भगवान श्रीविष्णु कर्म के प्रेरणा स्तोत्र-सामवेद से संदेश


             भगवान विष्णु कर्म और फल के प्रतीक भगवान माने जाते हैं। यही कारण है कि भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी के अनेक अवतार समय समय पर हुए है। ब्रह्मा संसार के रचियता तो भगवार शिव संहारक और उद्धारकर्ता कहे गये हैं और भगवान नारायण को पालनहार माना गया है। ब्रह्मा और शिव का कोई अवतार नहीं होता जबकि भगवान नारायण अवतार लेकर अपनी सक्रियता से भक्तों की रक्षा करते है-यह आम धारण हमारे देश के धर्मभीरु लोगों की रही है।  ऐसे में वह संसार में सक्रियतापूर्ण जीवन जीने वालों के प्रेरक भी है।

यह आश्चर्य की बात है कि प्रकृति ने मनुष्य को देह, बुद्धि और मन की दृष्टि से अन्य जीवों की अपेक्षा सर्वाधिक शक्तिशाली जीव बनाया है तो सबसे अधिक आलसी भाव भी प्रदान किया। अधिकतर लोग लोग अपने तथा परिवार के स्वार्थ सिद्ध करने के बाद आराम करना चाहते है और परमार्थ उनको निरर्थक विषय लगता है जबकि पुरुषार्थ का भाव निष्काम कर्म से ही प्रमाणित होता है। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस देह से मनुष्य संसार का उपभोग करता है उसका ही महत्व नहीं समझता और भोगों में उसका नाश करता है। जिससे अंत समय में रोग उसके अंतिम सहयात्री बन जाते हैं और मृत्यु तक साथ रहते हैं।

      योग साधना, ध्यान, भजन और उद्यानों की सैर करने से जो देह के साथ मन को भी जो नवीनता मिलती है उसका ज्ञान अधिकतर मनुष्यों को नहीं रहता। सच बात तो यह है कि शरीर और मन को प्रत्यक्ष रूप से प्रसन्न करने वाले विषय मनुष्य को आकर्षित करते है और वह इसमें सक्रिय होकर जीवन भर प्रसन्न रहने का निरर्थक प्रयास करत है। वह अपनी इसी सक्रियता को पुरुषार्थ समझता है जबकि अप्रत्यक्ष लाभ देने वाले योगासन, ध्यान, भजन तथा प्रातः उद्यानों में विचरण करना उसे एक निरर्थक क्रिया लगती है। सीधी बात कहें तो इस अप्रत्यक्ष लाभ के लिये निष्काम भाव से इन कर्मो में लगना ही पुरुषार्थ कहा जा सकता है।
           हमारे पावन ग्रंथ सामवेद में कहा गया है कि
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           विष्णोः कर्माणि पश्चत यतो व्रतानि पस्पशे।
          ‘‘भगवान विष्णु के पुरुषार्थों को देखो और उनका स्मरण करते हुए अनुसरण करो।’
         ऋतस्य पथ्या अनु।
        ‘‘ज्ञानी सत्य मार्ग का अनुसरण करते हैं।’’
        ‘प्रेता जयता नर।’
        आगे बढ़ो और विजय प्राप्त करो।’’
      पुरुषार्थ करना मनुष्य का धर्म है और इसके लिये जरूरी है कि सत्य को मार्ग का अनुसरण किया जाये। आजकल जल्दी धनवान बनने के लिये असत्य मार्ग को भी अपनाने लगते हैं और उनको कामयाबी भी मिल जाती है पर जब उनको इसका दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग कभी भी ऐसे गलत कार्य में अपना मन नहीं लगाते जिसका कालांतर में दुष्परिणाम भोगना पड़े।
     कर्म और पुरुषार्थ के विषय में भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। वह संसार के पालनहार माने जाते हैं। ऐसा महान केवल पुरुषार्थ करने वालों को ही मिल सकता है। भगवान विष्णु के चौदह अवतार माने जाते हैं और हर अवतार में कहीं न कहीं उनका पुरुषार्थ प्रकट होता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior

Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
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हिन्दू धर्म संदेश-स्वेच्छा से खराब भोजन करना अनुचित (hindu dharma sandesh-kharab bhojan na karen)


शब्दश्चातोऽकामकारे।।
हिन्दी में भावार्थ-
इच्छानुसार अभक्ष्य भोजन करना निषेध ही है।


सर्वानन्नुमतिश्च प्राणात्ययेतद्दर्शनात्।।
हिन्दी में भावार्थ
अन्न बिना प्राण न रहने की आशंका होने पर ही सब प्रकार के अन्न भक्षण करने की अनुमति है।

आबधाच्च
हिन्दी में भावार्थ-
वैसे आपातकाल में भी आचार का त्याग नहीं करना चाहिए।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल फास्ट फूड के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ रही है जिसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ अच्छा नहीं मानते। इसके अलावा तंबाकू की रसायन युक्त पुड़िया की आज की युवा पीढ़ी भक्त हो गयी है जो कि हर दृष्टि से खतरनाक है। समस्या यह है कि यह सब लोग अपनी इच्छानुसार कर रहे हैं। देश का उच्च तथा उच्च मध्यम वर्ग घर में खाने की बजाय बाहर के भोजन करने को उत्सुक रहता है। परिणाम यह है कि देश के अंदर अस्वस्थ लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है। अब स्थिति यह है कि हर बड़े शहर में फाइव स्टार चिकित्सालय खुल गये हैं जिनमें अपने स्वस्थ जीवन की तलाश करने वाले लोगों की भारी भीड़ रहती है। शीतल पेयों को पीना फैशन हो गया है। गर्मी के अवसर पर लोग सादा पानी पीने की बजाय शीतल पेयों से प्यास बुझाते हैं जिससे अनेक प्रकार की बीमारियां होती हैं।

कहने का आशय यह है कि पूरे विश्व में अपने अध्यात्मिक ज्ञान की पहचान रखने वाला भारतीय समाज फैशन की वजह से अंधे रास्ते पर चल रहा है। जिन भक्ष्य पदार्थों तथा अशुद्ध पेयों के सेवन से परे रहना चाहिए उनको फैशन बना लिया है यह जाने बिना कि उनका उपयोग तभी करना चाहिये जब भक्ष्य पदार्थ तथा शुद्ध पेय उपलब्ध न हों। हमारे देश पर प्रकृति की विशेष कृपा है इसलिये ही यहां आज भी भूजल स्तर अन्य देशों से अधिक है। अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ तथा प्रकृति संपदा उपलब्ध हैं। हम प्रकृति के आभारी होने की बजाय उससे दूर जा रहे हैं। जिसके कारण हम स्वर्ग में रहते हुए भी नरक के होने का आभास करते हैं। मनुष्य होकर भी पशु पक्षियों की तरह बाध्य होकर फैशन की मार झेल रहे हैं। अतः अपने खान पान को लेकर सजग होना चाहिये ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ और सजग रहें। वैसे भी एक बात याद रखना चाहिए कि हम अपने खाने और पीने के दौरान जो पदार्थ लेते हैं उनमें दोष होने पर हमारे शरीर में भी दोष उत्पन्न होता है अर्थात हम बीमार पड़ते हैं।

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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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खिलाड़ी से बड़ा है खेल-हिन्दी व्यंग्य लेख (khiladi se bada hai kehl-hindi vyangya lekh)


अक्लमंद को इशारा काफी होता है और मूर्ख बरसों तक कोई बात समझाने के बाद भी नहीं समझता। राजधानी दिल्ली में चल राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी चल रही है और उसमें भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं तो कुछ बुद्धिमान-ऐसा वह दावा करते हैं पर हैं तो निरे मूर्ख ही-सवाल कर रहे हैं कि जब हमारे देश में खिलाड़ी ही नहीं है तो फिर राष्ट्रमंडल, एशियाड या ओलम्पिक कराने की जरूरत क्या है? इतना पैसा यहीं कि खिलाड़ियों पर खर्च कर पहले देश के खेल का स्तर ऊंचा क्यों नही किया जाता?
यकीनन ऐसे लोगों को देश की व्यवस्था का ज्ञान नहीं है या फिर अखबार नहीं पढ़ते वरना ऐसा सवाल कभी नहीं करते। खिलाड़ियों का हाल यह है कि अभी दिल्ली में विश्व कप हुआ था जिसमें भारतीय खिलाड़ी उसके शुरु होने से पहले ही पैसों की मांग करने लगे। उनको धमकाया गया कि‘अगर नहीं खेलोगे तो बाहर कर दिय जाओगे!
वह खेले और हारे। अभी तक हमारे देश के व्यवस्थापक यह नहीं समझ सके कि खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाये बिना कोई खेल इस देश में बढ़ नहीं सकता। बाज़ार और देश की व्यवस्था इस तरह मिल गयी है कि यह कहना भी कठिन है कि कौन किसको चला रहा है? हाकी के खेल के प्रचार के लिये क्रिकेट खिलाड़ी चाहिये। बैंक को एटीएम और क्रेडिट काड के प्रचार के लिये क्रिकेट खिलाड़ी चाहिये। बीमा पॉलिसी बिकवाने के लिये क्रिकेट खिलाड़ी चाहिए। क्रिकेट खिलाड़ी अपने खेल से पैसा कमा कर देते हैं जिसके बदल उनको व्यवस्था से जुड़े उन संस्थानों के भी विज्ञापन मिल जाते हैं जिनका सीधा संबंध बाज़ार से है।
उस दिन एक ए.टी.एम केंद्र पर पैसा निकालते हुए एक आदमी की नज़र खिलाड़ियों के विज्ञापन पर पड़ गयी। उस आदमी ने कहा-‘आखिर, इतने प्रतिष्ठित बैंक को इन खिलाड़ियों से विज्ञापन की क्या जरूरत पड़ी? उसके पास तो वैसे ही ग्राहक आता है?’
दूसरे आदमी ने कहा-‘यह पैसा खर्च करने की बात है जो तुम समझोगे नहीं।’
यह पैसा खर्च करने की बात है। अगर बैंक चाहे तो किसी हॉकी खिलाड़ी से भी विज्ञापन करा सकता है-आखिर वह हमारा राष्ट्रीय खेल है। मगर वह ऐसा नहीं करेगा क्योंकि इससे वह किसी ऐसे खिलाड़ी को प्रतिष्ठित करेगा जिसका वह लाभ उठायेगा साथ में पैसे भी लेगा। कम लेगा तो कमीशन कम बनेगा इसलिये वैसे भी सस्ता खिलाड़ी उनको नहंी चाहिये। दूसरी बात यह है कि क्रिकेट खिलाड़ी स्वनिर्मित हैं। मतलब उनसे विज्ञापन कराकर उन्हें प्रतिष्ठत करने जैसा पाप नहीं करना पड़ता। उनका पेट भरा हुआ है इसलिये किसी भूखे को खिलाने जैसा अधर्म भी नहीं करना पड़ता।
इस देश के व्यवस्था से जुड़े लोगों की यही समस्या है कि वह स्वयं खेल, कला, या साहित्य से स्वयं नहीं पनपते इसलिये उसका प्रबंधन अपने लेकर अपने मन को तसल्ली देने के साथ उससे संबंधित संस्थाओं पर कब्ज़ा कर अपने को महान सिद्ध करना चाहते हैं। दूसरी बात यह कि उनके मन में ढेर सारी कुंठाये हैं इसलिये वह किसी नये खिलाड़ी, कलाकार या साहित्यकार को शिखर पर पहुंचाना पाप समझते हैं। अगर कोई महिला हो तो उसके देह शोषण का ख्याल उनको आता है पर अगर पुरुष हो तो उससे दूसरी नौकरी करवा लेंगे। फिर भी ऊंचाई पर पहुंचाने का पाप नहीं करेंगे।
सीधी बात कहें तो उनको खिलाड़ी नहंी खेल चाहिये। खिलाड़ी तो खाना खायेगा, कपड़ा मांगेगा और आने जाने की सवारी के लिये उसे भत्ता भी चाहिये। कमीशन देने से वह रहा! ऐसे में जाये वह भाड़ में! मगर खेल चाहिये! क्योंकि खेल होगा तो मैदान बनेगा। उस पर घास लगेगी! कुर्सियां बनेंगी, लाईट लगेगी और ख्ेाल के लिये तमाम सामान भी तो खरीदने का अवसर मिलेगा। यह सब होगा तो ठेके होंगे। ठेका होगा तो कमीशन होगा। कमीशन एक तरह से भ्रष्टाचार की जननी है। मगर अब तो वह भी इतनी पूज्यनीय नहीं रही। ठेका ही ऐसे लोगों को दिया जाता है जो अपने परिवार के सदस्य या रिश्तेदार हों।
जब खेल संगठनों पर सीधे नियंत्रण की बात आ जाती है तो हमारे देश के विकासवादी-जो कि वैसे हर मामले में सरकार से दखल की अपेक्षा रखते हैं-स्वायत्ता की रक्षा और अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देने लगते हैं। उनको यह सरकार नियंत्रण तानाशाही लगती है।
नियम तो यह है कि सरकार जहां पैसा देती है उसके लेखों की जांच करने का अधिकार लेखा परीक्षा संस्थाओं को है पर संभवतः खेल संगठन उससे अछूते हैं-ऐसा लगता है इसलिये उनकी बेईमानी बाहर नहंी आ पाती। यह खेल संगठन पल रहे हैं सरकार के पैसे पर, मगर उनका काम चल रहा है प्राईवेट कंपनी की तरह। इनके अध्यक्षों का व्यवहार तो ऐसा लगता है जैसे कि अन्य पदाधिकारी उनके मुनीम और खिलाड़ी मज़दूर हों। देश में खेलों की जो दशा है उसकी गाथा क्या सुनायें? क्रिकेट तो खैर अब खेल ही नहंी रहा पर शतरंज, टेनिस और बैटमिंटन में जो खिलाड़ी चमक रहे हैं वह उनके निजी प्रयास हैं और कोई खेल संगठन उनको उभारने का दायित्व नहीं ले सकता। ऐसे में खेल संगठनों की स्वायत्ता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। ऐसी स्वायत्ता किस काम की जो परिणाममूलक न हो।
मगर यहां परिणाममूलक संस्था चाहता कौन है? मुख्य विषय है संस्था को मिलने वाला पैसा जो अंततः सरकारी राजस्व से ही प्राप्त होता है। पूरी लड़ाई इसी राजस्व से प्राप्त पैसे को हड़पने की है। ओलंपिक में भारत को एक स्वर्ण पदक मिल जाने पर ही यहां लोग नाचने लगते हैं। कुछ बुद्धिमान तो इतने बेशर्म हैं कि कहते हैं कि ‘खेलों में भाग लेना महत्वपूर्ण है न कि पदक जीतना।’
अगर यह तर्क मान भी लें तो फिर किसलिये इतने तामझाम करते हैं खेलों के विकास के लिये। सीधे कहीं से भी उठाकर खिलाड़ी भेज दो। भाग ही तो लेना है कोई जीतना थोड़े ही है। हम तो कह रहे कि सारे पदाधिकारी ही जाकर खेलने लगो। इतने सारे खिलाड़ियों को शिविर में बुलाकर पैसे खर्च करने की क्या आवश्यकता है? तब हम भी भाग लेने की बात पर तसल्ली कर लेंगे।
साठ साल से इतना पैसा खर्च हुआ पर खिलाड़ी कोई बनाया नहंी! मिल्खा सिंह या पीटी ऊषा जैसा कोई अपने आप पैदा हो जाये अलग बात है वरना तो अपने अपने लोगों को-वह भी बिना सिफारिश के नहीं आ सकते-भी भेजने के आरोप लगते हैं।
इस देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। जो कहते हैं वह झूठ बोलते हैं या राजस्व से प्राप्त पैसा हड़पने की उनकी नीयत है। इस देश में इतने सारे गांव और शहर हैं जहां चीन से अधिक प्रतिभायें मिल सकती हैं। उस दिन हम पार्क में आठ से 14 वर्ष के बच्चों को फुलबाल खेलते हुए देख रहे थे। उनके खेलने का तरीका देखकर लगता था कि अगर उनको फुटबाल खिलाड़ी के रूप में चुनकर उन पर खर्च किया जाये तो वहां भी एक दो पेले मिल सकता है।
ऐसे हजारों शहर और गांव है जहां हमारे बच्चों के खेल को निष्काम भाव से खेलते हैं जो कि अच्छा खिलाड़ी बनने में सहायक होता है। मगर नहीं! खेल संगठनों के लोग भी हिन्दी फिल्म वालों की तरह ही वातानुकूलित कमरों में बैठकर खिलाड़ियों का इंतजार करते दिखते हैं। हिन्दी फिल्म वाले कहते हैं कि हिन्दी में लेखक नहीं मिलते। दरअसल वह चाहते हैं कि लेखक उनके लिपिक बन जायें। अखबारों में छपी खबरों से तो यही लगता है कि इन संगठनों के उच्च पदाधिकारी भी मज़दूर चाहते हैं खिलाड़ी नहीं।
हमारा मानना है कि खिलाड़ी भी जमीन में उगता है मगर उसके लिये यह जरूरी है कि खेल के शुभचिंतक किसान बनकर दिखायें न कि अधिकारी। मगर यह कल्पना ही है। हम जानते हैं कि मैदान और खेल का सामान खरीदने का लक्ष्य तय करने वाले वातानुकूलित कमरों में बैठकर इस इंतजार में रहते हैं कि कब कोई मज़दूर की तरह खिलाड़ी आये और उससे अपना काम करवायें। वह न आये तो बाकी के ठेकेदारों से ही कमीशन पर खिलाड़ी मंगा लेते होंगे। चल गया काम! खेलों में भाग लेने तक का ही लक्ष्य है तो उसे कमीशन लेकर पूरा किया जा सकता है। पिछले पैंसठ सालों से यह नाटक चल रहा है और इसके समाप्त होने के आसार अभी नज़र नहीं आते। इस नाटक का नाम यही है कि ‘खिलाड़ी नहीं खेल चाहिए’।
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हिन्दू धर्म दर्शन-पति पत्नी में झगड़ा न करायें


मद्यपापनं कलहं पुगवैरं भार्यापत्योरंतरं ज्ञातिभेदम्।
राजद्विष्टं स्त्रीपुंसयोर्विवादं वज्र्यान्याहुवैश्चं पन्थाः प्रदुष्टः।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर कहते हैं कि शराब पीना, कलह करना, अपने समूह के साथ शत्रुता, पति पत्नी और परिवार में भेद उत्पन्न करना, राजा के साथ क्लेश करने तथा किसी स्त्री पुरुष में झगड़ा करने सहित सभी बुरे रास्तों का त्याग करना ही श्रेयस्कर  है।
सामुद्रिकं वणिजं चोरपूर्व शलकाधूर्तं च चिकित्सकं सं।
अरि च मित्रं च केशलीचवं च नैतान् त्वधिकुवीत सप्तः।।
हिंदी में भावार्थ-
नीतिवेता विदुर कहते हैं कि हस्तरेखा विशेषज्ञ, चोरी का व्यापार करने वाला,जुआरी,चिकित्सक,शत्रु,मित्र और नर्तक को कभी अपना गवाह नहीं बनायें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कभी अगर किसी मुकदमे का सामना करना पड़े तो ऐसे व्यक्ति को ही अपना गवाह बनाना चाहिये जो सत्य कहने के साथ अपना न तो आत्मीय मित्र हो न ही शत्रु। इसके अलावा कुछ व्यवसायों में कुशल लोगों-चिकित्सक,हस्तरेखा विशेषज्ञ,नर्तक,जुआरी, तथा चोरी का व्यापार करने वाले को भी अपना गवाह नहीं बनाना चाहिये। दरअसल मित्र जहां हमारे दोषों को जानते हैं पर कहते नहीं है पर जब वह कहीं गवाही देने का समय आये तो उनकी दृष्टि में हमारे दोष भी आते हैं इसलिये भावनात्मक रूप से हमारे हितैषी होने के बावजूद वह वाणी से हमारी दृढ़ता पूर्वक समर्थन नहीं कर पाते या वह लड़खड़ाती है।
शराब पीना तो एक बुरा व्यसन है पर साथ दूसरे घरों में पति पत्नी या परिवार के अन्य सदस्यों के बीच भी झगड़ा कराना एक तरह से पाप है। अनेक जगह लोग स्त्रियों और पुरुषों के बीच झगड़ा कराने के लिये तत्पर रहते हैं। इस तरह का मानसिक विलास भी एक बुरा काम है और इनसे बचना चाहिये। यह न केवल दूसरे के लिए बल्कि कालांतर में अपने लिए भी कष्टकारक बनता है।
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हिन्दू धर्म संदेश-नीच स्वभाव होने पर ऊंचे कुल का सम्मान नहीं मिलता


य ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्य कुलान्वये।
सुखभौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिनन्तकः।।
हिंदी में भावार्थ
-जो दूसरे का धन, सौंदर्य, शक्ति और प्रतिष्ठा से ईर्ष्या करता है उसकी व्याधि की कोई औषधि नहीं है।
न कुलं वृत्तही प्रमाणमिति मे मतिः।
अन्तेध्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर प्रवृत्ति नीच हो तो ऊंचे कुल का प्रमाण भी सम्मान नहीं दिला सकता। निम्न श्रेणी के परिवार में जन्मा व्यक्ति प्रवृत्ति ऊंची का हो तो वह अवश्य विशिष्ट सम्मान का पात्र है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ईर्ष्या का कोई इलाज नहीं है। मनुष्य में रहने वाली यह प्रवृत्ति उसका पूरा जीवन ही नरक बना देती है। मनुष्य जीवन में बहुत सारा धन कमाता और व्यय करता है पर फिर भी सुख उससे परे रहता है। सुख कोई पेड़ पर लटका फल नहीं है जो किसी के हाथ में आ जाये। वह तो एक अनुभूति है। अगर हमारे रक्तकणों में आनंद पैदा करने वाले तत्व हों तभी सुख की अनुभूति हो सकती है। इसके विपरीत लोग तो दूसरे के सुख से जले जा रहे हैं। अपनी पीड़ा से अधिक कहीं उनको दूसरे का सुख परेशान करता है। इससे कोई विरला ही मुक्त हो पाता है। ईर्ष्या और द्वेष से मनुष्य में पैदा हुआ संताप मनुष्य को बीमार बना देता है। उसके इलाज के लिये वह चिकित्सकों के पास जाता है। फिर भी उसमें सुधार नहीं होता क्योंकि ईष्र्या और द्वेष का इलाज करने वाली कोई दवा इस संसार में बनी ही नहीं है।

जो लोग जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम पर सम्मान पाने का मोह पालते हैं वह मूर्ख हैं। उसी तरह पैसा, पद, और प्रतिष्ठा पाने पर अगर कोई यह भ्रम पाल लेता है कि लोग उनका सम्मान करते हैं तो वह भी नहीं रखना चाहिये। लोग दिखाने के लिये अपने से अधिक धनवान का सम्मान करते हैं पर हृदय से उसी व्यक्ति को चाहते हैं जो उनसे अधिक गुणवान होता है। गुणों की पहचान ही मनुष्य की पहचान होती हैं। इसलिये अपने अंदर सद्गुणों का संचय करना चाहिए। दूसरे का सुख और वैभव देखकर अपना खून जलाने से कोई लाभ नहीं होता।

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संत कबीर के दोहे-जहां विवाद होते हों, वहां न जायें


कबीर न तहां न जाइये, जहां जु नाना भाव।
लागे ही फल ढहि पड़े, वाजै कोई कुबाव।।
संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि वह कभी न जायें जहां नाना प्रकार के भाव हों। ऐसे लोगों से संपर्क न कर रखें जिनका कोई एक मत नहीं है। उनके संपर्क से के दुष्प्रभाव से हवा के एक झौंके से ही मन का प्रेम रूपी फल गिर जाता है।
कबीर तहां न जाइये, जहां कपट का हेत।
जानो कली अनार की, तन राता मन सेत।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि वहां कभी न जायें जहां कपट का प्रेम मिलता हो। ऐसे कपटी प्रेम को अनार की कली की तरह समझें जो उपरी भाग से लाल परंतु अंदर से सफेद होती है। कपटी लोगों का प्रेम भी ऐसा ही होता है वह बाहर तो लालित्य उड़ेलते हैं पर उनके भीतर शुद्ध रूप से कपट भरा होता है।
वर्तमान संदर्भ  में संपादकीय व्याख्या-जीवन में प्रसन्न रहने का यह भी एक तरीका है कि उस स्थान पर न जायें जहां आपको प्रसन्नता नहीं मिल जाती। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बाहर से तो बहुत प्रेम से पेश आते हैं जैसे कि उनका दिल साफ है पर व्यवहार में धीरे धीरे उनके स्वार्थ या कटु भाव दिखने लगता है तब मन में एक तरह से व्यग्रता का भाव पैदा होता है।  अनेक लोग अपने घर इसलिये बुलाते हैं ताकि दूसरे को अपमानित कर स्वयं को सम्मानित बनाया जा सके।  वह बुलाते तो बड़े प्यार से हैं पर फिर अपमान करने का मौका नहीं छोड़ते।  ऐसे लोगों के घर जाना व्यर्थ है जो मन को तकलीफ देते हैं वह चाहे कितने भी आत्मीय क्यों न हों? मुख्य बात यह है कि हमें अपने जीवन के दुःख या सुख की तलाश स्वयं करनी है अतः ऐसे ही स्थान पर जायें जहां सुख मिले। जहां जाने पर हृदय में क्लेश पैदा हो वहां नहीं जाना चाहिये।  उसी तरह ऐसे लोगों का साथ ही नहीं करना चाहिये जो एकमत के न हों। ऐसे भ्रमित लोग न स्वयं ही परेशान होते हैं बल्कि साथ वाले को भी तकलीफ देते हैं। अनेक जगह लोग निरर्थक विवाद करते हैं। ऐसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं जिनका हल उनके स्वयं के हाथ में ही नहीं होता। इतना ही नहीं सार्वजनिक विषयों पर बहस करने वाले अनेक लोग आपस में ही लड़ पड़ते हैं और शांतप्रिय आदमी के लिये यही अच्छा है कि वह उनसे दूर रहे। जहां लोग हर बात पर वाद विवाद करते हैं वहां का वातावरण कलुषित हो जाता है और अगर उनके बीच जाकर बैठेंगे तो हमारा मन भी त्रस्त हो जायेगा।

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चाणक्य नीति-उत्तम पुरुषों को गलत बताने वाले कष्ट उठाते हैं


दारिद्रयनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी।।
हिंदी में भावार्थ-
दान से दरिद्रता, शील भाव से दुर्भाग्य तथा निष्ठा से भय का नाश होता है।
अन्यथा वेदपाण्डितयं शास्त्रमाचारमन्यतथा।
अन्यथा कुवचः शान्तं लोकाः क्लिश्चन्ति चान्यथा।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो लोग वेदों में वर्णित तत्वज्ञान, शास्त्रों में विधान और उत्तम पुरुषों के चरित्र को गलत बताते हैं वह इस लोक में स्वयं ही भारी कष्ट उठाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-कभी भी किसी भी प्रकार के धर्मग्रंथ की आलोचना या विरोध नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि धर्म ग्रंथ तो निश्चित कालावधि में तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार लिखे जाते हैं जबकि पृथ्वी और प्रकृति के स्वरूप में बदलाव के साथ ही मनुष्य की जीवन शैली में बदलाव आता है और इसी कारण धर्मग्रंथों के कुछ संदेश समय के साथ अप्रासंगिक लगते हैं। अतः धर्म ग्रंथों की आलोचना करना उचित नहीं है।
हां, भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित तत्वज्ञान में कभी बदलाव नहीं आता क्योंकि उसमें जीवन के मूल तत्वों की जानकारी देने के साथ ही उसका सदुपयोग करने की प्रक्रिया का भी वर्णन मिलता है। विश्व में भले ही कितने प्रकार के भौतिक परिवर्तन आयें पर जीवन के तत्वों का निर्धारण करने वाली प्रक्रिया में बदलाव संभव नहीं है।
इसके अलावा एक बात ध्यान रखें कि प्राचीन ग्रंथों में वर्णित महापुरुषों पर विश्वास करें या नहीं पर उनको गलत नहीं बताना चाहिये। संभव है उनका चरित्र वर्तमान समय के हिसाब से अतार्किक या चमत्कारी लगता हो पर यह बात याद रखना चाहिये कि अनेक लोग उनको बहुत मानते हुए उनकी भक्ति तक करते हैं। ऐसे में महापुरुषों को गलत बताना या उपहास नहीं उड़ाना चाहिये क्योंकि इससे उनके भक्तों का मन रुष्ट होता है। महापुरुष स्वयमेव इस धरा पर न हों इसलिये उनसे किसी प्रकार की हानि की आशंका नहीं होती पर उनके भक्तों के मन को जो कष्ट पहुंचता है उसका बुरा प्रभाव जरूर पड़ सकता है। जो लोग प्राचीन महापुरुषों की निंदा करते हैं या उनका मजाक उड़ात हैं अंततः उनको इसका दुष्परिणाम भोगना ही पड़ता है।
भारतीय वेदों तथ अन्य धर्मग्रंथों की आलोचना करने वाले अपना उल्लू सीधा करने करने के लिये भारतीय धर्मग्रंथों के ऐसे चंद श्लोक या दोहे लेकर लोगों को बरगलाते हैं जो अब अप्रासांगिक हो गये हैं या लोग उस पर ध्यान नहीं देते। ऐसे लोग अज्ञान के अंधेरे में रहते हैं क्योंकि वह उनमें वर्णित तत्वज्ञान को नहीं जानते। ऐसे लोग भले ही चाहे कितनी भी प्रतिष्ठा या धन अर्जित कर लें पर सुखी नहीं रहते। वह नहीं जानते कि समाज के सहज संचालन के लिये भारतीय अध्यात्मिक दर्शन बहुत महत्वपूर्ण है। वह धनिक लोगों को दान देने के लिये प्रेरित करता है ताकि समाज की गरीब पर नियंत्रण हो। इतना ही नहीं उत्तम चरित्र से ही व्यक्ति के साथ ही समाज का निर्माण होता है। अक्सर लोग दूसरों के चरित्र पर तो लांछन लगाते हैं पर अपनी तरफ नहीं देखते। अगर सभी लोग तय करें तकि हम अपना चरित्र सही रखेंगे तो निश्चित रूप से देश में एक महान समाज का निर्माण होगा। यही बात भय के संबंध में भी कही जा सकती है। जब व्यक्ति की सब तरफ निष्ठा समाप्त हो जाती है तो वह अपने आप को एकाकी अनुभव करता है जिससे उसके मन भय का निर्माण होता है। इसलिये भगवान भक्ति से पुण्य मिले या नहीं पर अपने अंदर एक भय होता है जिससे हम निजात पा सकते हैं। कहने का का तात्पर्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथो की आलोचना करने वाले न अपने को सुखी रख पाते हैं न उन लोगों को लाभ होता है जो उनका अनुसरण करते हैं। सच बात तो यह है कि दूसरे की आस्था और भक्ति पर सवाल उठाने की बजाय अपने चरित्र और स्थितियों का मंथन करना चाहिये। भारतीय धर्म ग्रंथों पर आक्षेप करने वाले यह भूल जाते हैं कि उनमें वर्णित ऐसा ज्ञान है जिसकी आज विदेशों में भी साख है।

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