फ़िर भी लिखता रहूँगा


अब धीरे-धीरे यह समझ में आ रहा है कि ब्लॉग बनाना और लिखना वैसे ही है जैसे किसी शो के लिए एस.एम् एस. करना. जिस तरह टीवी चैनल पर शो होते हैं उनके लिए लोग आत्म मुग्ध होकर एस.एम् एस करते हैं कि हमने अपनी जोरदार भूमिका अदा की. इसी तरह रेडियो पर भी ज़रा-ज़रा से प्रश्नों पर जवाब के लिए एस.एम्. एस कराया जाता है. कुछ लोगों को विजेता बनाकर उनकी आवाज वहाँ सुनाई जाती है ताकि सब लोग उससे प्रेरित हों.
उससे किसका फायदा होता है सब जानते हैं. अलबता बड़े शहर के लोगों के लिए अपना नाम कमाने का खूब यहाँ अवसर हैं पर छोटे शहरों के ब्लॉग लेखकों को तो केवल भीड़ ही माना जायेगा.

इधर अब देश में भी ब्लॉग पर लिखने वालों को प्रोत्साहित किया जा रहा है. मैंने एक वर्ष पूर्व जब ब्लॉग लिखना शुरू किया तो मुझे लगा कि शायद कुछ पढने वाले मिल जायेंगे. यहाँ उस समय नारद करके एक फॉरम था जिस पर सब हिन्दी के ब्लॉग दिखते थे. उसके बाद तीन अन्य फॉरम भी खुल गए. वैसे वर्डप्रेस स्वयं भी अपने आप में एक फॉर्म चला रहा है पर ब्लागस्पाट.कॉम के लिए यह सभी हिन्दी फॉरम बहुत उपयोगी हैं क्योंकि उसके हिन्दी ब्लॉग एक साथ देखने के लिए कोई अन्य जगह नहीं है. बहरहाल मैंने अन्य लोगों के आग्रह पर वहाँ अपना ब्लॉग पंजीकृत कराया. शुरू में ऐसा लगा कि शायद कोई बहुत अच्छी जगह है पर अब लगाने लगा कि वहाँ अपनी रचना दिखाने का मतलब है कि उसको बाजार में बेचना. वहां ग्राहक आपकी चीज पर कोई प्रतिकूल कमेन्ट भी कर सकता है.

पर अब उसका दूसरा रूप भी सामने आ रहा है. मैंने एक वर्ष तक जमकर लिखा कि शायद पाठक संख्या बढे पर ऐसा हुआ नहीं उल्टे ऐसा लगा कि ब्लॉग लेखकों संख्या बढाकर कुछ लोग अपनी भीड़ बढाना चाहते हैं. पुराने ब्लोगर जिनके वेब साईटों में अपने संपर्क लगते हैं अपने लिए खूब प्रचार जुटा रहे हैं. मीडिया में ऐसे लोगों को प्रचार मिल रहा है जिनकी पढने की दृष्टि से हिन्दी ब्लॉग जगत में अधिक मान्यता नहीं है. इन लोगों ने पुरस्कार बांटे और फ़िर उनका अखबारों में खूब प्रचार किया. मुझे हैरानी हुई कि किसी ने भी मेरे नाम का उल्लेख नहीं किया जब कि मैंने १२ सौ से अधिक पोस्टों को लिखा. हद तो इस बात की हो गयी कि ब्लोगों के विषयों का उल्लेख करते हुए उन महत्वपूर्ण विषयों-चाणक्य,कबीर, रहीम, मनु स्मृति, और कौटिल्य, विदुर नीति श्री गीता-का उल्लेख तक नहीं किया जाता क्योंकि इसे मैं लिखता हूँ. इतना भयभीत लोग हैं मैं समझता नहीं था. बड़े शहरों के लोगों के दो समूह बन गए हैं जिनका लिखने से अधिक इस बात पर यकीन है कि आत्मप्रचार किया जाए. वैसे मैं इन विषयों पर लिखते हुए किसी सम्मान की आशा करता भी नहीं क्योंकि इसके लिए कोई प्रायोजक नहीं मिल सकता. उल्टे अपमानित किए जाने पर कोई पुरस्कार जरूर पा सकता है ऐसी मैं आशा नहीं करता था.

छोटे शहरों के ब्लोगरों के लिए नाम,नामा और इनाम जैसी अभी कोई संभावना नहीं बनती दिखती. अब तो यही सोच रहा हूँ कि हिन्दी फोरमों पर जो ब्लॉग हैं उन पर अधिक नहीं लिखा जाए क्योंकि वहाँ सम्मान न मिले पर अपमानित कर कुछ लोग पुरस्कृत जरूर हो सकते हैं. जैसे-जैसे यह संख्या बढेगी मुझे अपने आत्म सम्मान के बचाव के लिए अधिक मानसिक संघर्ष करना पड़ेगा और ऐसे में मेरी रचनाधर्मिता प्रभावित होगी. मैंने किसी से कुछ नहीं माँगा-न नाम, न नामा न इनाम पर इससे वह संतुष्ट नहीं है. क्योंकि मेरे विषय अगर कुछ लोगों को प्रिय हैं तो कुछ लोग उनको अपमानित कर अपने लिए सम्मान भी जुटा सकते हैं. एक तो विषय है फ़िर छोटे शहर का और फ़िर लिखकर उसका पीछा न करने की आदत मुझे कहीं पुरस्कृत कराएगी यह तो मैं सोचता भी नहीं पर अपमानित करने पर कुछ लोग पुरस्कृत हों क्या मैं यह स्वीकार कर लेता. बहरहाल फ़िर भी इन फोरमों पर लिखूंगा ताकि कुछ और कहानियाँ यहाँ पर मिल सकें. वैसे मैं धर्म भीरू इन्सान हूँ और श्रीगीता का संदेश नए संदर्भों में प्रस्तुत करने का मन है, उस पर मैं लिखता भी रहा हूँ पर जिस स्वरूप में लिखने का विचार है उसे शुरू नहीं कर सका. देखता हूँ कि आगे भगवान् की क्या मेहरबानी होती है.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s