Posted by: दीपक भारतदीप | January 25, 2008

जिन्दगी ऐसे ही बीत जाती-कविता साहित्य

किसी की पीडा को दूर करने की कोशिश
जब हो जाती है नाकाम
बढ़ जाती है उसकी पीडा तो
हो जाते बदनाम
कमजोर दिल के लोगों के बीच
रहते हुए
किसी पर तरस खाने में डर लगता है
लोग दर्द के कम होने से अधिक
दूसरों को जख्म देकर खुश होने की
कोशिश कर चलाते हैं अपना काम
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समंदर की तरह उठती हैं
मन में उठतीं है लहरें
जब लौटती हैं वापस तो
इच्छाओं और आकांशाओं को
साथ लेकर छोड़ जाती हैं
आदमी ढोता है उनका बोझ
हर पल गुजारता है बैचैनी के साथ
जोड़ता रहता है हर पल सामान पर
फिर भी रहते उसके खाली हाथ
उसकी जिन्दगी ऐसे ही बीत जाती

कहीं नहीं लिखा जिन्दगी गुजारो
किसी गुलाम की तरह
पर आदमी अपनी उम्मीदों की ही
करता जिन्दगी भर गुलामी
आजादी की सोचते हुए
पूरी जिन्दगी गुलामी में बीत जाती


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