भगवान श्रीविष्णु कर्म के प्रेरणा स्तोत्र-सामवेद से संदेश


             भगवान विष्णु कर्म और फल के प्रतीक भगवान माने जाते हैं। यही कारण है कि भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी के अनेक अवतार समय समय पर हुए है। ब्रह्मा संसार के रचियता तो भगवार शिव संहारक और उद्धारकर्ता कहे गये हैं और भगवान नारायण को पालनहार माना गया है। ब्रह्मा और शिव का कोई अवतार नहीं होता जबकि भगवान नारायण अवतार लेकर अपनी सक्रियता से भक्तों की रक्षा करते है-यह आम धारण हमारे देश के धर्मभीरु लोगों की रही है।  ऐसे में वह संसार में सक्रियतापूर्ण जीवन जीने वालों के प्रेरक भी है।

यह आश्चर्य की बात है कि प्रकृति ने मनुष्य को देह, बुद्धि और मन की दृष्टि से अन्य जीवों की अपेक्षा सर्वाधिक शक्तिशाली जीव बनाया है तो सबसे अधिक आलसी भाव भी प्रदान किया। अधिकतर लोग लोग अपने तथा परिवार के स्वार्थ सिद्ध करने के बाद आराम करना चाहते है और परमार्थ उनको निरर्थक विषय लगता है जबकि पुरुषार्थ का भाव निष्काम कर्म से ही प्रमाणित होता है। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस देह से मनुष्य संसार का उपभोग करता है उसका ही महत्व नहीं समझता और भोगों में उसका नाश करता है। जिससे अंत समय में रोग उसके अंतिम सहयात्री बन जाते हैं और मृत्यु तक साथ रहते हैं।

      योग साधना, ध्यान, भजन और उद्यानों की सैर करने से जो देह के साथ मन को भी जो नवीनता मिलती है उसका ज्ञान अधिकतर मनुष्यों को नहीं रहता। सच बात तो यह है कि शरीर और मन को प्रत्यक्ष रूप से प्रसन्न करने वाले विषय मनुष्य को आकर्षित करते है और वह इसमें सक्रिय होकर जीवन भर प्रसन्न रहने का निरर्थक प्रयास करत है। वह अपनी इसी सक्रियता को पुरुषार्थ समझता है जबकि अप्रत्यक्ष लाभ देने वाले योगासन, ध्यान, भजन तथा प्रातः उद्यानों में विचरण करना उसे एक निरर्थक क्रिया लगती है। सीधी बात कहें तो इस अप्रत्यक्ष लाभ के लिये निष्काम भाव से इन कर्मो में लगना ही पुरुषार्थ कहा जा सकता है।
           हमारे पावन ग्रंथ सामवेद में कहा गया है कि
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           विष्णोः कर्माणि पश्चत यतो व्रतानि पस्पशे।
          ‘‘भगवान विष्णु के पुरुषार्थों को देखो और उनका स्मरण करते हुए अनुसरण करो।’
         ऋतस्य पथ्या अनु।
        ‘‘ज्ञानी सत्य मार्ग का अनुसरण करते हैं।’’
        ‘प्रेता जयता नर।’
        आगे बढ़ो और विजय प्राप्त करो।’’
      पुरुषार्थ करना मनुष्य का धर्म है और इसके लिये जरूरी है कि सत्य को मार्ग का अनुसरण किया जाये। आजकल जल्दी धनवान बनने के लिये असत्य मार्ग को भी अपनाने लगते हैं और उनको कामयाबी भी मिल जाती है पर जब उनको इसका दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग कभी भी ऐसे गलत कार्य में अपना मन नहीं लगाते जिसका कालांतर में दुष्परिणाम भोगना पड़े।
     कर्म और पुरुषार्थ के विषय में भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। वह संसार के पालनहार माने जाते हैं। ऐसा महान केवल पुरुषार्थ करने वालों को ही मिल सकता है। भगवान विष्णु के चौदह अवतार माने जाते हैं और हर अवतार में कहीं न कहीं उनका पुरुषार्थ प्रकट होता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  ‘भारतदीप’,Gwalior

Editor and writer-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’
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हिन्दू धर्म संदेश-स्वेच्छा से खराब भोजन करना अनुचित (hindu dharma sandesh-kharab bhojan na karen)


शब्दश्चातोऽकामकारे।।
हिन्दी में भावार्थ-
इच्छानुसार अभक्ष्य भोजन करना निषेध ही है।


सर्वानन्नुमतिश्च प्राणात्ययेतद्दर्शनात्।।
हिन्दी में भावार्थ
अन्न बिना प्राण न रहने की आशंका होने पर ही सब प्रकार के अन्न भक्षण करने की अनुमति है।

आबधाच्च
हिन्दी में भावार्थ-
वैसे आपातकाल में भी आचार का त्याग नहीं करना चाहिए।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल फास्ट फूड के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ रही है जिसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ अच्छा नहीं मानते। इसके अलावा तंबाकू की रसायन युक्त पुड़िया की आज की युवा पीढ़ी भक्त हो गयी है जो कि हर दृष्टि से खतरनाक है। समस्या यह है कि यह सब लोग अपनी इच्छानुसार कर रहे हैं। देश का उच्च तथा उच्च मध्यम वर्ग घर में खाने की बजाय बाहर के भोजन करने को उत्सुक रहता है। परिणाम यह है कि देश के अंदर अस्वस्थ लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है। अब स्थिति यह है कि हर बड़े शहर में फाइव स्टार चिकित्सालय खुल गये हैं जिनमें अपने स्वस्थ जीवन की तलाश करने वाले लोगों की भारी भीड़ रहती है। शीतल पेयों को पीना फैशन हो गया है। गर्मी के अवसर पर लोग सादा पानी पीने की बजाय शीतल पेयों से प्यास बुझाते हैं जिससे अनेक प्रकार की बीमारियां होती हैं।

कहने का आशय यह है कि पूरे विश्व में अपने अध्यात्मिक ज्ञान की पहचान रखने वाला भारतीय समाज फैशन की वजह से अंधे रास्ते पर चल रहा है। जिन भक्ष्य पदार्थों तथा अशुद्ध पेयों के सेवन से परे रहना चाहिए उनको फैशन बना लिया है यह जाने बिना कि उनका उपयोग तभी करना चाहिये जब भक्ष्य पदार्थ तथा शुद्ध पेय उपलब्ध न हों। हमारे देश पर प्रकृति की विशेष कृपा है इसलिये ही यहां आज भी भूजल स्तर अन्य देशों से अधिक है। अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ तथा प्रकृति संपदा उपलब्ध हैं। हम प्रकृति के आभारी होने की बजाय उससे दूर जा रहे हैं। जिसके कारण हम स्वर्ग में रहते हुए भी नरक के होने का आभास करते हैं। मनुष्य होकर भी पशु पक्षियों की तरह बाध्य होकर फैशन की मार झेल रहे हैं। अतः अपने खान पान को लेकर सजग होना चाहिये ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ और सजग रहें। वैसे भी एक बात याद रखना चाहिए कि हम अपने खाने और पीने के दौरान जो पदार्थ लेते हैं उनमें दोष होने पर हमारे शरीर में भी दोष उत्पन्न होता है अर्थात हम बीमार पड़ते हैं।

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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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खिलाड़ी से बड़ा है खेल-हिन्दी व्यंग्य लेख (khiladi se bada hai kehl-hindi vyangya lekh)


अक्लमंद को इशारा काफी होता है और मूर्ख बरसों तक कोई बात समझाने के बाद भी नहीं समझता। राजधानी दिल्ली में चल राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी चल रही है और उसमें भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं तो कुछ बुद्धिमान-ऐसा वह दावा करते हैं पर हैं तो निरे मूर्ख ही-सवाल कर रहे हैं कि जब हमारे देश में खिलाड़ी ही नहीं है तो फिर राष्ट्रमंडल, एशियाड या ओलम्पिक कराने की जरूरत क्या है? इतना पैसा यहीं कि खिलाड़ियों पर खर्च कर पहले देश के खेल का स्तर ऊंचा क्यों नही किया जाता?
यकीनन ऐसे लोगों को देश की व्यवस्था का ज्ञान नहीं है या फिर अखबार नहीं पढ़ते वरना ऐसा सवाल कभी नहीं करते। खिलाड़ियों का हाल यह है कि अभी दिल्ली में विश्व कप हुआ था जिसमें भारतीय खिलाड़ी उसके शुरु होने से पहले ही पैसों की मांग करने लगे। उनको धमकाया गया कि‘अगर नहीं खेलोगे तो बाहर कर दिय जाओगे!
वह खेले और हारे। अभी तक हमारे देश के व्यवस्थापक यह नहीं समझ सके कि खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाये बिना कोई खेल इस देश में बढ़ नहीं सकता। बाज़ार और देश की व्यवस्था इस तरह मिल गयी है कि यह कहना भी कठिन है कि कौन किसको चला रहा है? हाकी के खेल के प्रचार के लिये क्रिकेट खिलाड़ी चाहिये। बैंक को एटीएम और क्रेडिट काड के प्रचार के लिये क्रिकेट खिलाड़ी चाहिये। बीमा पॉलिसी बिकवाने के लिये क्रिकेट खिलाड़ी चाहिए। क्रिकेट खिलाड़ी अपने खेल से पैसा कमा कर देते हैं जिसके बदल उनको व्यवस्था से जुड़े उन संस्थानों के भी विज्ञापन मिल जाते हैं जिनका सीधा संबंध बाज़ार से है।
उस दिन एक ए.टी.एम केंद्र पर पैसा निकालते हुए एक आदमी की नज़र खिलाड़ियों के विज्ञापन पर पड़ गयी। उस आदमी ने कहा-‘आखिर, इतने प्रतिष्ठित बैंक को इन खिलाड़ियों से विज्ञापन की क्या जरूरत पड़ी? उसके पास तो वैसे ही ग्राहक आता है?’
दूसरे आदमी ने कहा-‘यह पैसा खर्च करने की बात है जो तुम समझोगे नहीं।’
यह पैसा खर्च करने की बात है। अगर बैंक चाहे तो किसी हॉकी खिलाड़ी से भी विज्ञापन करा सकता है-आखिर वह हमारा राष्ट्रीय खेल है। मगर वह ऐसा नहीं करेगा क्योंकि इससे वह किसी ऐसे खिलाड़ी को प्रतिष्ठित करेगा जिसका वह लाभ उठायेगा साथ में पैसे भी लेगा। कम लेगा तो कमीशन कम बनेगा इसलिये वैसे भी सस्ता खिलाड़ी उनको नहंी चाहिये। दूसरी बात यह है कि क्रिकेट खिलाड़ी स्वनिर्मित हैं। मतलब उनसे विज्ञापन कराकर उन्हें प्रतिष्ठत करने जैसा पाप नहीं करना पड़ता। उनका पेट भरा हुआ है इसलिये किसी भूखे को खिलाने जैसा अधर्म भी नहीं करना पड़ता।
इस देश के व्यवस्था से जुड़े लोगों की यही समस्या है कि वह स्वयं खेल, कला, या साहित्य से स्वयं नहीं पनपते इसलिये उसका प्रबंधन अपने लेकर अपने मन को तसल्ली देने के साथ उससे संबंधित संस्थाओं पर कब्ज़ा कर अपने को महान सिद्ध करना चाहते हैं। दूसरी बात यह कि उनके मन में ढेर सारी कुंठाये हैं इसलिये वह किसी नये खिलाड़ी, कलाकार या साहित्यकार को शिखर पर पहुंचाना पाप समझते हैं। अगर कोई महिला हो तो उसके देह शोषण का ख्याल उनको आता है पर अगर पुरुष हो तो उससे दूसरी नौकरी करवा लेंगे। फिर भी ऊंचाई पर पहुंचाने का पाप नहीं करेंगे।
सीधी बात कहें तो उनको खिलाड़ी नहंी खेल चाहिये। खिलाड़ी तो खाना खायेगा, कपड़ा मांगेगा और आने जाने की सवारी के लिये उसे भत्ता भी चाहिये। कमीशन देने से वह रहा! ऐसे में जाये वह भाड़ में! मगर खेल चाहिये! क्योंकि खेल होगा तो मैदान बनेगा। उस पर घास लगेगी! कुर्सियां बनेंगी, लाईट लगेगी और ख्ेाल के लिये तमाम सामान भी तो खरीदने का अवसर मिलेगा। यह सब होगा तो ठेके होंगे। ठेका होगा तो कमीशन होगा। कमीशन एक तरह से भ्रष्टाचार की जननी है। मगर अब तो वह भी इतनी पूज्यनीय नहीं रही। ठेका ही ऐसे लोगों को दिया जाता है जो अपने परिवार के सदस्य या रिश्तेदार हों।
जब खेल संगठनों पर सीधे नियंत्रण की बात आ जाती है तो हमारे देश के विकासवादी-जो कि वैसे हर मामले में सरकार से दखल की अपेक्षा रखते हैं-स्वायत्ता की रक्षा और अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देने लगते हैं। उनको यह सरकार नियंत्रण तानाशाही लगती है।
नियम तो यह है कि सरकार जहां पैसा देती है उसके लेखों की जांच करने का अधिकार लेखा परीक्षा संस्थाओं को है पर संभवतः खेल संगठन उससे अछूते हैं-ऐसा लगता है इसलिये उनकी बेईमानी बाहर नहंी आ पाती। यह खेल संगठन पल रहे हैं सरकार के पैसे पर, मगर उनका काम चल रहा है प्राईवेट कंपनी की तरह। इनके अध्यक्षों का व्यवहार तो ऐसा लगता है जैसे कि अन्य पदाधिकारी उनके मुनीम और खिलाड़ी मज़दूर हों। देश में खेलों की जो दशा है उसकी गाथा क्या सुनायें? क्रिकेट तो खैर अब खेल ही नहंी रहा पर शतरंज, टेनिस और बैटमिंटन में जो खिलाड़ी चमक रहे हैं वह उनके निजी प्रयास हैं और कोई खेल संगठन उनको उभारने का दायित्व नहीं ले सकता। ऐसे में खेल संगठनों की स्वायत्ता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। ऐसी स्वायत्ता किस काम की जो परिणाममूलक न हो।
मगर यहां परिणाममूलक संस्था चाहता कौन है? मुख्य विषय है संस्था को मिलने वाला पैसा जो अंततः सरकारी राजस्व से ही प्राप्त होता है। पूरी लड़ाई इसी राजस्व से प्राप्त पैसे को हड़पने की है। ओलंपिक में भारत को एक स्वर्ण पदक मिल जाने पर ही यहां लोग नाचने लगते हैं। कुछ बुद्धिमान तो इतने बेशर्म हैं कि कहते हैं कि ‘खेलों में भाग लेना महत्वपूर्ण है न कि पदक जीतना।’
अगर यह तर्क मान भी लें तो फिर किसलिये इतने तामझाम करते हैं खेलों के विकास के लिये। सीधे कहीं से भी उठाकर खिलाड़ी भेज दो। भाग ही तो लेना है कोई जीतना थोड़े ही है। हम तो कह रहे कि सारे पदाधिकारी ही जाकर खेलने लगो। इतने सारे खिलाड़ियों को शिविर में बुलाकर पैसे खर्च करने की क्या आवश्यकता है? तब हम भी भाग लेने की बात पर तसल्ली कर लेंगे।
साठ साल से इतना पैसा खर्च हुआ पर खिलाड़ी कोई बनाया नहंी! मिल्खा सिंह या पीटी ऊषा जैसा कोई अपने आप पैदा हो जाये अलग बात है वरना तो अपने अपने लोगों को-वह भी बिना सिफारिश के नहीं आ सकते-भी भेजने के आरोप लगते हैं।
इस देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। जो कहते हैं वह झूठ बोलते हैं या राजस्व से प्राप्त पैसा हड़पने की उनकी नीयत है। इस देश में इतने सारे गांव और शहर हैं जहां चीन से अधिक प्रतिभायें मिल सकती हैं। उस दिन हम पार्क में आठ से 14 वर्ष के बच्चों को फुलबाल खेलते हुए देख रहे थे। उनके खेलने का तरीका देखकर लगता था कि अगर उनको फुटबाल खिलाड़ी के रूप में चुनकर उन पर खर्च किया जाये तो वहां भी एक दो पेले मिल सकता है।
ऐसे हजारों शहर और गांव है जहां हमारे बच्चों के खेल को निष्काम भाव से खेलते हैं जो कि अच्छा खिलाड़ी बनने में सहायक होता है। मगर नहीं! खेल संगठनों के लोग भी हिन्दी फिल्म वालों की तरह ही वातानुकूलित कमरों में बैठकर खिलाड़ियों का इंतजार करते दिखते हैं। हिन्दी फिल्म वाले कहते हैं कि हिन्दी में लेखक नहीं मिलते। दरअसल वह चाहते हैं कि लेखक उनके लिपिक बन जायें। अखबारों में छपी खबरों से तो यही लगता है कि इन संगठनों के उच्च पदाधिकारी भी मज़दूर चाहते हैं खिलाड़ी नहीं।
हमारा मानना है कि खिलाड़ी भी जमीन में उगता है मगर उसके लिये यह जरूरी है कि खेल के शुभचिंतक किसान बनकर दिखायें न कि अधिकारी। मगर यह कल्पना ही है। हम जानते हैं कि मैदान और खेल का सामान खरीदने का लक्ष्य तय करने वाले वातानुकूलित कमरों में बैठकर इस इंतजार में रहते हैं कि कब कोई मज़दूर की तरह खिलाड़ी आये और उससे अपना काम करवायें। वह न आये तो बाकी के ठेकेदारों से ही कमीशन पर खिलाड़ी मंगा लेते होंगे। चल गया काम! खेलों में भाग लेने तक का ही लक्ष्य है तो उसे कमीशन लेकर पूरा किया जा सकता है। पिछले पैंसठ सालों से यह नाटक चल रहा है और इसके समाप्त होने के आसार अभी नज़र नहीं आते। इस नाटक का नाम यही है कि ‘खिलाड़ी नहीं खेल चाहिए’।
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हिन्दू धर्म दर्शन-पति पत्नी में झगड़ा न करायें


मद्यपापनं कलहं पुगवैरं भार्यापत्योरंतरं ज्ञातिभेदम्।
राजद्विष्टं स्त्रीपुंसयोर्विवादं वज्र्यान्याहुवैश्चं पन्थाः प्रदुष्टः।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर कहते हैं कि शराब पीना, कलह करना, अपने समूह के साथ शत्रुता, पति पत्नी और परिवार में भेद उत्पन्न करना, राजा के साथ क्लेश करने तथा किसी स्त्री पुरुष में झगड़ा करने सहित सभी बुरे रास्तों का त्याग करना ही श्रेयस्कर  है।
सामुद्रिकं वणिजं चोरपूर्व शलकाधूर्तं च चिकित्सकं सं।
अरि च मित्रं च केशलीचवं च नैतान् त्वधिकुवीत सप्तः।।
हिंदी में भावार्थ-
नीतिवेता विदुर कहते हैं कि हस्तरेखा विशेषज्ञ, चोरी का व्यापार करने वाला,जुआरी,चिकित्सक,शत्रु,मित्र और नर्तक को कभी अपना गवाह नहीं बनायें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कभी अगर किसी मुकदमे का सामना करना पड़े तो ऐसे व्यक्ति को ही अपना गवाह बनाना चाहिये जो सत्य कहने के साथ अपना न तो आत्मीय मित्र हो न ही शत्रु। इसके अलावा कुछ व्यवसायों में कुशल लोगों-चिकित्सक,हस्तरेखा विशेषज्ञ,नर्तक,जुआरी, तथा चोरी का व्यापार करने वाले को भी अपना गवाह नहीं बनाना चाहिये। दरअसल मित्र जहां हमारे दोषों को जानते हैं पर कहते नहीं है पर जब वह कहीं गवाही देने का समय आये तो उनकी दृष्टि में हमारे दोष भी आते हैं इसलिये भावनात्मक रूप से हमारे हितैषी होने के बावजूद वह वाणी से हमारी दृढ़ता पूर्वक समर्थन नहीं कर पाते या वह लड़खड़ाती है।
शराब पीना तो एक बुरा व्यसन है पर साथ दूसरे घरों में पति पत्नी या परिवार के अन्य सदस्यों के बीच भी झगड़ा कराना एक तरह से पाप है। अनेक जगह लोग स्त्रियों और पुरुषों के बीच झगड़ा कराने के लिये तत्पर रहते हैं। इस तरह का मानसिक विलास भी एक बुरा काम है और इनसे बचना चाहिये। यह न केवल दूसरे के लिए बल्कि कालांतर में अपने लिए भी कष्टकारक बनता है।
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हिन्दू धर्म संदेश-नीच स्वभाव होने पर ऊंचे कुल का सम्मान नहीं मिलता


य ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्य कुलान्वये।
सुखभौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिनन्तकः।।
हिंदी में भावार्थ
-जो दूसरे का धन, सौंदर्य, शक्ति और प्रतिष्ठा से ईर्ष्या करता है उसकी व्याधि की कोई औषधि नहीं है।
न कुलं वृत्तही प्रमाणमिति मे मतिः।
अन्तेध्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर प्रवृत्ति नीच हो तो ऊंचे कुल का प्रमाण भी सम्मान नहीं दिला सकता। निम्न श्रेणी के परिवार में जन्मा व्यक्ति प्रवृत्ति ऊंची का हो तो वह अवश्य विशिष्ट सम्मान का पात्र है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ईर्ष्या का कोई इलाज नहीं है। मनुष्य में रहने वाली यह प्रवृत्ति उसका पूरा जीवन ही नरक बना देती है। मनुष्य जीवन में बहुत सारा धन कमाता और व्यय करता है पर फिर भी सुख उससे परे रहता है। सुख कोई पेड़ पर लटका फल नहीं है जो किसी के हाथ में आ जाये। वह तो एक अनुभूति है। अगर हमारे रक्तकणों में आनंद पैदा करने वाले तत्व हों तभी सुख की अनुभूति हो सकती है। इसके विपरीत लोग तो दूसरे के सुख से जले जा रहे हैं। अपनी पीड़ा से अधिक कहीं उनको दूसरे का सुख परेशान करता है। इससे कोई विरला ही मुक्त हो पाता है। ईर्ष्या और द्वेष से मनुष्य में पैदा हुआ संताप मनुष्य को बीमार बना देता है। उसके इलाज के लिये वह चिकित्सकों के पास जाता है। फिर भी उसमें सुधार नहीं होता क्योंकि ईष्र्या और द्वेष का इलाज करने वाली कोई दवा इस संसार में बनी ही नहीं है।

जो लोग जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम पर सम्मान पाने का मोह पालते हैं वह मूर्ख हैं। उसी तरह पैसा, पद, और प्रतिष्ठा पाने पर अगर कोई यह भ्रम पाल लेता है कि लोग उनका सम्मान करते हैं तो वह भी नहीं रखना चाहिये। लोग दिखाने के लिये अपने से अधिक धनवान का सम्मान करते हैं पर हृदय से उसी व्यक्ति को चाहते हैं जो उनसे अधिक गुणवान होता है। गुणों की पहचान ही मनुष्य की पहचान होती हैं। इसलिये अपने अंदर सद्गुणों का संचय करना चाहिए। दूसरे का सुख और वैभव देखकर अपना खून जलाने से कोई लाभ नहीं होता।

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संत कबीर के दोहे-जहां विवाद होते हों, वहां न जायें


कबीर न तहां न जाइये, जहां जु नाना भाव।
लागे ही फल ढहि पड़े, वाजै कोई कुबाव।।
संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि वह कभी न जायें जहां नाना प्रकार के भाव हों। ऐसे लोगों से संपर्क न कर रखें जिनका कोई एक मत नहीं है। उनके संपर्क से के दुष्प्रभाव से हवा के एक झौंके से ही मन का प्रेम रूपी फल गिर जाता है।
कबीर तहां न जाइये, जहां कपट का हेत।
जानो कली अनार की, तन राता मन सेत।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि वहां कभी न जायें जहां कपट का प्रेम मिलता हो। ऐसे कपटी प्रेम को अनार की कली की तरह समझें जो उपरी भाग से लाल परंतु अंदर से सफेद होती है। कपटी लोगों का प्रेम भी ऐसा ही होता है वह बाहर तो लालित्य उड़ेलते हैं पर उनके भीतर शुद्ध रूप से कपट भरा होता है।
वर्तमान संदर्भ  में संपादकीय व्याख्या-जीवन में प्रसन्न रहने का यह भी एक तरीका है कि उस स्थान पर न जायें जहां आपको प्रसन्नता नहीं मिल जाती। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बाहर से तो बहुत प्रेम से पेश आते हैं जैसे कि उनका दिल साफ है पर व्यवहार में धीरे धीरे उनके स्वार्थ या कटु भाव दिखने लगता है तब मन में एक तरह से व्यग्रता का भाव पैदा होता है।  अनेक लोग अपने घर इसलिये बुलाते हैं ताकि दूसरे को अपमानित कर स्वयं को सम्मानित बनाया जा सके।  वह बुलाते तो बड़े प्यार से हैं पर फिर अपमान करने का मौका नहीं छोड़ते।  ऐसे लोगों के घर जाना व्यर्थ है जो मन को तकलीफ देते हैं वह चाहे कितने भी आत्मीय क्यों न हों? मुख्य बात यह है कि हमें अपने जीवन के दुःख या सुख की तलाश स्वयं करनी है अतः ऐसे ही स्थान पर जायें जहां सुख मिले। जहां जाने पर हृदय में क्लेश पैदा हो वहां नहीं जाना चाहिये।  उसी तरह ऐसे लोगों का साथ ही नहीं करना चाहिये जो एकमत के न हों। ऐसे भ्रमित लोग न स्वयं ही परेशान होते हैं बल्कि साथ वाले को भी तकलीफ देते हैं। अनेक जगह लोग निरर्थक विवाद करते हैं। ऐसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं जिनका हल उनके स्वयं के हाथ में ही नहीं होता। इतना ही नहीं सार्वजनिक विषयों पर बहस करने वाले अनेक लोग आपस में ही लड़ पड़ते हैं और शांतप्रिय आदमी के लिये यही अच्छा है कि वह उनसे दूर रहे। जहां लोग हर बात पर वाद विवाद करते हैं वहां का वातावरण कलुषित हो जाता है और अगर उनके बीच जाकर बैठेंगे तो हमारा मन भी त्रस्त हो जायेगा।

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चाणक्य नीति-उत्तम पुरुषों को गलत बताने वाले कष्ट उठाते हैं


दारिद्रयनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी।।
हिंदी में भावार्थ-
दान से दरिद्रता, शील भाव से दुर्भाग्य तथा निष्ठा से भय का नाश होता है।
अन्यथा वेदपाण्डितयं शास्त्रमाचारमन्यतथा।
अन्यथा कुवचः शान्तं लोकाः क्लिश्चन्ति चान्यथा।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो लोग वेदों में वर्णित तत्वज्ञान, शास्त्रों में विधान और उत्तम पुरुषों के चरित्र को गलत बताते हैं वह इस लोक में स्वयं ही भारी कष्ट उठाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-कभी भी किसी भी प्रकार के धर्मग्रंथ की आलोचना या विरोध नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि धर्म ग्रंथ तो निश्चित कालावधि में तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार लिखे जाते हैं जबकि पृथ्वी और प्रकृति के स्वरूप में बदलाव के साथ ही मनुष्य की जीवन शैली में बदलाव आता है और इसी कारण धर्मग्रंथों के कुछ संदेश समय के साथ अप्रासंगिक लगते हैं। अतः धर्म ग्रंथों की आलोचना करना उचित नहीं है।
हां, भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित तत्वज्ञान में कभी बदलाव नहीं आता क्योंकि उसमें जीवन के मूल तत्वों की जानकारी देने के साथ ही उसका सदुपयोग करने की प्रक्रिया का भी वर्णन मिलता है। विश्व में भले ही कितने प्रकार के भौतिक परिवर्तन आयें पर जीवन के तत्वों का निर्धारण करने वाली प्रक्रिया में बदलाव संभव नहीं है।
इसके अलावा एक बात ध्यान रखें कि प्राचीन ग्रंथों में वर्णित महापुरुषों पर विश्वास करें या नहीं पर उनको गलत नहीं बताना चाहिये। संभव है उनका चरित्र वर्तमान समय के हिसाब से अतार्किक या चमत्कारी लगता हो पर यह बात याद रखना चाहिये कि अनेक लोग उनको बहुत मानते हुए उनकी भक्ति तक करते हैं। ऐसे में महापुरुषों को गलत बताना या उपहास नहीं उड़ाना चाहिये क्योंकि इससे उनके भक्तों का मन रुष्ट होता है। महापुरुष स्वयमेव इस धरा पर न हों इसलिये उनसे किसी प्रकार की हानि की आशंका नहीं होती पर उनके भक्तों के मन को जो कष्ट पहुंचता है उसका बुरा प्रभाव जरूर पड़ सकता है। जो लोग प्राचीन महापुरुषों की निंदा करते हैं या उनका मजाक उड़ात हैं अंततः उनको इसका दुष्परिणाम भोगना ही पड़ता है।
भारतीय वेदों तथ अन्य धर्मग्रंथों की आलोचना करने वाले अपना उल्लू सीधा करने करने के लिये भारतीय धर्मग्रंथों के ऐसे चंद श्लोक या दोहे लेकर लोगों को बरगलाते हैं जो अब अप्रासांगिक हो गये हैं या लोग उस पर ध्यान नहीं देते। ऐसे लोग अज्ञान के अंधेरे में रहते हैं क्योंकि वह उनमें वर्णित तत्वज्ञान को नहीं जानते। ऐसे लोग भले ही चाहे कितनी भी प्रतिष्ठा या धन अर्जित कर लें पर सुखी नहीं रहते। वह नहीं जानते कि समाज के सहज संचालन के लिये भारतीय अध्यात्मिक दर्शन बहुत महत्वपूर्ण है। वह धनिक लोगों को दान देने के लिये प्रेरित करता है ताकि समाज की गरीब पर नियंत्रण हो। इतना ही नहीं उत्तम चरित्र से ही व्यक्ति के साथ ही समाज का निर्माण होता है। अक्सर लोग दूसरों के चरित्र पर तो लांछन लगाते हैं पर अपनी तरफ नहीं देखते। अगर सभी लोग तय करें तकि हम अपना चरित्र सही रखेंगे तो निश्चित रूप से देश में एक महान समाज का निर्माण होगा। यही बात भय के संबंध में भी कही जा सकती है। जब व्यक्ति की सब तरफ निष्ठा समाप्त हो जाती है तो वह अपने आप को एकाकी अनुभव करता है जिससे उसके मन भय का निर्माण होता है। इसलिये भगवान भक्ति से पुण्य मिले या नहीं पर अपने अंदर एक भय होता है जिससे हम निजात पा सकते हैं। कहने का का तात्पर्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथो की आलोचना करने वाले न अपने को सुखी रख पाते हैं न उन लोगों को लाभ होता है जो उनका अनुसरण करते हैं। सच बात तो यह है कि दूसरे की आस्था और भक्ति पर सवाल उठाने की बजाय अपने चरित्र और स्थितियों का मंथन करना चाहिये। भारतीय धर्म ग्रंथों पर आक्षेप करने वाले यह भूल जाते हैं कि उनमें वर्णित ऐसा ज्ञान है जिसकी आज विदेशों में भी साख है।

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चाणक्य नीति शास्त्र-हृदय में शुद्धता में निहित है धर्म का भाव


वाचः शौचं च मनसः शौचन्द्रियनिग्रहः।
सर्वभूति दया शौचं एतच्छौत्रं पराऽर्थिनाम्।।
हिंदी में भावार्थ-
वाणी की पवित्रता, मन की स्वच्छता, इंन्द्रियों पर नियंत्रण, समस्त जीवों पर दया और भौतिक साधनों की शुद्धता ही वास्तव में धर्म है।
पुष्पे गंधं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।।
इक्षौ गुडं तथा देहे पश्चाऽऽत्मानं विवेकतः।।
हिंदी में भावार्थ-
पुष्पों में सुंगध, तिल में तेल, लकड़ी में आग और ईख में गुड़ प्रकार विद्यमान होते हुए भी दिखाई नहीं देता वैसे ही शरीर में आत्मा का निवास है। इस बात को विवेकशील व्यक्ति ही समझ पाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस विश्व में अनेक प्रकार के धर्म प्रचलन में आये हैं और हरेक में एक मध्यस्थ होता है जो उसका आशय समझाता है-आम आदमी उसकी बात पर ही यकीन कर लेता है। अनेक तरह की कहानियां सुनाकर लोगों की धार्मिक भावनाओं का दोहन किया जाता है। धर्म के नाम पर शांति की बात इसलिये की जाती है क्योंकि उसी के नाम पर सबसे अधिक झगड़े होते हैं। कहीं धार्मिक मध्यस्थ का प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ होता है तो कहीं उसका सामाजिक महत्व ही इस प्रकार का होता है उसे राज्य और समाज से अप्रत्यक्ष रूप में लाभ मिलता है। धर्म के आशय इतने बड़े कर दिये गये हैं कि लोगों को यही पता नहीं रह जाता कि वह क्या है?
धर्म का आशय है वाणी, मन और विचारों में शुद्धता होना साथ ही अपने नियमित कर्म मेें पवित्रता रखना। केवल मनुष्य ही नहीं सभी प्रकार के जीवों पर दया करना ही मनुष्य का धर्म है। शेष बातें तो केवल सामाजिक एवं जातीय समूह बनाकर शक्तिशाली लोग उन पर नियंत्रण बनाये रखने के लिये करते हैं।

अक्सर लोग आत्मा को लेकर भ्रमित रहते हैं। उनके लगता है कि अपनी इंद्रियों से जो सुनने, बोलने, देखने और खाने की क्रियायें हम कर रहे हैं। यह केवल एक संकीर्ण सोच है। यह हमारी देह है जिसकी समस्त इंद्रियां स्वतः इसलिये कर पाती हैं क्योंकि आत्मा उनको ऊर्जा देती है। वही आत्मा हम है। जिस तरह ईख (गन्ने) में गुड़ दिखाई नहीं देता उसी तरह आत्मा भी नहीं दिखाई देता। जिस तरह एक गन्ने को निचोड़कर उसमें से गुड़ निकालने पर दिखाई देता है इसलिये इंद्रियों पर नियंत्रण कर जब उनहें निचोड़ा जाये तभी वह आत्मा दिखाई देता है। ध्यान योगासन,प्राणायम और भक्ति भाव से जीवन गुजारना ही वह प्रक्रिया है जिससे अपने आत्मा का दर्शन किया जा सकता है। इसे ही आध्यामिक ज्ञान भी कहा जाता है जिसे समझने के बात जीवन में कोई भ्रम नहीं रहता है।
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हिन्दू धर्म सन्देश-बड़े लोगों का मुख ताकने वालों को धिक्कार (hindu dharam sandesh-bade logon ko mukh n tako)


मृतिपण्डो जलरेखया वलचितः सर्वोऽप्ययं न नन्वणुः स्वांशीकृत्य स एवं संगरशतै राज्ञां गणैर्भुज्यते।
ते दद्युर्ददतोऽथवा किमपरं क्षंुद्रदरिद्रं भृशं धिग्धिक्तान्युरुषाधमान्धनकणान् वांछन्ति तेभ्योऽपि ये।।
हिन्दी में भावार्थ-
यह पृथ्वी पानी से चारों तरफ घिरा मिट्टी का एक गोलामात्र है। इस पर अनेक लोगों ने राजा बनकर शासन किया। यह राजा लोग किसी को कुछ नहीं देते। फिर भी राजाओं का मुख ताकते हुए कुछ लोग पाने की उम्मीद में रहते हैं। ऐसे लोगों को धिक्कार है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-राजशाही समाप्त हो गयी पर लोगों के मुख ताकने की आदत नहीं गयी। फिर लोकतंत्र में तो केवल प्रत्यक्ष ही नहीं अप्रत्यक्ष रूप से राज्य करने वाले भी सक्रिय रहते हैं। ऐसे लोग अपने बाहुबल, धन बल तथा बुद्धिबल-चालाकी और बेईमानी-से प्रत्यक्ष रूप से शासन करने वालों पर नियंत्रण रखते हैं। इसका प्रमाण यह है कि अमेरिका की एक पत्रिका दुनियां के शक्तिशाली लोगों की सूची जारी करती है। उसमें कुख्यात लोगों के नाम भी शामिल होते हैं । इस शक्तिशाली शब्द का लोग सही अर्थ नहीं जानते। दरअसल केवल राजकाज और समाज पर नियंत्रण करने वाले व्यक्ति को ही शक्तिशाली माना जाता है। कभी कभी तो यह लगता है कि इस तरह पर्दे के पीछे यही शक्तिशाली विश्व भर के राजाओं में हैं। अनेक देशों की सरकारें उनके आगे पानी भरती नजर आती हैं। उस सूची से यह तो जाहिर हो जाता है कि कहीं न कहीं इन कुख्यात लोगों की पहुंच दूर तक है। यही अपराधी फिल्म, राजनीति, व्यापार, उद्योग में भी धन लगाकर वहां सक्रिय कुछ लोगों को अपना मातहत बना लेेते हैं। यही मातहत जनता को सामने तो राजा दिखते है पर उनकी डोर उनके पीछे खड़े इन कथित शक्तिशाली लोगों के हाथ में होती है जिनको जनता केवल कुख्यात रूप में पहचानती है। इसी अज्ञान के कारण वह उन्हीं मातहतों की तरफ मूंह ताकती रहती है कि वह शायद उसका भला करें। इसके अलावा इन शक्तिशाली तत्वों के मातहतों के आसपास अनेक कलाकार, लेखक, विद्वान तथा सामान्य लोग चक्कर लगाते हैं कि शायद वह उनके आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करें। यह उनका केवल एक भ्रम है। शक्तिशाली तथा राजशाही वाले लोेग किसी का भला नहीं करते। उनका न तो देशभक्ति से लगाव होता है न समाज सेवा से और न ही भगवान भक्ति से! उनका उद्देश्य केवल अपनी आर्थिक, सामाजिक तथा व्यक्ति सत्ता बनाये रखना ही होता है। अतः अपने हित के लिये उनका मुख ताकना केवल मूर्खता है।
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हिन्दू धर्म संदेश-सदगुणों से ही आयु बढ़ती है (sadgun aur ayu-hindu dharm sandesh)


अपनीतं सुनीतेन योऽयं प्रत्यानिनीषते।
मतिमास्थाय सुदृढां तदकापुरुषव्रतम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो अन्याय के कारण नष्ट हुए धन को अपनी स्थिर बुद्धि का आश्रय लेकर पवित्र नीति से वापस प्राप्त करने का संकल्प लेता है वह वीरता का आचरण करता है।
मार्दव सर्वभूतनामसूया क्षमा धृतिः।
आयुष्याणि बुधाः प्राहुर्मित्राणा चाभिमानना।।
हिंदी में भावार्थ-
संपूर्ण जीवों के प्रति कोमलता का भाव, गुणों में दोष न देखना, क्षमा, धैर्य और मित्रों का अपमान न करना जैसे गुण मनुष्य की आयु में वृद्धि करते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के स्वयं के अंदर ही गुण दोष होते हैं। उनको पहचानने की आवश्यकता है। दूसरे लोगों के दोष देखकर उनके प्रति कठोरता का भाव धारण करना स्वयं के लिये घातक है। जब किसी के प्रति क्रोध आता है तब हम अपने शरीर का खून ही जलाते हैं। अवसर आने पर हम अपने मित्रों का भी अपमान कर डालते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने हृदय में कठोरता या क्रोध के भाव लाकर मनुष्य अपनी ही आयु का क्षरण करता है।
कोमलता का भाव न केवल मनुष्य के प्रति वरन् पशु पक्षियों तथा अन्य जीवों के प्रति रखना चाहिए। कभी भी अपने सुख के लिये किसी जीव का वध नहीं करना चाहिये। आपने सुना होगा कि पहले राजा लोग शिकार करते थे पर अब उनका क्या हुआ? केवल भारत में ही नहीं वरन् पूरे विश्व में ही राजशाही खत्म हो गयी क्योंकि वह लोगा पशुओं के शिकार का अपना शौक पूरा करते थे। यह उन निर्दोष और बेजुबान जानवरों का ही श्राप था जो उनकी आने वाली पीढ़ियां शासन नहीं कर सकी।
हम जब अपनी मुट्ठियां भींचते हैं तब पता नहीं लगता कि कितना खून जला रहे हैं। यह मानकर चलिये कि इस संसार में सभी ज्ञानी नहीं है बल्कि अज्ञानियेां के समूह में रह रहे हैं। लोग चाहे जो बक देते हैं। अपने को ज्ञानी साबित करने के लिये न केवल उलूल जुलूल हरकतें करते हैं बल्कि घटिया व्यवहार भी करते हैं ताकि उनको देखने वाले श्रेष्ठ समझें। ऐसे लोग दिमाग से सोचकर बोलने की बजाय केवल जुबान से बोलते हैं। उनकी परवाह न कर उन्हें क्षमा करें ताकि उनको अधिक क्रोध आये या वह पश्चाताप की अग्नि में स्वयं जलें। अपनी आयु का क्षय करने से अच्छा है कि हम अपने अंदर ही क्षमा और कोमलता का भाव रखें। दूसरे ने क्या किया और कहा उस कान न दें।
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विदुर नीति-अर्थ प्राप्ति के लिए धर्म का पालन करें (arth aur dharm-hindu adhyamik sandesh)


यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च निवेशितः।
तेन स्र्वमिदं बुद्धम् प्रकृतिर्विकृतिश्चय वा।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिसकी बुद्धि पाप से परे होकर कल्याण के मार्ग पर आ जाये वह इस संसार में हर वस्तु कि प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह से जान लेता है।

अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्।
न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अर्थ प्राप्त करने की इच्छा है उसे धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए। जिस तरह स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह कहना गलत है धर्म के मार्ग पर अर्थ की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्म-ईमानदारी, सहजता, परमार्थ, और अपने कर्तव्य से प्रतिबद्धता-का परिणाम ही अर्थ की प्राप्ति ही है। यह अलग बात है कि जल्दी अमीर बनने या आवश्यकता से अधिक धनार्जन के के लिये लोग अपने जीवन में आक्रामक और बेईमानी की प्रवृत्ति अपना लेते हैं। इस संसार में ऐसे लोग भी है जो बेईमानी से धन कमाकर कथित रूप से प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का आकर्षण समाज के युवाओं को आकर्षित करता है पर उनको यह समझ लेना चाहिये कि बेईमान और भ्रष्ट लोगों को धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल की शक्ति की वजह से सामने कोई कुछ नहीं कहता पर पीठ पीछे सभी लोग उनके प्रति घृणा का भाव दिखाने से नहीं चूकते। फिर भ्रष्ट और बेईमान लोग का धन जिस तरह बर्बाद होता है उसे भी देखना चाहिये।

नीति विशारद विदुर जी के अनुसार जिस व्यक्ति ने ज्ञान प्राप्त कर लिया वह इस संसार में व्यक्तियों, वस्तुओं और स्थितियों की प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह समझ जाते हैं। इस ज्ञान से वह विकृतियों से परे रहने में सफल रहते हैं और प्रकृतियां उनका स्वतः ही मार्ग प्रशस्त करती हैं। अत: जितना हो सके योग साधना तथा अन्य उपायों द्वारा अपनी बुद्धि को शुद्ध रखने का प्रयास करना चाहिए।
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हिंदी आध्यात्मिक सन्देश-बेकार के कम न करें तो ही ठीक (vidur niti-bekar kam n karen)


तथैव योगविहितं यत्तु कर्म नि सिध्यति।
उपाययुक्तं मेधावी न तव्र गलपयेन्मनः।।
हिंदी में भावार्थ-
अच्छे और सात्विक प्रयास करने पर कोई सत्कर्म सिद्ध नहीं भी होता है तो भी बुद्धिमान पुरुष को अपने अंदर ग्लानि नहीं अनुभव करना चाहिए।

मिथ्यापेतानि कर्माण सिध्येवुर्यानि भारत।
अनुपायवुक्तानि मा स्म तेष मनः कृथाः।।
हिंदी में भावार्थ-
मिथ्या उपाय से कपट पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाते हैं पर उनमें मन लगाना ठीक नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर आपने सुना होगा कि प्यार और जंग में सब जायज है-यह पश्चिम से आयातित विचार है। जीवन की तो यह वास्तविकता है कि जैसा कर्म करोगे वैसा परिणाम सामने आयेगा। जैसा मन में संकल्प होगा वैसे ही यह संसार हमारे साथ व्यवहार करेगा। अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में मनुष्य इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने कर्म की शुद्धता और अशुद्धता का बोध नहीं रहता। इसी कारण वह ऐसे उपायों का भी सहारा लेता है जो अपवित्र और अनैतिक हैं। फिर उसको अपनी बात के प्रमाण रखने के लिये अनेक प्रकार के झूठ भी बोलने पड़ते हैं। इस तरह वह हमेशा पाप की दुनियां में घूमता है। मगर मन तो मन है वह उसकी तृप्ति के लिये भक्ति और साधना का ढोंग भी करता है। इससे प्रकार वह एक ऐसे मायाजाल में फंसा रहता है जिससे जीवन भर उसकी मुक्ति नहीं होती।
इसलिये अपने जीवन में अच्छे संकल्प धारण करने के साथ ही अपने कार्य की सिद्ध के लिये पवित्र और नैतिक उपायों की ही सहायता लेना चाहिए।

बाकी लोग किस रास्ते पर जा रहे हैं यह विचार करने की बजाय यह देखना चाहिए कि हमारे लिये उचित मार्ग कौनसा है। इसके अलावा यह भी एक अन्य बात यह भी है कि अगर हमारा कोई पवित्र और सात्विक कर्म अपने उचित उपाय से सिद्ध नहीं होता तो भी परवाह नहीं करना चाहिए। याद रखें कार्य सिद्ध होने का भी अपना एक समय होता है और जब आता है तो हमें यह भी पता नहीं लगता कि वह काम कैसे पूरा हुआ। इसलिए कोई भी शुभ काम मन लगाकर करना चाहिए। बहुत जल्दी सफलता के लिए ग़लत मार्ग नहीं पकड़ना चाहिए।
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कौटिल्य दर्शन-दोस्त और दुश्मन दो प्रकार के होते हैं (kautilya darshan-dost aur dushman)


सहज कार्यजश्वव द्विविधः शत्रु सच्यते।
सहज स्वकुलोत्पन्न कार्यजः स्मृतः।
हिंदी में भावार्थ-
शत्रु दो प्रकार के होते हैं-एक तो जो स्वाभाविक रूप से बनते हैं दूसरे वह जो कार्य से बनते हैं। स्वाभाविक शत्रु कुल में उत्पन्न होता है तो दूसरा अपने कार्य के कारण बन जाता है।
उच्छेदापचयो काले पीडनं कर्षणन्तथा।
इति विधाविदः प्राहु, शत्रौ वृतं चतुविंघम्।।
हिंदी में भावार्थ-
उच्छेद, अपचय, समय पर पीड़ा देना और कर्षण यह चार प्रकार की स्थिति विद्वान बताते हैं।
वर्तमान संबंध में संपादकीय-ऐसा कोई जीव इस प्रथ्वी पर नहीं है जिसका कोई शत्रु न हो। बड़े बड़े महापुरुष इस प्रकृत्ति के नियम का उल्लंघन नहीं कर पाये। शत्रु दो प्रकार के बनते हैं। एक तो जो स्वाभाविक रूप होते ही हैं दूसरे हमारे कार्य से बनते हैं। स्वाभाविक रूप शत्रु या विरोधी परिवार, समाज तथा कुल की वजह से बनते हैं। जैसे बिल्ली चूहे की तो कुत्ता बिल्ली का दुश्मन होता है। उसी तरह इंसानों में भी कुछ रिश्ते आपस में प्रतिस्पर्धा पैदा करते हैं। जहां कुल बड़ा होता है वहां आपस में लोग एक दूसरे के विरोधी या दुश्मन पैदा होते हैं। आपने देखा होगा कि किसी आदमी को तब हानि नहीं पहुंचाई जा सकती जब उसका अपना कोई शत्रु न हो। बड़े शत्रु को हराने के लिये छोटे शत्रु से समझौता करना चाहिये यह इसलिये कहा गया है कि क्योंकि दो शत्रुओं से एक साथ लड़ना संभव नहीं होता।

हम यहां शत्रु के साथ विरोधी की भी चर्चा करें तो बात आसानी से समझी जा सकती है। हम जब कोई अपना कार्य करते हैं तो वही कार्य करने वाला अन्य व्यक्ति स्वाभाविक रूप से हमें शत्रु भाव से देखता है। वह इस बात से आशंकित रहता है कि कहीं उसका प्रतिस्पर्धी उससे आगे न निकल जाये। तब वह इस बात का प्रयास भी करता है कि आपको नाकाम किया जाये, आपकी मजाक उड़ायी जाये और तमाम तरह का दुष्प्रचार कर आपका मनोबल गिराया जाये। वह आपके ही छोटे शत्रु या विरोधी को अपना मित्र बना लेता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि इस दैहिक जीवन में शत्रु या विरोधी से मुक्त रहना संभव नहीं है। अतः शत्रु और विरोधी की गतिविधियों को नजर रखें। वह आपकी उपेक्षा करने के साथ ही आपके कार्यसिद्धि के साधनों को हानि पहुंचा सकते हैं। शत्रु या विरोधी की प्रकृत्ति को समझें तो हमेशा सतर्क रहकर उसका मुकाबला कर सकते हैं। याद रहे आपके शत्रु या विरोधी कभी भी आपकी सफलता को न तो स्वीकार कर सकते हैं न ही पचा सकते हैं।
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भर्तृहरि नीति शतक-धन की ऊष्मा से रहित मनुष्य क्या रह जाता है (heat of money-hindu sandesh)


भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि 
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तानींद्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव।
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः क्षपोन सोऽष्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।

हिंदी में भावार्थ-मनुष्य की इंद्रिया नाम,बुद्धि तथा अन्य सभी गुण वही होते हैं पर धन की उष्मा से रहित हो जाने पर पुरुष क्षणमात्र में क्या रह जाता है? धन की महिमा विचित्र है।
वर्तमान सन्दर्भ  में संपादकीय व्याख्या- इस सृष्टि को परमात्मा ने बनाया है पर माया की भी अपनी लीला है जिस पर शायद किसी का भी बस नहीं है। माया या धन के पीछे सामान्य मनुष्य हमेशा पड़ा रहता है। चाहे कितना भी किसी के पास आध्यत्मिक ज्ञान या कोई दूसरा कौशल हो पर पंच तत्वों से बनी इस देह को पालने के लिये रोटी कपड़ा और मकान की आवश्यकता होती है। अब तो वैसे ही वस्तु विनिमय का समय नहीं रहा। सारा लेनदेन धन के रूप में ही होता है इसलिये साधु हो या गृहस्थ दोनों को ही धन तो चाहिये वरना किसी का काम नहीं चल सकता। हालांकि आदमी का गुणों की वजह से सम्मान होता है पर तब तक ही जब तक वह किसी से उसकी कीमत नहीं मांगता। वह सम्मान भी उसको तब तक ही मिलता है जब तक उसके पास अपनी रोजी रोटी होती है वरना अगर वह किसी से अपना पेट भरने के लिये धन भिक्षा या उधार के रूप में मांगे तो फिर वह समाप्त हो जाता है।
वैसे भी सामान्य लोग धनी आदमी का ही सम्मान करते है। कुछ धनी लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि वह अपने गुणों की वजह से पुज रहे हैं। इसी चक्कर में कुछ लोग दान और धर्म का दिखावा भी करते हैं। अगर धनी आदमी हो तो उसकी कला,लेखन तथा आध्यात्मिक ज्ञान-भले ही वह केवल सुनाने के लिये हो-की प्रशंसा सभी करते हैं। मगर जैसे ही उनके पास से धन चला जाये उनका सम्मान खत्म होते होते क्षीण हो जाता है।

इसके बावजूद यह नहीं समझना चाहिये कि धन ही सभी कुछ है। अगर अपने पास धन अल्प मात्रा में है तो अपने अंदर कुंठा नहीं पालना चाहिये। बस मन में शांति होना चाहिये। दूसरे लोगों का समाज में सम्मान देखकर अपने अंदर कोई कुंठा नहीं पालना चाहिये। यह स्वीकार करना चाहिये कि यह धन की महिमा है कि दूसरे को सम्मान मिल रहा है उसके गुणों के कारण नहीं। इसलिये अपने गुणों का संरक्षण करना चाहिये। वैसे यह सच है कि धन का कोई महत्व नहीं है पर वह इंसान में आत्मविश्वास बनाये रखने वाला एक बहुत बड़ा स्त्रोत है। सच
 तो यह है कि खेलती माया है हम सोचते हैं कि हम खेल रहे हैं।
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कबीर के दोहे-अपनी सराहना स्वयं न करें (kabir darshan-dosron ke dosh)


आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?
दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त।
अपना याद आवई, जाका आदि न अन्त।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों के दोष देखकर सभी हंसते हैं पर उनको अपनी देह के स्थाई दोष न तो याद आते हैं न दिखाई देते हैं जिनका कभी अंत ही नहीं है।
आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने मूंह से आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा करना मानवीय स्वभाव है। अपने में कोई गुण न हो पर उसे प्रचारित करना और दूसरे के गुण की जगह उसके दुर्गुण की चर्चा करने में सभी को आनंद आता है पर किसी को अपने दोष नहीं दिखते। जितनी संख्या में लोग परमार्थ करने वाले नहीं है उससे अधिक तो उसका दावा करने वाले मिल जायेंगे। हम अपनी देह में अपने उपरी अंग ही देखते हैं पर नीचे के अंग नहीं दिखाई देते जो गंदगी से भरे रहते हैं चाणक्य महाराज के अनुसार उनको कभी पूरी तरह साफ भी नहीं रखा जा सकता। तात्पर्य यह है कि हम अपने दैहिक और मानसिक दुर्गंण भूल जाते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने बारे में अधिक दावे मत करो अगर किसी ने उनका प्रमाण ढूंढना चाहा तो पूरी पोल खुल जायेगी।
उसी तरह दूसरे की निंदा करने की बजाय अपने गुणों की सहायता से भले काम करने का प्रयास करें यही अच्छा रहेगा। आत्मप्रवंचना कभी विकास नहीं करती और परनिंदा कभी पुरस्कार नहीं दिलाती। यह हमेशा याद रखना चाहिये।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-कार्य के तीन व्यसन (kautilya ka arthshastra-karya ke teen vyasan)


वस्तुध्वशक्येषु समुद्यनश्चेच्छक्येषु मोहादसमुद्यश्मश्च।
शक्येषु कालेन समुद्यनश्व त्रिघैव कार्यव्यसनं वदंति।।
हिंदी में भावार्थ-
शक्ति से परे वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करना, प्राप्त होने योग्य वस्तु के लिये उद्यम न करना , और तथा शक्ति होते हुए भी शक्य वस्तु की प्राप्ति के लिये समय निकल जाने पर प्रयास करना-यह कार्य के व्यसन हैं।
द्रोहो भयं शश्वदुपक्षणंव शीतोष्णवर्षाप्रसहिष्णुता च।
एतानि करले समुपहितानि कुर्वन्त्यवश्यं खलु सिद्धिविघ्नम्
हिंदी में भावार्थ-
द्रोह, डर, उपेक्षा, सर्दी,गमी, तथा वषा का अधिक होना कार्यसिद्धि समय पर होने मेें बाधा अवश्य उत्पन्न करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब भी हम अपने जीवन में कोई लक्ष्य निर्धारित करते हैं तो उस समय अपनी शक्ति का पूर्वानुमान करना चाहिये। उसी तरह कोई योजना बनाकर कोई वस्तु प्राप्त करते हैं तो उस समय अपने आर्थिक, सामाजिक, तथा पारिवारिक स्त्रोतों की सीमा पर भी विचार कना चाहिये। अपने सामथ्र्य से अधिक वस्तु या लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास एक तरह का व्यसन ही है।
उसी तरह किसी वस्तु या लक्ष्य का अवसर पास आने पर उसकी उपेक्षा कर मूंह फेर लेना भी एक तरह का व्यसन है। अगर कोई कार्य हमारी शक्ति की परिधि में है तो उसे अवश्य करना चाहिये। जीवन में सतत सक्रिय रहना ही मनुष्य जीवन को आनंद प्रदान करता है। अगर किसी उपयोगी वस्तु या लक्ष्य की प्राप्ति का अवसर आता है तो उसमें लग जाना चाहिये।
कोई वस्तु हमारी शक्ति के कारण प्राप्त हो सकती है पर हम उसकी यह सोचकर उपेक्षा कर देते हैं कि यह हमारे किस काम की! बाद में पता लगता है कि उसका हमारे लिये महत्व है और उसे पाने का प्रयास करते हैं। यह भी एक तरह का व्यसन है। हमें अपने जीवन में उपयोग और निरुपयोगी वस्तुओं और लक्ष्यों का ज्ञान होना चाहिये। कई बार कोई चीज हमें उपलब्ध होती है पर धीरे धीरे उसकी मात्रा काम होती है। उसका संग्रह का उपस्थित होने पर उसका विचार नहीं करते-यह सोचकर कि वह तो भंडार में है पर बाद में पता लगता है कि यह अनुमान गलत था। यह वैचारिक आलस्य का परिणाम जीवन में कष्टकारक होता है।
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चाणक्य नीति-प्रतिकार प्रतिहिंसा और प्रतिकार के भाव में दोष नहीं (chankya niti-time to time, life style)


संसार विषवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे।
सुभाषितं च सुस्वादु संगतिः सुजने जनै।।

हिन्दी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य जी कहते हैं कि इस विषरूपी संसार में दो तरह के फल अमृत की तरह लगते हैं। एक तो सज्जन लोगों की संगत और दूसरा अच्छी वाणी सुनना।
कृते प्रतिकृतं कुर्याद् हिंसने प्रतिहिसंनम्।
तत्र दोषो न पतति दुष्टे दुष्टे सामचरेत्
हिंदी में भावार्थ-
अपने प्रति अपराध और हिंसा करने वाले के विरुद्ध प्रतिकार और प्रतिहिंसा का भाव रखने में कोई दोष नहीं है। उसी तरह दुष्ट व्यक्ति के साथ वैसे ही व्यवहार करना कोई अपराध नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में वैसे तो दुःख और विष के अलावा अन्य कुछ नहीं दिखता पर दो तरह के फल अवश्य हैं जिनका मनुष्य अगर सेवन करे तो उसका जीवन संतोष के साथ व्यतीत किया जा सकता है। इसमें एक तो है ऐसे स्थानो पर जाना जहां भगवत्चर्चा होती हो। दूसरा है सज्जन और गुणी लोगों से संगत करना। दरअसल इस स्वार्थी दुनियां में निष्काम भाव से कुछ समय व्यतीत करने पर ही शांति मिलती है और यह तभी संभव है जब हम स्वार्थ की वजह से बने रिश्तों से अलग ऐसे संतों और सत्पुरुषों की संगत करें जिनका हम में और हमारा उनमें स्वार्थ न हो। इसके अलावा आत्मा को प्रसन्न करने वाली कहीं कोई बात सुनने को मिले तो वह अवश्य सुनना चाहिये।
कहते हैं कि मन में बुरा भाव नहीं रखना चाहिये पर अगर कोई हमारे साथ बुरा बर्ताव करता है तो उससे चिढ़ हो ही जाती है। पंच तत्व से बनी इस देह में बुद्धि, मन और अहंकार ऐसी प्रकृतियां हैं जिन पर चाहे जितना प्रयास करो पर नियंत्रण हो नहीं पाता। सज्जन लोग किसी अन्य द्वारा बुरा बर्ताव करने पर उससे मन में चिढ़ जाते हैं पर बाद में वह इस बात से पछताते हैं कि उनके मन में बुरी बात आई क्यों? अगर किसी बुरे व्यक्ति के बर्ताव से गुस्सा आता है तो उससे विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। वैसे जीवन में सतर्कता और सक्रियता आवश्यक है। कोई व्यक्ति हमारे अहित के लिये तत्पर है तो उसका वैसा ही प्रतिकार करने में कोई बुराई नहीं है। बस! इतना ध्यान रखना चाहिये कि उससे हम बाद में स्वयं मानसिक रूप से स्वयं प्रताड़ित न हों।
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विदुर नीति-बुद्धिमान से बैर करना ठीक नहीं (buddhiman se bair-vidur niti)


विदुर महाराज कहते हैं कि
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बुद्धिमान व्यक्ति के प्रति अपराध कर कोई दूर भी चला जाये तो चैन से न बैठे क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति की बाहें लंबी होती है और समय आने पर वह अपना बदला लेता है।
संक्षिप्त व्याख्या-कई मूर्ख लोग सभ्य और बुद्धिमान व्यक्तियों को अहिंसक समझकर उनका अपमान करते हैं। उनके प्रति अपराध करते हुए उनको लगता है कि यह तो अहिंसक व्यक्ति है क्या कर लेगा? आजकल तो हिंसा के प्रति लोगों का मोह ऐसा बढ़ गया है कि लोग बुद्धिमान से अधिक बाहूबलियों का आसरा लेना पसंद करते हैं। एक सभ्य और बुद्धिमान युवक की बजाय लोग दादा टाईप के आदमी से मित्रता करने को अधिक तरजीह देते हैं। ऐसा करना लाभदायक नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति शारीरिक रूप से हिंसक नहीं होते पर उनकी बुद्धि इतनी तीक्ष्ण होती है कि उससे उनकी कार्य करने की क्षमता व्यापक होती है अर्थात उनकी बाहें लंबी होती है। अपने स्वयं ये मित्र के प्रति अपराध या अपमान किये जाने का समय आने पर वह बदला लेते हैं। हमें इसलिये बुद्धिमान लोगों से मित्रता करना चाहिये न कि उनके प्रति अपराध।
2.जो विश्वास का पात्र नहीं है उसका तो कभी विश्वास किया ही नहीं जाना चाहिये पर जो विश्वास योग्य है उस पर भी अधिक विश्वास नहीं किया जाना चाहिये। विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है वह मूल उद्देश्य का भी नाश कर डालता है।
संक्षिप्त व्याख्या-सच तो यह है कि जहां विश्वास है वहीं धोखा है। इसलिये विश्वास तो करना ही नहीं चाहिये। किसी कार्य या उद्देश्य के लिये अपनी शक्ति पर निर्भर रहना ही अच्छा है पर अगर करना भी पड़े तो अधिक विश्वास नहीं करना चाहिये। जहां हमने अपने कार्य या उद्देश्य के लिये पूरी तरह किसी पर विश्वास किया तो उसके पूर्ण होने की संभावना नगण्य ही रह जाती है।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शत्रु पर सिंह की तरह प्रहार करें


कौमे संकोचभास्य प्रहारमपि मर्धयेत्।
काले प्रापते तु मतिमानुत्तिश्ठेत्क्रूरसर्पवत्।।
हिंदी में भावार्थ-
अपने समय के अनुसार जीवन में रणनीति बनाते हुए कछुए के समान अंग समेटकर शत्रु का प्रहार भी सहन करें तो और उचित अवसर देखकर सांप के समान प्रहार भी करें।
मतप्रमतवत् स्थित्वा ग्रसदुत्पलुत्य पण्डितः।
अपरिभश्यमानं हि क्रमप्राप्ते मृगेन्द्रवत्।।
हिंदी में भावार्थ-
बुद्धिमान व्यक्ति को मत्त और प्रमत्त के समान दिखावे में स्थित होकर शत्रु पर ऐसे ही प्रहार करते हैं जैसे सिंह करता है। उसका वार कभी खाली नहीं जाता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में कई बार ऐसा अवसर आता है जब हमें दूसरे के शब्दिक और शारीरिक आक्रमण को झेलना पड़ता है। उस समय हमें अपनी स्थितियों और शक्ति का अवलोकन करते हुए इस बात को भी देखना चाहिये कि हमारे सहयोगी कौन है? अगर समय हमारे अनुकूल न हो तो अपनी सहनशक्ति को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि उस समय क्रोध या निराशा में उठाया गया कदम आत्मघाती होता है।
इसके विपरीत जब हमारा समय अनुकूल हो और लगता हो कि हमारे मित्र और सहयोगी साथ देने के लिये तैयार हैं और शत्रु या विरोधी को दबाया जा सकता है तब उस पर शाब्दिक या शारीरिक आक्रमण किया जा सकता है। वैसे आजकल के सभ्य युग में शारीरिक कम शाब्दिक संघर्ष अधिक होते हैं। चाहे किस प्रकार का भी आक्रमण हो उसकी तैयारी विवेक से करना चाहिये। कहीं कहीं हम पर शाब्दिक आक्रमण भी होता है और अगर लगता है कि वहां प्रत्युत्तर देने का उचित समय नहीं है तो मौन रहना ही बेहतर है परंतु यदि लगता है कि उससे सामने वाले को अनावश्यक लाभ मिल रहा है तो स्थिति देखकर उस पर पलटवार करना बुरा नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है जीवन में अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये रणनीति से काम करना चाहिए। कहा भी जाता है कि यह जिंदगी को युद्ध या जंग से कम नहीं होती।
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चाणक्य नीति- निरंतर अभ्यास से ही कामयाबी संभव


जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्वते घटः।
स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य चः।।
हिंदी में भावार्थ-
पानी की एक एक बूंद से जिस तरह घड़ा भर जाता है उसी प्रकार थोड़े से अभ्यास से सभी प्रकार विद्यायें, धार्मिक ज्ञान तथा धन प्राप्त किया जा सकता है।
नाहारं विच्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्।
आहारा हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्वान को भोजन तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की चिंता छोड़कर केवल धर्म संग्रह की चिंता करना चाहिए क्योंकि परमात्मा ने दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति की व्यवस्था पहले ही कर दी है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में सफलता प्राप्त करने का कोई संक्षिप्त मार्ग नहीं है। जीवन में धीरज के साथ अपने कर्म करने के साथ ही ज्ञानार्जन का अभ्यास सतत करना ही सफलता का मंत्र है। संक्षिप्त मार्ग ढूंढने का आशय है अप्राकृतिक साधनों की तरफ आकर्षित होकर अपने लिये विपत्तियों का बुलाना। लोग एक दिन में ही लखपति और फिर करोड़पति बनना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि अवैध या अपराधिक कार्यों में ही यह संभव है पर स्वच्छ और पवित्र व्यवसायों में तो धीरज के साथ ही उन्नति की तरफ बढ़ा जाता है। इस बात पर विचार कर सुख के साथ शांति पूर्वक जीवन की इच्छा करने वालों को अपने व्यवसाय और नौकरी के साथ ही अध्यात्मिक विषयों में भी रुचि लेना चाहिए।
इतना ही नहीं जीवन में परिश्रम से बचने का कोई प्रयास नहीं करना चाहिए। काम करने से ही आत्मविश्वास बढ़ता है और इसके लिये जरूरी है कि अपने प्रयास में नैतिकता और ईमानदारी बरतें। अपने व्यवसाय और अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के कार्य के निरंतर अभ्यासरत रहने से उपलब्धियों प्राप्त होती हैं और इस पर विश्वास करना चाहिए।
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विदुर नीति-दुष्ट को अपना राज बताना खतरनाक


धर्माऽऽख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्।
सा सर्वदैव तिष्ठेयेत् को न मुच्येत बंधानात्।।
हिंदी में भावार्थ-
किसी भी धर्म स्थान पर जब कोई व्यक्ति सत्संग का लाभ उठाता है, श्मशान में किसी के शव दाहसंस्कार होते देखता है या किसी रोगी को अपनी पीड़ा से छटपटाता हुआ देखता है तो इस भौतिक दुनियां को निरर्थक मानने लगता है परंतु जैसे ही वहां से हट जाता है वैसे ही उसकी बुद्धि फिर इसी संसार के भौतिक स्वरूप की तरफ आकर्षित होती है।

जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि।
प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तरं वस्तुशक्तितः।।
हिंदी में भावार्थ-
जल में मिलाया गया तेल, दुर्जन को बताया गया गुप्त रहस्य, सुपात्र को दिया गया धन का दान और बुद्धिमान को प्रदाय किया ज्ञान स्वतः वृद्धि को प्राप्त होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति को अपने राज किसी अन्य से नहीं कहना चाहिये। अगर कोई व्यक्ति हमारे सामने अच्छा बर्ताव करता है पर अगर उसके मन में हमारे प्रति कपट,ईष्र्या या द्वेष का भाव है तो वह उसे जाकर सभी को बता देगा जिससे अधिक कष्ट प्राप्त होता है। उसी तरह अपने घन का दान किसी अगर अच्छे और गुणी को दिया जाये तो वह उसका सदुपयोग कर उसमें वृद्धि करेगा।
ऐसा अनेक बार जीवन में हमारे सामने अवसर आता है जब कहीं किसी सत्संग में जाते हैं या कहीं श्मशान में किसी प्रियजन और मित्र के दाह संस्कार को देखते हैं या कहीं कोई रोगी तड़तपा हुआ दिखता है तब हमें यह सारा संसार मिथ्या नजर आता है पर अगर उस स्थान से हटते हैं तो फिर सब भूल जाते है। दुनियां के इस भौतिक स्वरूप की महिमा कुछ ऐसी है कि जो इसे बाह्य आंखों से देखता है उसे प्रभावित करता है पर जो ज्ञानी हैं वह इसे जानते हैं और हमेशा ही सुख दुःख, प्रसन्नता शोक और लाभ हानि में समबुद्धिरूप से स्थित रहकर जीवन व्यतीत करते हैं।
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भर्तृहरि नीति शतक: धनी दोस्त से धन और दुर्जन से दया कि याचना न करें



भर्तृहरि महाराज कहते हाँ कि
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असन्तो नाम्यथ्र्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः प्रियान्याच्या वृत्तिर्मलिनमुसुभंगेऽप्यसुकरं।
चिपद्युच्चैः स्थेयं पदमनृविधेयं च महतां सत्तां केनाद्दिष्टं विषमममसिधाराव्रतमिदम्?
हिंदी में भावार्थ-
दृष्ट लोगों से दया के लिये प्रार्थना और अमीर मित्रों से याचना न कर केवल सत्य आचरण से ही जीवन पथ पर आगे बढ़ना चाहिये-ऐसे विचार का प्रतिपादन सज्जन लोगों के लिये किसने किया? मृत्यु के समक्ष भी उच्च विचारों की रक्षा की जाती है और महापुरुषों के मार्ग का ही अनुसरण करना पड़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन के अनेक नियम हैं जिनमें यह भी है कि जो व्यक्ति दुष्ट प्रवृत्ति का है उससे दया की याचना करने का कोई अर्थ नहीं है। उससे अपनी दुष्टता का प्रदर्शन करना ही है। दया दिखाने पर हो सकता है वह कुछ देर अपने दुष्कर्म से रुक जाये पर फिर उसे उसी मार्ग पर जाना है। अतः दुष्ट प्रकृति के लोगों का प्रतिकार करने का सामर्थ्य हमेशा अपने पास रखना चाहिये या फिर उस स्थान से ही चले जाना चाहिये जहां वह निवास करते है।
उसी तरह अपने धनी मित्र से किसी प्रकार की याचना कर अपने संबंध बिगाड़ने की आशंकायें पैदा करना व्यर्थ है। धन एक माया का रूप है और वह सभी को भ्रम, लालच और लोभ की प्रवृत्तियों के कारण अपने बंधन में जकड़े रहती है। अतः अपने धन बंधु-बांधवों और मित्रों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह याचना करने पर आर्थिक सहायता देंगे। जहां तक आर्थिक सहायता का प्रश्न है तो जिसके मन में यह उदार भाव होता है वह बिना मंागे ही करता है और जिसका हृदय संकीर्ण मानसिकता वाला है उससे कितना भी आग्रह करें वह आर्थिक सहायता नहीं करेगा।
जीवन में अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिये जरूरी है कि उसके कुछ नियमों को समझाया जाये। महापुरुष द्वारा ने अपने अनुभवों से जो सत्य का मार्ग दिखाया है उस पर चलकर ही सामान्य मनुष्य जीवन में स्वस्थ और प्रसन्न रह सकता है। उससे पृथक चलना अपने आपको ही शारीरिक और मानसिक कष्ट देना है।
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मनुस्मृतिः हिंसा से कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं होता


नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।

हिंदी में भावार्थ-किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये।

यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो हिनस्तिन किंचन।।

हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता, वह जिस विषय पर एकाग्रता के साथ विचार और कर्म करता है वह अपना लक्ष्य शीघ्र और बिना विशेष प्रयत्न के प्राप्त कर लेता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में मनुष्य के चलने के दो ही मार्ग हैं-एक सत्य और परमार्थ और दूसरा असत्य और हिंसा। यदि मनुष्य का मन लोभ, लालच और अहंकार से ग्रस्त हो गया तो वह नकारात्मक मार्ग पर चलेगा और उसमें सहृदयता का भाव है तो वह सकारात्मक मार्ग पर चलता है। श्रीगीता के संदेशों का सार यह है कि जैसा मनुष्य अन्न जल ग्रहण करता है तो वैसा ही उसका स्वभाव हो जाता है तब वह उसी के अनुसार ही कर्म करता हुआ फल भोगता है।
वैसे पश्चिम के वैज्ञानिक भी अपने अनुसंधान से यह बात प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन और मांसाहारी भोजन करने वालों के स्वभाव में अंतर होता है। वह यह भी प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन करने वालों के विचार और चिंतन में सकारात्मक पक्ष अधिक रहता है जबकि मांसाहारी लोगों का स्वभाव इसके विपरीत होता है। अतः जितना संभव हो सके भोजन में मांसाहार से परहेज करना चाहिये।
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भर्तृहरि शतकः हंसों का मूल गुण परमात्मा भी नहीं छीन सकता


अम्भोजिनी वनविहार विलासमेव हंसस्य हंति नितरां कुपितो विधाता।
न त्वस्य दुग्धवाभेदविधौ प्रसिद्धां वेंदग्ध्यकीर्तिमपहर्तुमसौं समर्थः

हिंदी में भावार्थ- अगर परमात्मा नाराज हो जाये तो वह हंसों का वनों में विहार करने से रोक सकता है लेकिन उनमें पानी और दूध को अलग अलग करने का जो स्वाभाविक गुण है उसे नष्ट नहीं कर सकता।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- श्रीगीता के संदेश के अनुसार भी जीव का जन्म परमात्मा की इच्छा से ही होता है पर पंच तत्वों से बनी देह में मन, अहंकार और बुद्धि से संचालन वह स्वयं करते हुए अपने कर्मों के फल के लिये दायी होता है। अधिकतर धर्मों के गुरु अपने भक्तों के सामने यह भ्रम पैदा करते हैं कि उनके कर्म और फल के लिये परमात्मा ही जिम्मेदार है, इसलिये वह केवल उसकी भक्ति करें। सच बात तो यह है कि इस तरह वह सांसरिक कर्मों से लोगों को विमुख करने का प्रयास करते हैं पर साथ ही फिर अपनी दान दक्षिण के नाम उन्हें धन संग्रह के लिये भी प्रेरित करते हैं। व्यक्ति को नैतिकता, अंिहंसा और परोपकार का उपदेश तो सभी गुरु देते हैं पर उसके लिये प्रेरित करने का उनके पास कोई उपाय नहीं होता। बस प्रवचनों में उनकी बात सुनो फिर भूल जाओ फिर सुनने आओ-यह क्रम चलता रहता है।

जब कोई व्यक्ति अपना दुःख लेकर ऐसे गुरुओं के पास पहुंचता है तो यही कहते हैं कि ‘जैसी परमात्मा की मर्जी। हमें तो बस यह संसार देखना है।’ आदमी अपने गुणों और अवगुणों का अध्ययन कर अपने कर्म का निर्णय करे ऐसा उपाय कोई नहीं बताता। अगर यह देह है तो आदमी अपने स्वाभाविक गुणों के वशीभूत कर कोई न कोई कर्म करेगा पर ज्ञानी परिणाम और स्थिति देखकर कदम बढ़ाते है जबकि सामान्य आदमी बिना सोचे समझे कर्मफल पर दृष्टि रखते हुए आगे बढ़ता है और फिर परेशान होता है। आत्म मंथन किये बिना मनुष्य जब आगे बढ़ता है तो उसे सफलता मिलना कठिन हो जाती है। आत्म मंथन से आशय यह है कि अपने अंदर मौजूद गुणों और अवगुणों का अवलोकन करते हुए अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिये। परमात्मा ने हमें कर्म करने की सारी शक्ति दी है इसलिये अपने कर्म की प्रेरणा के लिये उसकी तरफ ताकने की बजाय अपने गुणों के आधार पर लक्ष्य की तरफ बढ़ना चाहिये। सच बात तो यह है कि परमात्मा ने जिन गुणों को स्वाभाविक रूप से हमें सौंपा है उन्हें वह चाहकर भी वापस नहीं ले सकता क्योंकि वह फल को प्रदान तो करता है पर कर्र्म का निर्धारण जीव को स्वयं ही करना है।
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अन्धविश्वास ने धर्म के प्रति विश्वास को कमजोर किया है-आलेख


एक मित्र ब्लाग लेखक सुरेश चिपलूनकर ने कल कुछ फोटो बनारस शहर और गंगा नदी के भेजे। वह हिंदी ब्लागजगत के सक्रिय लेखक होने के साथ दूसरों से सतत संपर्क रखने की कला में भी सिद्ध हस्त हैं और अक्सर ऐसे फोटो और वेबसाईटें ईमेल पर भेजते रहते हैं जो वैचारिक और चिंतन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होती है। कल उनके फोटो के साथ इस बात का भी जिक्र था कि हिंदू धर्म के पवित्र माने जाने वाले बनारस और गंगा नदी में कितना कचड़ा दिखाई देता है। मेरा कभी बनारस जाना नहीं हुआ पर उसके बारे मेंे सुनता रहता हूं। अनेक लोग भी इस बात की चर्चा करते हैं कि वहां गंगा में अब प्रदूषण बहुत है। कहने को इसके लिये लोग अनेक कारण बतायेंगे पर सच बात तो यह है कि इसके लिये अंध श्रद्धालू भी कम जिम्मेदार नहीं है। हिंदू अध्यात्म विश्व का सबसे श्रेष्ठ ज्ञान है पर यह भी उतना ही सच है कि सर्वाधिक अज्ञानी और अंधविश्वासी भारत में ही हैं और इसी कारण भारत के अधिकतर शहर और नदियों की पवित्रता पर विष की चादर बिछ गयी है। देखा जाये तो मंदिर केवल इसलिये बने ताकि लोग एक समूह में आकर वहां सत्संग और कीर्तन कर सकें पर अंधविश्वासों और अज्ञान की वजह से लोगों ने उनको वह कूंआं मान लिया जहां से पुण्य भरकर अपने साथ स्वर्ग ले जाया सके। अपने दैहिक कचड़े को वहां छोड़कर वह यह मान लेते हैं कि वह पवित्र हो गये। उनके उस कचड़े से दूसरे आने वाले श्रद्धालू उनको कितना कोसते हैं और उसका पाप उनके सिर ही आता है यह वह भूल जाते हैं।
पहले उन फोटो की बात करें। उनमें दिखाया गया था कि बनारस की सड़कों पर भारी कचड़ा जमा था। गंगा नदी में लाशें तैर रहीं थीं। कई जगह रेत में तो हड्डियां बिखरी पड़ी थीं। लाशें देखकर अच्छा खासा आदमी डर जाये। उनको कुत्ते खा रहे थे। कई जगह कौवे उन पर बैठे थे। कई लाशें जलने को तैयारी थी तो पास में लोग नहाते हुए दिख रहे थे। कटे हुए बालों के झुंड वहां जमा थे। यह दृश्य देखकर हृदय से भक्ति करने वाले किसी भी आदमी का मन दुःखी हो सकता है। शरीर के बाल, पुराने जूते और कपड़े मंदिरों या तीर्थों पर जाकर फैंकना किस धर्म का हिस्सा है यह कहना कठिन है क्योंकि जिन ग्रंथों को हिंदू धर्म का आधार माना जाता है उनमें ऐसी कोई चर्चा नहीं है।
यह समस्या केवल बनारस तक ही सीमित नहीं है बल्कि देश के अनेक सिद्ध और प्रसिद्ध मंदिरों मेेंं ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं। कुछ महीने पहले की बात है कि हम अपने एक मित्र के साथ स्कूटर पर अपने ही शहर से तीस तीस किलोमीटर दूर एक प्रसिद्ध मंदिर गया। वह भी पवित्र दिन था और मित्र ने आग्रह इस तरह किया कि हमने सोचा चलो हम भी हो आते हैं। वहां जाकर अपना ध्यान भी लगायेंगे और घूमना भी हो जायेगा।

मंदिर पहाड़ी पर था और रास्ते में खेत खलिहान और तालाब देखकर बहुत अच्छा लगा। शहर से दूर ताजी हवा वैसे भी मन को प्रभावित करती है। जब उस मंदिर के निकट पहुंचे तो बहुत भीड़ थी। वैसे उस मंदिर पर भीड़ इतनी नहीं होती पर उस दिन खास दिन था इसलिये आवाजाही अधिक थी। हमने मंदिर से दो किलामीटर स्कूटर रखा-उसको रखने के पांच रुपये दिये क्योंकि ऐसे मौके पर भी भक्तों के साथ कोई रियायत नहीं होती। हम दोनों पैदल पहाड़ी पर चढ़ने लगे। वहां किनारे नाईयों के पास अपने बाल कटवाने वाले लोगों का झुंड लगा हुआ था। किनारे के दोनेां और पड़े बालो के झुंड किसी का मन खराब करने के लिये काफी थे। हम चलते गये तो आगे देखा कि लोग पुरानी चप्पलें वहीं छोड़ गये थे जो कई बार हमारे पैरों में बाधा पैदा कर देती थी। मंदिर पहुंचे तो लंबी लाईन लगी थी। हमने अपने मित्र से कहा कि इस धूप में इतनी देर लाईन में खड़े होना हमारे लिये संभव नहीं हैं। हम तो कभी दोबारा आकर दर्शन कर लेंगे।’
मित्र भी निराश हो गया था पर चलते चलते वह पता नहीं मंदिर से पचास मीटर पहले ही लाईन के बीच में लग गया हम उससे उस समय थोड़ा दूर थे। तब हम मंदिर के पास ही एक टैंट के में अपने बैठने की जगह तलाशने लगे। वह एक मैदान था। वहां बालों, पुराने कपड़ों और चप्पलों के बीच खड़ा होकर हम सोचने लगे कि ‘भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान’ में आखिर ऐसा कहां संदेश मिलता है कि धार्मिक स्थानों को अपने अंधविश्वासों से अपवित्र बनाया जाये। एक तो गर्मी फिर वहां के इस दृश्य ने हमें नरक के दर्शन कराकर पीड़ा ही दी और जब तक मित्र बाहर नहीं आया उससे झेलते रहे। एक बार तो गुस्सा आया कि लोगों से कहैं कि ‘यह कौनसा भक्ति करने का तरीका है।’ पर फिर सोचा कि जिस अध्यात्मिक ज्ञान की बात हम करेंगे उसके बारे में यह अधिक बतायेंगे। यहां कई ऐसे ज्ञानी हैं जिनको कबीर,तुलसी और सूर के दोहे जुबानी याद हैं पर अंधविश्वास की धारा में वही सभी से अधिक बहते हैं।
अगर पूरे बाल कटवा दिये जायें तो दिमाग को तरावट होती है। नये कपड़े या जूते पहने से भी देह को सुखद अनुभूति होती है। अगर किसी पवित्र स्थान पर जाकर ऐसी अनुभूति की तो कोई चमत्कार नहीं है पर उसको सिद्धि से जोड़ना भ्रम है। मंदिर निर्माण का मुख्य उद्देश्य मनुष्य में सामुदायिकता की भावना का विकास करना है और उसमें सिद्धि और प्रसिद्धि को विचार तो केवल प्रचार या विज्ञापन ही है। जो लोग वहां अपनी गंदगी का त्याग करते हैं वह कहां जायेगी? इस पर कोई नहीं सोचता। अनेक लोग मंदिरों में केवल मत्था टेकने जाते हैं उनके लिये इस प्रकार की गंदगी वहां नरक जैसा दृश्य प्रस्तुत करती है।

चिपलूनकर जी ने ईमेल के ऊपर ही लिख दिया था कि अंधभक्ति और कमजोर दिलवाले इसे नहीं देखें। बहरहाल हमने फोटो देखे और इस बात को समझ गये कि वह कहना क्या चाहते हैं? उन फोटो को यहां दिखाने की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह एक व्यापक विषय है कि हम अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे होकर अंधविश्वासों का बोझ कम तक ढोते रहेंगे? अक्सर देश की संस्कृति और संस्कार बचाने की बात करने वाले आखिर इस अंधविश्वास से आंखें बंद कर क्यों अपने अभियान चलाते हैं? आम पाठक शायद न समझें पर ब्लाग जगत पर सक्रिय ब्लाग लेखक यही कहना चाहेंगे कि यह सवाल तो सुरेश चिपलूनकर जी से ही किया जाना चाहिये। अधिकतर लोगों को यह लगता है कि सुरेश चिपलूनकर जी परंपरावादी लेखकों के समूह के सदस्य हैं पर हम ऐसा नहीं मानते। उनकी उग्र लेखनी से निकले आलेखों पर सभी लाजवाब हो जाते हैं और जो विरोध करते हैं तो भी उनके तर्क कमजोर दिखते हैं। सच बात तो यह है कि सुरेश चिपलूनकर न केवल अंध विश्वासों के विरोधी है बल्कि उनके कई पाठ धर्म के नाम पर पाखंड के विरुद्ध लिखे गये हैं। उन्होंने अपने ही उज्जैन शहर के मंदिर पर हो रहे पाखंड और भ्रष्टाचार का उल्लेख अपने पाठ में लिया था। उनके इन प्रहारात्मक लेखों से लोग इसलिये भी प्रभावित होते हैं। उन्हें परंपरावादी लेखक तो हम नहीं मानते बल्कि आधुनिक विचाराधारा के परिपक्व श्रेणी के लेखकों में गिनती करते हैं।
प्रसंगवश परंपरपादी और प्रगतिशील लेखकों की बात भी कर लें। दोनों में कोई अधिक अंतर नहीं है। प्रगतिशील भारत के अंधविश्वासों को निशाना बनाते हुए यहां के समग्र चरित्र पर प्रहार करते हुए विदेशी विचारधाराओं की बात करते हैं जबकि परंपरावादी लेखक अपने पुराने ज्ञान को ही प्रमाणिक मानते हैं और अपने अंधविश्वास और पाखंड से बचते हैं। प्रगतिशील और परंपरावादियों से अलग ऐसे आधुनिक लेखक भी हैं जो अपने पुराने अध्यात्म को प्रमाणिक मानते हुए अंधविश्वास और पाखंड पर प्रहार करने का अवसर नहीं चूकते और यही कारण है कि यह तीसरा वर्ग ही भारत में परिवर्तन के लिये जूझता दिखता है। सच बात तो यह है कि कर्मकांडों का आधार स्थानीय होता है और उनका धर्म से संबंध केवल इसलिये दिखता है क्योंकि देश के अधिकतर लोगों के धार्मिक इष्ट एक ही है। कई जगह एक त्यौहार जिस तरह से मनाया जाता है तो दूसरी जगह दूसरे ढंग से। उसी तरह जाति से भी त्यौहार मनाने के तरीके से भिन्नता का आभास होता है। अगर हम कुल निष्कर्ष निकालें तो केवल अध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर ही सभी एक हैं कर्मकांडों में विरोधाभास है और वह धर्म का आधार कतई नहीं लगते। यह अलग बात है कि पहले पुराने और अब आधुनिक बाजार ने अपनी कमाई के लिये कर्मकांडों को ही धार्मिक आधार बना दिया है। सच बात तो यह है कि अंधविश्वासों की वजह से धर्म बदनाम ही हुआ है और पराये क्या अपने ही लोग उनका मजाक उड़ाते हैं। भारत के अनेक महापुरुषों में पाखंड और अंधविश्वास से दूर रहने का संदेश दिया है और उनके कृतित्व का ही नतीजा है कि हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरु माना जाता है। शेष फिर कभी
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भक्तिकाल और अध्यात्मिकता -आलेख


शायद वह लोग सही कहते हैं कि ‘हिंदी सिखाने के लिये रहीम,तुलसी और कबीर की रचनाओं को नहीं पढ़ाना चाहिये।’
लोग उनका विरोध कर रहे हैं पर विरोध करने वाले स्वयं ही किसी वैचारिक धरातल पर नहीं खड़े हैं। अगर हम देखें तो तुलसी, रहीम और कबीर की रचनायें हैं वह शुद्ध हिंदी की नहीं है बल्कि स्थानीय भाषाओं में रची गयी हैं और केवल आधुनिक हिंदी का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति उनकेा बिना अभ्यास के समझ नहीं सकता। अन्य लोगों की तरह इस आलेख के लेखक ने भी तुलसी, रहीम और कबीर की रचनायें शैक्षणिक जीवन में एक विषय होने के कारण पढ़ीं। उस समय यह रचनायें बहुत तकलीफदेह लगती थीं। उस समय ऐसा लगता था कि कबीर दास और रहीम ने रचनायें क्यों लिखी?‘ उनके बारे मं पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देना दुरूह लगता था। सच कहें तो इस लेखक ने अपने बालक सहपाठियों के मूंह से इन रचनाओं को पढ़ने और समझने में जो दुरूहता अनुभव की उससे उपजी निराशा में ऐसे शब्द सुने हैंं जो इन महापुरुषो कें विरोधी भी नहीं कह सकते। हमें आधुनिक हिंदी का ज्ञान तो हो गया था पर भक्तिकाल की रचनाओं के लिये अनुवाद की आवश्यकता होती थी। सच बात तो यह है कि हमने हिंदी सीखी है उसमें रहीम,कबीर,तुलसी,मीरा,सूर, तथा रसखान का कोई येागदान नहीं है पर फिर भी हम उनका सम्मान करते हैं। आप पूछेंगे क्यो?

तय बात है कि भाषा एक अलग विषय है और अध्यात्मिकता और भक्ति एक अलग विषय है। भक्तिकाल को हिंदी भाषा का स्वर्णकाल कहा जाता है पर किस हिंदी का। शायद अध्यात्मिक हिंदी का। कम से कम आज की आधुनिक हिंदी को उससे जोड़ना ही गलत लगता है।
हम संक्षिप्त रूप से हिंदी की चर्चा भी कर लें। हिंदी में कोई माई का लाल यह नहीं कर सकता है कि वह उसका संपूर्ण जानकार है। हिंदी के बारे में बोलते हुए कई विद्वान यही गलती कर रहे हैं वह यह कि वह हिंदी के सर्वज्ञानी होने का भ्रम पाल लेते हैं। सच बात तो यह है कि शुरूआती दौर में हिंदी में उत्तरप्रदेश,बिहार और दिल्ली के विद्वानों का प्रभुत्व था पर राष्ट्रभाषा बनने के बाद यह देश में संवाद की इकलौती भाषा बनने की और अग्रसर है और अब इस समय अंतर्जाल पर करीब करीब सभी प्रदेशों से हिंदी लिखने वाले लेखक हैं देश में जो भौगौलिक विभिन्नता है उसके चलते लोगों के स्वभाव, विचार,भाषा और अभिव्यक्ति के स्वरूप भी अलग है। हिंदी हर पांच कोस पर बदल जाती है पर आदमी का अन्न जल और भौगौलिक परिस्थितियों तो हर एक कोस पर बदलती हैं। जो जिस हाल में रहता है वैसा ही उसका सोच हेाता है। यह भिन्नता लिखने,पढ़ने और समझने में भी परिलक्षित होती है। तब कितना भी बड़ा लेखक (?) हो अगर यह सोचकर अपनी बात दावे से कहता है कि उसका विचार अंतिम है तो वह गलती पर है। अंतर्जाल पर लिखने और पढ़ने की स्वतंत्रता है और अगर आप किसी को बड़ा लेखक या बुद्धिजीवी कर उसके विचार प्रस्तुत करते हैं तो यहां कोई भी लिख सकता है कि ‘अमुक कौन?‘ ऐसे में आपके कपास एक ही मार्ग बचता है कि दूसरे के विचार व्यक्त करने के दरवाजे बंद रखें पर याद रखें वह तीसरे से कुछ लिखवाकर वहां लिख कर अपनी भंड़ास निकालेगा।

बहरहाल अभी तक हिंदी के कुछ बड़े प्रदेशों मध्यप्रदेश,राजस्थान,छत्तीसगढ़,हरियाणा तथा अन्य प्रदेशों के लेखकों और पाठकों को कम ही दृष्टिगत रखा गया है और समय के साथ इन इलाकों के साथ पूरे देश में हिंदी का लेखन और पठनपाठन बढ़ रहा हैं। यहां यह बात याद रखें कि हर प्रदेश की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थतियां अलग अलग हैं और तय बात है कि उनके लेखक और पाठक के स्वभाव और संवेदनाऐं भी वैसे ही हैं। इतना ही नहीं प्रसिद्ध लेखकों के नाम भी अलग हैं। अनेक प्रदेशों के कई ऐसे लेखक हैं जिनको अब अंतर्जाल पर नाम आने से पूरे देश के अंतर्जाल लेखक जान पा रहे हैं।

यह लेखक स्वयं मध्यप्रदेश का है हिंदी में बड़े लेखक जब अपने विचार भाषा और उसके साहित्य पर व्यक्त करते हैं पर तब कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि उनको देश की विविधताओं का आभास नहीं है जिसमें हिंदी भाषा का स्वरूप भी शामिल है। उनकी मानसिकता अभी भी तीन चार प्रदेशों के इर्दगिर्द ही घूम रही है जबकि हिंदी पूरे देश में अपने पांव फैला रही हे पर स्थानीय भाषा के भाव और संवदेनाओं को संजोते हुए। आशय यह है कि हिंदी में सर्वज्ञानी होने का भ्रम तो किसी को नहीं रखना चाहिये। अगर आप हिंदी के विषय में कोई बात कह रहे हैं तो पहले आपको उसकी विविधता का भी ज्ञान होना चाहिये। इस देश में अभी तो कोई ऐसा भाषा ज्ञानी दिख नहीं रहा जिसे विविध हिंदी का ज्ञान हो इसलिये किसी एक की बात को मान लेना गलती करना ही है।

वैसे जो लोग रहीम,कबीर,मीरा,रसखान,सूर तथा भक्तिकाल के अन्य रचयिताओं को हिंदी में पढ़ाये जाने का विरोध कर रहे हैं उनका भाषा के प्रति रुझान कम उनके अध्यामिक और भक्ति से ओतप्रोत समाज को उससे दूर ले जाने में अधिक है। हां, यह सच है कि हिंदी भाषा की दृष्टि से भक्तिकाल अब अधिक प्रासंगिक नहीं है और अगर अब आधुनिक हिंदी का स्थापित करना चाहते हैं तो उसकी रचनाओं को ही प्रोत्साहन देना होगा। जहां तक भक्ति या स्वर्ण काल की रचनाओं से लोगों को जोड़े रखने का प्रश्न है तो उसके लिये एक अध्यात्मिक हिंदी का विषय सभी जगह पढ़ाया जाना चाहिये। शायद स्वतंत्रता के बाद हिंदी के विद्वान यही करते पर जिस तरह कुछ लोगों ने भारतीय अध्यात्म को लोगों से दूर करने की मांग की होगी तो भक्तिकाल की रचनाओं को हिंदी से जोड़ा गया। एक बात तय है कि उनकी रचनाओं को शैक्षणिक काल में ही पढ़ाया जाना चाहिये चाहे किसी भी रूप में भले ही हिंदी के विषय के रूप में नहीं।

वैसे कुछ लोग जो समाज, संस्कृति, और समाज की रक्षा को लेकर चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। संभव है कालांतर में इनको हिंदी में क्या किसी विषय में नहीं पढ़ाया जाये पर भारतीय समाज से भक्ति काल के रचयिताओं के अघ्यात्म ज्ञान और भक्ति से परिपूर्ण रचनाओं को दूर नहीं किया जा सकता। क्या संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण,महाभारत,श्रीमद्भागवत तथा वेदों को भारतीय समाज से दूर किया जा सका भले ही उनको शैक्षणिक विषयों के रूप में पढ़ाया नहीं जाता। हालांकि भक्तिकाल की रचनाओं में जो रस है उससे भारतीय समाज को अब दूर करना उसके साथ अन्याय होगा। जहां तक उनके विरोध का सवाल है तो वह कभी खत्म नहीं होगा क्योंकि देश की संपूर्ण क्षेत्रों में उनका समान प्रभाव है क्योंकि उनमें जीवन और प्राकृतिक रहस्यों को बहुत सहजता से प्रस्तुत किया गया है। भक्तिकाल के रचयिताओं का भाषा की दृष्टि से कम बल्कि अध्यात्मिक दृष्टि से अधिक योगदान है। उससे भाषा के विस्तार में कम आधुनिक और आत्मविश्वासी समाज के निर्माण में अधिक मदद मिली और इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिये। भक्तिकाल के रचयिताओं के प्रति लेखक के हृदय में सम्मान भाषा के कारण नहीं बल्कि उनकी विषय सामग्री के कारण है।
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योगासन के लिये समय तो निकालना ही होगा-आलेख


इस बात को कई लोग मानने लगे है कि योगासन, प्राणायाम और ध्यान से तन,मन और विचारों के विकास शरीर से निकल जाते हैं पर सवाल यह है कि आखिर करे कौन? लोग कहते हैं कि समय नहीं मिलता पर जब शरीर पर किसी रोग का हमला होता है तब चिकित्सकों के अस्पताल के बाहर पंक्ति में खड़े होकर जब अपने तथा परिवार के सदस्यों का समय नष्ट होता है तब समय कहां से आता है?

सच तो यह है लोग अपनी देह के साथ इतना खिलवाड़ करते हैं जैसे कि एक ही दिन में पूरे जीवन का सुख प्राप्त कर लेंगे। कई लोग तो ऐसे हैं जो रात को दो तीन बजे सोते हैं और सुबह आठ नौं बजे उठते हैं। फिर कहते हैं कि नींद पूरी नहीं हुई। कहो तो कहते हैं कि ‘क्या करें अपने काम से घर लौटते हैं तो परिवार के सदस्यों से बातचीत करते हुए ही पूरा समय निकल जाता है। बातें क्या होती हैं? यह सभी जानते हैं। सुबह उठने में आलस आना स्वाभाविक है। देर से उठना और रात के समय ही तमाम तरह की दुनियावी बातों में अपना समय और ऊर्जा व्यर्थ कर देते हैं जो कि रोग और विकारों को बढ़ाता है।

समय नहीं मिलता-यह कहने वाले जानते ही नहीं कि वह अपना कितना समय व्यर्थ गुजारते हैं। असल में अब लोगों के पास धन अधिक मात्रा में आया गया है और उसके स्त्रोत भी अधिक पवित्र नहीं है और यह धन जिसे माया भी कहते हैं कि आदमी को बैचेन किए देते हैं और वह अपने मन में छिपे पापों को अपनी स्मृति से हटाने के लिये ही ऐसे उपक्रम करता है। वह परिवार के सदस्यों के साथ अधिक समय रात तक बात करते हुए उनको बताता है कि किस तरह उसने अपने जीवन में उपलब्धियां प्राप्त की हैं। प्रतिदिन एक ही कहानी। घर पर नहीं तो बाहर मित्रों के साथ भी वह इसी तरह समय बिताता है।

जब देह रूपी घड़ा विकारों से भर जाता है और वह बाहर फैलने लगता है तब आदमी पेड़ के पत्ते की तरह कांपता हुआ अपने लिये दया याचना करता है और ऐसे में चिकित्सक ही उसका सहारा होता है और जिन परिवार के सदस्यों या मित्रों के साथ उसने अपना समय नष्ट किया होता है वह उसका हालचाल पूछने आते हैं-उनका आना भी फिर उसी तरह के तनाव को जन्म देता है जिस तरह के पहले झेले होते हैं।

योगासन एक नितांत एकांत साधना है और किसी गुरु से सीखकर अकेले मेें ही करना चाहिए। जरूरत पड़े तो अपनी पत्नी और बच्चों को भी सिखायें पर करना तो एकांत में ही चाहिए। कई जगह योगसाधना के समय ही दुनियावी बातों की चर्चा होती है और प्राणायाम और ध्यान पर समय नगण्य कर देते हैं। इससे लाभ कम हो जाता है।
मस्तिष्क शरीर का केंद्र बिंदु है और जब तक वह स्वस्थ नहीं है तब तक कोई भी आदमी अपने जीवन में प्रसन्न नहीं रह सकता। उसका इलाज तो एकाग्रता पूर्र्वक किया गया ध्यान है औरजब तक उसमें पूर्णता नहीं होगी आदमी संपूर्णता के साथ नहीं स्वस्थ जीवन बिता पायेगा। शेष अगले अंंक में
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रहीम के दोहेःईश्वर का वर्णन कोई नहीं कर सकता


रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं
जो जानत सो कहत नहिं, कहत त जानत नाहिं

कविवर रहीम कहते हैं कि परमात्मा का वर्णन करना कठिन है। उसका स्वरूप अगम्य है और कहना सुनना कठिन है जो जानते हैं वह कहते नहीं हैं जो कहते हैं वह जानते नहीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सच तो यह है कि परमात्मा के स्वरूप कोई समझ नहीं सकता । उसकी व्याख्या हर कोई अपने अनुसार हर कोई करता है पर वास्तविकता का वर्णन करना कठिन है। अनेक लोग अपने अनुसार भगवान के स्वरूप की व्याख्या करते है। पर सच तो यह है कि उनके स्वरूप का वर्णन कहना और सुनना कठिन है। उनको तो केवल भक्ति से ही धारण किया जा सकता है। परमात्मा का चरित्र वर्णनातीत है और सच्चे भक्त इस बात को जानते हैं पर कहते नहीं है और जो कहते हैं वह जानते नहीं है। अनेक लोग परमात्मा के अनेक स्वरूपों में से हरेक के जीवन चरित्र पर व्याख्या करते हुए अपना ज्ञान बघारते हैं पर सच तो यह है कि यह उनका व्यवसाय है और वह उसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं। उनके वास्तविक स्वरूप को सच्चे भक्त ही जानते हैं पर वह उसका बखान कर अपने अहंकार का प्रदर्शन नहीं करते। अनेक लोग तमाम तरह की खोज का दावा करते हैं तो कुछ लोग कहीं एकांत में तपस्या कर सिद्धि प्राप्त कर फिर समाज में अपना अध्यात्मिक सम्राज्य कायम करने के लिये जुट जाते हैं। ऐसे ढोंगी लोग परमात्मा के स्वरूप का उतना ही बखान करते है जितने से उनका हित और आय का साधन बनता हो।
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समाज की इमारत में आदमी पत्थर की तरह लग जाते-कविता साहित्य


हर पल लोगों के सामने
अपना कद बढाने की कोशिश
हर बार समाज में
सम्मान पाने की कोशिश
आदमी को बांधे रहती है
ऐसे बंधनों में जो उसे लाचार बनाते

ऐसे कायदों पर चलने की कोशिश जो
सर्वशक्तिमान के बनाए बताये जाते
कई किताबों के झुंड में से
छांटकर लोगों को सुनाये जाते
झूठ भी सच के तरह बताते

सब जानते हैं कि भ्रम रचे गए
आदमी को पालतू बनाने के लिए
उड़ न सके कभी आजाद पंछी की तरह
फिर भी कोई नहीं चाहता
अपने बनाए रास्ते पर चलना
क्योंकि जहाँ तकलीफ हो वहाँ चिल्लाते
जहाँ फायदा हो वहाँ हाथ फैलाकर खडे हो जाते
समाज कोई इमारत नहीं है
पर आदमी इसमें पत्थर की तरह लग जाते

आदमी अकेला आया है
और अकेला ही जाता भी
पर ताउम्र उठाता है ऐसे भ्रमों का बोझ
जो कभी सच होते नहीं दिख पाते
लोग पंछियों की तरह उड़ने की चाहत लिए
इस दुनिया से विदा हो जाते

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क्यों नहीं देते सुखद अहसास

हाथ के स्पर्श से किसी के बदन को
तसल्ली मिलती है तो
उसे छूकर क्यों नहीं देते सुखद अहसास
चंद अल्फाजों से किसी के दिल को
हमदर्दी मिल जाती है
तो अपनी जुबान से बोलकर
क्यों नहीं देते किसी को सुखद अहसास
अपने देखने से किसी को
अच्छा लगता है
तो क्यों नहीं अपनी नजरें इनायत कर
किसी को क्यों नहीं देते अहसास
क्या डरते हैं
अपने से लड़ते हैं
सोचते हैं
किसी को सुखी देख
परेशान होगा मन
ए जिन्दगी को आकाश वाले का तोहफा
माननी वालों
दुख से सजा है यह उसका तोहफा
इसे मिलजुलकर सुख बना दो
इसलिए अक्ल दी है
बांटकर एक दूसरे का दुख-दर्द
क्यों नहीं देते एक दूसरे को सुख का अहसास

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भृतहरि शतकःसज्जन की मित्रता पूर्वाद्ध की छाया के समान


दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर
इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी तो साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।

आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्

जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्ध में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्ध में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है।

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