कौटिल्य दर्शन-अपनी गलत आदतों की उपेक्षा न करें


प्रकृतिव्यवसननि भूतिकामः समुपेक्षेत नहि प्रमाददर्पात्।
प्रकृत्तिवयवसनान्यूपेक्षते यो न चिरात्तं रिपवःपराभवन्ति।।
हिंदी में भावार्थ-
विभूति की इच्छा से उत्पन्न प्रमाद या अहंकार की प्रकृत्ति से उत्पन्न व्यसनों की उपेक्षा न करें। प्रकृत्ति के व्यसनों की उपेक्षा करने वाले को शत्रु शीघ्र नष्ट कर डालते हैं।

इत्यादि सर्व प्रकृति तथावद्बुध्यत राजा व्यसनं प्रयत्नात्।
बुद्धया च शक्त्वा व्यसनस्य कुर्याकालहीन व्यवरोपर्णहि।।
हिंदी में भावार्थ-
राज प्रमुख विधिपूर्वक सबके व्यसनों को जाने तथा अपनी बुद्धि तथा शक्ति से अपने अंदर स्थित व्यसनों को अधूरेपन में ही नष्ट कर दे क्योंकि विपत्ति होने पर हीन वस्तु और व्यक्ति शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के व्यसन उसको कमजोर करते हैं। शराब, तंबाकू तथा अन्य कोई भी बुरी आदत पालना ठीक नहीं होती। व्यसनों से न केवल देह की रोगों से लड़ने के लिये प्रतिरोधक क्षमता का क्षरण होता है बल्कि मानसिक रूप से भी मनुष्य कमजोर होता है। इतना ही नहीं व्यसनी मित्रों के साथ रहना भी ठीक नहीं है क्योंकि वह उनके वशीभूत होते हैं और किसी भी समय संकट का कारण बन सकते हैं। कहने का आशय यह है कि व्यवसनी का मन अपने वश में नहीं रहता इसलिये वह अपनी अन्मयस्कता की वजह से विश्वास योग्य नहीं होता। अपने अंदर कोई व्यसन हो और लगे कि उसे छोड़ना ही हितकर है तो बिना विलंब किये उससे परे हो जाना चाहिये।
उसी तरह मौसम के अनुसार ही भोजनादि ग्रहण करना चाहिये क्योंकि प्रकृत्ति के अनुसार न चलने पर भी भारी परेशानी उठानी पड़ती है। उसके विपरीत चलने का व्यसन बहुत हानिकारक होता है। व्यसन किसी भी प्रकार से मनुष्य को हानि पहुंचा सकते हैं चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

1 Comment

  1. Such a b’ful collection and proper formal exposition of all priceless ‘dohas and chanakya niti’.
    Brilliant work. Keep it up. One query…where i can read and view the entire collection of such dohas and shlokas of chankya niti with meaning?

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