Posted by: दीपक भारतदीप | January 28, 2008

हिन्दी के ठेकेदार- हास्य-व्यंग्य कविता

अंतर्जाल पर एकछत्र राज्य की
कोशिश ने कुछ लोगों को अंधा बना दिया
अपने दोस्त लेखकों की भीड़ जुटाकर
सम्मान की एक दुकान को सजा दिया

एक लेखकनुमा ब्लोगर जो
लिख नहीं पाता था कविता
पसंद भी नहीं था पढ़ना
चुन लाया कहीं से तीन सर्वश्रेष्ठ
और अपना फैसला सुना दिया
कवियों के ब्लोग दूर ही रखे गए
तकनीकी वाले जरूरी थे सो पढे गए
लो मैंने अपना फैसला सुना दिया

मच गया शोर
बरसी कहीं से हास्य कवितायेँ
उसके इस काम पर
आ गया वह बचाव पर
देने लगा पुराने वाद और नारे पर बयान
कर रहा था मैं भी वर्ग में बांटकर
ब्लोग लेखकों का सम्मान
पर लोगों ने अनसुना कर दिया

अब आया एक नेतानुमा ब्लोगर
कर लाया कहीं से बीस का जुगाड़
पुराने दोस्तों को सजाया थाली में
जैसे कोई पकवान
इनके लायक ही है सर्वश्रेष्ठ का सम्मान
लोकतंत्र है सो करो मतदान
मैंने तो बीस का थाल सजा दिया

कहैं दीपक बापू
अभी शुरू भी नहीं हुई
इंटरनेट पर हिन्दी के आने की प्रक्रिया
पहुंच गए हैं धंधेबाज पहले ही
और अपना दुकान सजा दिया
हैरान है लोग
जो हिन्दी की ठेकेदार
हर जगह हैं
सन्देश देते हैं
यहाँ हिन्दी का अपमान हुआ है इस पर लिखो
जमकर विरोध करते दिखो
तुम लिखो जैसा हमने सन्देश दिया

क्या ब्लोग तुम्हारी जागीर है
जो थाल सजाये घूम रहे हो
अपनी वीरों को ही क्यों नहीं झोंकते
तुम्हारी फौज में दम नहीं है
जो हिन्दी का अपमान नहीं रोकते
फिर काहे उनको सम्मान दिया
ग़लतफ़हमी मत पालो
नारों और वाद पर हम नहीं भड़कते
लिखते हैं अपने ख्याल खुद
तुम तो पूजते हो
अपने महल सजाते हो दूसरों के सम्मान से
हिन्दी की दुर्दशा पर रोने वालों
लिखने वालों तो जीते हैं अपमान से
फिर भी दमदार लिखते हैं
वह और होंगे जो तुम्हारे सम्मान पर बिकते हैं
हिन्दी लिखने वाले तो दिल से लिखते हैं
उन्हें परवाह नहीं सम्मान तुमने
दिया कि नहीं दिया
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