खिलाड़ी से बड़ा है खेल-हिन्दी व्यंग्य लेख (khiladi se bada hai kehl-hindi vyangya lekh)


अक्लमंद को इशारा काफी होता है और मूर्ख बरसों तक कोई बात समझाने के बाद भी नहीं समझता। राजधानी दिल्ली में चल राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी चल रही है और उसमें भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं तो कुछ बुद्धिमान-ऐसा वह दावा करते हैं पर हैं तो निरे मूर्ख ही-सवाल कर रहे हैं कि जब हमारे देश में खिलाड़ी ही नहीं है तो फिर राष्ट्रमंडल, एशियाड या ओलम्पिक कराने की जरूरत क्या है? इतना पैसा यहीं कि खिलाड़ियों पर खर्च कर पहले देश के खेल का स्तर ऊंचा क्यों नही किया जाता?
यकीनन ऐसे लोगों को देश की व्यवस्था का ज्ञान नहीं है या फिर अखबार नहीं पढ़ते वरना ऐसा सवाल कभी नहीं करते। खिलाड़ियों का हाल यह है कि अभी दिल्ली में विश्व कप हुआ था जिसमें भारतीय खिलाड़ी उसके शुरु होने से पहले ही पैसों की मांग करने लगे। उनको धमकाया गया कि‘अगर नहीं खेलोगे तो बाहर कर दिय जाओगे!
वह खेले और हारे। अभी तक हमारे देश के व्यवस्थापक यह नहीं समझ सके कि खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाये बिना कोई खेल इस देश में बढ़ नहीं सकता। बाज़ार और देश की व्यवस्था इस तरह मिल गयी है कि यह कहना भी कठिन है कि कौन किसको चला रहा है? हाकी के खेल के प्रचार के लिये क्रिकेट खिलाड़ी चाहिये। बैंक को एटीएम और क्रेडिट काड के प्रचार के लिये क्रिकेट खिलाड़ी चाहिये। बीमा पॉलिसी बिकवाने के लिये क्रिकेट खिलाड़ी चाहिए। क्रिकेट खिलाड़ी अपने खेल से पैसा कमा कर देते हैं जिसके बदल उनको व्यवस्था से जुड़े उन संस्थानों के भी विज्ञापन मिल जाते हैं जिनका सीधा संबंध बाज़ार से है।
उस दिन एक ए.टी.एम केंद्र पर पैसा निकालते हुए एक आदमी की नज़र खिलाड़ियों के विज्ञापन पर पड़ गयी। उस आदमी ने कहा-‘आखिर, इतने प्रतिष्ठित बैंक को इन खिलाड़ियों से विज्ञापन की क्या जरूरत पड़ी? उसके पास तो वैसे ही ग्राहक आता है?’
दूसरे आदमी ने कहा-‘यह पैसा खर्च करने की बात है जो तुम समझोगे नहीं।’
यह पैसा खर्च करने की बात है। अगर बैंक चाहे तो किसी हॉकी खिलाड़ी से भी विज्ञापन करा सकता है-आखिर वह हमारा राष्ट्रीय खेल है। मगर वह ऐसा नहीं करेगा क्योंकि इससे वह किसी ऐसे खिलाड़ी को प्रतिष्ठित करेगा जिसका वह लाभ उठायेगा साथ में पैसे भी लेगा। कम लेगा तो कमीशन कम बनेगा इसलिये वैसे भी सस्ता खिलाड़ी उनको नहंी चाहिये। दूसरी बात यह है कि क्रिकेट खिलाड़ी स्वनिर्मित हैं। मतलब उनसे विज्ञापन कराकर उन्हें प्रतिष्ठत करने जैसा पाप नहीं करना पड़ता। उनका पेट भरा हुआ है इसलिये किसी भूखे को खिलाने जैसा अधर्म भी नहीं करना पड़ता।
इस देश के व्यवस्था से जुड़े लोगों की यही समस्या है कि वह स्वयं खेल, कला, या साहित्य से स्वयं नहीं पनपते इसलिये उसका प्रबंधन अपने लेकर अपने मन को तसल्ली देने के साथ उससे संबंधित संस्थाओं पर कब्ज़ा कर अपने को महान सिद्ध करना चाहते हैं। दूसरी बात यह कि उनके मन में ढेर सारी कुंठाये हैं इसलिये वह किसी नये खिलाड़ी, कलाकार या साहित्यकार को शिखर पर पहुंचाना पाप समझते हैं। अगर कोई महिला हो तो उसके देह शोषण का ख्याल उनको आता है पर अगर पुरुष हो तो उससे दूसरी नौकरी करवा लेंगे। फिर भी ऊंचाई पर पहुंचाने का पाप नहीं करेंगे।
सीधी बात कहें तो उनको खिलाड़ी नहंी खेल चाहिये। खिलाड़ी तो खाना खायेगा, कपड़ा मांगेगा और आने जाने की सवारी के लिये उसे भत्ता भी चाहिये। कमीशन देने से वह रहा! ऐसे में जाये वह भाड़ में! मगर खेल चाहिये! क्योंकि खेल होगा तो मैदान बनेगा। उस पर घास लगेगी! कुर्सियां बनेंगी, लाईट लगेगी और ख्ेाल के लिये तमाम सामान भी तो खरीदने का अवसर मिलेगा। यह सब होगा तो ठेके होंगे। ठेका होगा तो कमीशन होगा। कमीशन एक तरह से भ्रष्टाचार की जननी है। मगर अब तो वह भी इतनी पूज्यनीय नहीं रही। ठेका ही ऐसे लोगों को दिया जाता है जो अपने परिवार के सदस्य या रिश्तेदार हों।
जब खेल संगठनों पर सीधे नियंत्रण की बात आ जाती है तो हमारे देश के विकासवादी-जो कि वैसे हर मामले में सरकार से दखल की अपेक्षा रखते हैं-स्वायत्ता की रक्षा और अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देने लगते हैं। उनको यह सरकार नियंत्रण तानाशाही लगती है।
नियम तो यह है कि सरकार जहां पैसा देती है उसके लेखों की जांच करने का अधिकार लेखा परीक्षा संस्थाओं को है पर संभवतः खेल संगठन उससे अछूते हैं-ऐसा लगता है इसलिये उनकी बेईमानी बाहर नहंी आ पाती। यह खेल संगठन पल रहे हैं सरकार के पैसे पर, मगर उनका काम चल रहा है प्राईवेट कंपनी की तरह। इनके अध्यक्षों का व्यवहार तो ऐसा लगता है जैसे कि अन्य पदाधिकारी उनके मुनीम और खिलाड़ी मज़दूर हों। देश में खेलों की जो दशा है उसकी गाथा क्या सुनायें? क्रिकेट तो खैर अब खेल ही नहंी रहा पर शतरंज, टेनिस और बैटमिंटन में जो खिलाड़ी चमक रहे हैं वह उनके निजी प्रयास हैं और कोई खेल संगठन उनको उभारने का दायित्व नहीं ले सकता। ऐसे में खेल संगठनों की स्वायत्ता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। ऐसी स्वायत्ता किस काम की जो परिणाममूलक न हो।
मगर यहां परिणाममूलक संस्था चाहता कौन है? मुख्य विषय है संस्था को मिलने वाला पैसा जो अंततः सरकारी राजस्व से ही प्राप्त होता है। पूरी लड़ाई इसी राजस्व से प्राप्त पैसे को हड़पने की है। ओलंपिक में भारत को एक स्वर्ण पदक मिल जाने पर ही यहां लोग नाचने लगते हैं। कुछ बुद्धिमान तो इतने बेशर्म हैं कि कहते हैं कि ‘खेलों में भाग लेना महत्वपूर्ण है न कि पदक जीतना।’
अगर यह तर्क मान भी लें तो फिर किसलिये इतने तामझाम करते हैं खेलों के विकास के लिये। सीधे कहीं से भी उठाकर खिलाड़ी भेज दो। भाग ही तो लेना है कोई जीतना थोड़े ही है। हम तो कह रहे कि सारे पदाधिकारी ही जाकर खेलने लगो। इतने सारे खिलाड़ियों को शिविर में बुलाकर पैसे खर्च करने की क्या आवश्यकता है? तब हम भी भाग लेने की बात पर तसल्ली कर लेंगे।
साठ साल से इतना पैसा खर्च हुआ पर खिलाड़ी कोई बनाया नहंी! मिल्खा सिंह या पीटी ऊषा जैसा कोई अपने आप पैदा हो जाये अलग बात है वरना तो अपने अपने लोगों को-वह भी बिना सिफारिश के नहीं आ सकते-भी भेजने के आरोप लगते हैं।
इस देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। जो कहते हैं वह झूठ बोलते हैं या राजस्व से प्राप्त पैसा हड़पने की उनकी नीयत है। इस देश में इतने सारे गांव और शहर हैं जहां चीन से अधिक प्रतिभायें मिल सकती हैं। उस दिन हम पार्क में आठ से 14 वर्ष के बच्चों को फुलबाल खेलते हुए देख रहे थे। उनके खेलने का तरीका देखकर लगता था कि अगर उनको फुटबाल खिलाड़ी के रूप में चुनकर उन पर खर्च किया जाये तो वहां भी एक दो पेले मिल सकता है।
ऐसे हजारों शहर और गांव है जहां हमारे बच्चों के खेल को निष्काम भाव से खेलते हैं जो कि अच्छा खिलाड़ी बनने में सहायक होता है। मगर नहीं! खेल संगठनों के लोग भी हिन्दी फिल्म वालों की तरह ही वातानुकूलित कमरों में बैठकर खिलाड़ियों का इंतजार करते दिखते हैं। हिन्दी फिल्म वाले कहते हैं कि हिन्दी में लेखक नहीं मिलते। दरअसल वह चाहते हैं कि लेखक उनके लिपिक बन जायें। अखबारों में छपी खबरों से तो यही लगता है कि इन संगठनों के उच्च पदाधिकारी भी मज़दूर चाहते हैं खिलाड़ी नहीं।
हमारा मानना है कि खिलाड़ी भी जमीन में उगता है मगर उसके लिये यह जरूरी है कि खेल के शुभचिंतक किसान बनकर दिखायें न कि अधिकारी। मगर यह कल्पना ही है। हम जानते हैं कि मैदान और खेल का सामान खरीदने का लक्ष्य तय करने वाले वातानुकूलित कमरों में बैठकर इस इंतजार में रहते हैं कि कब कोई मज़दूर की तरह खिलाड़ी आये और उससे अपना काम करवायें। वह न आये तो बाकी के ठेकेदारों से ही कमीशन पर खिलाड़ी मंगा लेते होंगे। चल गया काम! खेलों में भाग लेने तक का ही लक्ष्य है तो उसे कमीशन लेकर पूरा किया जा सकता है। पिछले पैंसठ सालों से यह नाटक चल रहा है और इसके समाप्त होने के आसार अभी नज़र नहीं आते। इस नाटक का नाम यही है कि ‘खिलाड़ी नहीं खेल चाहिए’।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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