Posted by: दीपक भारतदीप | January 27, 2008

सत्य से जितनी दूर जाओगे-हास्य कविता

सत्य से जितनी दूर जाओगे
भ्रम को उतना ही करीब पाओगे
खवाब भले ही हकीकत होने लगें
सपने चाहे सामने चमकने लगें
उम्मीदें भी आसमान में उड़ने लगें
पर तुम अपने पाँव हमेशा
जमीन से ऊपर नहीं उठा पाओगे

झूठ को सच साबित करने के लिए
हजार बहानों की बैसाखियों की
जरूरत होती है
सच का कोई श्रृंगार नहीं होता
कटु होते हुए भी
उसकी संगत में सुखद अनुभूति होती हैं
कब तक उससे आंखें छिपाओगे
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प्यार सच है
पर कभी दिखता नहीं है
जो दिख रहा है
वह केवल एक पल का सपना है
जिसमें होती है यह गलतफहमी कि
जो सामने वह अपना है
इस झूठ में बह गए कई लोग
अपनी हंसती-खेलती जिन्दगी
उनको चलता फिरता मुर्दा दिखता है
पराये को भी जबरदस्ती
पड़ता समझना अपना है
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