Archive for the ‘Enternment’ Category

फरिश्तों का सम्मेलन -हिन्दी व्यंग्य कविता (sammelan-hindi satire poem

अब संभव नहीं है
कोई कर सके
सागर का मंथन
या डाले हवाओं पर बंधन।
इसलिये नये फरिश्ते इस दुनियां के
रोकना चाहते हैं
जहरीली गैसों का उत्सर्जन
जिसे छोड़ते जा रहे हैं खुद
समंदर से अधिक खारे
विष से अधिक विषैले
नीम से अधिक कसैले अपनी
उन फरिश्तों ने महफिल सजाने के लिये
ढूंढ लिया है कोपेनहेगन।।
——–
वह समंदर मंथन कर
अमृत देवताओं [...]

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विदुर नीति-अर्थ प्राप्ति के लिए धर्म का पालन करें (arth aur dharm-hindu adhyamik sandesh)

यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च निवेशितः।
तेन स्र्वमिदं बुद्धम् प्रकृतिर्विकृतिश्चय वा।।
हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिसकी बुद्धि पाप से परे होकर कल्याण के मार्ग पर आ जाये वह इस संसार में हर वस्तु कि प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह से जान लेता है।
अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्।
न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।।
हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद विदुर [...]

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कबीर के दोहे-अपनी सराहना स्वयं न करें (kabir darshan-dosron ke dosh)

आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?
दोष पराया देखि [...]

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मनु स्मृति-गोद में रखकर भोजन करना ठीक नहीं (bhojan karne ka tarika-manu smruti)

न नृत्येन्नैव गायेन वादित्राणि वादयेत्।
नास्फीट च क्ष्वेडेन्न च रक्तो विरोधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-मनुमहाराज कहते हैं कि नाचना गाना, वाद्य यंत्र बजाना ताल ठोंकना, दांत पीसकर बोलना ठीक नहीं और भावावेश में आकर गधे जैसा शब्द नहीं बोलना चाहिये।
न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्य´्जलिना पिबेत्।
नौत्संगे भक्षयेद् भक्ष्यानां जातु स्यात्कुतूहली।।
हिंदी में भावार्थ-मनुमहाराज कहते हैं कि जिस कार्य को [...]

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चाणक्य नीति-जो विद्या काम की न आये उसे पाना व्यर्थ

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
————————-
हर्त ज्ञार्न क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नर।
हर्त निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष ह्यभर्तृकाः ।।
हिंदी में भावार्थ- जिस ज्ञान को आचरण में प्रयोग न किया जाये वह व्यर्थ है। अज्ञानी पुरुष हमेशा ही संकट में रहता हुआ ऐसे ही शीघ्र नष्ट हो जाता है जैसे सेनापति से रहित सेना युद्ध में स्वामीविहीन [...]

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संत कबीर वाणीः अच्छा खाने को मिले तो भी बेवकूफ की संगत न करें

कबीर संगत साधु की, जौ की भूसी खाय
खीर खीड भोजन मिलै, साकट संग न जाय
संत कबीर दास जी कहते हैं कि साधु की संगत में अगर भूसी भी मिलै तो वह भी श्रेयस्कर है। खीर तथा तमाम तरह के व्यंजन मिलने की संभावना हो तब भी दुष्ट व्यक्ति की संगत न करें।
कबीर संगत साधु [...]

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भर्तृहरि नीति शतक: कुत्ता हड्डी चबाते हुए इन्द्र देवता की परवाह नहीं करता

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
——————–
कृमिकुलचितं लालाक्लिन्नं विगन्धिजुगुप्सितम्, निरुपमरसं प्रीत्या खादन्नस्थि निरामिषम्
सुरपतिमपि श्वा पाश्र्वस्थं विलोक्य न शंकते
न हि गणयति क्षुद्रो जन्तुः परिग्रहफल्गुताम्
हिदी में भावार्थ-कीड़ों,लार,दुर्गंध और देखने में गंदी रसहीन हड्डी को कुत्ता बहुत शौक से चबाता है। उस समय इंद्रदेव के अपने आने की परवाह भी नहीं होती। यही हालत स्वार्थी और नीच प्राणी की [...]

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पत्थर कभी इतने नहीं उड़े जितनी खबरें बनी-हास्य व्यंग्य कविता

पत्थर कभी इतने नहीं उड़ाये गये
जितनी खबरें बन गयी।
खंजर कभी इतने नहीं घौंपे गये
जिनकी चर्चा से जमाने की भौहें तन गयी।
बस! बात इतनी है कि
अमन से रहते लोगों के दिमाग में
खौफ के जज़्बात की हवा का
एक झटका देना बहुत होता है
जिसमें बहकर वह बाजार चला आता है
दिल बहलाने के लिये
सौदागरों की जेब [...]

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पुरुष को बैल बनाने में ही देखते नारी की शान-व्यंग्य ग़ज़ल

लोगों में सोच जगाने के लिये चला रहे सभी अभियान।
किताबों के गुलाम मिटाने निकले हैं गुलामी के निशान।।
नारी स्वतंत्रता का नारा लगाते हुए वह मुस्कराते हैं
गृहस्थी में पुरुष को बैल बनाने में ही देखते नारी की शान।।
पूरी जिंदगी दिखाया समाज को उन्होंने नया रास्ता
अपनी सोच से पैदल रहे,पराये ख्याल पर पाया सम्मान।।
मसीहा बनने की [...]

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बाज़ार में बिकती है दवा और अमृत-हिंदी शायरी

सादगी से कही बात
किसी को समझ में नहीं आती है
इसलिए शायद कुछ लोग श्रृंगार रस की
चाशनी में डुबो कर सुनाते हैं
अलंकारों में सजाते हैं
तो कुछ वीभत्स के विष से डराते हैं
आदमी में विषय के लिए जिज्ञासा जगाते हैं
आदमी के दिल में ही रहता है
प्यार और खौफ
जिसे कभी कवियों ने बहलाया था
अब तो बाजार [...]

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अंतर्जाल पर अंग्रेजी से नहीं बल्कि हिन्दी से ही बदलाव हो सकता है=आलेख

अंतर्जाल के ब्लाग पर सामाजिक आंदोलन और जागरुकता के लिये प्रयास कोई अब नयी बात नहीं है। कुछ लोगों ने अभी हाल ही में वेलंटाईन डे के पहले तक इंटरनेट पर चले विवाद पर लिखे गये पाठों को देखकर यही निष्कर्ष निकाला है कि आने वाले समय में भारत के 4.2 [...]

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वैलंटाईन डे का एक दिन में शोर थमा (हास्य-व्यग्य)

कल वैलंटाईन डे बीत गया। पिछले प्रदंह दिन से उसका प्रचार जोरदार ढंग से हुआ। आज अनेक खबरें इस बारे में समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में छायी हुईं हैं। अधिकतर लोगोंं का ध्यान सड़कों, पार्कों, होटलों तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर हुए अच्छे बुरे दृश्यों के विश्लेषण पर केंद्रित हैं पर [...]

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मंदी का दौर:नया उपभोक्ता वर्ग कहां से आयेगा-आलेख

अमेरिका के उद्योगपति बिल गेट्स ने कहा है कि वर्तमान मंदी अगले चार साल तक चल सकती है। बिल गेट्स विश्व में प्रसिद्ध उद्योगपति हैं और नये लोगों को उनसे प्रेरणा लेने को कहा जाता है। वैसे उन्होंने जो अनुमान लगाया है उसके जो आधार होंगे वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के [...]

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आजाद होकर भी गुलाम खड़े मालिकों की कृपा के इंतजार में -हास्य व्यंग्य कविताएँ

परदेस में पुजने से ही
देश में भगवान बनेंगे
कैसा यह उनका भ्रम है।
देश के लोगों से मिले मान से
क्या गौरव नहीं बढ़ता जो
बाहर से इनाम लूटने के लिये
दौड़ का नहीं थम रहा क्रम है।
मालिकों ने कर दिया आजाद
पर फिर भी गुलाम खड़े हैं इंतजार में
उनके दरवाजे पर
कृपा में शायद कोई मिल जाये इनाम
तो बढ़े अपने [...]

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बाज़ार में खौफ का अफ़साना-हिन्दी शायरी

<strong>कुछ हकीकत कुछ ख्वाव
बन जाता है  यूँ ही अफसाना
सुर्खियों में बने रहें अख़बारों की 
चर्चा करे नाम की पूरा ज़माने
इसलिए कभी वह हादसों को ढूंढते हैं
न मिलें तो कर लेते, आगे होने  का बहाना
जिन्हें आदत हो गयी भीड़ में चमकने की
उनको पसंद नहीं है हाशिये पर आना
लोगों की मस्ती और बेचैनी में ही
आता हैं उनको कमाना
जो [...]

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मानव सभ्यता पर वाद-विवाद-आलेख

आज एक समाचार में एक इतिहासकार द्वारा इतिहास में अयथार्थ से भरे तथ्यों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों से हटाने की मांग की गयी है। उन्होंने आर्यों से संबंधित कुछ तथ्यों का प्रतिवाद किया।
एक तो यह कि आर्य कभी आक्रामक नहीं रहे और उनके द्वारा कभी भी कहीं सामूहिक नरसंहार नहीं किया गया-यह पश्चिमी अवधारणा केवल [...]

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रौशनी ने भी अपने रूप बदले हैं-हिंदी शायरी

निकले थे अंधेरे में माटी के चिराग ढूंढने
पर कांच के बल्ब के टुकड़े लग गये पांव में
रौशनी ने भी अपने रूप बदले हैं
शहर चमक रहे हैं चकाचौंध में
अंधेरे का घर है गांव में
मधुर स्वर सुनने की चाह में
पहुंच गये महफिल में
पर कान लगने फटने
सभी गाने वाले लगे थे कांव-कांव में
आंखों से देखने की चाह [...]

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भक्तिकाल और अध्यात्मिकता -आलेख

शायद वह लोग सही कहते हैं कि ‘हिंदी सिखाने के लिये रहीम,तुलसी और कबीर की रचनाओं को नहीं पढ़ाना चाहिये।’
लोग उनका विरोध कर रहे हैं पर विरोध करने वाले स्वयं ही किसी वैचारिक धरातल पर नहीं खड़े हैं। अगर हम देखें तो तुलसी, रहीम और कबीर की रचनायें हैं वह शुद्ध हिंदी की नहीं [...]

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कतरनों में मनोरंजन -हास्य कविताऐं

बेच रहे हैं मनोरंजन
कहते हैं उसे खबरें
भाषा के शब्दकोष से चुन लिए हैं
कुछ ख़ास शब्द
उनके अर्थ की बना रहे कब्रें
परदे पर दृश्य दिखा रहे हैं
और साथ में चिल्ला रहे हैं
अपनी आँख और कान पर भरोसा नहीं
दूसरों पर शक जता रहे हैं
इसलिए जुबान का भी जोर लगा रहे हैं
टीवी पर कान और आँख लगाए बैठे [...]

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फरेबी भी बदनाम होकर नाम तो पा जाते हैं-व्यंग्य कविता

अपनी काबलियत पर न इतना इतराओ
इनाम यहां यूं ही नहीं मिल जाते हैं
भीख मांगने का भी होता है तरीका
लूटने के लिये भी चाहिए सलीका
लोगों की नजरें अब देख नहीं
जब कहीं बवंडर नहीं होता
समंदर भर आंसु बहाकर
जब तक कोई नहीं रोता
काबलियत को कर दो दरकिनार
फरेबी भी बदनाम होकर भी
यहां नाम तो पा जाते हैं
शौहरत होना [...]

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अध्यात्म ज्ञान के बिना धर्म को समझना कठिन-चिंत्तन

धर्म क्या है यह समझे बिना उसकी आलोचना करना गलत है। किसी भी धार्मिक विद्वान् ने अपने विचार से धर्म की आज तक कोई एक परिभाषा तय नहीं की , इसका कारण यह है कि जिन लोगों ने बुद्धिमान और शिक्षित होने का ठेका लिया है वह वादों-विवादों में इतना फंस [...]

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अर्थ होता है पढने वाले की नीयत जैसा-हिन्दी शायरी

लिखते लिखते कविता सड़ जाती है
न लिखो तो दिमाग में जड़ हो जाती है
शब्द बोलो तो कोई सुनता नहीं
कान है यहाँ तो, ख्याल है अन्यत्र कहीं
अपने जुबान से निकले शब्द अर्थहीन लगते हैं
अनसुने होकर अपने को ही ठगते हैं
सडांध लगती हैं अपने आसपास
इसलिए नीयत कविता लिखने को मचल जाती हैं
लिखा हुआ सड़ [...]

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पढ़कर कितना समझते-हास्य हिन्दी शायरी

आम इंसानों की तरह
रोज जिंदगी गुजारते हैं
पर आ जाता है
पर सर्वशक्तिमान के दलाल
जब देते हैं संदेश
अपना ईमान बचाने का
तब सब भूल जाते हैं
दिल से इबादत तो
कम ही करते हैं लोग
पर उसके नाम पर
जंग करने उतर आते हैं
कौन कहता है कि
दुनियां के सारे धर्म
इंसान को इंसान की
तरह रहना सिखाते
ढेर सारी किताबों को
दिल से इज्जत देने की [...]

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सुविधाओं के गुलाम-व्यंग्य

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था या एक राष्ट्र के रूप में स्थापना हुई थी। परंतत्र देश स्वतंत्र हुआ पर क्या परतंत्र का मतलब गुलामी होता है। कुछ प्रश्न है जिन पर विचार किया जाना चाहिये। विचार होगा इसकी संभावना बहुत कम लगती है क्योंकि वाद ओर नारों पर चलने वाले भारतीय [...]

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हमदर्दी जताने का ख्याल-हिन्दी शायरी

अपनों में गैर
और गैरों में अजनबी हो जाना
कितना सताता है
जब आदमी अपने को अकेला पाता है
भरी दोपहर में
शरीर से बहता पसीना
चलते जा रहे पांव
चंद पलों के मन के सुख की खातिर
जिस घर के अंदर झांका
वहीं जंग का मैदान पाता है
मांगने पर थोड़ा प्यार
इतराने लगते हैं लोग
देते हैं नसीहतें तमाम
पर चंद प्यार के लफ्ज बोलकर
हमदर्दी [...]

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योगासन के लिये समय तो निकालना ही होगा-आलेख

इस बात को कई लोग मानने लगे है कि योगासन, प्राणायाम और ध्यान से तन,मन और विचारों के विकास शरीर से निकल जाते हैं पर सवाल यह है कि आखिर करे कौन? लोग कहते हैं कि समय नहीं मिलता पर जब शरीर पर किसी रोग का हमला होता है तब चिकित्सकों के अस्पताल के बाहर [...]

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सच को छिपाना कठिन-हिंदी शायरी

सत्य से जितनी दूर जाओगे
भ्रम को उतना ही करीब पाओगे
खवाब भले ही हकीकत होने लगें
सपने चाहे सामने चमकने लगें
उम्मीदें भी आसमान में उड़ने लगें
पर तुम अपने पाँव हमेशा
जमीन पर ही रख पाओगे
झूठ को सच साबित करने के लिए
हजार बहानों की बैसाखियों की
जरूरत होती है
सच का कोई श्रृंगार नहीं होता
कटु होते हुए भी
उसकी संगत में [...]

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प्यार बिकता हैं यहां-हिंदी शायरी

जब भी हम ढूढ़ते हैं अपने लिए प्यार
पर मिलती है सब जगह से दुत्कार
खुद करो चाहे किसी से भी तुम
मांगो न किसी से इसका उपहार
लोग नहीं निकल पाते अपने दिल से
खरीदा और बिकता पैसे से यहाँ प्यार
भाषा में बहुत होते हैं सुन्दर शब्द
पर बोलने में सब लोग हैं लाचार
अपनों में कितना भी तलाशो नहीं मिलता
गैरों [...]

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कहने वाले का कहना ही है व्यापार-व्यंग्य कविता

एक सपना लेकर
सभी लोग आते हैं सामने
दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन
कहते हैं
‘तुम उस पर बैठ सकते हो
और कर सकते हो दुनियां पर शासन
उठाकर देखता हूं दृष्टि
दिखती है सुनसान सारी सृष्टि
न कहीं सिंहासन दिखता है
न शासन होने के आसार
कहने वाले का कहना ही है व्यापार
वह दिखाते हैं एक सपना
‘तुम हमारी बात मान लो
हमार [...]

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श्रमिक पुत्र कभी अभिनेता नहीं बनता-हास्य कविता-व्यंग्य कविता

आज मजदूर दिवस है
आओ सब मिलकर नारे लगायें
जो गरीबों और मजदूरों को भायें
जन कल्याण और न्याय के लिये
जोर से आवाज उठायें
फिर भूल चाहे भूल जायें
एक ही दिन तो सब करना है
फिर कौन पूछेगा कोई कि
हम क्या कर रहे हैं
मजदूर दिवस कोई रोज नहीं आता
जो कोई फिक्र करें कि
उसके बाद भी कुछ करना होगा
फिर तो पूर [...]

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