कबीर के दोहे-अपनी सराहना स्वयं न करें (kabir darshan-dosron ke dosh)
आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय। चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा? दोष पराया [...]
कौटिल्य का अर्थशास्त्र-कार्य के तीन व्यसन (kautilya ka arthshastra-karya ke teen vyasan)
वस्तुध्वशक्येषु समुद्यनश्चेच्छक्येषु मोहादसमुद्यश्मश्च। शक्येषु कालेन समुद्यनश्व त्रिघैव कार्यव्यसनं वदंति।। हिंदी में भावार्थ-शक्ति से परे वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करना, प्राप्त होने योग्य वस्तु के लिये उद्यम न करना , और तथा शक्ति होते हुए भी शक्य वस्तु की प्राप्ति के लिये समय निकल जाने पर प्रयास करना-यह कार्य के व्यसन हैं। द्रोहो भयं [...]
श्री गीता से-वेद ज्ञान से बड़ी है ह्रदय से की गए भक्ति (ved aur bhakt-shri geeta in hindi)
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदावादरताः पार्थ नान्यदरस्तीति वादिनः।। कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।। भोगैश्वर्यप्रस्कतानां तयापहृतचेसाम्।। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।। (श्री गीता के अध्याय दो के श्लोक क्र. 42, 43, 44) हिंदी में भावार्थ-जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग [...]
कबीर वाणी-प्यार को सही ढंग से कोई नहीं समझता(kabir vani-pyar ka gyan)
प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके। [...]
चाणक्य नीति-प्रतिकार प्रतिहिंसा और प्रतिकार के भाव में दोष नहीं (chankya niti-time to time, life style)
संसार विषवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे। सुभाषितं च सुस्वादु संगतिः सुजने जनै।। हिन्दी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य जी कहते हैं कि इस विषरूपी संसार में दो तरह के फल अमृत की तरह लगते हैं। एक तो सज्जन लोगों की संगत और दूसरा अच्छी वाणी सुनना। कृते प्रतिकृतं कुर्याद् हिंसने प्रतिहिसंनम्। तत्र दोषो न पतति दुष्टे दुष्टे [...]
मनु स्मृति-अध्ययन में सुस्ती नहीं करें (manu smriti-shiksha aur susti)
अध्येयष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः। ‘अधीष्व भो! इति ब्रुयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत्।। हिंदी में भावार्थ-शिष्य को पढ़ाने के विषय में गुरु को कभी भी आलस नहीं बरतना चाहिये। इसके अलावा बेमन से भी अध्यापन का कार्य करना उचित नहीं है। अध्यापन प्रारंभ करने से पहले छात्र से कहना चाहिये कि ‘पढ़ो’ और समाप्ति पर कहना चाहिये कि विश्राम करो। [...]




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