समाज की इमारत में आदमी पत्थर की तरह लग जाते-कविता साहित्य
हर पल लोगों के सामने अपना कद बढाने की कोशिश हर बार समाज में सम्मान पाने की कोशिश आदमी को बांधे रहती है ऐसे बंधनों में जो उसे लाचार बनाते ऐसे कायदों पर चलने की कोशिश जो सर्वशक्तिमान के बनाए बताये जाते कई किताबों के झुंड में से छांटकर लोगों को सुनाये जाते झूठ भी [...]
कहने वाले का कहना ही है व्यापार-व्यंग्य कविता
एक सपना लेकर सभी लोग आते हैं सामने दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन कहते हैं ‘तुम उस पर बैठ सकते हो और कर सकते हो दुनियां पर शासन उठाकर देखता हूं दृष्टि दिखती है सुनसान सारी सृष्टि न कहीं सिंहासन दिखता है न शासन होने के आसार कहने वाले का कहना ही [...]
श्रमिक पुत्र कभी अभिनेता नहीं बनता-हास्य कविता-व्यंग्य कविता
आज मजदूर दिवस है आओ सब मिलकर नारे लगायें जो गरीबों और मजदूरों को भायें जन कल्याण और न्याय के लिये जोर से आवाज उठायें फिर भूल चाहे भूल जायें एक ही दिन तो सब करना है फिर कौन पूछेगा कोई कि हम क्या कर रहे हैं मजदूर दिवस कोई रोज नहीं आता जो कोई [...]
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी उड़ा ले जाते हैं-हिन्दी शायरी
मोहब्बत में साथ चलते हुए सफर हो जाते आसान नहीं होता पांव में पड़े छालों के दर्द का भान पर समय भी होता है बलवान दिल के मचे तूफानों का कौन पता लगा सकता है जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी उड़ा ले जाते हैं खाली पड़ी जगह पर जवाब नहीं होते जो सवालों [...]
भृतहरि शतकःसज्जन की मित्रता पूर्वाद्ध की छाया के समान
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन् मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी तो साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता। आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात् दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम् जिस तरह [...]
देखें यह चालाकी है या चोरी या कोई प्रयोग-आलेख
दीपक बापू कहिन पर अपना पाठ रखा और उस ब्लाग पर गया -जहां मेरे पाठ की कापी मेरे से पूछे ही रखी जा रही है-तो क्या देखता हूं कि पहले वाला पाठ उसने नहीं रखा पर आज वाला पाठ वहां पर आ गया। इतना तो समझ में आ गया है कि मेरे ब्लाग सीधे उस [...]
संगीत का लेते नाम, मचाते कोहराम-हास्य कविता
गीत और संगीत से दिल मिल जाते हैं पर अब तो उसकी परख के लिये प्रतियोगितायें को अब वह महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते जिन सुरों से खिलना चाहिये मन उससे हमले कराये जाते मद्धिम संगीत और गीत से तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में उन पर [...]
भृतहरि शतकःमनुष्य इच्छा और आशा के कारण नाचता है
खलालापाः सोढा कथमपि तदाराश्र्चनपरैर्निगुह्मान्तर्वाष्पं हस्तिमपि शून्येन मनसा कृतश्चियत्तस्तम्भः प्रहसितश्रिचयामञ्जलिरपि त्वमाशे मोघाशे किममपरमतो नर्तयसि माम् हिंदी में भावार्थ-दुष्टजनों की सेवा करते हुए उनके ताने और व्यंग्य सुने। दुख के कारण हृदय में उमड्ने वाले आंसुओं को रोक और उनका मन रखने के लिए उनक सामने हंसने का दिखावा किया। मन को समझाकर उन्हें प्रसन्न करने के [...]
संत कबीर वाणी:विषयी लोग दीप और संत हीरे समान होते हैं
दीपक सुन्दर देखि करि, जरि जरि मरे पतंग बड़ी लहर जो विषय की, जरत न मोरे अंग संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जलते हुए दीपक की रौशनी को देखकर पतंगे जल-जल कर मर जाते हैं। उसी प्रकार जब मनुष्य के मन में विषयों की लहर हमेशा उठती है और वह उसमें बहता रहता है-उसे [...]
रहीम के दोहे:देता तो परमात्मा है किसी अन्य का भ्रम मत पालो
देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन लोग भरम पै धरे, वाते नीचे नैन कविवर रहीम कहते हैं कि इस जीवन में कुछ देने वाला तो परमात्मा है पर लोग अपने द्वारा लेने-देने की भ्रम पाल लेते है। इसी कारण हमारे नेत्र झुके रहते है। दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि सोच नहीं [...]
भृतहरि शतकःसंतोष से अमीर-गरीब समान हो जाते हैं
वयमहि परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दृकूलैस्सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः। स तु भवतु यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्र भावार्थ-इस भौतिक संसार में कोई मनुष्य वृक्ष की छाल के वस्त्र पहनकर ही संतुष्ट होता है तो किसी का मन रेशमी सूत के बने वस्त्र धारण कर ही प्रसन्न होता है। इसमें कोई आश्चर्य की [...]




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