** दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका** Mastram Deepak Bharatdeep's Hindi express patrika

February 10, 2008

पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए-hindi poem

मनोरंजन के लिए किसी
दृश्य, वस्तु या आदमी की चाहत
इन्सान को मजबूर करती है
इधर-उधर जाने के लिए
बाजार में कई बुत खडे है
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए

भटकते मन को चैन और खुशी
चंद सिक्के दिला देते हैं
जब ऊब जाये हंसने से
मनोरंजन के लिए दहला भी देते हैं
बिकता है मनोरंजन भी
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए

पर कोई ऐसी चीज नहीं मिलती जो
हर पल मन बहला सके
रोज पनपते दर्द को सहला सके
हालत यह होती की
जितने दर्द हल्का कर पाते
वह नये दर्द में जुड़कर चले आते
फिर चले जाते उन ठिकानों पर
जहाँ सजे हैं बाजार
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए

क्यों नहीं तलाशते
अपने मन में ही मनोरंजन
क्यों जाते उन लोगों के पास
जो बेचते नकली दवा दिल की
फिक्र उनको आदमी की नहीं
होती केवल अपने बिल की
कभी गानों की सजाते झूठी महफ़िल
कभी डर की रचना से बहलाते दिल
पूरी जिन्दगी गुजारते हैं
पैसा लेकर दिल बहलाने के लिए
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