैं धर्म भीरू इन्सान हूँ और श्रीगीता का संदेश नए संदर्भों में प्रस्तुत करने का मन है, उस पर मैं लिखता भी रहा हूँ पर जिस स्वरूप में लिखने का विचार है उसे शुरू नहीं कर सका. देखता हूँ कि आगे भगवान् की क्या मेहरबानी होती है.

संत कबीर वाणी:मन का अहंकार नहीं छूट पाता


माया तजो तो क्या भया मान तजा न जाय
मन बडे मुनिवर गले, मान सभी को खाम

यदि माया मोह का किसी साधक ने अपने आत्मबल से त्याग भी कर दिया, तो भी व्यर्थ है क्योंकि वह अभिमान का त्याग नहीं हो पाता. इसके विपरीत यह अहंकार हो जाता है कि हमने अहंकार का त्याग कर दिया.

मोटी माया सब तजैं, झीनी तजी न जाय
पीर पैगंबर, औलिया, झीनी सबको खाय

स्थूल माया जो दिखती हैं उसका त्याग तो किया जा सकता हैं पर जो सूक्ष्म माया यानी जो मन में अहं का भाव है वह कभी ख़त्म नहीं होता और कई ऐसे लोग जो सिद्ध होने का दावा करते हैं वह भी इससे नहीं बच पाते

हिन्दी के ठेकेदार- हास्य-व्यंग्य कविता


अंतर्जाल पर एकछत्र राज्य की
कोशिश ने कुछ लोगों को अंधा बना दिया
अपने दोस्त लेखकों की भीड़ जुटाकर
सम्मान की एक दुकान को सजा दिया

एक लेखकनुमा ब्लोगर जो
लिख नहीं पाता था कविता
पसंद भी नहीं था पढ़ना
चुन लाया कहीं से तीन सर्वश्रेष्ठ
और अपना फैसला सुना दिया
कवियों के ब्लोग दूर ही रखे गए
तकनीकी वाले जरूरी थे सो पढे गए
लो मैंने अपना फैसला सुना दिया

मच गया शोर
बरसी कहीं से हास्य कवितायेँ
उसके इस काम पर
आ गया वह बचाव पर
देने लगा पुराने वाद और नारे पर बयान
कर रहा था मैं भी वर्ग में बांटकर
ब्लोग लेखकों का सम्मान
पर लोगों ने अनसुना कर दिया

अब आया एक नेतानुमा ब्लोगर
कर लाया कहीं से बीस का जुगाड़
पुराने दोस्तों को सजाया थाली में
जैसे कोई पकवान
इनके लायक ही है सर्वश्रेष्ठ का सम्मान
लोकतंत्र है सो करो मतदान
मैंने तो बीस का थाल सजा दिया

कहैं दीपक बापू
अभी शुरू भी नहीं हुई
इंटरनेट पर हिन्दी के आने की प्रक्रिया
पहुंच गए हैं धंधेबाज पहले ही
और अपना दुकान सजा दिया
हैरान है लोग
जो हिन्दी की ठेकेदार
हर जगह हैं
सन्देश देते हैं
यहाँ हिन्दी का अपमान हुआ है इस पर लिखो
जमकर विरोध करते दिखो
तुम लिखो जैसा हमने सन्देश दिया

क्या ब्लोग तुम्हारी जागीर है
जो थाल सजाये घूम रहे हो
अपनी वीरों को ही क्यों नहीं झोंकते
तुम्हारी फौज में दम नहीं है
जो हिन्दी का अपमान नहीं रोकते
फिर काहे उनको सम्मान दिया
ग़लतफ़हमी मत पालो
नारों और वाद पर हम नहीं भड़कते
लिखते हैं अपने ख्याल खुद
तुम तो पूजते हो
अपने महल सजाते हो दूसरों के सम्मान से
हिन्दी की दुर्दशा पर रोने वालों
लिखने वालों तो जीते हैं अपमान से
फिर भी दमदार लिखते हैं
वह और होंगे जो तुम्हारे सम्मान पर बिकते हैं
हिन्दी लिखने वाले तो दिल से लिखते हैं
उन्हें परवाह नहीं सम्मान तुमने
दिया कि नहीं दिया
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