संत कबीर वाणी:मन का अहंकार नहीं छूट पाता

माया तजो तो क्या भया मान तजा न जाय
मन बडे मुनिवर गले, मान सभी को खाम

यदि माया मोह का किसी साधक ने अपने आत्मबल से त्याग भी कर दिया, तो भी व्यर्थ है क्योंकि वह अभिमान का त्याग नहीं हो पाता. इसके विपरीत यह अहंकार हो जाता है कि हमने अहंकार का त्याग कर दिया.

मोटी माया सब तजैं, झीनी तजी न जाय
पीर पैगंबर, औलिया, झीनी सबको खाय

स्थूल माया जो दिखती हैं उसका त्याग तो किया जा सकता हैं पर जो सूक्ष्म माया यानी जो मन में अहं का भाव है वह कभी ख़त्म नहीं होता और कई ऐसे लोग जो सिद्ध होने का दावा करते हैं वह भी इससे नहीं बच पाते

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