एक वर्ष हो गया ब्लोग पर लिखते हुए


आज ईसवी संवत २००७ समाप्त हो रहा है और कल से २००८ प्रारंभ हो रहा है। इस अवसर मैंने लोगों को औपचारिक रूप से बधाई देने का सिलसिला कब शुरू किया मुझे याद नहीं पर इतना जरूर है कि कोई अगर मुझे इस अवसर पर बधाई देता है तो उसे अवश्य देता हूँ पर अपनी तरफ से कभी पहल नहीं करता। वजह मुझे अजीब लगता है और आज भी जिन लोगों से मेरे संपर्क हैं वह उनमें बहुत कम ऐसे हैं जिनसे इस तरह की औपचारिकता पूरी करता हूँ।

वैसे आज मुझे एक वर्ष पूरा हो गया जो मैंने अपना ब्लोग बनाने के प्रयास शुरू किये थे। मुझे कुछ पता नहीं था कि क्या करना है? कोई तकनीकी जानकारी देने वाला नहीं था, और अभिव्यक्ति पत्रिका पर जाकर जब नारद पर देखता हो सोचता था कि कैसे इसे बनाया जाये। बहुत समय तक तो मैं यही समझता था कि अभिव्यक्ति वाले ही इस पर अपनी रचना रखते होंगे। मैंने उनको अपनी एक रचना “पेन मांगने में शर्म नहीं आती” भेजी और सोचा वह छाप देंगे। इधर अक्षरधाम से ब्लोग बनाने का प्रयास किया तो भी समझ में नहीं आया। वहाँ से होता वर्डप्रेस पर गया। फिर ब्लागस्पाट।कॉम पर आया। दोनों पर पहला ब्लोग एक ही दिन यानी ३१ दिसंबर २००६ को बनाया। और उस पर अपने कृतिदेव फॉण्ट में लिख कर रख दी। फिर पलट कर नहीं देखा। वर्डप्रेस पर अपना ब्लोग रेटिंग में न देखकर निराशा होती थी, फिर पता नहीं उसे कैसे हिन्दी में ले गया। तब थोडा चलता दिखा, पर काम से काम दो माह बाद।
नारद पर जाने के प्रयास सफल नहीं हो रहे थे सो अपनी अलख बैठकर जगह रहे थे। वहाँ की पोस्टें देखते रहते फिर वर्डप्रेस। पर भी उनको देखते। कोई परवाह नहीं थी पर रेटिंग में जब वह ऊंचे जातीं तो सोचता था कि आगे हम भी इस स्थिति में आयेंगे पर समय लगेगा।

४ अप्रैल २००७ पर नारद पर ब्लोग पंजीकृत हुआ तो फिर चल पड़े इस राह पर। पिछले एक वर्ष में मैंने बहुत कुछ परिवर्तन देखे हैं। अपने प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि मैं अपनी मूल स्वरूप में नहीं हूँ। मैंने बहुत कम हाथ से लिखकर यहाँ टाईप किया है अधिकतर सीधे ही इस पर लिखा है। अगर सादा हिन्दी फॉण्ट में लिखूं तो शायद प्रभावी हो सकता हूँ पर अभी उसकी सुविधा नहीं है इसलिए खुद को कामचलाऊ मानता हूँ। मैं आक्रामक लिखने वाला लेखक हूँ और इस पर लगता है कि अपनी पोस्ट टाल रहा हूँ। इतना जरूर है कि उसके कुछ फायदे भी हुए हैं। अगर कोई मुझसे कोई कहे कि हाथ से कविता लिखो तो मैं लिख नहीं पाऊंगा जितना मुझे इस पर आता है। खासतौर से हास्य कवितायेँ। अगर मुझसे सादा हिन्दी फॉण्ट में कहें तो नहीं लिखूंगा-जितना मजा मुझे इस पर आता है। जब मैं कंप्यूटर पर आता हूँ तो बस यही सोचता हूँ कि इस पर गद्य रचनाएं तो लिखने में बहुत समय लगता है और प्रभावी भी नहीं होतीं तो क्यों न हास्य कविता लिखी जाये।

बहरहाल ब्लोग पर आये आज एक वर्ष हो गया और अब मेरे लिए यह विश्लेषण करने का वक्त आ गया है कि कहाँ खडा हूँ। मेरी उपलब्धि अगर है तो वह यह मुझसे यहाँ बहुत अच्छे दोस्त मिले हैं और अब उनका प्यार मुझसे लिखवा रहा है। मेरे सामने श्रीश शर्मा और अफलातून जी के नववर्ष के बधाई सन्देश रखे हुए हैं और मुझे अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है पर इन दोनों महानुभावों ने किस तरह मुझे प्रेरित किया यह बताना जरूरी है। श्रीश जी का फोटों मैंने अभिव्यक्ति पर कंप्यूटर पर बैठे देखा था और उसमें ब्लोग बनाने से संबंधित जानकारी थी और मैंने उसे पढा था पर मेरे समझ में कुछ नहीं आया पर मैंने तय किया कि इस शख्स को चुनौती देनी है। मैं चल पड़ा जब इस राह पर तो ऐसा लगा रहा था कि कुछ जम नहीं रहा है। उसके बाद अफलातून जी की एक पोस्ट देखी उनकी बातों से से सहमत नहीं हुआ और जोरदार पोस्ट लिख डाली। उसके बाद अफलातून जी की ही एक पोस्ट ने हास्य कविता लिखने को प्रेरित किया। उनकी पोस्टों से तीन चार बार प्रेरित होकर हास्य कविता लिखी-और इस तरह हास्य कविता लिखना शुरू किया तो वह एक आदत बन गया।उन पर समीक्षा लिखने का कई बार मन आता है पर लिख नहीं पाता। उसका शीर्षक लिखने का दिमाग में रहता है ”लिखते हैं संजीदा नाम अफलातून’। बहरहाल अब सोचता हूँ कि अब कुछ स्वयं भी संजीदा होकर लिखें।

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