सहज कार्यजश्वव द्विविधः शत्रु सच्यते।
सहज स्वकुलोत्पन्न कार्यजः स्मृतः।
हिंदी में भावार्थ-शत्रु दो प्रकार के होते हैं-एक तो जो स्वाभाविक रूप से बनते हैं दूसरे वह जो कार्य से बनते हैं। स्वाभाविक शत्रु कुल में उत्पन्न होता है तो दूसरा अपने कार्य के कारण बन जाता है।
उच्छेदापचयो काले पीडनं कर्षणन्तथा।
इति विधाविदः प्राहु, शत्रौ वृतं चतुविंघम्।।
हिंदी में भावार्थ-उच्छेद, [...]
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31 Jul
संत कबीर के-रात के सपने निराशा का भाव पैदा करते हैं (sant kabir-rat ke sapne aur nirasha)
कबीर सपनें रैन के, ऊपरी आये नैन
जीव परा बहू लूट में, जागूं लेन न देन
संत शिरोमणि कबीरदास जी का आशय यह है कि रात में सपना देखते देखते हुए अचानक आंखें खुल जाती है तो प्रतीत होता है कि हम तो व्यर्थ के ही आनंद या दुःख में पड़े थे। जागने पर पता लगता है [...]
19 Jul
विदुर नीति-बुद्धिमान से बैर करना ठीक नहीं (buddhiman se bair-vidur niti)
विदुर महाराज कहते हैं कि
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बुद्धिमान व्यक्ति के प्रति अपराध कर कोई दूर भी चला जाये तो चैन से न बैठे क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति की बाहें लंबी होती है और समय आने पर वह अपना बदला लेता है।
संक्षिप्त व्याख्या-कई मूर्ख लोग सभ्य और बुद्धिमान व्यक्तियों को अहिंसक समझकर उनका अपमान करते हैं। उनके प्रति अपराध [...]
25 Jun
भर्तृहरि नीति शतक: भक्ति को धंधा न समझें
भर्तृहरि कहते हैं कि
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कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।
हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के लये कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता [...]
18 Jun
चाणक्य नीति- निरंतर अभ्यास से ही कामयाबी संभव
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्वते घटः।
स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य चः।।
हिंदी में भावार्थ-पानी की एक एक बूंद से जिस तरह घड़ा भर जाता है उसी प्रकार थोड़े से अभ्यास से सभी प्रकार विद्यायें, धार्मिक ज्ञान तथा धन प्राप्त किया जा सकता है।
नाहारं विच्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्।
आहारा हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते।।
हिंदी में भावार्थ-विद्वान को भोजन [...]
10 May
मनुस्मृतिः हिंसा से कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं होता
नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये।
यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो [...]
8 May
भर्तृहरि नीति शतक: कुत्ता हड्डी चबाते हुए इन्द्र देवता की परवाह नहीं करता
भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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कृमिकुलचितं लालाक्लिन्नं विगन्धिजुगुप्सितम्, निरुपमरसं प्रीत्या खादन्नस्थि निरामिषम्
सुरपतिमपि श्वा पाश्र्वस्थं विलोक्य न शंकते
न हि गणयति क्षुद्रो जन्तुः परिग्रहफल्गुताम्
हिदी में भावार्थ-कीड़ों,लार,दुर्गंध और देखने में गंदी रसहीन हड्डी को कुत्ता बहुत शौक से चबाता है। उस समय इंद्रदेव के अपने आने की परवाह भी नहीं होती। यही हालत स्वार्थी और नीच प्राणी की [...]
15 Feb
वैलंटाईन डे का एक दिन में शोर थमा (हास्य-व्यग्य)
कल वैलंटाईन डे बीत गया। पिछले प्रदंह दिन से उसका प्रचार जोरदार ढंग से हुआ। आज अनेक खबरें इस बारे में समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में छायी हुईं हैं। अधिकतर लोगोंं का ध्यान सड़कों, पार्कों, होटलों तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर हुए अच्छे बुरे दृश्यों के विश्लेषण पर केंद्रित हैं पर [...]
25 Dec
फरेबी भी बदनाम होकर नाम तो पा जाते हैं-व्यंग्य कविता
अपनी काबलियत पर न इतना इतराओ
इनाम यहां यूं ही नहीं मिल जाते हैं
भीख मांगने का भी होता है तरीका
लूटने के लिये भी चाहिए सलीका
लोगों की नजरें अब देख नहीं
जब कहीं बवंडर नहीं होता
समंदर भर आंसु बहाकर
जब तक कोई नहीं रोता
काबलियत को कर दो दरकिनार
फरेबी भी बदनाम होकर भी
यहां नाम तो पा जाते हैं
शौहरत होना [...]
14 Dec
अध्यात्म ज्ञान के बिना धर्म को समझना कठिन-चिंत्तन
धर्म क्या है यह समझे बिना उसकी आलोचना करना गलत है। किसी भी धार्मिक विद्वान् ने अपने विचार से धर्म की आज तक कोई एक परिभाषा तय नहीं की , इसका कारण यह है कि जिन लोगों ने बुद्धिमान और शिक्षित होने का ठेका लिया है वह वादों-विवादों में इतना फंस [...]
4 Dec
अर्थ होता है पढने वाले की नीयत जैसा-हिन्दी शायरी
लिखते लिखते कविता सड़ जाती है
न लिखो तो दिमाग में जड़ हो जाती है
शब्द बोलो तो कोई सुनता नहीं
कान है यहाँ तो, ख्याल है अन्यत्र कहीं
अपने जुबान से निकले शब्द अर्थहीन लगते हैं
अनसुने होकर अपने को ही ठगते हैं
सडांध लगती हैं अपने आसपास
इसलिए नीयत कविता लिखने को मचल जाती हैं
लिखा हुआ सड़ [...]
12 Oct
अपनी-अपनी सब कहैं-हास्य व्यंग्य कवितायें
किस्से कहें और
क्या कहें
सुनते सभी हैं
पर गुनते नजर नहीं आते
कान से सुनते सभी हैं
पर मन के बहरे सभी हैं
——————
अपने मन की बात
किसी से कहें तो क्या
पहले तो कान न धरे
और धरे तो बनाए मजाक
कहें दीपक बापू
कान से बहरे तो ठीक
मन के बहरों के आगे
क्या बीन बजाना
दुसरे उडाएं
इससे तो अपने पर ही
हंस कर अपना [...]
8 Oct
पढ़कर कितना समझते-हास्य हिन्दी शायरी
आम इंसानों की तरह
रोज जिंदगी गुजारते हैं
पर आ जाता है
पर सर्वशक्तिमान के दलाल
जब देते हैं संदेश
अपना ईमान बचाने का
तब सब भूल जाते हैं
दिल से इबादत तो
कम ही करते हैं लोग
पर उसके नाम पर
जंग करने उतर आते हैं
कौन कहता है कि
दुनियां के सारे धर्म
इंसान को इंसान की
तरह रहना सिखाते
ढेर सारी किताबों को
दिल से इज्जत देने की [...]
2 Oct
प्रेमपत्र लिखने का युग बीत गया-हास्य व्यंग्य कविता
जैसे ही कवि ने कहा
”अब मैं आपको अपनी नई कविता
‘प्यार भरा ख़त’ सुनाऊंगा
लिफाफे के रंग का असर भी बताऊंगा
आप ज़रा गौर फ़रमाएँ “
यह सुनते ही दर्शकों में शोर मच गया
एक चिल्ला कर बोला-
“अभी भी कुछ कवि उन्नीसवीं सदी में जी रहे हैं
चंद पुरानी कविताओं के सहारे अभी तक
शेम्पेन पी रहे हैं
कब का [...]
23 Sep
संत कबीर संदेशः खोटी मनोवृत्ति के लोगों के सामने अपने रहस्य न खोलें
हीरा तहां न खोलिए,जहां खोटी है हाट
कसि करि बांधो गठरी, उठि चालो बाट
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि अगर अपनी गांठ में हीरा है तो उसे वहां मत खोलो जहां बाजार में खोटी मनोवृत्ति के लोग घूम रहे हैं। उस हीरे को कसकर अपनी गांठ में बांध लो और अपने मार्ग पर चले [...]
17 Sep
अपने को बैचेन कर शान्ति ढूँढने जाते-हिन्दी शायरी
चलने को ताज महल भी चल जाता है
हिलने को कुतुबमीनार भी हिल जाता है
चांद लाकर यहां भेंट किया जाता है
तारा तोड़ कर जमीन पर सजाया जाता है
बेचने वाला सौदागर होना चाहिए
ख्वाब और भ्रम बेचना यहां आसान है
अपढ़ क्या पढ़ालिखा भी खरीददार बन जाता है
सच से परे ज्ञान पाकर
अक्ल से कौन काम कर पायेगा
जिनके पास [...]
14 Sep
तुम मोबाइल भाई बन जाओ-हास्य कविता hasya vyangya
सास ने कहा बहू से
‘देखो, आज है राखी का दिन
सब बहनों को भाईयों से निभाना
तुम जल्दी भाई को जाकर राखी बांधकर
लौट आओ
फिर पूरा घर है तुम्हें संभालना
फिर मुझे अपने भाई के घर है जाना
वहीं होगा मेरा आज खाना
पीछे से तुम्हारी ननद आयेगी
उसके लिये जल्दी भोजन बनाना
वह लौट जायेगी
फिर उसकी ननद अपने मायके
भाई को राखी [...]
10 Sep
महामशीन भी कैसे महादानव बन जायेगी-हास्य कविता
बहुत शोर सुना था
महामशीन बन जायेगी
महादानव और
पूरी धरती काले छेद में घुस जायेगी
ऐसा नहीं होना था, नहीं हुआ
क्योंकि हाड़मांस की दानव भी
भस्मासुर जैसे महादानव तभी बनते थे
जब करते थे भारी तपस्या
इंसानी फितरत से बने लोहे के ढांचे का क्या
जो दुनियां ढह जायेगी
देवता तो वह इंसान स्वयं नहीं बनता
महादानव की कल्पना भी भला
कैसे साकार हो पायेगी
यारों, [...]
7 Sep
योगासन के लिये समय तो निकालना ही होगा-आलेख
इस बात को कई लोग मानने लगे है कि योगासन, प्राणायाम और ध्यान से तन,मन और विचारों के विकास शरीर से निकल जाते हैं पर सवाल यह है कि आखिर करे कौन? लोग कहते हैं कि समय नहीं मिलता पर जब शरीर पर किसी रोग का हमला होता है तब चिकित्सकों के अस्पताल के बाहर [...]
31 Aug
वह मतलब निकालकर होशियार कहलाये-हिंदी कविता
जिनको माना था सरताज
वह असलियत में सियार निकल आये
भरोसा किया था जिन पर
वह मतलब निकालकर होशियार कहलाये
उनके लिये लड़ते हुए थकेहारे
सब कुछ गंवा दिया
इसलिये हम कसूरवार कहलाये
………………………………………..
अपनी जिंदगी के राज किसको बतायें
अपने गमों से बचने के लिये सब मजाक बनायें
टूटे बिखरे मन के लोगों का समूह है चारों तरफ
किसके आसरे अपना जहां टिकायें
बेहतर है खुद [...]
26 Aug
रहीम के दोहेःसहृदय लोगों को बुरी संगति नहीं फलती
रहिमन उजली प्रकृति को, नहीं नीच को संग
करिया वासन कर गहे, कालिख लागत अंग
कविवर रहीम कहते हैं कि जिनकी प्रवृत्ति उजली और पवित्र है अगर उनकी संगत नीच से न हो तो अच्छा ही है। नीच और दुष्ट लोगों की संगत से कोई न कोई कलंक लगता ही है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सज्जन और उज्जवन प्रकृति [...]
7 Aug
रहीम के दोहेःईश्वर का वर्णन कोई नहीं कर सकता
रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं
जो जानत सो कहत नहिं, कहत त जानत नाहिं
कविवर रहीम कहते हैं कि परमात्मा का वर्णन करना कठिन है। उसका स्वरूप अगम्य है और कहना सुनना कठिन है जो जानते हैं वह कहते नहीं हैं जो कहते हैं वह जानते नहीं।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सच तो यह है [...]
6 Aug
प्यार बिकता हैं यहां-हिंदी शायरी
जब भी हम ढूढ़ते हैं अपने लिए प्यार
पर मिलती है सब जगह से दुत्कार
खुद करो चाहे किसी से भी तुम
मांगो न किसी से इसका उपहार
लोग नहीं निकल पाते अपने दिल से
खरीदा और बिकता पैसे से यहाँ प्यार
भाषा में बहुत होते हैं सुन्दर शब्द
पर बोलने में सब लोग हैं लाचार
अपनों में कितना भी तलाशो नहीं मिलता
गैरों [...]
30 Jul
समाज की इमारत में आदमी पत्थर की तरह लग जाते-कविता साहित्य
हर पल लोगों के सामने
अपना कद बढाने की कोशिश
हर बार समाज में
सम्मान पाने की कोशिश
आदमी को बांधे रहती है
ऐसे बंधनों में जो उसे लाचार बनाते
ऐसे कायदों पर चलने की कोशिश जो
सर्वशक्तिमान के बनाए बताये जाते
कई किताबों के झुंड में से
छांटकर लोगों को सुनाये जाते
झूठ भी सच के तरह बताते
सब जानते हैं कि भ्रम [...]
29 Jul
कहने वाले का कहना ही है व्यापार-व्यंग्य कविता
एक सपना लेकर
सभी लोग आते हैं सामने
दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन
कहते हैं
‘तुम उस पर बैठ सकते हो
और कर सकते हो दुनियां पर शासन
उठाकर देखता हूं दृष्टि
दिखती है सुनसान सारी सृष्टि
न कहीं सिंहासन दिखता है
न शासन होने के आसार
कहने वाले का कहना ही है व्यापार
वह दिखाते हैं एक सपना
‘तुम हमारी बात मान लो
हमार [...]
28 Jul
श्रमिक पुत्र कभी अभिनेता नहीं बनता-हास्य कविता-व्यंग्य कविता
आज मजदूर दिवस है
आओ सब मिलकर नारे लगायें
जो गरीबों और मजदूरों को भायें
जन कल्याण और न्याय के लिये
जोर से आवाज उठायें
फिर भूल चाहे भूल जायें
एक ही दिन तो सब करना है
फिर कौन पूछेगा कोई कि
हम क्या कर रहे हैं
मजदूर दिवस कोई रोज नहीं आता
जो कोई फिक्र करें कि
उसके बाद भी कुछ करना होगा
फिर तो पूर [...]
27 Jul
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी उड़ा ले जाते हैं-हिन्दी शायरी
मोहब्बत में साथ चलते हुए
सफर हो जाते आसान
नहीं होता पांव में पड़े
छालों के दर्द का भान
पर समय भी होता है बलवान
दिल के मचे तूफानों का
कौन पता लगा सकता है
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी
उड़ा ले जाते हैं
खाली पड़ी जगह पर जवाब नहीं होते
जो सवालों को दिये जायें
वहां रह जाते हैं बस जख्मों के निशान
……………………………
जब [...]
20 Jul
देखें यह चालाकी है या चोरी या कोई प्रयोग-आलेख
दीपक बापू कहिन पर अपना पाठ रखा और उस ब्लाग पर गया -जहां मेरे पाठ की कापी मेरे से पूछे ही रखी जा रही है-तो क्या देखता हूं कि पहले वाला पाठ उसने नहीं रखा पर आज वाला पाठ वहां पर आ गया। इतना तो समझ में आ गया है कि मेरे ब्लाग सीधे [...]
19 Jul
संगीत का लेते नाम, मचाते कोहराम-हास्य कविता
गीत और संगीत से
दिल मिल जाते हैं पर
अब तो उसकी परख के लिये
प्रतियोगितायें को अब वह
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन
उससे हमले कराये जाते
मद्धिम संगीत और गीत से
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते
कहें महाकवि दीपक बापू
‘अब गीत और [...]
4 Jul
भृतहरि शतकःमनुष्य इच्छा और आशा के कारण नाचता है
खलालापाः सोढा कथमपि तदाराश्र्चनपरैर्निगुह्मान्तर्वाष्पं हस्तिमपि शून्येन मनसा
कृतश्चियत्तस्तम्भः प्रहसितश्रिचयामञ्जलिरपि त्वमाशे मोघाशे किममपरमतो नर्तयसि माम्
हिंदी में भावार्थ-दुष्टजनों की सेवा करते हुए उनके ताने और व्यंग्य सुने। दुख के कारण हृदय में उमड्ने वाले आंसुओं को रोक और उनका मन रखने के लिए उनक सामने हंसने का दिखावा किया। मन को समझाकर उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनके [...]
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