Posted by: दीपक भारतदीप | September 17, 2008

अपने को बैचेन कर शान्ति ढूँढने जाते-हिन्दी शायरी

चलने को ताज महल भी चल जाता है
हिलने को कुतुबमीनार भी हिल जाता है
चांद लाकर यहां भेंट किया जाता है
तारा तोड़ कर जमीन पर सजाया जाता है
बेचने वाला सौदागर होना चाहिए
ख्वाब और भ्रम बेचना यहां आसान है
अपढ़ क्या पढ़ालिखा भी खरीददार बन जाता है

सच से परे ज्ञान पाकर
अक्ल से कौन काम कर पायेगा
जिनके पास ज्ञान है
वह कभी क्यों ख्वाब या भ्रम के बाजार जायेगा
सुख-सुविधा की दौड़ में
इनाम के रूप में चाहते लोग आराम
दिल में बैचेनी और ख्वाहिशों का बोझ ढोते हुए
गुजारते है सुबह और शाम
अंधेरे में जाते रौशनी की तलाश में
रहते है सौदागरों से वफा की आस में
बदन और मन को कर देती है जो राख
उसी आग के पास चैन की तलाश में जाते हैं
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यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग
‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’

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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप


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  1. good ideas.


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