Archive for January, 2009
31
Jan
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, Enternment, family, friends, hasya kavita, hasya-vyangya, hindi litreture, hindi writer, inlglish, internet, jagran, mastram, religion, web bhaskar, web dunia, web duniya, web jagran, web panjab kesri, web panjabkesrei, अनुभूति, अभिव्यक्ति, कविता, दीपक भारतदीप, मस्तराम, शेर-ओ-शायरी, सन्देश, साहित्य, हिन्दी. Tagged: कला, मनोरंजन, शायरी, शेर, समाज, हिंदी साहित्य, hindi poem, kavita, sahitya, shayri, sher. Leave a Comment
परदेस में पुजने से ही
देश में भगवान बनेंगे
कैसा यह उनका भ्रम है।
देश के लोगों से मिले मान से
क्या गौरव नहीं बढ़ता जो
बाहर से इनाम लूटने के लिये
दौड़ का नहीं थम रहा क्रम है।
मालिकों ने कर दिया आजाद
पर फिर भी गुलाम खड़े हैं इंतजार में
उनके दरवाजे पर
कृपा में शायद कोई मिल जाये इनाम
तो बढ़े अपने [...]
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23
Jan
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<strong>कुछ हकीकत कुछ ख्वाव
बन जाता है यूँ ही अफसाना
सुर्खियों में बने रहें अख़बारों की
चर्चा करे नाम की पूरा ज़माने
इसलिए कभी वह हादसों को ढूंढते हैं
न मिलें तो कर लेते, आगे होने का बहाना
जिन्हें आदत हो गयी भीड़ में चमकने की
उनको पसंद नहीं है हाशिये पर आना
लोगों की मस्ती और बेचैनी में ही
आता हैं उनको कमाना
जो [...]
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17
Jan
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, Enternment, IN FAMILY, India, editoriyal, family, friends, hindi litreture, inlglish, mastram, religion, web bhaskar, web dunia, web duniya, web jagran, web panjab kesri, web panjabkesrei, अनुभूति, अभिव्यक्ति, आलेख, चिंतन, दीपक भारतदीप, मस्तराम, शब्द, संपादकीय, सन्देश, साहित्य. Tagged: arya, अनार्य, आर्य, इतिहास, जातियां, लेख, हिंदी साहित्य, hindi article, sahitya. Leave a Comment
आज एक समाचार में एक इतिहासकार द्वारा इतिहास में अयथार्थ से भरे तथ्यों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों से हटाने की मांग की गयी है। उन्होंने आर्यों से संबंधित कुछ तथ्यों का प्रतिवाद किया।
एक तो यह कि आर्य कभी आक्रामक नहीं रहे और उनके द्वारा कभी भी कहीं सामूहिक नरसंहार नहीं किया गया-यह पश्चिमी अवधारणा केवल [...]
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11
Jan
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निकले थे अंधेरे में माटी के चिराग ढूंढने
पर कांच के बल्ब के टुकड़े लग गये पांव में
रौशनी ने भी अपने रूप बदले हैं
शहर चमक रहे हैं चकाचौंध में
अंधेरे का घर है गांव में
मधुर स्वर सुनने की चाह में
पहुंच गये महफिल में
पर कान लगने फटने
सभी गाने वाले लगे थे कांव-कांव में
आंखों से देखने की चाह [...]
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7
Jan
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, Enternment, bharat, hindi writer, hindu, internet, jagran, religion, web bhaskar, web dunia, web duniya, web jagran, web panjab kesri, web panjabkesrei, अध्यात्म, अनुभूति, अभिव्यक्ति, चिंतन, दीपक भारतदीप. Tagged: भारत, भाषा, लेखक, संपादकीय, समाज, हिंदी साहित्य, editorial, hindi article, sahitya. Leave a Comment
शायद वह लोग सही कहते हैं कि ‘हिंदी सिखाने के लिये रहीम,तुलसी और कबीर की रचनाओं को नहीं पढ़ाना चाहिये।’
लोग उनका विरोध कर रहे हैं पर विरोध करने वाले स्वयं ही किसी वैचारिक धरातल पर नहीं खड़े हैं। अगर हम देखें तो तुलसी, रहीम और कबीर की रचनायें हैं वह शुद्ध हिंदी की नहीं [...]
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4
Jan
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बेच रहे हैं मनोरंजन
कहते हैं उसे खबरें
भाषा के शब्दकोष से चुन लिए हैं
कुछ ख़ास शब्द
उनके अर्थ की बना रहे कब्रें
परदे पर दृश्य दिखा रहे हैं
और साथ में चिल्ला रहे हैं
अपनी आँख और कान पर भरोसा नहीं
दूसरों पर शक जता रहे हैं
इसलिए जुबान का भी जोर लगा रहे हैं
टीवी पर कान और आँख लगाए बैठे [...]
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