अन्धविश्वास ने धर्म के प्रति विश्वास को कमजोर किया है-आलेख


एक मित्र ब्लाग लेखक सुरेश चिपलूनकर ने कल कुछ फोटो बनारस शहर और गंगा नदी के भेजे। वह हिंदी ब्लागजगत के सक्रिय लेखक होने के साथ दूसरों से सतत संपर्क रखने की कला में भी सिद्ध हस्त हैं और अक्सर ऐसे फोटो और वेबसाईटें ईमेल पर भेजते रहते हैं जो वैचारिक और चिंतन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होती है। कल उनके फोटो के साथ इस बात का भी जिक्र था कि हिंदू धर्म के पवित्र माने जाने वाले बनारस और गंगा नदी में कितना कचड़ा दिखाई देता है। मेरा कभी बनारस जाना नहीं हुआ पर उसके बारे मेंे सुनता रहता हूं। अनेक लोग भी इस बात की चर्चा करते हैं कि वहां गंगा में अब प्रदूषण बहुत है। कहने को इसके लिये लोग अनेक कारण बतायेंगे पर सच बात तो यह है कि इसके लिये अंध श्रद्धालू भी कम जिम्मेदार नहीं है। हिंदू अध्यात्म विश्व का सबसे श्रेष्ठ ज्ञान है पर यह भी उतना ही सच है कि सर्वाधिक अज्ञानी और अंधविश्वासी भारत में ही हैं और इसी कारण भारत के अधिकतर शहर और नदियों की पवित्रता पर विष की चादर बिछ गयी है। देखा जाये तो मंदिर केवल इसलिये बने ताकि लोग एक समूह में आकर वहां सत्संग और कीर्तन कर सकें पर अंधविश्वासों और अज्ञान की वजह से लोगों ने उनको वह कूंआं मान लिया जहां से पुण्य भरकर अपने साथ स्वर्ग ले जाया सके। अपने दैहिक कचड़े को वहां छोड़कर वह यह मान लेते हैं कि वह पवित्र हो गये। उनके उस कचड़े से दूसरे आने वाले श्रद्धालू उनको कितना कोसते हैं और उसका पाप उनके सिर ही आता है यह वह भूल जाते हैं।
पहले उन फोटो की बात करें। उनमें दिखाया गया था कि बनारस की सड़कों पर भारी कचड़ा जमा था। गंगा नदी में लाशें तैर रहीं थीं। कई जगह रेत में तो हड्डियां बिखरी पड़ी थीं। लाशें देखकर अच्छा खासा आदमी डर जाये। उनको कुत्ते खा रहे थे। कई जगह कौवे उन पर बैठे थे। कई लाशें जलने को तैयारी थी तो पास में लोग नहाते हुए दिख रहे थे। कटे हुए बालों के झुंड वहां जमा थे। यह दृश्य देखकर हृदय से भक्ति करने वाले किसी भी आदमी का मन दुःखी हो सकता है। शरीर के बाल, पुराने जूते और कपड़े मंदिरों या तीर्थों पर जाकर फैंकना किस धर्म का हिस्सा है यह कहना कठिन है क्योंकि जिन ग्रंथों को हिंदू धर्म का आधार माना जाता है उनमें ऐसी कोई चर्चा नहीं है।
यह समस्या केवल बनारस तक ही सीमित नहीं है बल्कि देश के अनेक सिद्ध और प्रसिद्ध मंदिरों मेेंं ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं। कुछ महीने पहले की बात है कि हम अपने एक मित्र के साथ स्कूटर पर अपने ही शहर से तीस तीस किलोमीटर दूर एक प्रसिद्ध मंदिर गया। वह भी पवित्र दिन था और मित्र ने आग्रह इस तरह किया कि हमने सोचा चलो हम भी हो आते हैं। वहां जाकर अपना ध्यान भी लगायेंगे और घूमना भी हो जायेगा।

मंदिर पहाड़ी पर था और रास्ते में खेत खलिहान और तालाब देखकर बहुत अच्छा लगा। शहर से दूर ताजी हवा वैसे भी मन को प्रभावित करती है। जब उस मंदिर के निकट पहुंचे तो बहुत भीड़ थी। वैसे उस मंदिर पर भीड़ इतनी नहीं होती पर उस दिन खास दिन था इसलिये आवाजाही अधिक थी। हमने मंदिर से दो किलामीटर स्कूटर रखा-उसको रखने के पांच रुपये दिये क्योंकि ऐसे मौके पर भी भक्तों के साथ कोई रियायत नहीं होती। हम दोनों पैदल पहाड़ी पर चढ़ने लगे। वहां किनारे नाईयों के पास अपने बाल कटवाने वाले लोगों का झुंड लगा हुआ था। किनारे के दोनेां और पड़े बालो के झुंड किसी का मन खराब करने के लिये काफी थे। हम चलते गये तो आगे देखा कि लोग पुरानी चप्पलें वहीं छोड़ गये थे जो कई बार हमारे पैरों में बाधा पैदा कर देती थी। मंदिर पहुंचे तो लंबी लाईन लगी थी। हमने अपने मित्र से कहा कि इस धूप में इतनी देर लाईन में खड़े होना हमारे लिये संभव नहीं हैं। हम तो कभी दोबारा आकर दर्शन कर लेंगे।’
मित्र भी निराश हो गया था पर चलते चलते वह पता नहीं मंदिर से पचास मीटर पहले ही लाईन के बीच में लग गया हम उससे उस समय थोड़ा दूर थे। तब हम मंदिर के पास ही एक टैंट के में अपने बैठने की जगह तलाशने लगे। वह एक मैदान था। वहां बालों, पुराने कपड़ों और चप्पलों के बीच खड़ा होकर हम सोचने लगे कि ‘भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान’ में आखिर ऐसा कहां संदेश मिलता है कि धार्मिक स्थानों को अपने अंधविश्वासों से अपवित्र बनाया जाये। एक तो गर्मी फिर वहां के इस दृश्य ने हमें नरक के दर्शन कराकर पीड़ा ही दी और जब तक मित्र बाहर नहीं आया उससे झेलते रहे। एक बार तो गुस्सा आया कि लोगों से कहैं कि ‘यह कौनसा भक्ति करने का तरीका है।’ पर फिर सोचा कि जिस अध्यात्मिक ज्ञान की बात हम करेंगे उसके बारे में यह अधिक बतायेंगे। यहां कई ऐसे ज्ञानी हैं जिनको कबीर,तुलसी और सूर के दोहे जुबानी याद हैं पर अंधविश्वास की धारा में वही सभी से अधिक बहते हैं।
अगर पूरे बाल कटवा दिये जायें तो दिमाग को तरावट होती है। नये कपड़े या जूते पहने से भी देह को सुखद अनुभूति होती है। अगर किसी पवित्र स्थान पर जाकर ऐसी अनुभूति की तो कोई चमत्कार नहीं है पर उसको सिद्धि से जोड़ना भ्रम है। मंदिर निर्माण का मुख्य उद्देश्य मनुष्य में सामुदायिकता की भावना का विकास करना है और उसमें सिद्धि और प्रसिद्धि को विचार तो केवल प्रचार या विज्ञापन ही है। जो लोग वहां अपनी गंदगी का त्याग करते हैं वह कहां जायेगी? इस पर कोई नहीं सोचता। अनेक लोग मंदिरों में केवल मत्था टेकने जाते हैं उनके लिये इस प्रकार की गंदगी वहां नरक जैसा दृश्य प्रस्तुत करती है।

चिपलूनकर जी ने ईमेल के ऊपर ही लिख दिया था कि अंधभक्ति और कमजोर दिलवाले इसे नहीं देखें। बहरहाल हमने फोटो देखे और इस बात को समझ गये कि वह कहना क्या चाहते हैं? उन फोटो को यहां दिखाने की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह एक व्यापक विषय है कि हम अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे होकर अंधविश्वासों का बोझ कम तक ढोते रहेंगे? अक्सर देश की संस्कृति और संस्कार बचाने की बात करने वाले आखिर इस अंधविश्वास से आंखें बंद कर क्यों अपने अभियान चलाते हैं? आम पाठक शायद न समझें पर ब्लाग जगत पर सक्रिय ब्लाग लेखक यही कहना चाहेंगे कि यह सवाल तो सुरेश चिपलूनकर जी से ही किया जाना चाहिये। अधिकतर लोगों को यह लगता है कि सुरेश चिपलूनकर जी परंपरावादी लेखकों के समूह के सदस्य हैं पर हम ऐसा नहीं मानते। उनकी उग्र लेखनी से निकले आलेखों पर सभी लाजवाब हो जाते हैं और जो विरोध करते हैं तो भी उनके तर्क कमजोर दिखते हैं। सच बात तो यह है कि सुरेश चिपलूनकर न केवल अंध विश्वासों के विरोधी है बल्कि उनके कई पाठ धर्म के नाम पर पाखंड के विरुद्ध लिखे गये हैं। उन्होंने अपने ही उज्जैन शहर के मंदिर पर हो रहे पाखंड और भ्रष्टाचार का उल्लेख अपने पाठ में लिया था। उनके इन प्रहारात्मक लेखों से लोग इसलिये भी प्रभावित होते हैं। उन्हें परंपरावादी लेखक तो हम नहीं मानते बल्कि आधुनिक विचाराधारा के परिपक्व श्रेणी के लेखकों में गिनती करते हैं।
प्रसंगवश परंपरपादी और प्रगतिशील लेखकों की बात भी कर लें। दोनों में कोई अधिक अंतर नहीं है। प्रगतिशील भारत के अंधविश्वासों को निशाना बनाते हुए यहां के समग्र चरित्र पर प्रहार करते हुए विदेशी विचारधाराओं की बात करते हैं जबकि परंपरावादी लेखक अपने पुराने ज्ञान को ही प्रमाणिक मानते हैं और अपने अंधविश्वास और पाखंड से बचते हैं। प्रगतिशील और परंपरावादियों से अलग ऐसे आधुनिक लेखक भी हैं जो अपने पुराने अध्यात्म को प्रमाणिक मानते हुए अंधविश्वास और पाखंड पर प्रहार करने का अवसर नहीं चूकते और यही कारण है कि यह तीसरा वर्ग ही भारत में परिवर्तन के लिये जूझता दिखता है। सच बात तो यह है कि कर्मकांडों का आधार स्थानीय होता है और उनका धर्म से संबंध केवल इसलिये दिखता है क्योंकि देश के अधिकतर लोगों के धार्मिक इष्ट एक ही है। कई जगह एक त्यौहार जिस तरह से मनाया जाता है तो दूसरी जगह दूसरे ढंग से। उसी तरह जाति से भी त्यौहार मनाने के तरीके से भिन्नता का आभास होता है। अगर हम कुल निष्कर्ष निकालें तो केवल अध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर ही सभी एक हैं कर्मकांडों में विरोधाभास है और वह धर्म का आधार कतई नहीं लगते। यह अलग बात है कि पहले पुराने और अब आधुनिक बाजार ने अपनी कमाई के लिये कर्मकांडों को ही धार्मिक आधार बना दिया है। सच बात तो यह है कि अंधविश्वासों की वजह से धर्म बदनाम ही हुआ है और पराये क्या अपने ही लोग उनका मजाक उड़ाते हैं। भारत के अनेक महापुरुषों में पाखंड और अंधविश्वास से दूर रहने का संदेश दिया है और उनके कृतित्व का ही नतीजा है कि हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरु माना जाता है। शेष फिर कभी
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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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1 Comment

  1. BHARATDEEP JI namaskar. Dharm manushya ko pashutva se manushyava ki aur le jane wala saadhan hai. Dukh ka vishay hai ki aaj ham dharm ke mool tatvon se anbhigya hain. Hum ne kabhi VED,UPNISHAD, PURAN, RAMAYAN,BHAGWAT ityadi shashtron ko tatva gyan ki dristi se nahin padha na samjha.Bhed chaal mein hi anurakt rahen hain aur hamare tathakathit dharm guruon ne bhi humen shikshit karne main kami hi rakhi.Aaj isi ka parinam hai ke log HINDU DHARM{VISHVA DHARM} ko gaali dene mein garv anubhav karte hain,vidharmiyon ki vahvahi batorne ke liye swdharm ko galiyan dete hain aur BEHAYA ban kar doosre mazhabon ke kaside padhte hain.ADYA JAGADGURU SHANKARACHARYA, DAYANAND, VIVEKANAND,RAMAN MAHARISHI, jaise mahapurushon ki dharti aaj andhkar main doobi hai, deshdrohi aur ARAB-ROM SAMARAJYAVADI kutsit chalen chal rahe hain,dharm parivartan ke jhanjhawat chal rahe hain,HINDUSTAN baant diya gaya ,ab bhi kai tukade karne ki poori tayyari hai, Neta apani kursiyon ko bachane ke khel main lage hain ,jaat paat ka zahar itna ghul chuka hai ki is zahar ko bhagwan SHANKAR bhi peene se mana kar skte hain. Jo HINDU DHARM -DHRITI,KSHAMA,DAM,ASTEYA,SHAUCH,INDRIYA-NIGRAHA,DHEE,VIDYA,SATYA,AKORDH jaise vaishvik lakshanon ko sthpit karta hai tatha KAAM, KRODH, LOBH, MOHA,MAD,MATSAR jaise shat ripuon se bachata hai voh pakhandiyon dwara poorntah dooshit kiya ja chuka hai,MATHO-MANDIRON AASHRAMON main pashchtya sanskriti haavi ho chuki hai, bhakt ki moti jeb hi uski bhakti ka paimana ho gaye hai .CHALI,KAPATI,EERSYALU,KUTIL,SHADYANTRAKARI,DHONGI,GUTBAAZ logo ne dharm roopi site ko HAIK kar liya hai.MUSHAYARON main HIndutva ko gaaliyan de kar taaliyan batori ja rahi hai, SADDAM to mar gaya lekin LADEN baaki hai ki sinmha garjana karne wale koi musalman nahin sasti lokpriyata ki lolup MARWARI HINDU BRAHMAN ke ghar ki jaayi janmi hai , yeh to ek udharan hai.DHARM KE KARNDHARON ab to cheto.AE UNCHI HAWELI KE VAASHINDE KABHI TO NEECHE JHAANK , DEKH PAANI TERI HADON MAIN AA GAYA HAI,Doobane ka hi pakka vichar kaar liya ho to wah bhi bata do hum apane kevat khud dhoond lenge.NIDA FAZLI ke she’r ko thoda badal kar likh raha hun.
    MANDIRON KO CHOD KE SAB BHAKT CHAL DIYE
    BUS DHONGIYON KE HAAT MAIN HINDUTVA RAH GAYA.
    Agar hamare dharm guru apane paad prkshalan ,T V par parosi ja rahi kathaon aur pravachano se thoda bhi upar uth kar hinduon ko sangthit kar ,dharmik dristi se shikshit kare to sare VIRUS nast ho jayenge aur hamare desh HINDUSTAN ka kaya kalp ho jayega saath hi bhrastachaar aur asamvedansheelta ka khatma ho kar sabhi PARAM VAIBHAWA ko prapt honge.DHARM KI JAY HO ,ADHARM KA NAASH HO ,PRANIYON MAIN SADBHAWANA HO , VISHVA KA KALYAN HO. DINESH KUMAR BISSA

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