** दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका** Mastram Deepak Bharatdeep's Hindi express patrika

February 4, 2008

कभी कभी खामोशी भी बहुत भली

जब कभी में चौपालों पर लिखता हूँ तो ऐसा लगता है कि कुछ लोग नहीं चाहते कि मैं वहाँ कुछ लिखूं.
कल एक चिट्ठाकार मेरे चिट्ठे पर बदतमीजी भरी कमेन्ट लिख गया और सुबह मैं जल्दी में था इसलिए उसका कोई जवाब नहीं दे सकता था पर थोडा गुस्से में उसका ब्लोग देखकर आया और फिर अपने ब्लोग से उसके कमेन्ट डीलीट कर दिए और अब उसका पता ढूंढ रहा हूँ. हालांकि मैं उसका कडा जवाब दे सकता था पर इसके पीछे उसी यह चाल भी लगती है कि वह मेरे द्वारा अपने ब्लोग की प्रसिद्धि चाहता हो. क्योंकि अक्सर कोई भी बदतमीजी करता है तो छद्म नाम से करता है, पर उसका ब्लोग और ईमेल पता मेरे ब्लोग पर दिख रहा था. इसका मतलब यह है कि वह कुछ प्रचार की उम्मीद कर रहा होगा. बहरहाल उसका पता मुझे भले ही याद न हो पर उसका ब्लोग जब मेरे सामने आयेगा तब समझ जाऊंगा.

वह मेरी एक कविता से बौखलाया हुआ लगता था जबकि उसके साथ मेरा कोई संपर्क नहीं है. अगर उसको कविता से विरोध था तो उसमें कुछ नहीं था और उसने के नहीं तीन कमेन्ट दिए थे. मुझे शक है कि वह पिए हुए था. अगर मेरे अन्य ब्लोग और रचनाओं को उसने पढा होता तो शायद वह ऐसा नहीं करता. ऐसा भी हो सकता है कि कुछ भद्र ब्लोगर जो मेरे लिखे से ग्रसित हैं उसे इसलिए तैयार किया हो कि वह मुझे आतंकित करे. उसने ब्लोग पर कुछ लिखा है, और कुछ वरिष्ठ ब्लोगर के उस पर कमेन्ट भी थे. बाकी पीछे की पोस्ट पर कोई कमेन्ट नहीं था. आज मैंने एक ब्लोग देखा पर उस पर ऐसा नहीं लग रहा कि वह सज्जन ऐसे भी हो सकते हैं.
मैंने अभी इस बारे में खामोशी अख्तियार करने का फैसला लिया है क्योंकि इससे वह लोग बहुत खुश होंगे जो मुझे अपमानित करना चाहते हैं. वैसे भी मैंने चौपालों पर अधिक लिखने का इरादा छोड़ दिया है क्योंकि वहाँ लिखने का मतलब है कि अपनी पोस्ट मछली बाजार में ले जाना.

No Comments Yet »

No comments yet.

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

Leave a comment

Blog at WordPress.com.