Good news was not read – comic satire अच्छा हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य


My wife has asked the night -”What will eat?”
We have said -”Where we eat at night? So you take a cup of milk with him a small toast to be so afraid. Although you asked why?
Ira said – ‘you just write something to eat. I thought that perhaps you saw the hunger will take. When preparing food at night and not on the account, he writes, why?
I said – ‘write for yourself, not what the think. Read the account of the night will not! How serious is the matter of foreign dignitaries that the people of our country, people are accused of taking more food, it is important to understand that it is no worry about that.
my wife -”out-you must have been like a man. And all the people to say that I am an account at the time you eat at night and come home with only two to four tea and biscuits account of the night with a cup of milk toast two accounts. It is not, and what to eat? And people say I am a time account.

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I have said -”I did that I would tell people to account and I am the account. This is the thing that set our house on the night, caused not eat.”

I has been silent wife. One morning, and visited the gentleman replied – yaar”Look, our country, what people are saying out of India’s people eat more food in the world because of the crisis. Tell me now, the people of this country was poor, and the flag poles on the ideologies of this country to do with the attack. End! Privatization liberalization live. Now say that more accounts. Now what not to eat bread filled the stomach?

I has said -”if food is not enough. A need to eat less bread.
He said a gentleman – you yaar”as one that can not be any time to eat eat.
I has said -”Today we are less physical effort of so little account.
Mrs them were familiar with them and we spoke -”Where an account of time? Almost at night with tea and biscuits at night with a cup of milk toast must account. What is eating less?

We has thought of speaking lies did not help and i said – ‘We do not say that low?
He said a gentleman – ‘It is also, we still eat on the account. After eating glass of milk must take. Ha, etc. do not pay with her toast. bhabhiji, Do you understand that the only people you drink the milk. After we eat, sleep sip of milk is not only not come.
We have said – ‘you eat with, why are so upset? Your boy’s wedding will, we must also lashed eat like other people. No such oath not to eat that night and never eat. Yes, yoga meditation since the start of the night, then eat free from worry, you have not ever say that the dinner to take leave. Some also say the man said.

He said – ‘The issue is that really what we eat too?
We have said -”Do not think more? You are already complaining of diabetes and it will only benefit those companies who are out of their pills because of the food is digested you get. Yoga, meditation may be that publicity from now increasing the number of healthy people and those on the ‘more food’ campaign to increase the tension will be the same again made them sick The move may be the same.
He said a gentleman -”it has not yet informed you of what we eat more Indian?
I has said – in this country,”one hundred and five million people live. Far more people eat wheat, rice, said something and. No one has a scale. A house in four age groups of four are members of the amount of food on their own – is different. Now, how the people of this country say that the accounts are more or less.
He said a gentleman – the last ten years, we are seeing that in your home comes as wheat not take more than once. But eating out of its low consumption have been going. Like many small children, etc. ate the chips enter the stomach, pizzs, burger and ate the stomach, then fill in the house where eat?
I has said – ‘eating out of the account appear to other people. On the road to the movement of money out of people to see such things are doing so. Eating places them in the market and a crowd of people watching the money flow seems that the nation is the very account.
The concern of a gentleman, after all, if my wife would have said – ‘brother Sahib, so why would you worry? The people of this country, an account of seized a short account. A field in sight, not kill. Any of the seized is not happy to see him come? Went on a looting the house, do not. This is your home you told we eat at night when to come? If you ever bhabhiji and children to come not just to eat on.

He said a gentleman – ‘You Kamal doing? Such a debate has been on the field and you eat, then sat been talking about. At tea, you will eat, so she does not force us not come to your house, including family. Yes, once you come to eat, think again.
Then we went and he changed the subject of talks were the wife said -”it said that the people of India who are more account?

I has said -”We know you try to learn why their concerns have been raised. More concern to a great loss of body fat. “
As he spoke out – if it is a matter of course. Although such a title today in the newspaper, saw on the news was read out. Was not a good read. Without meaning to read the news of what advantage?हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य

हमने कहा-‘‘हम रात को कहां खाते हैं?तुम दूध का एक कप ले आओ तो उसके साथ एक छोटा टोस्ट खाकर सो जायेंगे। वैसे तुमने यह पूछा क्यों?’
कहने लगीं-‘तुम अभी कुछ खाने पर लिख रहे थे। मैने देखा तो सोचा कि शायद तुम्हें भूख लग जाये। जब रात को खाना नहीं खाते तो उस पर लिखते क्यों हो?’
मैने कहा-‘अपने लिये तो लिखते नहीं है जो यह सोचें। पढ़ने वाले तो रात को खाते होंगे न! फिर कितनी गंभीर बात है कि अपने देश के लोगों पर अधिक खाने का आरोप लग रहा है तो यह समझाना जरूरी है कि ऐसी कोई बात नहीं है।’
हमारी श्रीमती जी बोली-‘‘लगाने वाला भी तुम जैसा कोई आदमी रहा होगा। सारी दुनियां से कहते हो कि एक समय खाना खाता हूं पर तुम रात को घर आते ही चाय के साथ  दो से चार बिस्कुट  खाते हो और रात को दूध के कप के साथ एक दो टोस्ट उदरस्थ कर जाते हो। यह खाना नहीं तो और क्या है? और लोगों से कहते हो कि एक समय खाता हूं।’

हमने कहा-‘‘तो क्या लोगों का बताता फिरूं कि मैं यह खाता हूं और वह खाता हूं। यह तो तय बात है कि रात को हमारे घर पर खाना नहीं बनता।’’

हमारी श्रीमती जी चुप हो गयीं। सुबह ही एक सज्जन आये और बोले-‘‘देखो यार, अपने देश के  बाहर के लोग क्या कह रहे हैं  भारत के लोग अधिक खाते हैं इसलिये दुनियां में खाद्यान्न का संकट है। अब बताओ, इस देश के लोग गरीब थे तो झंडे और डंडे लेकर इस देश पर विचाराधाराओं के साथ हमला करते थे। सरकारीकरण खत्म करो उदारीकरण चलो। अब कह रहे हैं कि अधिक खाते हैं। अब क्या रोटी भी पेट भरकर  नहीं खायें?’

हमने कहा-‘‘भरपेट तो खाना नहीं चाहिए। जरूरत से एक रोटी कम खाना चाहिए।
वह सज्जन बोले-‘‘यार तुम जैसा तो कोई हो नहीं सकता कि एक समय खाना खाये।’
हमने कहा-‘‘हम आजकल शारीरिक मेहनत कम कर रहे हैं इसलिये कम खाते हैं।
हमारी श्रीमती उनसे परिचित थीं और उनसे बोलीं-‘‘कहां एक समय खाते हैं? रात को आते ही चाय के साथ बिस्किट और रात को दूध के कप के साथ टोस्ट जरूर खाते हैं। वह क्या खाने से कम है?’

हमने सोचा झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है और हमने कहा-‘हम कम कहते हैं कि नहीं लेते?’
वह सज्जन बोले-‘यह तो हम भी करते है पर फिर भी खाना खाते हैं। खाने के बाद दूध का ग्लास जरूर लेते हैं। हा,ं उसके साथ टोस्ट वगैरह नहीं लेते। भाभीजी, आप क्या समझ रही हो कि केवल आप लोग ही दूध पीते हैं। खाने के बाद हम दूध न पियें तो नींद ही नहीं आये।’
हमने कहा-‘पर आप खाने को लेकर इतने परेशान क्यों हो रहे हैं? आपके लड़के की शादी में आयेंगे तो जरूर हम भी जमकर खायेंगे जैसे दूसरे। ऐसी कोई कसम नहीं खा रखी कि रात को कभी नहीं खायेंगे। हां, जबसे योग साधना शूरू की है तब से रात को खाने की चिंता से मुक्त हो गये हैं पर आपको कभी यह नहीं कहेंगे कि रात का भोजन लेना छोड़ दें। कहने वाला कुछ भी कहता रहे।’

वह बोले-‘मुद्दे की बात यह है कि क्या वाकई हम बहुत खाते हैं?’
हमने कहा-‘‘अधिक मत सोचो? पहले ही तुम मधुमेह की शिकायत करते हो  और उसमें फायदा उन कंपनियों का ही होगा जो बाहर की हैं क्योंकि उनकी गोलियों से ही तुम खाना पचा पाते हो। हो सकता है कि योग साधना के प्रचार से  अब स्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही हो और उन पर ‘अधिक खाने’ के शगूफे से तनाव बढ़ाकर फिर उनको बीमार बनाया जाये यही इसके पीछे यही चाल हो सकती है।
वह सज्जन बोले-‘‘पर तुमने यह अभी तक नहीं बताया कि क्या हम भारतीय अधिक खाते हैं?’
हमने कहा-‘‘इस देश में एक सौ पांच करोड़ लोग रहते हैं। कहीं लोग गेंहूं अधिक खाते हैं तो कही चावल तो कहीं कुछ और। किसी के पास कोई पैमाना नहीं है। घर में चार एक आयु वर्ग के चार सदस्य होते हैं पर उनके खाने की मात्रा अलग-अलग होती है। अब कैसे कहें कि इस देश के लोग अधिक खाते हैं या कम।’
वह सज्जल बोले-‘हम तो पिछले दस साल से देख रहे हैं कि अपने घर में जितना गेंहूं आता है उससे अधिक कभी लेते नहीं है। बल्कि बाहर के खाने से उसकी खपत कम होती जा रही है। छोटे बच्चे तो तमाम तरह की चिप्स वगैरह खाकर पेट भरते हैं, पीजा, बर्गर और पैट्रीज खाकर पेट भरेंगे तो फिर घर में कहां खायेंगे?’
हमने कहा-‘फिर बाहर खाने से दूसरे लोगों को खाते दिखते हैं। पैसे की आवाजाही सड़क पर होने से बाहर के लोगों को दिख रही हैं इसलिये ऐसी बातें कर रहे हैं। उनको बाजार में खाने के स्थानों पर लोगों की भीड़ और पैसे का बहाव देखकर ऐसा  लगता है कि यह देश बहुत खाता है।’
वह सज्जन चिंता में पड़े रहे तो आखिर हमारी श्रीमती जी ने कहा-‘भाई साहब, इतनी चिंता में आप पड़े क्यों हैं? इस देश के लोग खाते हैं तो किसी से छीनकर थोड़े ही खाते हैं। किसी के खाने में नजर तो नहीं डालते। किसी को सुखी देखकर उससे छीनते तो नहीं हैं? किसी के घर पर जाकर लूटपाट तो नहीं करते। आप यह बताईये हम आपके घर रात के खाने पर कब आयें? आप तो भाभीजी और बच्चों को लेकर कभी खाने पर लेकर  आते ही नहीं।’
 
वह सज्जन बोले-‘आप कमाल कर रही हो? इतनी बहस हो गयी खाने पर और आप फिर खाने की बात  लेकर बैठ गयीं। कभी आयेंगे चाय पीने पर आप खाने के जबरदस्ती करतीं हैं इसीलिये नहीं हम परिवार सहित आपके घर नहीं आते।ं हां, आप एक बार खाने पर आयें तो फिर सोचेंगे।’
फिर हमने बातचीत का विषय बदला और वह चले गये तो श्रीमतीजी ने कहा-‘‘पर यह कहा किसने है कि भारत के लोग खाते अधिक हैं?’

हमने कहा-‘‘हमें पता है पर तुम जानने की कोशिश कर अपनी चिंता क्यों बढ़ा रही हो। अधिक चिंता शरीर को हानि पहुंचाती है।’
वह बाहर जाते हुए बोलीं-हां यह तो बात है। वैसे आज अखबार में ऐसा कोई ऐसा शीर्षक तो देखा था पर खबर पूरी नहीं पढ़ी। अच्छा हुआ नहीं पढ़ी। बिना मतलब की खबर पढ़ने से क्या फायदा?’

 

 

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